सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

पृष्ठ 347, कुल 1172 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 347

किंतु रहने दो यह प्रस्तुत । सुन इस भांति हैं वे दीक्षित
यज कर मुझको ही याचित । स्वर्गका सुख ॥ १८ ॥
जो पापात्मक पुण्य होता । उससे मैं नहीं मिलता ।
उससे प्राप्त जो योग्यता । देती है स्वर्ग ॥ १९ ॥
स्वर्ग-सुखका वर्णन—
अमरत्व जहां सिंहासन । ऐरावत जैसा है वाहन ।
राजधानी तथा है भुवन । अमरावती ॥ ३२० ॥
महासिद्धिंका जहां भंडार । अमृतका भरा है कोठार ।
वहां फिरते हैं समाहार । कामधेनुके ॥ २१ ॥
देवही जहां स्वयंसेवक । भूमि है चिंतामणिकी नेक ।
विनोद वाटिका हैं अनेक । सुरतरुकी वहां ॥ २२ ॥
गायन गंधर्वोंका । नर्तन है रंभाका ।
विलास उर्वशीका । मिलता वहां ॥ २३ ॥
मदन करता शय्या-श्रृंगार । चन्द्र बिछाता अमृत-तुषार ।
हरकारा है पवन तयार । वहां सदैव ॥ २४ ॥
ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालं
क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति ।
एवं त्रयीधर्ममनुप्रपन्ना
गतागतं कामकामा लभन्ते ॥ २१ ॥
बृहस्पतिसे महान । स्वस्तिश्रीके ब्राह्मण ।
भोजनमें सुरगण । साथ रहते ॥ २५ ॥
वे भोगते स्वर्ग विशाल ऐसा
आते यहीं क्षीण होते हि पुण्य ।
ऐसे फलासक्त जो वेद-धर्मी
पुनः पुनः जाकर लौटते हैं ॥ २१ ॥
२७७ राज-विद्या-समर्पणयोग