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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

ऐसे ही अनेक प्रकार । बनाकर मानवाकार ।
करके ज्ञानपे अंधार । विपरीत ज्ञानसे ॥ ७१ ॥
मोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतसः ।
राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मोहिनीं श्रिताः ॥ १२ ॥
मैं अंधोंके हाथमें पड़ा मोति-सा हूं-
इसीलिए जन्मना ही मोघ । जैसे वर्षाके बिन ही मेघ ।
अथवा मृगजल तरंग । देखना दूरसे ही ॥ ७२ ॥
या मृत्तिकाके घुड़सवार । या कलंदरके अलंकार ।
गंधर्व-नगरका आवार । आभास जो ॥ ७३ ॥
जैसे थूहरका बडा सरल । अंदर खोकला ना है फल ।
लटकते स्तन जैसे गला- । में बकरीके ॥ ७४ ॥
मूर्खका जीवन है व्यर्थ । जैसे सेमल फल पार्थ ।
धिक् उसके कर्म समस्त । जो हैं निरर्थक ॥ ७५ ॥
फिर मानो है उसका पढना । मर्कटका नारियल तोडना ।
अथवा अंधेका हाथ पडना । मोति जैसे ॥ ७६ ॥
वास्तवमें उनके शस्त्र । कुम्हारके हाथमें शंख ।
या कहा अशौचको मंत्र- । बीज किसीने ॥ ७७ ॥
वैसे उसका ज्ञान-जात । औ' आचरण क्रिया पार्थ ।
वह संपूर्ण गया व्यर्थ । चित्तहीन ॥ ७८ ॥
तमो-गुण राक्षसी । जो है सद्बुद्धि ग्रासी ।
विवेक-मूल नासी । निशाचरी ॥ ७९ ॥
उस प्रकृतिके आधीन हुये । इसीलिए चिंताका ग्रास भये ।
इस तामसीके कलेऊ हुये । मुखमें ही ॥ १८० ॥
वे आशावाद मूढोंके व्यर्थ हैं ज्ञान-कर्म भी ।
जिन्होंने संपदा पायी आसुरी मोह-कारक ॥ १२ ॥
ज्ञानेश्वरी २६४

जहां लारमें आशाकी । लोटती जिह्वा हिंसाकी ।
जुगाली करें कौरकी । मोदसे नित ॥ ८१ ॥
जो हैं कान तक अनर्थके । चाटती जीभ बाहर लाके ।
कोह बन प्रमाद गिरिके । हुई उन्मत्त ॥ ८२ ॥
जहां हैं क्रूर दांत द्वेषके । पीसते हैं बीजको ज्ञानके ।
आवरण डालते तमके । मूढ-बुद्धि पर ॥ ८३ ॥
आसुरी बुद्धिके मुखमें ऐसे । पडते हैं भूत बलिके कौरसे ।
भ्रमजालके कुण्डमें पड़नेसे । सुन धनंजय ॥ ८४ ॥
पडे वे ऐसे गर्तमें तमके । न लगते हाथमें विचारके ।
जहां गये उस स्थानके । निशान भी नहीं ॥ ८५ ॥
मैं भक्तोंके कीर्तन-मेलेमें रहता हूं—
यह निष्फल वर्णन तदर्थ । रहने दो मूर्खोंकी बात पार्थ ।
विस्तार करनेसे वाणी व्यर्थ । थकेगी इससे ॥ ८६ ॥
ऐसे बोले तब देव । "जी" कहा सुन पांडव ।
सुन वाचा ही नीरव । साधु-कथासे ॥ ८७ ॥
महात्मानस्तु मां पार्थ दैवीं प्रकृतिमाश्रिताः ।
भजन्त्यनन्यमनसो ज्ञात्वा भूतादिमव्ययम् ॥ १३ ॥
अजी ! जिनका है निर्मल मानस । बसता वहां मैं ले क्षेत्र-सन्यास ।
नींदमें भी वे करते स-उल्लास । वैराग्याराधना ॥ ८८ ॥
जिनका सद्भाव आलंबन । रहता धर्मका सिंहासन ।
जिनके मनका है जीवन । विवेकमात्र ॥ ८९ ॥
जो हैं ज्ञान गंगामें स्नात । पूर्णता-भोजनसे तृप्त ।
शांति-लताके नव-पात । है अति कोमल ॥ १९० ॥
जुटाके संपदा दैवी महात्मा भजते मुझे ।
अनन्य भावसे जान मैं विश्वारंभ शाश्वत ॥ १३ ॥
(34) २६५ राज-विद्या-समर्पणयोग

पूर्णावस्थामें जो फूटे अंकुर । तथा धर्म-मंडपके आधार ।
शांति-सागरसे लिये हैं भर । पूर्ण-कुम्भ जैसे ॥ ९१ ॥
भक्तिकी हुई इन्हें इतनी प्राप्ति । कहते वे परे हठो तुम मुक्ति ।
उनके आचरणसे है नीति । खिलती सदा ॥ ९२ ॥
उनकी इंद्रियां भी संपूर्ण । पहने हैं शांतिका भूषण ।
उनका चित्त है आभरण । मुझ व्यापकको ॥ ९३ ॥
ऐसे जो महानुभाव । दैवी प्रकृतिके देव ।
जान करके वे सर्व । मेरा ही रूप है ॥ ९४ ॥
बढता हुआ उनका प्रेम । मुझे भजता है जो निष्काम ।
किंतु भिन्नताका मनोधर्म । छूता भी नहीं ॥ ९५ ॥
स्वयं मैं होकर पांडव । करते हैं वे मेरी सेवा ।
किंतु आश्चर्य है जो भाव । अब मैं कहता ॥ ९६ ॥
सततं कीर्तयन्तो मां यतन्तश्च दृढव्रताः ।
नमस्यन्तश्च मां भक्त्या नित्ययुक्ता उपासते ॥ १४ ॥
उत्कर्षसे उन्होंने कीर्तनके । नाशे व्यवसाय प्रायश्चित्तके ।
नाम भी न रहे सब पापके । ऐसा ही किया ॥ ९७ ॥
निस्तेज किये सब यम-दम । तीर्थ उठाये पदसे उत्तम ।
थमे यमलोकके उपक्रम । अनेक प्रकारके ॥ ९८ ॥
यम कहें क्या यमना । दम पूछे किसे दमना ।
तीर्थ कहते हैं क्या खाना । दोष नहीं नाम-मात्र ॥ ९९ ॥
ऐसा है मेरा नाम-घोष । मिटाते हैं विश्वके दुःख ।
सारे जगमें महासुख । गूंज-महकता ॥ २०० ॥
दिखाते वे सूर्योदय बिन । जिलाते हैं अमृतके बिन ।
तथा वे देते योगके बिन । दर्शन-कैवल्यको ॥ १ ॥
नित्य कीर्तनमें मेरे यत्नसे लीन जो व्रती ।
भक्तिसे नित्य हो युक्त पूजते नम्र भावसे ॥ १४ ॥
ज्ञानेश्वरी २६६

