ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
श्रेयान् स्वधर्मो विगुणः परधर्मात् स्वनुष्ठितात् ।
स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम् ॥ ४७ ॥
अपने हितके लिये सब । नीम है सुख दायक जब ।
उसके तीतापनसे तब । उक्तायें कैसे ॥ २४ ॥
फलनेसे प्रथम जैसे । आशा भंग होता केलेसे ।
इसीलिये उखाडनेसे । फल मिलेगा क्या ॥ २५ ॥
स्वधर्मका आचरण । करना जान कठिन ।
तजा तो मोक्ष अर्जुन । मिलेगा कहां ? ॥ २६ ॥
तथा अपनी जो माता । कुलटा होनेसे पार्था ।
तो भी होते हैं जीविता । स्नेह न होता टेढा ॥ २७ ॥
अथवा जो है परकीय । रंभासे सुंदर काय ।
उससे मिले क्या स्तन्य । बालकको कभी ॥ २८ ॥
अजी ! पानीसे भी बहुत । गुणमें उत्तम घृत ।
इससे कह मीन पार्थ । रहेगा क्या उसमें ॥ २९ ॥
विश्वको होता है जो विष । जंतुओंका वह पीयूष ।
तथा विश्वका गुड देख । विष है उनको ॥ ९३० ॥
इसीलिये है जो शास्त्र-विहित । कर्मसे खुलता भव अंकित ।
तभी कष्टदायक भी विहित । करना कर्म ॥ ३१ ॥
अपना विहित-कर्म तजकर । दूसरोंका भला जो अपनाकर ।
जैसे पैरोंसे चलना छोडकर । चलना सिरसे ॥ ३२ ॥
इसीलिये जो कर्म अपना । स्वभावसे मिला हुवा मान ।
करनेसे ही कर्म-बंधन । छूटता पार्थ ॥ ३३ ॥
तथा स्वधर्मको पालना । पर-धर्म जान तजना ।
यह नियम न पालना । उस समय ॥ ३४ ॥
हलका अपना धर्म भला है पर धर्मसे ।
जलता दोष जो कर्म नियुक्त जो स्वभावसे ॥ ४७ ॥
७९३ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग
जब न होता आत्मानुभव । कर्म नहीं छूटता पांडव ।
उन्हे भोगना दुःख सदैव । मिलता मात्र ॥ ३५ ॥
सहजं कर्म कौंतेय सदोषमपि न त्यजेत् ।
सर्वारंभा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः ॥ ४८ ॥
प्रत्येक कर्म करते समय प्रारंभमें आयास होते हैं—
इसीलिये किसी भी कर्ममें । आयास होते हैं प्रारंभमें ।
तब कह तू क्या स्वधर्ममें । रहा दोष ॥ ३६ ॥
अजी ! सरल मार्ग चलना । पैरोंका यदि है थक जाना ।
तो घने जंगलमें घुसना । तब भी वही ॥ ३७ ॥
शिला या साथ लिया पाथेय । एक ही भार है धनंजय ।
विश्रांतिमें जो सुखका होय । लेना है वही ॥ ३८ ॥
वैसे तो दाना और भूसा । कूटनेमें श्रम एक-सा ।
पकानेमें श्वानका मांस । तथा हविष्यान्न ॥ ३९ ॥
दधि तथा जलका मंथन । व्यापार जैसा एक समान ।
बालू तथा तिलोंका पेरना । एक ही जैसा ॥ ९४० ॥
करनेमें नित्यका होम हवन । जलाके आग करना दहन ।
फूंकके धूम सहना है अर्जुन । एक जैसा ही ॥ ४१ ॥
धर्म-पत्नी या वारांगना । पोसनेमें कष्ट समान ।
वारांगना रुख करना । अन्याथ क्या दूसरा ॥ ४२ ॥
पीठमें लगके हथियार । आती जब मृत्यु धनुर्धर ।
तब सम्मुख हो लडकर । करना विक्रम ॥ ४३ ॥
अकुल की मारके भयसे । परगृहमें खाती है वैसे ।
अपने पतिको तजनेसे । मिला ही क्या अपना ॥ ४४ ॥
सहज प्राप्त जो कर्म न छोडना सदोष भी ।
दोष हैं सब कर्मोंमें जैसे हैं धूम आगमें ॥ ४८ ॥
ज्ञानेश्वरी ७९५
वैसे कमी कोई कर्म । नहीं होता बिना श्रम ।
तब है विहित कर्म । करना क्या बुरा ॥ ४५ ॥
लेनेसे जब अल्प अमृत । मिलता है अमर जीवित ।
तब सर्वस्व देनेमें पार्थ । जाता क्या अपना ॥ ४६ ॥
अजी ! क्यों मूल्य देकर । पीना विष खरीद कर ।
मरना आत्म-दाह कर । पड़ता है जो ॥ ४७ ॥
वैसे कष्ट देकर इंद्रियोंको । खर्च कर आयुष्यके दिनोंको ।
और क्या इकट्ठा किया पापको । दुःखके लिये ॥ ४८ ॥
इसलिये पालना स्वधर्म । पालनेसे दूर होते श्रम ।
तथा उचित देता परम- । पुरुषार्थ राज ॥ ४९ ॥
यह कारण है अर्जुन । स्वधर्मका ही आचरण ।
संकट समयमें स्मरण । सिद्ध मंत्रका जैसे ॥ ९५० ॥
या नांव जैसे समुद्रमें । दिव्यौषधि महारोगमें ।
