गणितसारसंग्रह (महावीराचार्य - प्रो. लक्ष्मीचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)
Ganitasarasangraha of Mahaviracharya with Hindi Translation
महावीराचार्य (अनुवादक: प्रो. एल. सी. जैन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६२ ] गणितसारसंग्रहः [ ६. २७९½
इष्टसंख्याहीनयुक्तवर्गमूलानयनसूत्रम्—
उद्दिष्टो यो राशिस्त्वर्धीकृतवर्गितोऽथ रूपयुतः । यच्छति मूलं स्वेष्टात्संयुक्ते चापनीते च ॥२७९½॥
अत्रोद्देशकः
दशभिः संमिश्रोऽयं दशभिस्तैर्वर्जितस्तु संशुद्धम् ।
यच्छति मूलं गणक प्रकथय संचिन्त्य राशिं मे ॥ २८०½ ॥
इष्टवर्गीकृतराशिद्वयादिष्टघ्नादन्तरमूलदिष्टानयनसूत्रम्—
सैकेष्टव्येकेष्टावर्धीकृत्याथ वर्गितौ राशी । एताविष्टघ्नावथ तद्विश्लेषस्य मूलमिष्टं स्यात् ॥२८१½॥
जो किसी ज्ञात संख्या द्वारा बढ़ाई अथवा हासित की जाती है, ऐसी अज्ञात संख्या के वर्गमूल
को निकालने के लिये नियम—
दी गई ज्ञात राशि को आधा करके वर्गित किया जाता है और तब उसमें एक जोड़ा जाता है ।
परिणामी संख्या को, जब या तो इच्छित दी हुई राशि द्वारा बढ़ाते हैं अथवा उसी दी हुई राशि द्वारा
हासित करते हैं, तब यथार्थ वर्गमूल प्राप्त होता है ॥ २७९½ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
एक संख्या है, जो जब १० द्वारा बढ़ाई जाती है अथवा १० द्वारा हासित की जाती है, तो यथार्थ
वर्गमूल को देती है । हे गणक, ठीक तरह सोच कर वह संख्या बताओ ॥ २८०½ ॥
ज्ञात संख्या द्वारा गुणित इष्ट वर्ग राशियों की सहायता से, और साथ ही इन गुणनफलों के
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