राजा रंकका भेद नहीं करते । बाल-वृद्ध यह भी नहीं देखते ।
जगतको आनंदमें भर देते । पूर्ण-रूपसे ॥ २ ॥
अजी ! कभी कोई जाता है वैकुण्ठ । इन्होंने किया है विश्व ही वैकुण्ठ ।
मेरे नाम गौरवसे हे सुभट । उजलाया विश्व ॥ ३ ॥
तेजमें होते सूर्य-से उज्ज्वल । किन्तु सूर्यमें अस्तका काजल ।
पूर्ण-चन्द्र रहता एक काल । ये सदा पूर्णत्वमें ही ॥ ४ ॥
बरसनेमें मेघ उदार । घटनेमें हैं वह अपूर ।
ये निःसंदेह कृपालु वीर । पंचानन ॥ ५ ॥
उनकी जिह्वा पर सतत । नाम रहे मेरा नृत्य-रत ।
पानेमें जो जाते जन्मजात । सहस्रावधि ॥ ६ ॥
तब मैं वैकुण्ठमें नहीं रहता । भानु-बिम्बमें तब नहीं दीखता ।
योगियोंके हृदयके पार जाता । मैं उस समय ॥ ७ ॥
किंतु उनके पास धनुर्धर । करते जो नाम-घोष मधुर ।
रहता हूँ मैं निश्चित सादर । जो है खोया हुआ ॥ ८ ॥
मेरे गुणगानमें ही हैं वे तृप्त । देशकाल भूलते जो नामरत ।
कीर्तन सुखमें हुए सतत । स्वरूप रूप ॥ ९ ॥
कृष्ण विष्णु हरि गोविंद । नामके निखिल प्रबंध ।
तथा आत्म-चर्चा विशद । खोते हैं उसमें ही ॥ १० ॥
नमस्कार भक्तिसे मद्रूप होते हैं--
रहने दो अब ये अर्जुन । सुन करके वे मेरा कीर्तन ।
तथा विचरते हैं अनुदिन । चराचरमें ॥ ११ ॥
ऐसे अनेक हैं पार्थ । कर सहज सिद्धता ।
मन-प्राणको ले साथ । पथ-दर्शक ॥ १२ ॥
बाहर लगायी यम नियमकी बाड़ । भीतर वज्रासनका गढ़ सुदृढ़ ॥
उस पर प्राणायामकी तोप चढ़ा- । रखी है सज्ज ॥ १३ ॥
वहां कुण्डलिनीके प्रकाशमें । मन-पवनके सहयोगमें ।
कर लिया अपने आधीनमें । सत्रहवींका कुम्भ ॥ १४ ॥
२६७ राज-विद्या-समर्पणयोग

प्रत्याहारने तब परक्रम किया । विषयोंके नाम मात्रको मिटा दिया
सब इन्द्रियोंको बांध करके लाया । हृदयांगनमें ॥ १५ ॥
तब दौड़े धारणाके घुड़सवार । पकड़ लाये महाभूत इक ठौर ।
फिर किया चतुरंग सेना संहार । जो हैं संकल्पकी ॥ १६ ॥
तब “विजय हुआरे विजय ।” सिंगी बजी ध्यानकी हो निर्भय ।
दीखता तन्मयका स-समय । वहां एक-छत्र ॥ १७ ॥
फिर समाधिश्रीका अशेष । आत्मानुभवका राज्य-सुख ।
सिंहासन आरोहण देख । हुआ समरससे ॥ १८ ॥
ऐसा है यह गहन । अर्जुन मेरा भजन ।
अब कहता हूं सुन । अन्य प्रकार ॥ १९ ॥
जैसे सर्वत्र समानरूपमें । एक तंतु रहता है वस्त्रमें ।
वैसे वे “मैं” बिन चराचरमें । जानते नहीं ॥ २० ॥
आदि ब्रह्मसे लेकर । मच्छर तक आखर ।
मेरा रूप है सुन्दर । जानते हैं यह ॥ २१ ॥
फिर छोटा बड़ा नहीं कहते । निर्जीव सजीव नहीं जानते ।
सबके सम्मुख नम्र हैं होते । सब “मैं” मानकर ॥ २२ ॥
अपना उत्तमत्व नहीं जानते । औरोंकी योग्यायोग्यता न देखते ।
सर्वत्र आत्म-तत्व देख नमते । प्रेम-भावसे ॥ २३ ॥
जैसे ऊपरसे पानी गिरता । नीचे तल तक है वह जाता ।
वैसे भूतमात्रसेही नम्रता । स्वभाव यह उनका ॥ २४ ॥
या वृक्षकी शाखा फल-भारसे । उतरती है सहज-भावसे ।
वैसे वे झुकते हैं नम्रतासे । सबके प्रति ॥ २५ ॥
रहते हैं सर्वज्ञ निराभिमान । विनय ही उनकी संपत्ति महान ।
करते वे जयजय मंत्र अर्पण । मुझको ही ॥ २६ ॥
नमनसे गला मानाभिमान । सहज हुए मद्रूप अर्जुन ।
ऐसे होकर मत्स्वरूप-लीन । भजते मुझको ॥ २७ ॥
है यह अर्जुन श्रेष्ठ भक्ति । कही मैंने अभी तेरे प्रति ।
ज्ञान-यज्ञसे भजन रीति । सुन तू भक्तकी अब ॥ २८ ॥
ज्ञानेश्वरी २६८

