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गणितसारसंग्रह (महावीराचार्य - प्रो. लक्ष्मीचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

गणितसारसंग्रह (महावीराचार्य - प्रो. लक्ष्मीचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

Ganitasarasangraha of Mahaviracharya with Hindi Translation

महावीराचार्य (अनुवादक: प्रो. एल. सी. जैन) द्वारा

DevanagariHindipublished421 पृष्ठ

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पृष्ठ 219

-६. २९१ ] मिश्रकव्यवहारः [ १६५
अत्रोद्देशकः
परिधिशरा अष्टादश तूणीरस्थाः शराः के स्युः ।
गणितज्ञ यदि विचित्रे कुट्टीकारे श्रमोऽस्ति ते कथय ॥ २८९ ॥
इति मिश्रकव्यवहारे विचित्रकुट्टीकारः समाप्तः ।
श्रेढीबद्धसंकलितम्
इतः परं मिश्रकगणिते श्रेढीबद्धसंकलितं व्याख्यास्यामः ।
हीनाधिकचयसंकलितधनानयनसूत्रम्—
व्येकार्धपदोनाधिकचयघातोनान्वितः पुनः प्रभवः ।
गच्छाभ्यस्तो हीनाधिकचयसमुदायसंकलितम् ॥ २९० ॥
अत्रोद्देशकः
चतुरुत्तरदश चादिर्हीनचयस्त्रीणि पञ्च गच्छः किम् ।
द्वावादिवृद्धिचयः षट् पदमष्टौ धनं भवेदत्र ॥ २९१ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
परिध्यान शरों की संख्या १८ है । कुल मिलाकर तरकश में कितने शर हैं, हे गणितज्ञ, यदि
तुमने विचित्र कुट्टीकार के सम्बन्ध में कष्ट किया है, तो इसे हल करो ॥२८९॥
इस प्रकार, मिश्रक व्यवहार में विचित्र कुट्टीकार नामक प्रकरण समाप्त हुआ ।
श्रेढीबद्ध संकलित ( श्रेणियों का संकलन )
इसके पश्चात् हम गणित में श्रेणियों के संकलन की व्याख्या करेंगे ।
धनात्मक अथवा ऋणात्मक प्रचयवाली समान्तर श्रेणी के योग को निकालने के लिये नियम:—
प्रथमपद उस गुणनफल के द्वारा या तो घटाया अथवा बढ़ाया जाता है, जो ऋणात्मक या
धनात्मक प्रचय में श्रेणी के एक कम पदों की संख्या की अर्द्ध राशि का गुणन करने से प्राप्त होता है ।
तब यह प्राप्तफल श्रेणी के पदों की संख्या से गुणित किया जाता है । इस प्रकार, धनात्मक अथवा
ऋणात्मक प्रचयवाली समान्तर श्रेणी के योग को प्राप्त किया जाता है ॥२९०॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
प्रथम पद १४ है; ऋणात्मक प्रचय ३ है; पदों की संख्या ५ है । प्रथमपद २ है; धनात्मक प्रचय
६ है; और पदों की संख्या ८ है । इन दशाओं में से प्रत्येक में श्रेणी का योग बतलाओ ॥२९१॥
( २९० ) बीजीय रूप से, ( (न - १)/२ ब ± अ ) न = श, जहाँ न पदों की संख्या है, अ प्रथम पद है;
ब प्रचय है, और श श्रेणीका योग है ।