सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
गणितसारसंग्रह (महावीराचार्य - प्रो. लक्ष्मीचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

गणितसारसंग्रह (महावीराचार्य - प्रो. लक्ष्मीचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

Ganitasarasangraha of Mahaviracharya with Hindi Translation

महावीराचार्य (अनुवादक: प्रो. एल. सी. जैन) द्वारा

DevanagariHindipublished421 पृष्ठ

पृष्ठ 226, कुल 421 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 226

१७२ ] गणितसारसंग्रहः [ ६. ३११½-
अंशाप्तं व्येकं फलमाद्यन्यघ्नं गुणोनरूपहृतम् ॥ ३११½ ॥
अत्रोद्देशकः
दीनारार्धं पञ्चसु नगरेषु चयस्त्रिभागोऽभूत् । आदिस्त्र्यंशः पादो गुणोत्तरं सप्त भिन्नगुणचितिका ।
का भवति कथय शीघ्रं यदि तेऽस्ति परिश्रमो गणिते ॥ ३१३ ॥
अधिकहीनगुणसंकलितानयनसूत्रम्—
गुणचितिरन्यादिहृता विपदाधिकहीनसंगुणा भक्ता ।
व्येकगुणेनान्या फलरहिता हीनेऽधिके तु फलयुक्ता ॥ ३१४ ॥
गुणित करते हैं । इस क्रिया का फल दो स्थानों में लिखा जाता है । इस प्रकार प्राप्त, एक स्थान में रखे
हुए, फल के अंश को फल द्वारा ही भाजित करते हैं । तब उसमें से १ घटाया जाता है । परिणामी राशि
को श्रेढि के प्रथमपद द्वारा गुणित किया जाता है, और तब दूसरे स्थान में रखी हुई राशि द्वारा गुणित
किया जाता है । इस प्रकार प्राप्त गुणनफल जब १ द्वारा हासित साधारण निष्पत्ति द्वारा भाजित किया
जाता है, तब श्रेढि का इष्ट योग उत्पन्न होता है ॥ ३११½ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
५ नगरों के सम्बन्ध में, प्रथम पद १/२ दीनार है, और साधारण निष्पत्ति १/३ है । उन सबमें प्राप्त
दीनारों के योग को निकालो । प्रथमपद १/३ है, साधारण निष्पत्ति १/४ है और पदों की संख्या ७ है । यदि
तुमने गणना में परिश्रम किया हो, तो यहाँ गुणोत्तर भिन्नीय श्रेढि का योग बतलाओ ॥३१२½-३१३॥
गुणोत्तर श्रेढि का योग निकालने के लिये नियम, जहाँ किसी दी गई ज्ञात राशि द्वारा किसी
निर्दिष्ट रीति से पद या तो बढ़ाये या घटाये जाते हों—
जिसके सम्बन्ध में प्रथमपद, साधारण निष्पत्ति और पदों की संख्या दी गई है ऐसी शुद्ध गुणो-
त्तर श्रेढि के योग को दो स्थानों में लिखा जाता है । इनमें से एक को दिये गये प्रथमपद द्वारा भाजित
किया जाता है । इस परिणामी भजनफल में से पदों की दी गई संख्या को घटाया जाता है । परिणामी
शेष की प्रस्तावित श्रेढि के पदों में जोड़ी जानेवाली अथवा उनमें से घटाई जानेवाली दत्त राशि द्वारा
गुणित किया जाता है । इस प्रकार प्राप्त राशि को १ द्वारा हासित साधारण निष्पत्ति द्वारा भाजित किया
जाता है । दूसरे स्थान में रखे हुए योग को इस अन्तिम परिणामी भजनफल राशि द्वारा हासित किया
जाता है, जब कि श्रेढि के पदों में से दी गई राशि घटाई जाती हो । पर, यदि वह जोड़ी जाती हो, तो
दूसरे स्थान में रखे हुए गुणोत्तर श्रेढि के योग को उक्त परिणामी भजनफल द्वारा बढ़ाया जाता है ।
प्रत्येक दशा में प्राप्तफल निर्दिष्ट श्रेढि का इष्ट योग होता है ॥ ३१४ ॥
( ३११½ ) इस नियम में, भिन्नीय साधारण निष्पत्ति का अंश हमेशा १ ले लिया जाता है ।
अध्याय २ की ९४ वीं गाथा तथा उसकी टिप्पणी द्रष्टव्य है ।
( ३१४ ) बीजीय रूप से, ± ( श/अ - न ) म ÷ ( र - १ ) + श; यह निम्नलिखित रूपवाली श्रेढि
का योग है—
अ, अर ± म, (अर ± म) र ± म, { (अर ± म) र ± म } र ± म, ..... इत्यादि ।