ज्ञानी-भक्त सदा-सर्वत्र एक भावसे मुझे देखता है—
यह भजन-परिपाटी। जानता ही है तू किरीटी।
की इसकी हमने गोष्ठी। पहले ही ॥ २९॥
तब कहता है “जी हां” अर्जुन। “यह है देवप्रसाद महान।”
जब मिलता अमृत-भोजन। कहेगा कौन “बस है” ॥ ३० ॥
सुनकर यह अनंत। हुआ अति प्रसन्न-चित्त।
सुननेका अर्जुन-मत। जानकर ॥ ३१ ॥
कहते हैं भला किया पार्था। यह अनवसर सर्वथा।
किंतु कहलाती तेरी अवस्था। मुझसे अब ॥ ३२ ॥
पार्थ पूछे ऐसे कैसे कहता। बिन चकोर चंद्र नहीं उगता ?।
देता है वह विश्वको शीतलता। यह स्वभाव उसका ॥ ३३ ॥
यहां चकोर अपनेही हितार्थ। चोंच उठाता चन्द्रकी ओर नित।
हमारी विनय है एक निमित्त। देव आप कृपासिंधु ॥ ३४ ॥
उदारतासे मेघ बरसता। जगतकी है तरस मिटाता।
चातककी प्यासकी क्या है कथा। वर्षाके सम्मुख ॥ ३५ ॥
पानीके लिये एक घूंट। जाना पडता गंगा-तट।
देव सुनाओ हमें चट। चाह है बहु या अल्प ॥ ३६॥
कृष्ण कहे रहने दो पार्था। देखके तुम्हारी यह आस्था।
हुआ है मेरा चित्त मुदित। स्तुति न होती सहन ॥ ३७ ॥
जब तू सुनता है अति उत्तम। वक्तृत्व निमंत्रणका काम।
कहता यह बोल पुरुषोत्तम। आदर कर बोले ॥ ३८ ॥
ज्ञानयज्ञेन चाप्यन्ये यजन्तो मामुपासते।
एकत्वेन पृथक्त्वेन बहुधा विश्वतोमुखम् ॥ १५ ॥
ज्ञान-यज्ञका यह रूप। आदि संकल्प यह यूप।
पंच-महाभूत मंडप। भेद है पशु ॥ ३९॥
दूसरे ज्ञान-यज्ञोंसे देखके ब्रह्म-भावसे।
विवेकसे अविभेद भेदमें भजते मुझे ॥ १५ ॥
२६९
राज-विद्या-समर्पणयोग

फिर पांचोंके जो विशेष गुण । अथवा इन्द्रियां तथा है प्राण ।
यही है यज्ञोपचार भरण । अज्ञान है घृत ॥ २४० ॥
वहां कुण्ड है मन बुद्धिका । प्रज्वलित अग्नी है ज्ञानका ।
समताकी सुन्दर वेदिका । जान तू पार्थ ॥ ४१ ॥
मति कौशल्य स-विवेक । मंत्र-विद्या गौरव नेक ।
शांति ही है सुवा और सुक । जीव है यजमान ॥ ४२ ॥
स्वरूपानुभव पात्रसे । विवेकके महा-मंत्रसे ।
वह है ज्ञानाग्नि होत्रसे । नाशता भेद ॥ ४३ ॥
जब है अज्ञान मिट जाता । यजितका यज्ञ है रुकता ।
आत्म-समरस स्नान होता । अवभृतका ॥ ४४ ॥
तब भूत विषय कारण । न होता इसका भेद ज्ञान ।
एकत्वका है संपूर्ण ज्ञान । होता आत्म-बुद्धिसे ॥ ४५ ॥
जागृत मनुष्य जैसे अर्जुना । कहता स्वप्नकी विचित्र सेना ।
आप रही स्वयं बन गया था ना । निद्रावश होकर ॥ ४५ ॥
अब न रही सेना जो थी सेना । मैं अकेला ही था पूर्ण रूपेण ।
ऐसा होता तब एकत्व-भान । उसको विश्वका ॥ ४७ ॥
फिर जीवत्वका भान है मिटता । आब्रह्म परमात्म बोध भरता ।
इस भांति ज्ञान-भावसे भजता । अद्वय-बोधसे ॥ ४८ ॥
जब सर्वत्र मैं हूं तब अलग भजन कैसे ?—
या अनादि यह अनेक । भिन्नत्व है अनेकानेक ।
तथा है नाम-रूपादिक । वह भी बिषम ॥ ४९ ॥
इसीलिए विश्व है भिन्न । न भेदता उसका ज्ञान ।
जैसे अंग हैं भिन्न भिन्न । पर शरीर एक ॥ २५० ॥
शाखाओंके अनेक प्रकार । किंतु है एक ही तरुवर ।
रश्मि ढेर, एक दिनकर । वैसे ही पार्थ ॥ ५१ ॥
ज्ञानेश्वरी २७०

