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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 875

इसीलिये जो है मुमुक्षु । आत्म-ज्ञानमें होता दक्ष ।
सदैव वह योग-पक्ष । लेकर रहता ॥ ३५ ॥
अपान रंध्रद्वय । बीचमें धनंजय ।
उसके जो है मध्य । एडीसे दबाके ॥ ३६ ॥
आकुंचन करना अध । करके तीन ही बंध ।
होते हैं जो वायुभेद । करना एक ॥ ३७ ॥
कुंडलिनीको जगाकर । अध्यात्मका विकासकर ।
आधारादिसे भेद कर । सहस्रार तक ॥ ३८ ॥
सहस्रदलका जो मेघ । पीयूष बर्षता सवेग ।
उसके मूल पर ओघ । ला करके ॥ ३९ ॥
नाचता रहता पुण्य गिरिपर । उस चैतन्य भैरवका खापर ।
मन-प्राण खिचडीसे भरकर । तदुपरांत ॥ १०४० ॥
योगाभ्यास दृढ होने पर । यह तीनों बंध आगे कर ।
किया है ध्यान पिछली ओर । ब्रह्म सिद्ध ॥ ४१ ॥
तथा योग और ध्यान । दोनों हो पूर्ण निर्वहन ।
आत्म-ज्ञानमें हो लीन । सो पहले ही ॥ ४२ ॥
वीतराग सरीखा । जोड़ रखा है सखा ।
वह सभी भूमिका । करता पार ॥ ४३ ॥
देखना जो है दीखने तक । साथ देना आंखोंको दीपक ।
तब न दीखेगी कहां तक । वह जो वस्तु ॥ ४४ ॥
ऐसे करता जो मोक्ष प्रवर्तन । ब्रह्ममें चित्त हो जाने तक लीन ।
साथ रहता है वैराग्य अर्जुन । उसका नाश कैसे ॥ ४५ ॥
इसीलिये है वैराग्य । ज्ञानाभ्यासका सौभाग्य ।
करके देता जो योग्य । आत्म-लाभ ॥ ४६ ॥
वैराग्यका कवच पहन कर । उससे जैसे वज्रांग बनकर ।
वह राजयोगके तुरंग पर । होता आरूढ ॥ ४७ ॥
८०३ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग