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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 346

ऐसे दीक्षित है जो सोमप । आपही होते यज्ञ-स्वरूप ।
वहां पुण्यके नामसे पाप । जुडा जान ॥ ९ ॥
श्रुतित्रयको वे जानकर । शत-यज्ञोंको सम्पन्न कर ।
यजित मुझको भूलकर । चाहते स्वर्ग ॥ ३१० ॥
त्रैविद्या मां सोमपाः पूतपापा
यज्ञैरिष्ट्वा स्वर्गतिं प्रार्थयन्ते ।
ते पुण्यमासाद्य सुरेन्द्रलोक-
मश्नन्ति दिव्यान्दिवि देवभोगान् ॥ २० ॥
जैसे जो कल्पतरुकी छायामें । बैठ गांठ बांधे भिक्षा-झोलीमें ।
निकलेगा ही वह भिक्षान्नमें । निर्दैवी निश्चित ॥ ११ ॥
वैसे सौ शत सौ यज्ञ किये मेरेलिए । किंतु चाह है स्वर्ग सुखकेलिए ।
पुण्य करना यह पापकेलिए । ऐसा नहीं क्या ? ॥ १२ ॥
मुझे छोडकर पाना स्वर्ग । अज्ञानका यह पुण्यमार्ग ।
ज्ञानी जन उसे उपसर्ग । कहते हैं जो ॥ १३ ॥
वैसे देख नरकको दुःख । दिया है नाम स्वर्गको सुख ।
नित्यानन्द-रूप है निर्दोष । स्वरूप मेरा ॥ १४ ॥
मेरे पास आते हुए पार्थ । पडते हैं ये दोनों सतत ।
स्वर्ग तथा नरकका पथ । है ये चोरोंके ही ॥ १५ ॥
जो मेरे पास लाता है वही शुद्ध-पुण्य है—
स्वर्ग देता है पुण्यात्मक पाप । नरक देता है पापात्मक पाप ।
मुझ तक पहुंचाता है आप । यह है शुद्ध-पुण्य ॥ १६ ॥
मत्स्वरूपमें रहते । मुझसे हैं दूर होते ।
ऐसे कर्मको कहते । पुण्य कैसे ? ॥ १७ ॥
वेदाभ्यासी सोम पीके पुनीत
यज्ञसे जो चाहते स्वर्ग पाना ।
वे पुण्यसे पाकर इंद्र-लोक
पाते वहांके सुख भोग दिव्य ॥ २० ॥
ज्ञानेश्वरी २७६