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चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)

Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary

मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा

DevanagariAwadhipublished520 पृष्ठ

१९८
२०५
( रीड्सबर्ग्स १४१; पंजाब [प ] )
सिस्ते नखशती चौरन्सी
( चौरण्डीकी चित्रसरीका वर्णन )
झार चौरुन्डी इगुर पानी । चित्र उरेह फीन्द सुनपानी ॥१
लंक उरेह भमीखन रेहा । सैंध मान दसगर र्क देहा ॥२
सीता हरन राम मंग्राऊँ । दुर पांडो कुरुखेत क ठाँऊँ ॥३
करपाँ पार कोइया सुभारू । अजपी नगरी अगिया बँतारू ॥४
साँझी पञ्चकाश्च भइ लावा । चक्रव्यूह अगिँ उथापा ॥५
सीह-सैंसूर मिरघ मिरपावन आनीं भाँत ।६
कपा-काथ परलोक निसारैंभ, लिख लीँयी जिहँ पाँत ॥७
पाठान्तर—पंजाब प्रति—
शीर्षक—फट गया है ।
१—पूरी पंक्ति अस्पष्ट है पढा नहीं जाता ।
२—राउलदा (?) ।
३—पंक्ति ६-७ अस्पष्ट हैं पढ़े नहीं जाते ।
टिप्पणी—(१) झार—पोतकर, रगड़कर । इंगुर—(सं हिङ्गुल>इङ्गुल>ईंगुर>
इंगुर) एक प्रकारका लाल रंग जिसे अभ्रक पारद तथा गन्धक घोट
कर बनाते हैं। स्त्रियाँ इसे अपना माँग भरनेके लिए सिन्दूरकी तरह
काममें लाती हैं । बानी—(सं वर्णिक)-रंग । सुनबानी—सोनेका
रेखांकन । इगुरी पृष्ठ भूमि पर सोनेसे रेखांकित चित्र चौदहवीं-
पन्द्रहवीं शताब्दीमें काफी प्रचलित थे और उसके नमूने बड़ी मात्रामें
चित्रित जैन ग्रन्थोंमें देखनेको मिलते हैं ।
(२) लंक—रावणका निवासस्थान । भमीखन—विभीषण । रेहा—
रेखांकित किया । दसगर—दशकन्ध, रावण ।
(३) दुर—दुर्योधन । कुरुखेत—कुरुक्षेत्र, जहाँ महाभारत हुआ था ।
(४) इस पंक्तिम लोककथाओंमें प्रचलित पात्र जान पड़ते हैं किन्तु उनकी
पहचान हम नहीं कर सके हैं । अगिया बैताल (अगिया बैतार)—
विक्रमादित्यकी सिद्ध दो बैतालोंमेंसे एक ।
(५) चक्रव्यूह—चक्रव्यूह ।
(६) मिरखावन—मृगारण्य शिकारगाह । आनीं—अनेक प्रकारके ।

१९९
२०६
(रीडींग्स १६१)
सिफ़ते खुश्बूए हर किस्से आरास्त: गोयद
(प्रत्येक प्रकारकी सुगन्धिका वर्णन)
लौटि देखि जो कुंकू लोरा। चन्दन घिसि मरि घरै कचोरा ॥१
बेर्ना परिमल इस औ छरा। ठौर ठौर पर सेडिया जरा ॥२
मेध सुगन्ध आइ असराऊ। चोवा पास होय मैंहकारू ॥३
खैर कपूर सुरंग सुपारी। पान अदा कर घरी सँवारी ॥४
नरियर दाख फिराँजी आहा। खाँड खँदोर कहूँ तिह काहा ॥५
लोरहिं लीन्ह खौम परछाईं, तुर उघाइ मुख जोइ ।६
धन बिरास चाँदा कैं, बास माँहिं निसि सोइ ॥७
टिप्पणी—( ) बेर्ना = ख बीरण, उस। परिमल—अनेक सुगन्धियोंको मिलाकर
बनायी हुई सुगन्धि। इस—सम्भवतः इत्र।
(३) मेध—मेद एक प्रकारकी सुगन्धि जो किसी पशुके नाभिस बनायी
जाती थी। (आइन-अकबरी, आइन ३, पृ ८७)। चोवा—एक
सुगन्धि जिसके तैयार करनेकी विधिका आइन अकबरीमें उल्लेख है।
(४) कपूर—'केवर' पाठ भी सम्भव है। उस स्थितिम उसका तात्पर्य
'केवड़ा' होगा।
२०७
(रीडींग्स १६१)
सिफ़ते तख्त बरीं व मुकक्कल बे ज्याहिराते चिराग
(शय्या वर्णन)
पालँग सेब ओ आनि बिछाइ। धरत पाठ सुई लागे जाइ ॥१
पान बनै अरु फूलहिं भारी। सोनें झारी ढाँस गुंदारी ॥२
सुरंग चीर एक आन बिछावा। घरती पैंस झँपन अस आवा ॥३
सिद्धि धदि छत रखतें बिफगरा। खोंपा छूट छिटक गये भारा ॥४
यहि भैंति फरै फूल पहि पासी। फरेंकी धारि फूर भर दासी ॥५

२००
लोर जान आये समरि, पुहुप बास रस आइ ॥६
निसा हाथ पसारे, छाँपि उठे कर पाइ ॥७
टिप्पणी—(१) आधि—शकर । धरत—रखते ही। पाइ—पैर। धूर—भूमि ।
(३) सुरंग—लाल । अचँव—मूढ़ा । अस—ऐसा ।
(४) खोंवा—रेशमका जूड़ा। बाल—बाल केश ।
(५) काँड़ी—पुलकी टोकरी । कूर—कूड ।
२०८
( रीडिंग्स १६० )
पैदाइ बदने लोरक चाँदा रा बज रजाब
( लोरकका चाँदाको जगाना )
गूँदवा गाँद परा मधकाई । दीन पतीसैं बैठे आई ॥१
मुखा कँवल जनु बिगसत आहा । अधर सुरंग बिरंगू फाहा ॥२
सोवत फिरा हियें कर धीरू । अपन देखि सुरँगि गा बीरू॥३
चितई गइँ अब आप जनाऊँ । पाइ धरउँ कै मकत सुनाऊँ ॥४
फिरि कै लोर झों अस आवा । मन संका नहि सोवत जगावा॥५
कापर जान भरपूर गहि, बीरहि यकति न आठ ।६
जीठ दान मन संका, किहि बिधि सोवत जगाउ ॥७
२०९
( रीडिंग्स १६५ : पंजाब [क] )
बीदार शुदने चाँदा व गिरफ्तन मोये सरे लोरक व फरियाद बर आवर्दन
( चाँदाका जागकर लोरकके केस पकड़कर चिल्लाना )
ठहरत पेर गही कर भारी । नैन सांझहि मन आगि कुभारी ॥१
पुन खतरी आ नियरें आवा । कर गहि केस बाँद गुहरावा ॥२
बार बार कहि फेड न जागे । मानुस सुत सो गुहार न लागे ॥३

२१
ऊँच पोल तो चेरी जागहिं । चोर देखि भय जीयें लागहिं ॥४
छाड़ न केम घरसि दइ फेरा । करहि गुहार चोर महिं हेरा ॥५
मन रहँसै धनि अस कहै, जिये आस तुलान ।६
दयी ठाँठ जो माँगेउँ, सो महँ सरबस आन ॥७
पाठान्तर—पंजाब प्रति—
शीर्षक—अंश अप्राप्य है ।
१—सूख । २—गुहरवा । ३—पूरी पंक्ति अप्राप्य है । ४—चोर देखि
बहु जियसे डरारहिं । ५—पंक्ति ६-७ वाला अंश कट गया है ।
टिप्पणी—(१) बेर—समय । गढ़ी—पकड़ा । बारी—बाला युवती ।
(२) नियरेँ—निकट । गुहरावा—पुकार लगाऊं ।
(५) हेरा—देखा ।
(६) तुलान—पूरी हुई ।
(७) गुहार—पुकार ।
(८) सरबस—सर्वस्व सब कुछ ।
२१०
( रोकेण्ड्स १६१ )
जवाब दादने लोरक मर चाँदा रा बानरमी
( लोरुकका चाँदासे धीरे कहना )
मन अचरत छनि भीमर छोली । अपने जनम न कीन्हेउँ चोरी ॥१
आयउँ तोरैं नेह कुंवारी । कही चोर आँ दीन्ही गारी ॥२
चोर होवेउँ तोर अमरन लेवेउँ । पूर गहन ऊँ ऊघदि देवेउँ ॥३
घरी केम तूँ महिँ गुहरावसि । सोवत लोग फेरि अरय जगापसि॥४
अमरन काज न आयइँ मोरे । रूप भुलानेउँ चाँदा तोरें ॥५
तोहि लागि जो मरेउँ, नेह न छाडेउँ काउ ।६
पिरत तुम्हार लाग मोर हिरदें, जै दिठ बिनु आइ तो खाउ ॥७
टिप्पणी—गुहरावसि—पुकारती हो ।

