ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंलोकपालोंके समान । अश्व खींचते वाहन ।
उच्चैश्रवा स-सम्मान । चलता आगे ॥ २६ ॥
वहां मिलते हैं ऐसे । भोग इंद्र-सुख जैसे ।
पुण्यांश लोप होनेसे । होते लोप ॥ २७ ॥
पुण्य क्षीण होनेके बाद—
पुण्यका जब लोप होता । ऐंद्रैश्वर्य भी है मिटता ।
तब लौट आना पड़ता । मृत्यु लोकमें ॥ २८ ॥
धन गंवाता है जो वेश्यागमनमें । जा न सकता फिर उसके द्वारमें ।
दीक्षितके वैसे लज्जित जीवनमें । कहना क्या रहा ? ॥ २९ ॥
उन्होंने यहां खोया मुझको । पुण्य बलसे चाहा स्वर्गको ।
वंचित हुवे अमरत्वको । तब फिर मृत्यु-लोक ॥ ३० ॥
फिर माताका उदर गहर । पचाना वहाँ मलमूत्र सागर ।
वहां रहके नवमास भर । जनमते औ' मरते ॥ ३१ ॥
अजी ! स्वप्नमें पाते निधान । जगकर भूलते सम्पूर्ण ।
वैसे स्वर्गका सुख है जान । वेदज्ञोंका ३२ ॥
यद्यपि हैं वेद महान । मेरे बिन हैं वे अर्जुन ।
भूसा कूटना धान बिन । वैसा है व्यर्थ ॥ ३३ ॥
जो मेरी निष्काम भक्ति करते हैं उनका मैं दास बनता हूँ—
इसलिए जो मेरे बिन । वेद-धर्म है अकारण ।
जान मुझे कुछ न जान । तो भी होगा सुखी ॥ ३४ ॥
अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते ।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् ॥ २२ ॥
चितसे सर्व भाव संपूर्ण । मुझे किया सर्व समर्पण ।
जैसे गर्भ-गोल हे अजान । न जानता उद्यम ॥ ३५ ॥
अनन्य भावसे नित्य भजते भक्त जो मुझे ।
उनका जो सदा लीन चलाता योग-क्षेम मैं ॥ २२ ॥
ज्ञानेश्वरी २७८