वैसे नानाविध व्यक्ति । नाना नाम तथा वृत्ति ।
उसमें मैं अभेद-मूर्ति । भेदमें जानते ॥ ५२ ॥
ऐसे भिन्नत्वमें धनुर्धर । करते ज्ञानयज्ञ सुन्दर ।
बोध न होता नाना प्रकार । जाननेसे ॥ ५३ ॥
या जहां जो कुछ है देखते । मेरे बिन अन्य न जानते ।
सदा मेरी प्रतीति करते । यह बोध उनका ॥ ५४ ॥
बुल्ले जहां तथा जितने होते । जलके आधारसे ही बनते ।
फिर रहते या घुल जाते । पानीमें ही ॥ ५५ ॥
मानो आंधीने परमाणु उडाये । वे भूमित्वसे अलग नहीं गये ।
वे जब पुनः नीचे ही गिर गये । तो पृथ्वी पर ही ॥ ५६ ॥
वैसे कहीं कुछ भी हो जाये । या कहो कुछ भी ना हो जाये ।
सब ही "मैं" बोध लेते गये । सर्व-भावसे ॥ ५७ ॥
अजी ! जहां जितनी मेरी व्याप्ति । उतनी ही है उनकी प्रतीति ।
बहुधाकारकी वर्तन स्थिति । बहुरूप उनकी ॥ ५८ ॥
जैसे भानु-बिंब नित्य । सबके सम्मुख दिव्य ।
वैसे वे विश्वके भव्य । सदा सम्मुख ॥ ५९ ॥
अजी ! उनका वह जो ज्ञान । आगे पीछे न जाने अर्जुन ।
वायु जैसा सदैव गगन । रहे सर्वत्र ॥ २६० ॥
वैसे जितना हूं मैं संपूर्ण । उतना उनका भाव-पूर्ण ।
इससे न करते अर्जुन । भजन होता है ॥ ६१ ॥
वैसे मैं हूं सर्वत्र पूर्ण रूपसे । कहां मेरा भजन न होता कैसे ।
किंतु यहां ऐसा ज्ञान होनेसे । भजन न होता ॥ ६२ ॥
यहां जो उचित रूपसे । भजते हैं ज्ञान-यज्ञसे ।
कही बात मैंने तुझसे । उनकी पार्थ ॥ ६३ ॥
जहां मैं नहीं ऐसा स्थान नहीं—
यह सब है सतत सबकी ओरसे । अर्पण होता मुझे सहज भावसे ।
यह नहीं जाननेसे अज्ञानियोंसे । न होता मुझे अर्पण ॥ ६४ ॥
२७१ राज-विद्या-समर्पणयोग

अहं क्रतुरहं यज्ञः स्वधाहमहमौषधम् ।
मन्त्रोऽहमहमेवाज्यमहमग्निरहं हुतम् ॥ १६ ॥
उदय होगा जब ज्ञानका । तब वेद ही "मैं हूँ" इसका ।
"मैं" ही तज्जन्य-ऋतु होनेका । अनुभव होगा ॥ ६५ ॥
तब यज्ञ जन्य सकल । सांगोपांग कर्म निर्मल ।
यज्ञ भी "मैं" यह निखिल । होगा बोध पार्थ ॥ ६६ ॥
स्वाहा "मैं" हूँ तथा स्वधा । सोमादि दिव्य विविध ।
आज्य और "मैं" समिधा । मंत्र औ, हवि भी ॥ ६७ ॥
होता मैं हवन करता । अग्नि स्वरूप मैं रहता ।
हवन-वस्तु जो जो होता । वह सब मैं हूँ ॥ ६८ ॥
पिताहमस्य जगतो माता धाता पितामहः ।
वेद्यं पवित्रमोंकार ऋक्साम यजुरेव च ॥ १७ ॥
अजी ! जिसके अंग-संगसे । यहां प्रकृति के अष्टांगसे ।
जन्म होता विश्वका जिससे । पिता वह मैं हूँ ॥ ६९ ॥
अर्धनारी नटेश्वरी । जो पुरुष वह नारी ।
वैसा मैं सचराचरीं । माता भी हूँ ॥ २७० ॥
जगत जहांसे होता औ' रहता । जिससे जीवन लेकर बढता ।
मेरे बिना वह कछु नहीं होता । अन्य धनुर्धर ॥ ७१ ॥
प्रकृति तथा पुरुष दोनोंको यहां । जनम दिया हमने मनमें जहां ।
वह पितामह त्रिभुवनमें यहां । मैं हूँ विश्वका ॥ ७२ ॥
जहां ज्ञान-रूप सभी बाट । जिस स्थान आती हैं सुभठ !
उन वेदोंकी वेद्य जो गोष्ठ । कहलाती है ॥ ७३ ॥
मैं ही संकल्प मैं यज्ञ स्वावउंबन अन्न मैं ।
मंत्र मैं हव्य भी मैं हू अग्नि मैं आहुती तथा ॥ १६ ॥
जगदाधार ही मैं हूं माता पिता पितामह ।
मैं तीनों वेद ॐकार जानने योग्य पावन ॥ १७ ॥
ज्ञानेश्वरी २७२

जहां नाना मतोंका अपरिचितपन । मिटता है शास्त्रोंका अनजान ।
मिलते हैं जहां भूले हुए सभी ज्ञान । वह पवित्र मैं हूँ ॥ ७४ ॥
ब्रह्म-बीजका फूटा अंकुर । घोष ध्वनि नाद औ' आकार ।
उसका भुवन जो ओंकार । वह भी मैं हूँ ॥ ७५ ॥
उस ओंकारका है उदर । समालेता है अ, उ, म, कार ।
जनमते ही वेद लेकर । उठे वे तीनों ॥ ७६ ॥
इसीलिए ऋग् यजु तथा साम । ये तीनों कहे मैं आत्माराम ।
एवं मैं ही हूँ सब कुलक्रम । शब्द ब्रह्मका ॥ ७७ ॥
गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत् ।
प्रभवः प्रलयः स्थानं निधानं बीजमव्ययम् ॥ १८ ॥
जो है यह चराचर संपूर्ण । जिसमें भरी है प्रकृति पूर्ण ।
उस प्रकृतिका विश्राम स्थान । परमगति मैं हूँ ॥ ७८ ॥
जिससे पाती है प्रकृति जीवन । अधिष्ठानसे होता विश्व जनन ।
आकर जो उस प्रकृतिके गुण । भोगता है ॥ ७९ ॥
विश्वश्रीका वह भर्ता । मैं हूँ जानो पांडुसुता ।
हूँ अधिपति समस्ता । त्रिभुवनका मैं ॥ २८० ॥
आकाशको सर्वत्र बसाना । वायुको कभी स्वस्थ न होना ।
तथा वर्षाको बरसना । औ' दहना अग्निको ॥ ८१ ॥
पर्वतको न छोड़ना आसन । समुद्रको न सीमा उल्लंघन ।
पृथ्वी करे भूतोंका वहन । यह है आज्ञा मेरी ॥ ८२ ॥
मेरे कहनेसे है वेद बोलता । मेरे चलानेसे सूर्य है चलता ।
मेरे हिलानेसे प्राण है हिलता । करता विश्वका चलन ॥ ८३ ॥
मेरे ही नियमनमें काल । प्राणि-मात्रको जाता निगल ।
मेरी ही आज्ञामें है सकल । चलता नित्य ॥ ८४ ॥
साक्षी स्वामी सखा भर्ता निवास गति आसरा ।
मैं हूं कर्ता भर्ता हर्ता निदान बीज अक्षय ॥ १८ ॥
२७३ राज-विद्या-समर्पणयोग
(35)

ऐसा हूँ मैं समर्थ । जो जगतका नाथ ।
औ' मैं हूँ साक्षीभूत । गगन जैसा ॥ ८५ ॥
यहां नाम रूपमें पूर्ण । बसा हुआ है अर्जुन ।
नाम रूपका अधिष्ठान । वह भी मैं हूँ ॥ ८६ ॥
जलका है जैसे कल्लोल । औ' कल्लोलमें होता जल ।
वैसे विश्वका मैं सकल । आधार भूत हूँ ॥ ८७ ॥
होता जो मेरा अनन्य शरण । उसका हरता जन्म मरण ।
शरणागतका शरण्य स्थान । मैं ही एक ॥ ८८ ॥
एक मैं अनेक रूप-धारण । कर ले प्रकृतिके भिन्न गुण ।
बन सजीव जगतके प्राण । रहता हूँ पार्थ ॥ ८९ ॥
डबरा सागर भेद न मान । सबमें बिंबता सूर्य समान ।
वैसे ब्रह्मादि भूतमें समान । सु-हृदयस्थ मैं ॥ २९० ॥
अजी ! मैं ही हूँ अर्जुन । त्रिभुवनका जीवन ।
सृष्टि क्षयका कारण । मूल जो मैं हूँ ॥ ९१ ॥
बीज ही शाखाओंको प्रसवता । वही वृक्ष बीजमें है समाता ।
वैसे संकल्पसे सब बनता । औ' समाता संकल्पमें ॥ ९२ ॥
विश्वका बीज जो है संकल्प । अव्यक्त तथा वासना रूप ।
उस संकल्पका है निक्षेप । अन्तमें मैं हूँ ॥ ९३ ॥ .
यहां नाम-रूप मिटते । वर्ण औ' व्यक्ति है अटते ।
जातिके भेद भी खुलते । जब न होता आकाश ॥ ९४ ॥
संकल्प वासना संस्कार । फिर रचनेमें आकार ।
रहते हैं जहां अमर । वह स्थान मैं हूँ ॥ ९५ ॥
तपाम्यहमहं वर्षं निगृह्णाम्युत्सृजामि च ।
अमृतं चैव मृत्युश्च सदसच्चाहमर्जुन ॥ १९ ।
तपके जलको खींच गिराता वृष्टि रूपसे ।
मृत्यु मैं और मैं मोक्ष मैं ही सत् और हूं असत् ॥ १९ ॥
ज्ञानेश्वरी २७४

मैं सूर्य बन तपता । शोषता औ' प्रकाशता ।
इंद्र बन मैं वर्षाता । आता सुकाल ॥ ९६ ॥
जब है अग्नि काष्ठ खाता । काष्ठ ही है अग्नि बनता ।
वैसे मरता व मारता । जानो स्वरूप मेरा ॥ ९७ ॥
जो जो दीखता है यहां मर्त्य । वह सब मेरा रूप खुत्य ।
तथा जो है सहज अमर्त्य । वह अविनाशी हूँ मैं ॥ ९८ ॥
अजी ! बहुत बोल क्या करना । सबही एक वाक्यमें जानना ।
सता·सत सार अनुभवना । मैं हूँ सब ॥ ९९ ॥
पुण्यकी समाप्तिके बाद पुनः मृत्यु-लोकमें—
इसीलिए पार्थ मैं नहीं । ऐसा कछु है नहीं कहीं ।
प्राणियोंका दैव है कहीं । जो न देखें मुझको ॥ ३०० ॥
पानी बिन तरंग है सूखती । सूर्य बिन रश्मि न दीखती ।
न करते मद्रूपकी प्रतीति । है यह विस्मय ॥ १ ॥
भरा यह मुझसे बाहर भीतर । ढला है विश्व मुझसे ही ओर छोर ।
किंतु बीता है उनका कर्म-कठोर । कहते हैं मैं नहीं ॥ २ ॥
अमृत-कुण्डमें जो पडते । अपनेको निकाल कहते ।
ऐसोंको है क्या कह सकते । अप्राप्यको होता ऐसा ॥ ३ ॥
अन्नके लिए एक कौर । दौडता है अंध सत्वर ।
चिंतामणि ठुकराकर । अंधत्वमें ॥ ४ ॥
मिटती है जब ज्ञानमें आस्था । होती ऐसी अंधेकीसी अवस्था ।
करके न किया ऐसा सर्वथा । होता ज्ञानके बिन ॥ ५ ॥
अंधेको गरुड पंख मिलता । उसका क्या उपयोग होता ।
वैसे सत्कर्म सदा व्यर्थ जाता । ज्ञानके बिन ॥ ६ ॥
अजी ! देख तू यह अर्जुन । आश्रम-धर्मका आचरण ।
विधि-मार्गका देता शिक्षण । अपने आप ॥ ७ ॥
करनेसे सहज-यजन । होता है प्रसन्न वेदार्जन ।
क्रिया फल सह मूर्तिमान । आता सम्मुख ॥ ८ ॥
२७५ राज-विद्या-समर्पणयोग

ऐसे दीक्षित है जो सोमप । आपही होते यज्ञ-स्वरूप ।
वहां पुण्यके नामसे पाप । जुडा जान ॥ ९ ॥
श्रुतित्रयको वे जानकर । शत-यज्ञोंको सम्पन्न कर ।
यजित मुझको भूलकर । चाहते स्वर्ग ॥ ३१० ॥
त्रैविद्या मां सोमपाः पूतपापा
यज्ञैरिष्ट्वा स्वर्गतिं प्रार्थयन्ते ।
ते पुण्यमासाद्य सुरेन्द्रलोक-
मश्नन्ति दिव्यान्दिवि देवभोगान् ॥ २० ॥
जैसे जो कल्पतरुकी छायामें । बैठ गांठ बांधे भिक्षा-झोलीमें ।
निकलेगा ही वह भिक्षान्नमें । निर्दैवी निश्चित ॥ ११ ॥
वैसे सौ शत सौ यज्ञ किये मेरेलिए । किंतु चाह है स्वर्ग सुखकेलिए ।
पुण्य करना यह पापकेलिए । ऐसा नहीं क्या ? ॥ १२ ॥
मुझे छोडकर पाना स्वर्ग । अज्ञानका यह पुण्यमार्ग ।
ज्ञानी जन उसे उपसर्ग । कहते हैं जो ॥ १३ ॥
वैसे देख नरकको दुःख । दिया है नाम स्वर्गको सुख ।
नित्यानन्द-रूप है निर्दोष । स्वरूप मेरा ॥ १४ ॥
मेरे पास आते हुए पार्थ । पडते हैं ये दोनों सतत ।
स्वर्ग तथा नरकका पथ । है ये चोरोंके ही ॥ १५ ॥
जो मेरे पास लाता है वही शुद्ध-पुण्य है—
स्वर्ग देता है पुण्यात्मक पाप । नरक देता है पापात्मक पाप ।
मुझ तक पहुंचाता है आप । यह है शुद्ध-पुण्य ॥ १६ ॥
मत्स्वरूपमें रहते । मुझसे हैं दूर होते ।
ऐसे कर्मको कहते । पुण्य कैसे ? ॥ १७ ॥
वेदाभ्यासी सोम पीके पुनीत
यज्ञसे जो चाहते स्वर्ग पाना ।
वे पुण्यसे पाकर इंद्र-लोक
पाते वहांके सुख भोग दिव्य ॥ २० ॥
ज्ञानेश्वरी २७६

किंतु रहने दो यह प्रस्तुत । सुन इस भांति हैं वे दीक्षित
यज कर मुझको ही याचित । स्वर्गका सुख ॥ १८ ॥
जो पापात्मक पुण्य होता । उससे मैं नहीं मिलता ।
उससे प्राप्त जो योग्यता । देती है स्वर्ग ॥ १९ ॥
स्वर्ग-सुखका वर्णन—
अमरत्व जहां सिंहासन । ऐरावत जैसा है वाहन ।
राजधानी तथा है भुवन । अमरावती ॥ ३२० ॥
महासिद्धिंका जहां भंडार । अमृतका भरा है कोठार ।
वहां फिरते हैं समाहार । कामधेनुके ॥ २१ ॥
देवही जहां स्वयंसेवक । भूमि है चिंतामणिकी नेक ।
विनोद वाटिका हैं अनेक । सुरतरुकी वहां ॥ २२ ॥
गायन गंधर्वोंका । नर्तन है रंभाका ।
विलास उर्वशीका । मिलता वहां ॥ २३ ॥
मदन करता शय्या-श्रृंगार । चन्द्र बिछाता अमृत-तुषार ।
हरकारा है पवन तयार । वहां सदैव ॥ २४ ॥
ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालं
क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति ।
एवं त्रयीधर्ममनुप्रपन्ना
गतागतं कामकामा लभन्ते ॥ २१ ॥
बृहस्पतिसे महान । स्वस्तिश्रीके ब्राह्मण ।
भोजनमें सुरगण । साथ रहते ॥ २५ ॥
वे भोगते स्वर्ग विशाल ऐसा
आते यहीं क्षीण होते हि पुण्य ।
ऐसे फलासक्त जो वेद-धर्मी
पुनः पुनः जाकर लौटते हैं ॥ २१ ॥
२७७ राज-विद्या-समर्पणयोग

लोकपालोंके समान । अश्व खींचते वाहन ।
उच्चैश्रवा स-सम्मान । चलता आगे ॥ २६ ॥
वहां मिलते हैं ऐसे । भोग इंद्र-सुख जैसे ।
पुण्यांश लोप होनेसे । होते लोप ॥ २७ ॥
पुण्य क्षीण होनेके बाद—
पुण्यका जब लोप होता । ऐंद्रैश्वर्य भी है मिटता ।
तब लौट आना पड़ता । मृत्यु लोकमें ॥ २८ ॥
धन गंवाता है जो वेश्यागमनमें । जा न सकता फिर उसके द्वारमें ।
दीक्षितके वैसे लज्जित जीवनमें । कहना क्या रहा ? ॥ २९ ॥
उन्होंने यहां खोया मुझको । पुण्य बलसे चाहा स्वर्गको ।
वंचित हुवे अमरत्वको । तब फिर मृत्यु-लोक ॥ ३० ॥
फिर माताका उदर गहर । पचाना वहाँ मलमूत्र सागर ।
वहां रहके नवमास भर । जनमते औ' मरते ॥ ३१ ॥
अजी ! स्वप्नमें पाते निधान । जगकर भूलते सम्पूर्ण ।
वैसे स्वर्गका सुख है जान । वेदज्ञोंका ३२ ॥
यद्यपि हैं वेद महान । मेरे बिन हैं वे अर्जुन ।
भूसा कूटना धान बिन । वैसा है व्यर्थ ॥ ३३ ॥
जो मेरी निष्काम भक्ति करते हैं उनका मैं दास बनता हूँ—
इसलिए जो मेरे बिन । वेद-धर्म है अकारण ।
जान मुझे कुछ न जान । तो भी होगा सुखी ॥ ३४ ॥
अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते ।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् ॥ २२ ॥
चितसे सर्व भाव संपूर्ण । मुझे किया सर्व समर्पण ।
जैसे गर्भ-गोल हे अजान । न जानता उद्यम ॥ ३५ ॥
अनन्य भावसे नित्य भजते भक्त जो मुझे ।
उनका जो सदा लीन चलाता योग-क्षेम मैं ॥ २२ ॥
ज्ञानेश्वरी २७८