तथा स्वधर्म जगतमें । नहीं भूलना ॥ ५१ ॥
फिर करना कपिध्वजा । स्वकर्मसे ही महापूजा ।
तुष्ट हो ईश तम रज । करेगा दूर ॥ ५२ ॥
शुद्ध सत्वकी है बाट । तथा अपनी उत्कंठा ।
भव स्वर्ग कालकूट । दिखांती ऐसे ॥ ५३ ॥
जिस वैराग्यके कहे लक्षण । यही पहले संसिद्धि लक्षण ।
वहां पहुंचना है विलक्षण । जिस स्थान पर ॥ ५४ ॥
इस भूमिकाको प्राप्त कर । साधक वैसे होता है फिर ।
सर्वत्र क्या पाना धनुर्धर । कहता हूं अब ॥ ५५ ॥
निर्मल स्नेह पक्व-फलकी भांति अलिप्त होता है—
देहादिक है संसारमें । तन ही पड़ा है फंदेमें ।
फंस भी न आता जालमें । वायु जैसे ॥ ५६ ॥
७९५ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग'
असक्तबुद्धिः सर्वत्र जितात्मा विगतस्पृहः ।
नैष्कर्म्यसिद्धिं परमां संन्यासेनाधिगच्छति ॥ ४९ ॥
जैसे आता है पकताका काल । न डांड फल या फल डंटल ।
न धरता वैसे स्नेह निर्मल । होता है सर्वत्र ॥ ५७ ॥
पुत्र संपदा कलत्र । इससे होता स्वतंत्र ।
मेरा न कहता पात्र । विषका जैसे ॥ ५८ ॥
रहने दे यह विषय-मात्रसे । बुद्धि मुडती है पीछे चली जैसे ।
पीछे लौटकर एकांतमें ऐसे । रहती है हृदयमें ॥ ५९ ॥
ऐसे है उसका अंतःकरण । बाहर आनेसे डरता जान ।
राजाकी सौगंधसे लेके प्रण । न आती दासी जैसे ॥ १६० ॥
इस प्रकार जो चित्त । एकाग्र करके पार्थ ।
आत्म-चिंतनमें नित । लगाता है ॥ ६१ ॥
दृष्टादृष्ट कामना तब । जैसे नष्ट हो जाती हैं सब ।
आग राखमें दबती तब । धुंवा नहीं आता ॥ ६२ ॥
मन होता ऐसा अंतर्मुख । इच्छाएं नष्ट होती हैं देख ।
तब प्राप्त करता साधक । भूमिका ऐसी ॥ ६३ ॥
अनासक्त कर्मयोगीकी संन्यस्त अवस्था—
विपरीत ज्ञान संपूर्ण । नष्ट हो करके अर्जुन ।
ज्ञानमें ही अंतःकरण । होता है स्थिर ॥ ६४ ॥
संचित जैसे व्ययसे चुकता । वैसे प्राचीन भोगसे मिटता ।
नया क्रियमाण नहीं होता । किसी कर्मसे ॥ ६५ ॥
ऐसी जो कर्म-समय दशा । वहां बनती है वीरेशा ।
फिर श्रीगुरु आप ऐसा । मिल जाता है ॥ ६६ ॥
न कहीं रख आसक्ति जीतके मन निःस्पृह ।
नैष्कर्मकी महासिद्धि पाता संन्यास साधके ॥ ४९ ॥
ज्ञानेश्वरी ७९६
रातके जो चार प्रहर । होते ही मिटाके अंधार ।
आंखोंको दीखता भास्कर । उसी भांति ॥ ६७ ॥
अथवा आकर फलकी घौंद । करता केलेका बढ़ना बंद ।
श्रीगुरु मिल साधकको छंद । जगाते हैं मोक्षका ॥ ६८ ॥
चंद्र जो पूर्णिमासे आलिंगित । तजता जैसे सभी व्यंग पार्थ ।
वैसे उसको मिलती सतत । श्रीगुरुकी कृपा ॥ ६९ ॥
अज्ञान मात्र तब जो रहता । उस कृपासे है सभी मिटता ।
रजनी सहित है जैसे जाता । अंधार सारा ॥ ९७० ॥
अज्ञानके गर्भमें जैसे । कर्म कर्ता औ' कार्य ऐसे ।
यह त्रिपुटी रहनेसे । गर्भिणी ही मरी ॥ ७१ ॥
ऐसे अज्ञान नाशके साथ । नष्ट होते हैं सभी क्रिया जात ।
ऐसे समूल संभव पार्थ । होता संन्यास ॥ ७२ ॥
मूल अज्ञान संन्याससे ऐसे । दृश्यका स्थान ही मिट जानेसे ।
वहां जानना रहता है ऐसे । आत्मतत्व ॥ ७३ ॥
जगने पर जैसे अर्जुन । डूबे थे ऐसे स्थान ।
करना पड़ता क्या गमन । बचानेको ॥ ७४ ॥
जो न मैं जानता वह जानूंगा । ऐसा दुष्ट स्वप्न जब मिटेगा ।
ज्ञाता ज्ञान विरहित जो होगा । चिदाकाश केवल ॥ ७५ ॥
सुखाभास सह वह दर्पण । दूर करनेसे अर्जुन ।
रहता देखनेके बिन । देखनेवाला जो ॥ ७६ ॥
वैसे न जानना जो गया । साथ जानना भी ले गया ।
फिर निष्क्रिय रह गया । चिन्मात्रा ही ॥ ७७ ॥
स्वभावसे वहां धनंजय । न रही किसी भांतिकी क्रिया ।
इसीलिये वह कहा गया । नैष्कर्म्य ऐसा ॥ ७८ ॥
होता है जब वायुका लोप । उससे होता तरंग लोप ।
तब जैसे रहता है आप । समुद्र मात्र ॥ ७९ ॥
७९७ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग
ऐसे होना जब नहीं घड़ता । वह नैष्कर्म्य सिद्धि है कहाता ।
सभी सिद्धियोंमें यह जो होता । परम श्रेष्ठ ॥ ९८० ॥
मंदिरके कार्यमें कलश । गंगाकी सीमा सिंधु-प्रवेश ।
वैसे सुवर्ण-सिद्धिमें कस । सोलहवा अंतिम ॥ ८१ ॥
ऐसे अपना अज्ञान । मिटा देता जो वह ज्ञान ।
वह भी निगल अर्जुन । रहनेकी दशा ॥ ८२ ॥
इसके पर कुछ नहीं । पाना ऐसे रहता नहीं ।
इसीलिये कहना यही । परम-सिद्धि ॥ ८३ ॥
किंतु यही जो आत्म-सिद्धि । जैसे है कोई भाग्य-निधि ।
श्रीगुरुकृपा-उपलब्धि । होती तब मिलती ॥ ८४ ॥
सिद्धिं प्राप्तो यथा ब्रह्म तथाप्नोति निबोध मे ।
समासेनैव कौंतेय निष्ठा ज्ञानस्य या परा ॥ ५० ॥
ब्रह्मत्व-सिद्धिका विवेचन—
उदय होते ही दिनकर । प्रकाश ही होता है अंधार ।
अथवा दीप सह् कर्पूर । होता है दीप ॥ ८५ ॥
अथवा लवण-कणिका । मिलकर जैसे उदका ।
होती है आप भी उदक । उसी प्रकार ॥ ८६ ॥
या निद्रित होता है जागृत । स्वप्न सह् नींद होती व्यर्थ ।
तथा अपना रूप जागृत । पाना जैसे ॥ ८७ ॥
जिस किसीके सुदैवसे । श्रीगुरु-वाक्य श्रवणसे ।
द्वैत निगल स्थिरतासे । रहता स्ववृत्तिमें ॥ ८८ ॥
श्रवण वचनका मिलन । होते ही जैसे सुन अर्जुन ।
स्वयं-स्वरूप हो जाना मान । अपने आपमें ॥ ८९ ॥
मिला है सिद्धिमें ब्रह्म कैसे किस प्रकारसे ।
ज्ञानकी श्रेष्ठ जो निष्ठा अल्पमें कहता सुन ॥ ५० ॥
ज्ञानेश्वरी ७९८
उसको फिर कुछ करना । रहता क्या कह अर्जुन ।
आकाशको आना तथा जाना । रहता है क्या ॥ ९९० ॥
इसीलिये उसको कहीं । त्रिशुद्धि करना है नहीं ।
न हुवा ऐसे कुछ कहीं । उसके लिये ॥ ९१ ॥
उन्हे स्व-कर्मकी अग्निमें । काम्य निषेध ईंधनमें ।
रज तमको जलानेमें । करना प्रारंभ ॥ ९२ ॥
पुत्र वित्त तथा परलोक । इन तीनोंका जो अभिलाष ।
हुवा जैसे अपना सेवक । ऐसे होगा ॥ ९३ ॥
स्वैर इंद्रियोंमें सर्व-स्पर्शसे । आई हुई जिस मलिनतासे ।
मुक्त करनेमें प्रत्याहारसे । किया जाता स्नान ॥ ९४ ॥
तथा स्वधर्मका जो फल । ईश्वरार्पण करके बल ।
लेकर किया है गरल । वैषम्यका वह ॥ ९५ ॥
आत्म-साक्षात्कारमें ऐसे । ज्ञानका उत्कर्ष हो कैसे ।
इसकी सामग्री जो ऐसे । पाता है वह ॥ ९६ ॥
तथा है ऐसे ही समय । सद्गुरु मिले धनंजय ।
उसने ज्ञान-दान कार्य । सही किया तो भी ॥ ९७ ॥
वैराग्यका लाभ और श्रीगुरुके लोभसे अनुभव-अंकुर फूटता है-
औषध लेते ही तत्क्षण । रोगमें आयेगा क्या गुण ।
या सूर्योदयसे तत्क्षण । मध्यान्ह होगा क्या ॥ ९८ ॥
सुक्षेत्र तथा है जो तर । बोया बीज गला सुंदर ।
किंतु फल आनेमें देर । लगेगा ही ॥ ९९ ॥
चले मार्ग पर जो सरल । वहां मिला सत्संगका मेल ।
पहुंचने तक कुछ काल । लगेगा ही ॥ १००० ॥
ऐसे हुवा वैराग्यका लाभ । तथा मिला श्रीगुरुका लोभ ।
अंतःकरणमें फूटा कोंब । विवेकका ॥ १ ॥
७९९ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग
वह ब्रह्म ही एक सत । दूसरा संपूर्ण है भ्रांत ।
इसको जिसने प्रतीत । किया है दृढ ॥ २ ॥
किंतु वह जो परब्रह्म । सर्वात्मक है सर्वोत्तम ।
जिससे मोक्षका भी काम । रहता नहीं ॥ ३ ॥
अपनेमें ही यह जो ज्ञान । पचाता तीनो अवस्था जान ।
उस ज्ञानका भी आलिंगन । करती जो वस्तु ॥ ४ ॥
ऐक्यकी एकता होती समाप्त । आनंद कण भी होता है लुप्त ।
कुछ न करके रहता नित । जो है कुछ ॥ ५ ॥
उस ब्रह्ममें ही लय होकर । रहना है ब्रह्म ही बनकर ।
क्रमसे उसको भी प्राप्त कर । लिया है तब ॥ ६ ॥
जैसे है कोई बुभुक्षित । करता षड्रसान्न प्राप्त ।
तब प्रति ग्राससे तृप्त । होता है वैसे ॥ ७ ॥
मिला वैराग्य-स्नेहका भरण । विवेक दीप कर प्रज्वलन ।
उसमेंसे आत्म-तत्व निधान । पा लेना है ॥ ८ ॥
भोगना है आत्म-ऋद्धि । इतनी योग्यता सिद्धि ।
जिसने है निरवधि । पायी भूषण रूप ॥ ९ ॥
