गणितसारसंग्रह (महावीराचार्य - प्रो. लक्ष्मीचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)
Ganitasarasangraha of Mahaviracharya with Hindi Translation
महावीराचार्य (अनुवादक: प्रो. एल. सी. जैन) द्वारा
पृष्ठ 223, कुल 421 में से
संदर्भ में पढ़ेंी श्रेढि की दी हुई संख्या के पदों का योग निकालने के लिए नियम, जहाँ पद उत्तरोत्तर १ से लेकर निर्दिष्ट सीमा तक प्राकृत संख्याओं के योग हों, तथा ये सीमित संख्यायें दी हुई समान्तर श्रेढि के पद हों— समान्तर श्रेढि में दी गई श्रेढि की पदों की संख्या की दुगुनी राशि को एक द्वारा कम करते हैं, और तब प्रचय के वर्ग द्वारा गुणित करते हैं । यह गुणनफल ६ द्वारा भाजित किया जाता है । प्राप्त फल प्रचय की अर्द्धराशि में जोड़ा जाता है, और साथ ही प्रथम पद और प्रचय के गुणनफल में भी जोड़ा जाता है । इस प्रकार प्राप्त योग को एक कम पदों की संख्या द्वारा गुणित किया जाता है । प्राप्त गुणन- फल को प्रथम पद तथा १ में प्रथम पद जोड़ने से प्राप्तराशि के गुणनफल में जोड़ा जाता है । इस प्रकार प्राप्तराशि को जब श्रेढि के पदों की संख्या की अर्द्ध राशिद्वारा गुणित किया जाता है, तो ऐसी श्रेढि का इष्ट योग प्राप्त होता है, जिसके स्वपद ही निर्दिष्ट श्रेढि के योग होते हैं ॥३०५-३०५½॥`
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( ३०३ ) बीजीय रूप से,
± श अ ( अ ~ ब ) + श² ब = समान्तर श्रेढि के पदों के घनों का योग,
Wait, look at the formula:
`± श अ