मेरे बिन कुछ भी नहीं । जिन्हें सुहाता कभी कहीं ।
उनके जीवन हेतु ही । एकमात्र मैं ॥ ३६ ॥
ऐसा अनन्य गति जो चित्त । मेरे ही चिंतनमें है रत ।
उनकी मैं हूँ दिन रात । सेवा करता ॥ ३७ ॥
जब वे एकनिष्ठ हो पार्थ । चलते रहते मेरा पथ ।
उनकी चिंता है मेरे साथ । लगती सदा ॥ ३८ ॥
फिर जो जो है उनको करना होता । वह सब मुझको ही करना पड़ता ।
जैसा अजात पक्षीका जीवन होता । पक्षिणीको जीना ॥ ३९ ॥
शिशु अपनी भूख-प्यास न जानता । तब माताको सब करना पड़ता ।
वैसे जो प्राण-पणसे मुझे भजता । उनकी सेवा लजाता नहीं ॥ ४० ॥
उसको चाह मेरे सायुज्यकी । उसे पूर्ण करना मेरे मनकी ।
या सेवाकी चाह मुझसे उसकी । जिससे होती प्रीति ॥ ४१ ॥
वैसे मनमें वे जो जो भाव । धरते पूर्ण करता देव ।
देता जो उसे मैं ही सदैव । रक्षण करता ॥ ४२ ॥
किंतु विश्वमें सकाम भक्त ही अधिक हैं—
येऽप्यन्यदेवता भक्ता यजन्ते श्रद्धयान्विताः ।
तेऽपि मामेव कौन्तेय यजन्त्यविधिपूर्वकम् ॥ २३ ॥
यह योग-क्षेम सम्पूर्ण । मुझ पर पडा अर्जुन ।
उसका है सर्व भावेन । मैं ही आश्रय ॥ ४३ ॥
अब अन्य कयी हैं संप्रदाय । जो मुझे न जानते मैं उन्हें नित्य ।
वे हैं अग्नि इन्द्र सूर्य सोमाय । कहकर हैं यजते ॥ ४४ ॥
वह भी है मेरा ही भजन । क्योंकि यह जो है मैं ही पूर्ण ।
किंतु यह सरल न जान । वक्र ही हैं ॥ ४५ ॥
श्रद्धा-पूर्वक जो कोयी पूजते अन्य दैवत ।
पूजते हैं मुझको ही किंतु है विधि छोडके ॥ २३ ॥
२७९ राज-विद्या समर्पणयोग

जैसे शाखा पल्लव वृक्षके । सारे हैं ये एक ही बीजके ।
किंतु पानी लेते हैं जडके । धर्म वैसे ही ॥ ४६ ॥
या जो दस इन्द्रियां हैं । सब एक ही देहकी हैं ।
इनके विषय जाते हैं । एक ही स्थानपे ॥ ४७ ॥
किंतु मृष्टान्न कैसे मधुर । कानोंमें भरना सुखकर ।
कैसे जाने सौरभ मधुर । सूँघकर नमक ॥ ४८ ॥
जैसे जिह्वासे रस चखना । घ्राणसे ही परिमल लेना ।
वैसे मेरा भजन करना । मुझे जानकर ॥ ४९ ॥
मुझे न जानकर भजन । करते हैं वह पार्थ जान ।
तभी कर्मके चक्षु हैं ज्ञान । वह हो निर्दोष ॥ ३५० ॥
अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च ।
न तु मामभिजानन्ति तत्त्वेनातश्च्यवन्ति ते ॥२४॥
वैसे देखें तो हे पार्थ । यज्ञोपहार समस्त ।
मेरे बिन कहो भोक्ता । कौन है अन्य ॥ ५१ ॥
सकल यज्ञका मैं आदि । इसका मैं ही हूं अवधि ।
किंतु मुझे छोड दुर्बुद्धि । भजते देवोंको ॥ ५२ ॥
गंगाजीको गंगोदक ही जैसे । देते हैं देव पितरोद्देश्यसे ।
देते हैं मेरा ही मुझको वैसे । भावसे अन्य ॥ ५३ ॥
यान्ति देवव्रता देवान्पितॄन्यान्ति पितृव्रताः ।
भूतानि यान्ति भूतेज्या यान्ति मद्याजिनोऽपिमाम् ॥२५॥
इसीलिए सुन पांडुसुता । मुझे न मिलकर सर्वथा ।
दिया मनमें रख जो आस्था । वहीं गया ॥ ५४ ॥
भोक्ता मैं सब यज्ञोंका फलदायक भी स्वयं ।
न जाने तत्व जो मेरा गिरते हैं सदा वही ॥ २४ ॥
देवोंके भक्त देवोंसे पितृओंसे पितृ-पूजक ।
भूतोंके भक्त भूतोंसे मेरे जो मिलते मुझे ॥ २५ ॥
ज्ञानेश्वरी २८०