जिस क्रमसे वह ब्रह्म । होता जाता यह सुगम ।
उस क्रमका अब मर्म । कहता हूं सुन ॥ १०१० ॥
बुद्ध्या विशुद्धया युक्तो धृत्यात्मानं नियम्य च ।
शब्दादीन्विषयांस्त्यक्त्वा रागद्वेषौ व्युदस्य च ॥ ५१ ॥
द्वंद्व चिंता छोड़ कर स्व-चिंतन करना शुद्ध-बुद्धि है—
श्रीगुरुके दिखाये मार्ग पर । चारु विवेक-तीर्थ तटपर ।
साधक बुद्धिका मल धोकर । तदुपरांत ॥ ११ ॥
जुड़ाके सात्विकी बुद्धि धृतिकी डोर खींचके ।
तजके शब्द स्पर्शादि जीतके राग-द्वेषको ॥ ५१ ॥
ज्ञानेश्वरी ८००
फिर जो राहुके मुखसे मुक्त । चंद्र-प्रभा चंद्रसे आलिंगित ।
वैसे शुद्ध बुद्धि करती प्राप्त । अपने ही रूपको ॥ १२ ॥
जैसे दोनों कुलको तजकर । प्रिया प्रियमें रत निरंतर ।
वैसे द्वंद्व चिंतन तजकर । करती स्वचिंतन ॥ १३ ॥
वैसेही ज्ञान जैसे जीवन । विषयोंमें ले जा अनुदिन ।
इंद्रियोंसे किये बडे जान । शब्दादिक जो ॥ १४ ॥
दूर होते ही रश्मि जाल । मिट जाता है मृगजल ।
वैसे ही धृतिसे निर्मल । किये पांचोंही ॥ १५ ॥
खाया हुवा जो अधमान्न । करते हैं जैसे वमन ।
इंद्रियोंसे ऐसे वासना । सह किया विजय ॥ १६ ॥
आत्माकार वह वृत्ति फिर । लगाके गंगाके तट पर ।
प्रायश्चित्त किया जो धोकर । शुद्धिकारक ॥ १७ ॥
तब उसने सात्विक दृष्टिसे । विशुद्ध किये हुए इंद्रियोंसे ।
मन सह योग-धारणासे । लगाई वह ॥ १८ ॥
वैसे ही प्राचीन इष्टानिष्ट । होती है भोगोंसे जब भेंट ।
आयी हुई कटुतासे रुष्ट । होते नहीं कभी ॥ १९ ॥
या मिले सुंदर विषय । प्रारब्धवश धनंजय ।
न करते उस समय । अभिलाषा भी ॥ १०२० ॥
ऐसे इष्टानिष्टमें पार्थ । रागद्वेषसे हो रहित ।
वन गिरि-गुहामें नित । करते वास ॥ २१ ॥
साधनावस्थाका विवेचन—
भीड भाड तजकर । वनस्थलमें जाकर ।
अंगों सह धनुर्धर । रहता आप ॥ २२ ॥
शम-दमादिकोंसे खेलना । सदा मौनसे ही है बोलना ।
गुरु-वचनोंमें बिताना । समय सारा ॥ २३ ॥
(90) ८०१ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-जोशी
विविक्तसेवी लघ्वाशी यतवाक्कायमानसः ।
ध्यानयोगपरो नित्यं वैराग्यं समुपाश्रितः ॥ ५२ ॥
शरीरमें बल रहना । अथवा भूखको मिटाना ।
या जीभके पूर्ण करना । मनोरथ सारे ॥ २४ ॥
करनेमें वह भोजन । नहीं जानता है ये तीन ।
संतुष्ट होता है अल्पान्न । खाकर ही वह ॥ २५ ॥
आसनकी उष्णतासे । प्राणकी क्षति होनेसे ।
रहे प्राण जितनेसे । उतनाही खाना ॥ २६ ॥
जैसे पर-पुरुषकी इच्छा मान । न देती कुल-वधु अपना तन ।
वैसे ही निद्रालस्य दायक अन्न । खाता ही नहीं ॥ २७ ॥
दंडवत जब वह करता । तभी तन भूमिस्पर्श करता ।
वैसे ही भूमिपे वह नहीं पड़ता । अविचारसे कभी ॥ २८ ॥
शरीर निर्वाह हो अपना । उतने हाथ पैर हिलाना ।
ऐसे है अंतर्बाह्य अपना । संयम करता ॥ २९ ॥
तथा देख मनका चौखट । वृत्ति नही जाती निकट ।
वहां वाचाकी जो खटपट । रहती ही कहां ॥ १०३० ॥
ऐसे तन वचन मानस । जीतके सब बाह्य प्रदेश ।
आधीन करना है आकाश । ध्यानका उसको ॥ ३१ ॥
गुरु-वाक्यसे होता जो जागृत । उस बोधमें देखता निश्चित ।
दर्पणमें जैसे देखता पार्थ । अपना स्वरूप ॥ ३२ ॥
अपनेको ही है ध्यानस्थ । ध्यान-रूप वृत्तिमें पार्थ ।
ध्येयत्वसे लेता है नित । ध्यान प्रकार वह ॥ ३३ ॥
ध्यान ध्येय और ध्याता । होते हैं एकरूपता ।
तब तक पांडुसुता । करना ध्यान ॥ ३४ ॥
वाक् काय मनको जीत एकांत अल्प सेवन ।
दृढ वैराग्यसे युक्त डूबा जो ध्यान-योगमें ॥ ५२ ॥
ज्ञानेश्वरी ८०२
इसीलिये जो है मुमुक्षु । आत्म-ज्ञानमें होता दक्ष ।
सदैव वह योग-पक्ष । लेकर रहता ॥ ३५ ॥
अपान रंध्रद्वय । बीचमें धनंजय ।
उसके जो है मध्य । एडीसे दबाके ॥ ३६ ॥
आकुंचन करना अध । करके तीन ही बंध ।
होते हैं जो वायुभेद । करना एक ॥ ३७ ॥
कुंडलिनीको जगाकर । अध्यात्मका विकासकर ।
आधारादिसे भेद कर । सहस्रार तक ॥ ३८ ॥
सहस्रदलका जो मेघ । पीयूष बर्षता सवेग ।
उसके मूल पर ओघ । ला करके ॥ ३९ ॥
नाचता रहता पुण्य गिरिपर । उस चैतन्य भैरवका खापर ।
मन-प्राण खिचडीसे भरकर । तदुपरांत ॥ १०४० ॥
योगाभ्यास दृढ होने पर । यह तीनों बंध आगे कर ।
किया है ध्यान पिछली ओर । ब्रह्म सिद्ध ॥ ४१ ॥
तथा योग और ध्यान । दोनों हो पूर्ण निर्वहन ।
आत्म-ज्ञानमें हो लीन । सो पहले ही ॥ ४२ ॥
वीतराग सरीखा । जोड़ रखा है सखा ।
वह सभी भूमिका । करता पार ॥ ४३ ॥
देखना जो है दीखने तक । साथ देना आंखोंको दीपक ।
तब न दीखेगी कहां तक । वह जो वस्तु ॥ ४४ ॥
ऐसे करता जो मोक्ष प्रवर्तन । ब्रह्ममें चित्त हो जाने तक लीन ।
साथ रहता है वैराग्य अर्जुन । उसका नाश कैसे ॥ ४५ ॥
इसीलिये है वैराग्य । ज्ञानाभ्यासका सौभाग्य ।
करके देता जो योग्य । आत्म-लाभ ॥ ४६ ॥
वैराग्यका कवच पहन कर । उससे जैसे वज्रांग बनकर ।
वह राजयोगके तुरंग पर । होता आरूढ ॥ ४७ ॥
८०३ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग
फिर जो दृश्य दृष्टि-पथमें आता । उसमें जो छोटा बड़ा दीखता ।
उसे मिटाने ध्यान खड्ग धरता । विवेक मुष्टिमें ॥ ४८ ॥
अहंकारं बलं दर्पं कामं क्रोधं परिग्रहम् ।
विमुच्य निर्ममः शांतो ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥ ५३ ॥
ब्रह्म प्राप्ति पथके ये शत्रु—
ऐसे संसार-रणांगण पर । सूर्यसा जाता चीरता अंधार ।
मोक्षश्रीका बनने भर्त्तार । निर्भय होके ॥ ४९ ॥
वहां जो रोकने आता । उस वैरीको मारता ।
उसमें पहला होता । देहाहंकार ॥ १०५० ॥
मार कर वह नहीं छोड़ता । जन्म देकर जीने नहीं देता ।
पेंचमें डाल कुंठित करता । अस्थि पंजरके ॥ ५१ ॥
देह दुर्ग उसका सहारा । तोड कर लिया धनुर्धरा ।
तथा बल है यह दूसरा । मारा शत्रू ॥ ५२ ॥
विषयोंका नाम ही सुनकर । बढ़ जाता चौगुनेसे ऊपर ।
मृतावस्थामें यह धनुर्धर । पहुंचाता विश्वको ॥ ५३ ॥
वह है विषय-विषका गर्त । सब दोषोंका चक्रवर्ती पार्थ ।
किंतु कैसे ध्यान-खड्गका घात । सहेगा वह ॥ ५४ ॥
प्रिय विषय जब होते प्राप्त । उस सुखको कर अभिव्यक्त ।
वही आवरण डालके पार्थ । करता है गर्जना ॥ ५५ ॥
सन्मार्गको ही जो भुलाता । अधर्म वनमें फंसाता ।
बाघके मुखमें है देता । नरकादिक ॥ ५६ ॥
विश्वाससे मारता जो रिपु । निर्मम कर देता है दर्प ।
जिसके नामसे आता कंप । तपस्वियोंको ॥ ५७ ॥
बल दर्प अहंकार काम क्रोध परिग्रह ।
छोड़ कर स-ममत्व पाता है ब्रह्म शांतिसे ॥ ५३ ॥
ज्ञानेश्वरी ८०४
क्रोध जैसा है महादोष । जिसका होता परिपाक ।
भरनेसे होता अधिक । रीता ही जो ॥ ५८ ॥
वह काम जिस स्थान पर । नष्ट होता उस स्थान पर ।
क्रोध भी सहज धनुर्धर । होता है नष्ट ॥ ५९ ॥
जड़ ही तोड़नेसे जैसे । शाखायें नष्ट होती वैसे ।
वैसे ही कामके नाशसे । नासता है क्रोध ॥ १०६० ॥
इसीलिये वैरी है जो काम । उसीका मिटाया जब नाम ।
मिटता जैसे गमनागम । क्रोधका भी ॥ ६१ ॥
जैसे अपना अड़गोड़ा समर्थ । अपराधीके सिरपे होता पार्थ ।
वैसे भोग देकर होता समर्थ । परिग्रह ॥ ६२ ॥
वैसे ही खुगीर सिरपे देता । अंगांगमें अवगुण भरता ।
जीवके हाथमें लकड़ी देता । ममत्वकी जो ॥ ६३ ॥
शिष्य-शाखादि विलाससे । मठ मुद्रादि बहानेसे ।
डाले हैं जो इसने फांसे । असंगों पर भी ॥ ६४ ॥
घरमें कुटुंब रूपसे रहता । वनमें वन्य बन अवतरता ।
नग्न शरीरको भी चिपकता । पांडुकुमार ॥ ६५ ॥
अपरिग्रह जो ऐसा दुर्जय । उसपे भी पाकर विजय ।
भव विजयका धनंजय । आता उत्साह ॥ ६६ ॥
अमानित्वादि जो संपूर्ण । ज्ञानके होते सभी गुण ।
वैफल्य देशके प्रधान । होते हैं जैसे ॥ ६७ ॥
