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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 874

विविक्तसेवी लघ्वाशी यतवाक्कायमानसः ।
ध्यानयोगपरो नित्यं वैराग्यं समुपाश्रितः ॥ ५२ ॥
शरीरमें बल रहना । अथवा भूखको मिटाना ।
या जीभके पूर्ण करना । मनोरथ सारे ॥ २४ ॥
करनेमें वह भोजन । नहीं जानता है ये तीन ।
संतुष्ट होता है अल्पान्न । खाकर ही वह ॥ २५ ॥
आसनकी उष्णतासे । प्राणकी क्षति होनेसे ।
रहे प्राण जितनेसे । उतनाही खाना ॥ २६ ॥
जैसे पर-पुरुषकी इच्छा मान । न देती कुल-वधु अपना तन ।
वैसे ही निद्रालस्य दायक अन्न । खाता ही नहीं ॥ २७ ॥
दंडवत जब वह करता । तभी तन भूमिस्पर्श करता ।
वैसे ही भूमिपे वह नहीं पड़ता । अविचारसे कभी ॥ २८ ॥
शरीर निर्वाह हो अपना । उतने हाथ पैर हिलाना ।
ऐसे है अंतर्बाह्य अपना । संयम करता ॥ २९ ॥
तथा देख मनका चौखट । वृत्ति नही जाती निकट ।
वहां वाचाकी जो खटपट । रहती ही कहां ॥ १०३० ॥
ऐसे तन वचन मानस । जीतके सब बाह्य प्रदेश ।
आधीन करना है आकाश । ध्यानका उसको ॥ ३१ ॥
गुरु-वाक्यसे होता जो जागृत । उस बोधमें देखता निश्चित ।
दर्पणमें जैसे देखता पार्थ । अपना स्वरूप ॥ ३२ ॥
अपनेको ही है ध्यानस्थ । ध्यान-रूप वृत्तिमें पार्थ ।
ध्येयत्वसे लेता है नित । ध्यान प्रकार वह ॥ ३३ ॥
ध्यान ध्येय और ध्याता । होते हैं एकरूपता ।
तब तक पांडुसुता । करना ध्यान ॥ ३४ ॥
वाक् काय मनको जीत एकांत अल्प सेवन ।
दृढ वैराग्यसे युक्त डूबा जो ध्यान-योगमें ॥ ५२ ॥
ज्ञानेश्वरी ८०२