मन-वचन करणसे अर्जुन । करता है जो देवार्पण भजन ।
शरीर त्यागकर वह तत्क्षण । पाता देव-लोक ॥ ५५ ॥
अथवा पितरोंके व्रत । आचरता जिनका चित्त ।
समाप्त होतेही जिवित । पाते पितृ-लोक ॥ ५६ ॥
या क्षुद्र देवतादि जो भूत । जिनके हैं परम दैवत ।
अभिचारसे जिनका चित्त । करता उपासना ॥ ५७ ॥
उनका शरीर जब गिरता । भूतत्वको वह प्राप्त करता ।
संकल्पवशतासे है फळता । उनका कर्म ॥ ५८ ॥
मैं उनका हो जाता हूं जो मेरी निष्काम भक्ति करते हैं -
जिसने देखा मुझको ही आंखसे । जिसने सुना मुझको ही कानसे ।
मुझको ही प्रतीत किया मनसे । वाणीसे गाया ॥ ५९ ॥
अजी ! सर्वत्र सर्वांगसे । मुझे भजन पूजनसे ।
दान-पुण्य क्रिया भी उसे । मेरे ही हेतु ॥ ३६० ॥
जिन्होंने किया मेरा ही अध्ययन । अंदर बाहर मेरा ही चिंतन ।
मुझसे जुडा उनका जीवन । सर्व-भावसे ॥ ६१ ॥
धोते हैं वे सदैव अहंकार । हरि दास्यत्वका कर स्वीकार ।
उनका लोभ है एक आखर । केवल हरि-भक्ति ही ॥ ६२ ॥
जो मेरे ही काममें सकाम । मेरे ही प्रेममें सप्रेम ।
मेरे ही भ्रममें संभ्रम । जानता अन्य ॥ ६३ ॥
उनके शास्त्र मुझे ही जानते । उनके मंत्र मुझे ही जुडते ।
उनके तंत्र सदा ही करते । मेरा ही भजन ॥ ६४ ॥
आनेसे पहले वे मरण । ऐक्य हुए मुझसे अर्जुन ।
मर करके वे कौन स्थान । पाएंगे पार्थ ॥ ६५ ॥
इसीलिए जो मद्याजी हुए । मेरे ही सायुज्यमें वे आये ।
उपचारार्थ जिन्होंने दिये । अपने भाव ॥ ६६ ॥
२८१ राज-विद्या-समर्पणयोग
(36)

वैभव-पूर्ण पूजासे मैं किसीका नहीं होता — मुझे क्या कम है ? —
अजी ! आत्मार्पणके बिन । न भाता मुझे कुछ भिन्न ।
अन्य उपचारसे जान । मैं नहीं मिलता ॥ ६७ ॥
जाना कहता जो वह न जानता । संपन्नता दिखाना ही है न्यूनता ।
कृतार्थ हुआ मैं यह जो कहता । वह कुछ नहीं जान ॥ ६८ ॥
दान-यज्ञ-तपका जो अर्जुन । मनमें धरता है अभिमान ।
यहां यह सब तृण-समान । व्यर्थ जान तू ॥ ६९ ॥
जो है ज्ञानमें संपन्न । वेदसे बढ़के कौन ।
अचल शेष समान । कोयी है क्या ? ॥ ३७० ॥
शैयाके नीचे शेष छिपता । वेद नेति नेति है कहता ।
जहां ज्ञान भी है पगलाता । सनकादिकका ॥ ७१ ॥
तापसमें है कहां कौन । जो शूल-पाणीके समान ।
लेता है त्यज अभिमान । पद-जल सिरपे ॥ ७२ ॥
या ऐश्वर्यमें कौन । है लक्ष्मीके समान ।
है श्रियाके समान । घरमें दासी ॥ ७३ ॥
जिसके खेलका घरौंदा एक । कहलाता अमरावति नेक ।
तब हुए खिलौने इन्द्रादिक । उनके सब ॥ ३७४ ॥
जब वह तोड़ती अनचाह खेल । होते रंक इन्द्रादिक ले दल-बल ।
जिसके कटाक्षसे होते वृक्ष फल । सुरतरु दिव्य ॥ ७५ ॥
जिनकी दासियाँ विभिन्न । हैं इतनी शक्ति सम्पन्न ।
वह लक्ष्मी देवी महान । है यहाँ दासी ॥ ७६ ॥
करती वह सर्व भावसे सेवा । छोड़के अभिमान सब पांडव ।
तब कहीं चरण धोनेका दावा । पा सकी वह ॥ ७७ ॥
छोड़कर सब बड़प्पन । भूलकर व्युत्पत्ति सम्पूर्ण ।
होते हैं लघु अणु समान । पाते तब सामिप्य ॥ ७८ ॥
सहस्र करके समीप । चंद्रका भी होता है लोप ।
खद्योत करता प्रलाप । अपने प्रकाशका ॥ ७९ ॥
ज्ञानेश्वरी २८२

न चलती जहाँ लक्ष्मीकी महत्ता । तथा शिवका तप नहीं पुरता ।
घामड़ लोगोंका भला क्या चलता । वहाँ धनंजय ॥ ८० ॥
इसीलिए तन अर्पित कर । सकल गुण कर न्योछावर ।
संपत्ति-मद श्री-चरण पर । रख तत्पश्चात् ॥ ८१ ॥
पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति ।
तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः ॥ २६ ॥
मुझे निष्काम प्रेम चाहिये-प्रेमसे दिया पत्ता भी मैं सुखसे खाता हूं—
कर निःसीम भाव उल्लास । मेरे अर्पणका ले उद्देश्य ।
जो भी फल दिया स-संतोष । लेता हूँ मैं ॥ ८२ ॥
जब वह भक्त मुझे दिखाता । अपने हाथ मैं दोनों बढ़ाता ।
उसका डंठल भी न तोड़ता । खाता हूँ आदरसे ॥ ८३ ॥
किसीने शुद्ध भक्तिसे । दिया सुमन प्रीतिसे ।
खाता भावातिरेकसे । भूल सूंघना ॥ ८४ ॥
फल-फूल क्यों इक पात । सूखा भी हो उसका गात ।
लेता उसे मोदसे पार्थ । देते हैं जो भक्तिसे ॥ ८५ ॥
देख भरा वह सर्व-भावसे । भूखा तोषता जैसे अमृतसे ।
वैसा मैं मुखमें तोषसे उसे । डालता हूँ पार्थ ॥ ८६ ॥
अथवा ऐसा भी जब होगा । वह पात भी नहीं मिलेगा ।
पानीका बूंद एक तो होगा । उसे नहीं अकाल ॥ ८७ ॥
वह है सर्वत्र रहता । सबको सहज मिलता ।
उसीका अर्पण करता । सर्वस्व मान ॥ ८८ ॥
उसने बैकुण्ठके विशाल । बनाया मेरे लिए महल ।
कौस्तुभसे भी अति निर्मल । दिये अलंकार ॥ ८९ ॥
प्रेमसे पत्र या पुष्प फल या जल दे मुझे
भक्तिसे जो दिया सारा खाता मैं सुख-पूर्वक ॥ २६ ॥
२८३ - राज-विद्या-समर्पणयोग