सम्यग्ज्ञानका राज्य अर्पण । करके वे सभी गुणगण ।
उसके परिवार भूषण । होके रहते हैं ॥ ६८ ॥
तब प्रवृत्तिके राज-पथमें । अवस्था-भेद प्रमदियां आपमें ।
दीठ उतारती प्रति-पगमें । अपने सुखकी ॥ ६९ ॥
बोधके दंडसे विवेक जब । दृश्योंकी भीड हटाता सब ।
योगकी भूमिका आके तब । आरती उतारती ॥ १०७० ॥
८०५ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग
तब ऋद्धि सिद्धिके समुदाय । आते रहते समय समय ।
उस पुष्प-वृष्टिसे धनंजय । नहाता रहता वह ॥ ७१ ॥
इस भांति ब्रह्मैक्यके समान । स्वराज्य आता है समीप जान ।
आनंदसे तीनों लोक अर्जुन । भर देता है ॥ ७२ ॥
शत्रु-मित्रभाव तब अर्जुन । नहीं रहता साम्यके कारण ।
न होता द्वंद्व अणु समान । उस समय ॥ ७३ ॥
यही नहीं किसी कारणसे । कभी कहें यह मेरा ऐसे ।
इतना द्वैत भी प्रतीतिसे । न जानता वह ॥ ७४ ॥
एक मात्र तब अपनी सत्ता । विश्व-व्यापी करके पांडुसुता ।
पास फटकने न देता ममता । इतना भी वह ॥ ७५ ॥
जीतकर ऐसा रिपुवर्ग । आप बन गया सारा जग ।
तब होगया तुरंत योग । वहां सुदृढ ॥ ७६ ॥
अपने पथके शत्रुओंको जीतनेके बाद—
फिर वैराग्यका आवरण । तनपे दृढ था जो अर्जुन ।
करता शिथिल कुछ क्षण । उस समय ॥ ७७ ॥
चलाने ध्यानकी जो तलवार । सम्मुख नहीं द्वैत धनुर्धर ।
तब होता है ध्यानका भी कर । कुछ शिथिल ॥ ७८ ॥
अथवा रसौषधि जैसे । अपना काम हो जानेसे ।
आप ही न रहती वैसे । उसी प्रकार ॥ ७९ ॥
जैसे है जहां पहुंचना होता । वह स्थान देख पैर रुकता ।
वैसे ब्रह्म-दर्शनसे होता । अभ्यास शिथिल ॥ १०८० ॥
जैसे सिंधुसे संपर्क आता । गंगाका वेग भी उतरता ।
या पतिसे मिलके स्थिरता । आती कामिनीमें ॥ ८१ ॥
अथवा आता है जब फल । बढ़ न सकता जब केल ।
या गांव आते जैसे केवल । रुकता मार्ग ॥ ८२ ॥
ज्ञानेश्वरी ८०६
वैसे ही आत्म-साक्षात्कार । होता है यह देख कर ।
साधनाका जो हथियार । रखता नीचे ॥ ८३ ॥
इसीलिये ब्रह्मसे उसका । समय आने पर ऐक्यका ।
शिथिल होता है साधनोंका । वेग पार्थ ॥ ८४ ॥
वैराग्यका फिर है तिरोधान । नानाभ्यासका वार्धक्य अर्जुन ।
योग फलका परिपाक जान । दशा है जो ॥ ८५ ॥
तब वह शांति मान पांडुसुता । उसके अंगांगमें आती पूर्णता ।
ब्रह्मत्व पाके योग्य है वह होता । पुण्य-पुरुष ॥ ८६ ॥
पूर्णिमासे जैसे चतुर्दशी । अल्पत्वमें रहता है शशी ।
या सोलहवे कससे जैसे । पंद्रह होता अल्प ॥ ८७ ॥
सागरमें जाता पानी वेगसे । वह होता गंगौघका जैसे ।
तथा जो निश्चलतासे । रहता सिंधुका ॥ ८८ ॥
ब्रह्म या ब्रह्मत्वके निकट । व्यक्ति होता उसमें सुभट ।
ऐसा अंतर जो वह काट । पाता ब्रह्मत्व ॥ ८९ ॥
परंतु ऐसे हुए बिन । प्रतीत होता ब्रह्मपन ।
वही ब्रह्म होनेकी जान । योग्यता है वहां ॥ १०९० ॥
ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न कांक्षति ।
समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम् ॥ ५४ ॥
वह ब्रह्म-भाव योग्यता । पुरुष फिर पांडुसुता ।
आत्म-बोधकी प्रसन्नता । पद पाता है ॥ ९१ ॥
जिस तापसे होता है पाक । वह जाता पकनेपे पाक ।
फिर जैसे आह्लाद कारक । होता है वह ॥ ९२ ॥
अनेक प्रवाह जैसे लगभग । शरत्कालमें तजते है गंग ।
अथवा गीत होनेपे उपांग । रुकते जैसे ॥ ९३ ॥
हुवा ब्रह्म प्रसन्नात्मा कामना शोकके बिन ।
पाता मेरी परा भक्ति देखती साम्य जो कहीं ॥ ५४ ॥
८०७ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग
आत्म-बोधमें ऐसा उद्यम । करते हुए होता है श्रम ।
उसका भी हो जाता है शम । जिस स्थानपे ॥ ९४ ॥
आत्म-बोध प्रसन्नता । कहलाती वह पार्थ ! ।
उसका है भोग लेता । योग-साधक ॥ ९५ ॥
ब्रह्म-प्राप्तिके समयका विवेचन—
