ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंजहां नाना मतोंका अपरिचितपन । मिटता है शास्त्रोंका अनजान ।
मिलते हैं जहां भूले हुए सभी ज्ञान । वह पवित्र मैं हूँ ॥ ७४ ॥
ब्रह्म-बीजका फूटा अंकुर । घोष ध्वनि नाद औ' आकार ।
उसका भुवन जो ओंकार । वह भी मैं हूँ ॥ ७५ ॥
उस ओंकारका है उदर । समालेता है अ, उ, म, कार ।
जनमते ही वेद लेकर । उठे वे तीनों ॥ ७६ ॥
इसीलिए ऋग् यजु तथा साम । ये तीनों कहे मैं आत्माराम ।
एवं मैं ही हूँ सब कुलक्रम । शब्द ब्रह्मका ॥ ७७ ॥
गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत् ।
प्रभवः प्रलयः स्थानं निधानं बीजमव्ययम् ॥ १८ ॥
जो है यह चराचर संपूर्ण । जिसमें भरी है प्रकृति पूर्ण ।
उस प्रकृतिका विश्राम स्थान । परमगति मैं हूँ ॥ ७८ ॥
जिससे पाती है प्रकृति जीवन । अधिष्ठानसे होता विश्व जनन ।
आकर जो उस प्रकृतिके गुण । भोगता है ॥ ७९ ॥
विश्वश्रीका वह भर्ता । मैं हूँ जानो पांडुसुता ।
हूँ अधिपति समस्ता । त्रिभुवनका मैं ॥ २८० ॥
आकाशको सर्वत्र बसाना । वायुको कभी स्वस्थ न होना ।
तथा वर्षाको बरसना । औ' दहना अग्निको ॥ ८१ ॥
पर्वतको न छोड़ना आसन । समुद्रको न सीमा उल्लंघन ।
पृथ्वी करे भूतोंका वहन । यह है आज्ञा मेरी ॥ ८२ ॥
मेरे कहनेसे है वेद बोलता । मेरे चलानेसे सूर्य है चलता ।
मेरे हिलानेसे प्राण है हिलता । करता विश्वका चलन ॥ ८३ ॥
मेरे ही नियमनमें काल । प्राणि-मात्रको जाता निगल ।
मेरी ही आज्ञामें है सकल । चलता नित्य ॥ ८४ ॥
साक्षी स्वामी सखा भर्ता निवास गति आसरा ।
मैं हूं कर्ता भर्ता हर्ता निदान बीज अक्षय ॥ १८ ॥
२७३ राज-विद्या-समर्पणयोग
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