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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 340

फिर पांचोंके जो विशेष गुण । अथवा इन्द्रियां तथा है प्राण ।
यही है यज्ञोपचार भरण । अज्ञान है घृत ॥ २४० ॥
वहां कुण्ड है मन बुद्धिका । प्रज्वलित अग्नी है ज्ञानका ।
समताकी सुन्दर वेदिका । जान तू पार्थ ॥ ४१ ॥
मति कौशल्य स-विवेक । मंत्र-विद्या गौरव नेक ।
शांति ही है सुवा और सुक । जीव है यजमान ॥ ४२ ॥
स्वरूपानुभव पात्रसे । विवेकके महा-मंत्रसे ।
वह है ज्ञानाग्नि होत्रसे । नाशता भेद ॥ ४३ ॥
जब है अज्ञान मिट जाता । यजितका यज्ञ है रुकता ।
आत्म-समरस स्नान होता । अवभृतका ॥ ४४ ॥
तब भूत विषय कारण । न होता इसका भेद ज्ञान ।
एकत्वका है संपूर्ण ज्ञान । होता आत्म-बुद्धिसे ॥ ४५ ॥
जागृत मनुष्य जैसे अर्जुना । कहता स्वप्नकी विचित्र सेना ।
आप रही स्वयं बन गया था ना । निद्रावश होकर ॥ ४५ ॥
अब न रही सेना जो थी सेना । मैं अकेला ही था पूर्ण रूपेण ।
ऐसा होता तब एकत्व-भान । उसको विश्वका ॥ ४७ ॥
फिर जीवत्वका भान है मिटता । आब्रह्म परमात्म बोध भरता ।
इस भांति ज्ञान-भावसे भजता । अद्वय-बोधसे ॥ ४८ ॥
जब सर्वत्र मैं हूं तब अलग भजन कैसे ?—
या अनादि यह अनेक । भिन्नत्व है अनेकानेक ।
तथा है नाम-रूपादिक । वह भी बिषम ॥ ४९ ॥
इसीलिए विश्व है भिन्न । न भेदता उसका ज्ञान ।
जैसे अंग हैं भिन्न भिन्न । पर शरीर एक ॥ २५० ॥
शाखाओंके अनेक प्रकार । किंतु है एक ही तरुवर ।
रश्मि ढेर, एक दिनकर । वैसे ही पार्थ ॥ ५१ ॥
ज्ञानेश्वरी २७०