उस स्थितिमें शोक करना । किसी वस्तुकी इच्छा करना ।
डूबती यह सब भावना । साम्य-पूरमें ॥ ९६ ॥
उदय होते ही गभस्ति । नक्षत्र-मंडलकी व्यक्ति ।
लोपती है उसकी दीप्ति । जिस प्रकार ॥ ९७ ॥
उदय होते ही आत्म-प्रभा । जो सारी भूत भेद व्यवस्था ।
तोड़ते हुए वह देखता । अपनारूप ॥ ९८ ॥
पाटी पे लिखे अक्षर । जैसे पोंछते हैं कर ।
वैसे खोते भेदांतर । उसकी दृष्टिमें ॥ ९९ ॥
वैसे ही जो अन्यथा ज्ञान । दिखाता जागृति स्वप्न ।
वे दोनों क्रियायें हैं लीन । अज्ञानमें ॥ ११०० ॥
फिर वह भी अज्ञान । बोध बढते ही लीन ।
उस बोधमें संपूर्ण । डूबता है ॥ १ ॥
जैसे भोजनके समय । क्षुधा क्षीणती धनंजय ।
वैसे ही तृप्तिके समय । होती है अस्त ॥ २ ॥
जैसे वेग बढ़ता जाता । वैसे मार्ग घटता जाता ।
फिर जब गंतव्य आता । डूबता मार्ग ॥ ३ ॥
या जागृतिका होता उदीपन । निद्रा क्षीण होते जाती अर्जुन
वैसे ही पूर्ण जागृतिमें मान । निद्राका अंत ॥ ४ ॥
या अपना पूर्णत्व मिलता । चंद्रका बढ़ना ही मिटता ।
शुक्ल-पक्षका भी अंत आता । तब निःशेष ॥ ५ ॥
ज्ञानेश्वरी ८०८
जैसे सभी पदार्थ-ज्ञान । निगल जाता मेरा ज्ञान ।
तब वह संपूर्ण ज्ञान । अज्ञान निगलता ॥ ६ ॥
जैसे कल्पांतके समय । नदी सिंधुके समुदाय ।
एक होकर धनंजय । जल होता आम्रक्ष ॥ ७ ॥
या मिटकर नाना घटाकाश । एक हो जाता है महदाकाश ।
या काष्ठोंसे जलके काष्ठ शेष । रहता है अग्नि ॥ ८ ॥
अथवा भूषणके आकार । आंचमें सभी पिघलकर ।
सारा नाम रूप मिटाकर । होता है सुवर्ण ॥ ९ ॥
अथवा होते ही जागृत । हो जाता है स्वप्नका अस्त ।
फिर जैसे आपही पार्थ । रह जाता है ॥ १११० ॥
वैसे ही मुझ एकको छोडकर । न उसे अपने सह कुछ और ।
कहाती जो चौथी भक्ति धनुर्धर । पाता है वह ॥ ११ ॥
जहां आर्त जिज्ञासू अर्थार्थी । जिस मार्गसे करते भक्ति ।
इसे देख मैं कहता चौथी । भक्ति इसको ॥ १२ ॥
वैसे नहीं पहली या चौथी । दूसरी तीसरी इस भांति ।
किंतु जो मेरी सहज स्थिति । भक्ति नाम उसका ॥ १३ ॥
मेरे अज्ञानका प्रकाशन । दिखाके मेरा अन्यथा ज्ञान ।
सबको सर्वत्र ही भजन- । सुझाती है ॥ १४ ॥
जहां जो जैसे देखता वैसे । उसे वहां रहता है वैसे ।
दीखता मेरे चित्प्रकाशसे । यह अखंड ॥ १५ ॥
स्वप्नका दीखना या न दीखना । अपने अस्तित्वपे होना जाना ।
जिससे विश्वका होना या न होना । प्रकाशना वैसे ॥ १६ ॥
ऐसा यह मेरा सहज । प्रकाश जो है कपिध्वज ।
वह भक्ति नामसे आज । कहा जाता है ॥ १७ ॥
इसीलिये आर्तोंमें जैसे । बनके उत्कट इच्छासे ।
अपेक्षणीय जो है उसे । भाता मैं ही ॥ १८ ॥
८०९ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग
जिज्ञासूके सन्मुख वीरेशा । इसी भांति होकर जिज्ञासा ।
मैं ही मानो जिज्ञास्यु है ऐसा । दिखाया गया है ॥ १९ ॥
ऐसे ही बनकर अर्थना । मैं ही मेरे अर्थार्थ अर्जुना ।
करके तब अर्थाभिधाना । लाता मुझको ही ॥ ११२० ॥
ऐसे ही अज्ञानका कर स्वीकार । करते भक्तिमें मेरा व्यवहार ।
दिखाती भक्ति दृश्य-रूप लेकर । मुझ द्रष्टाको ही ॥ २१ ॥
मुखको दीखता वहां मुख । इस बोलनेमें नहीं चूक ।
झूठा द्वैत दिखाता है देख । दर्पण यहां ॥ २२ ॥
चंद्रको ही देखते हैं नेत्र । तिमिर करता यही मात्र ।
दिखाता रहता है सर्वत्र । एकका होकर ॥ २३ ॥
सर्वत्र ऐसे मुझको मैं अर्जुन । भक्तिसे होता रहता आकलन ।
किंतु है दृश्यत्व अज्ञान कारण । व्यर्थका यहां ॥ २४ ॥
मिटा अब वह सब अज्ञान । मेरा द्रष्टृत्व मुझे मिला मान ।
निज-बिंबमें हुवा है विलीन । प्रतिबिंब जैसे ॥ २५ ॥
सोनेमें जब मिला रहता मल । तब भी सोना रहता है अचल ।
किंतु जल करके वह केवल । रहता सोना ही ॥ २६ ॥
अजी ! पूर्णमासिके पहले कहीं । चंद्रमा सावयव होता या नहीं ।