२४
पुरुख न आपु सराहै, पूछति कहइ बात ॥६
घोर घोल सो मारै, जो मन पाउर रात ॥७
टिप्पणी—(१) च्छिन्हि—पहचानती हो । गह्म—ग्रहण । उबारेंउ—उबार
दिया।
(२) साझ—साथ । प्हरेउँ—भगाया ।
(३) भगरीं—सभों ।
(४) गार—गिरा ।
(७) पाउर—पागल । रात—अनुरक्त होकर ।
२१५
(रीडिंग्स १७ ब)
रुपाऊ कर्दने चाँदा बर मेहानते लोरक
(चाँदाका लोरकका उपहास करना)
आपुहि बीर सराहसि काहा । जात गुवार आइ घरमाहा ॥१
हमरें घेर सहस एक जाहींहें । काज कहा नहीं तिइ एक न छेपहें॥२
जति कप्तान जो पूँछ पहारा । असवारहि कउँ फेरि न आवा ॥३
माझें लोर कीन्हि मिठार्ड । सिंह के मंदिर कस पैठेउ धाई ॥४
ऐसें नर आ सेउ कराइइ । साईं दोह अस छोड़ न आवइ ॥५
सुन जो पावइ महर जस, गोचरा परिहँइ बेरि ।६
एक धरति सो परि पर्ह, हँ डोलहु फिरि केरि ॥७
टिप्पणी—(१) गुवार—ग्वाल । जाइ—हो ।
(७) परिहँइ—पड़ेगी । बेरि—बेड़ी ।
२१६
(रीडिंग्स १७ ब)
जवाब दादने लोरक बर चाँदा रा
(लोरकका उत्तर)
साईं दोइ अस बोलै नारी । रात आइ अइनातें भारी ॥१
कै आपन बिरुबार सँभारै । कै बिनाय धर्मा मई मारै ॥२

२०५
झेंकरें काज जीठ लै दीजा। ताकहँ चाँद दोह कइ कीजा ॥३
महर फाब घसि गोबराँ लेऊँ। बीउ जो माँग फाड़ि कै देऊँ ॥४
हमरैं दोह न कीजै घनाँ। दोहँ करहिं तिह कोइ न गुनाँ ॥५
गुन अवगुन सभ कोइ न जानै, जो मन आइ सरीर ।६
आयन पाठ घर आयउँ, हौँ पूछेउँ मझ नीर ॥७
टिप्पणी—(१) अहबाई—अनायास, बिना किसी कारणके।
(२) बायस—निमन्त्रण। दियाप—दाद।
(३) झंकरैँ—जिसके।
२१७
(रीडिंग्स १०१अ)
स्वाल कर्दन् चौंदा बर लोरक दर इश्क
(चाँदका लोरकसे प्रेम-प्रश्न)
पूछेउँ लोरक कहु सत मोही। (के) एती बुधि दीन्हेँ तोही ॥१
सतैंहि तरै सायर महँ नावा। बिनु सत बूड़े थाह न पावा ॥२
जिहँ सत होइ सो लागै तीरा। सत कइ हनै युद्ध मँझ नीरा ॥३
सत गुन खींचि तीर लै लावा। सत छाँड़ेँ गुन तोर बहावा ॥४
सत सँभार सो पावइ थाहा। बिनु सत थाह होइ अवगाहा ॥५
सत साथी सत साँमल, सतैं नाव गुनधार ।६
कह सत कित तूँ आयसि, यहु बुध दइ करतार ॥७
मूलपाठ—(१) के (लिपिकार काफ़पर ऊपर मरकज़ देना भूल गया है)।
टिप्पणी—(१) एती—इतनी।
(२) सायर—सागर।
(४) गुन—रस्सी।
(६) गुनधार—यह कँडहार भी पढ़ा जा सकता है। पद्मावत और मधु-
मालतीमें यह शब्द अनेक बार आया है और कदा इस माताप्रसाद
गुप्तने 'कँडहार' ही पढ़ा है और उसे 'कर्णधार'का रूप बताया है।
वासुदेवशरण अग्रवालने भी इस रूपको स्वीकार कर उसका अर्थ
'पतवार धारण करनेवाला (माझी) दिया है। वस्तुतः उसके लिए