पूर्णचंद्र देखने मिलता यहीं । पूर्णमासीको ॥ २७ ॥
वैसे मैं अन्यथा ज्ञानसे । दीखता हूं भिन्न रूपसे ।
वह द्रष्टत्वमें खोनेसे । मुझे मैं भेटता ॥ २८ ॥
तभी दृश्यपथातीत । मेरा यह पांडुसुत ।
भक्तियोग है चतुर्थ । कहा मैंने ॥ २९ ॥
ज्ञान-भक्तिसे जो सहजरूप । भक्त मुझमें लीन हुवा आप ।
वह केवल मैं हूं परंतप । जानता तू यह ॥ ११३० ॥
जो मैं हुवा नहीं उसके लिये मैं है ही नहीं—
मैंने ही हाथ उठाकर । ज्ञानी भक्त जो धनुर्धर ।
मेरा आत्मा इस प्रकार । कहा सातवेमें ॥ ३१ ॥
ज्ञानेश्वरी ८१०
भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्त्वतः ।
ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनंतरम् ॥ ५५ ॥
भक्ति जो कल्पादिमें मुझसे । उपदेश रूप जो ब्रह्मसे ।
कही गयी है उत्तम ऐसे । भागवतद्वारा ॥ ३२ ॥
ज्ञानी इसको स्व-संवित्ति । शैव कहते इसे शक्ति ।
तथा हम परम-भक्ति । कहते अपनी ॥ ३३ ॥
मुझसे मिलते हुए यह भक्ति । उस श्रमयोगियोंको है फलती ।
फिर समस्त विश्वको ही देखती । मेरे ही रूपमें ॥ ३४ ॥
वहां वैराग्य विवेकके साथ । मिटता है बंध मोक्ष समस्त ।
डूबती वृत्ति ध्यान सह पार्थ । उस समय ॥ ३५ ॥
चारों तत्त्वोंको निगलकर । रहता आकार मात्र धनुर्धर ।
नहीं रहता उसका ओर छोर । कल्पांतमें जैसे ॥ ३६ ॥
उस भांति होकर कूटस्थ । शुद्ध मैं साध्य साधनातीत ।
वह बनकर मुझे पार्थ । भोगता है ॥ ३७ ॥
बनकर सिंधुका अंग । सिंधुपे झलकती गंग ।
ऐसे रूपका उसका भोग । सुन तू यह ॥ ३८ ॥
या दर्पणको ही दर्पण । दिखाया मान तू अर्जुन ।
बढ़ता तब दृष्टापन । वैसे इस भोगमें ॥ ३९ ॥
जागृतका जब स्वप्न नाशता । अपना ही तब ऐक्य दीखता ।
जैसे जागृतिका ऐक्य भोगता । बिनाद्वैतके ॥ ११४० ॥
जाने दो जब दर्पण खोता । तब मुख-बोध भी ले जाता ।
मुख-सौंदर्य आप भोगता । अकेला जैसे ॥ ४१ ॥
वही होनेसे भोग उसका । न होता यह भाव जिसका ।
शब्दसे कैसे करें शब्दका । कह तू उच्चार ॥ ४२ ॥
भक्तिसे तत्त्वता जान कौन मैं कितना रहा ।
इस भांति मुझे जान मुझमें मिलते फिर ॥ ५५ ॥
८११ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग.
किसके गांवमें दीपकसे । सूर्यको उजाला जाता कैसे ।
व्योमके लिये मांडव कैसे । उभारते न जाने ॥ ४३ ॥
अपनेमें नहीं जब राजपन । भोगेगा कैसा जी राजा राजपन ।
या अंधार करेगा आलिंगन । सूर्यसे कैसे ॥ ४४ ॥
अथवा जो नहीं है आकाश । वह जानेगा कैसे आकाश ।
गूंणचीका गहना विशेष । सोहेगा क्या रत्नोमें ॥ ४५ ॥
इसीलिये जो मैं हुवा नहीं । उसके लिये मैं है ही नहीं ।
फिर भजेगा कैसे जो कोई । कह तू मुझसे ॥ ४६ ॥
अद्वैतमें क्रिया कर्म नहीं होता किंतु भक्ति होती है—
इसी लिये है वह क्रमयोगी । मैं बनकर मेरा भोगी ।
तारुण्य भोगती है तरुणांगी । उसी प्रकार ॥ ४७ ॥
तोय करता सर्वांगसे यदि चुंबन । प्रभा सर्वत्र विलसती है बिंब मान ।
नाना आकाश नभमें होकर विलीन । भोगते हैं जैसे ॥ ४८ ॥
वैसे है जो मेरा ही रूप होकर । अक्रिय भजता मुझे निरंतर ।
भोगता रहता जैसे अलंकार । स्वर्णको ही ॥ ४९ ॥
चंदनकी सुगंध जैसे । चंदन भोगती आपसे ।
या स्वाभाविक चंद्र जैसे । चंद्रिकाको ॥ ११५० ॥
ऐसे वह क्रिया नहीं सहता । अद्वैतमें भक्ति होती है पार्था ।
यह अनुभवसे जाना जाता । तोलनेसे नहीं ॥ ५१ ॥
तब पूर्व संस्कारके कारण । जो कुछ होता है यह भाषण ।
वह विनय सुन मैं अर्जुन । बोलता हूं ॥ ५२ ॥
शब्दको शब्द ही जब मिलता । बोलका व्यवहार नहीं होता ।
तब है मौन ही स्तवन होता । सुंदर मेरा ॥ ५३ ॥
इसीलिये जब वह बोलता । बोलने वालेसे मैं हूं मिलता ।
तब मौनसे ही वह तत्वता । स्तवता मुझको ॥ ५४ ॥
ज्ञानेश्वरी ८१२