१२
२११
( रीकैण्ड्स १५७ )
गुफ़्तनै चाँदा लोरक रा खुन्द
( चाँदा उत्तर )
लोर रैन जो घोरी आवइ । अमरन लेत तिन्हि कवन छुड़ावइ॥१
लोरहु नेह फइइ दुनि फाहा । अइस उतर कहु आइत आहा ॥२
मैं तिन्हको का संदेस पठावा । कौन सकति ऐं मो पहँ आवा ॥३
जा तिन्हिं पखि उठी जो आई । रहे न पाठ सो मरे उड़ाई ॥४
डिठ दइ पाहु आइ सो बेरा । नीन्द न फोठ लोर महिं हेरा ॥५
मींजु तार तूँ आनसि, फँसै मेट न जाइ ।६
पाठ धरहु तिहँ बिस्तर, लायहु जीठ गँवाइ ॥७
टिप्पणी—(१) मो—मुझ ।
२१२
( रीकैण्डस १५८क )
सवाल करदने लोरक ब नमूदन तमसील
( लोरकका कथन )
जाँलहि जीठ घट महँ होई । तौलहि सरग न आवइ कोई ॥१
प्रथम मानुम जीउ गँवावइ । तो पाछैं थइ सरगहिं आवइ ॥२
मर कै चाँद सरग हौं आवा । जो डिठ होइ डराइ डरावा ॥३
हौं तो मरतें बिनहु सो देखी । तोहि देख धन मुएऊँ बिसोखी ॥४
सुर्ये जो मारे सो कस आहा । चाँद सुर्ये कर मारग काहा ॥५
देख रूप डिठ दीन्हों, तो आयउँ तिहिं पास ।६
रहे नैन तिहिं देखेवैं, रहे जीइ सें साँस ॥७
टिप्पणी—(१) जाँलहि—जब तक । तौलहि—तब तक ।
(२) पाछैं—पीछे, बादमें ।
(५) मारग—मारना ।

९३
२१३
( रीकेन्ह्स १६८५ )
गुवाश्तने चाँदा मुये खरे लोरक व गिरफ्तने कमरबन्दे ऊ
( चाँदाका केश छोड़कर काँचुक पकड़ना )
लोर मन उठा सरोहू । चाँदा चितईं भुझानेवँ कोहू ॥१
केस छाड़ि धनि आँचर गहा । चाँद बैठि नर ठाढ़ा रहा ॥२
धोर नाँव आपुन कहु मोही । बोल सबद मकु चीन्हों तोही ॥३
कउन जात तुर घर है कहाँ । कउन लोक तुम्ह आछ जहाँ ॥४
मता पिता तोरें चिन्त न करिहैँ । रैन फिरत तिहि धाघ न घरिहैँ ॥५
कहत बचन मईं अस भा, फारुहिँ फरियहुँ तोहि ।६
महर रोस लै फरहिँ, सर हत्या फुनि मोहि ॥७
टिप्पणी—(२) धनि—स्त्री । आँचर—आँचल । गहा—ग्रहण किया, पकड़ा ।
ठाढ़ा—खड़ा ।
(३) नाँव—नाम ।
(४) कउन—कौन । तुर—तेरा । आछ—रहते हो ।
(७) रोस—रोष क्रोध ।
२१४
( रीकेन्ह्स १६९ )
जवाब दायने लोरक चाँदा रा
( चाँदाको लोरकका उत्तर )
आजु कहु चाँद न चीन्हसि मोही । गहनें लेत उपारेउँ तोही ॥१
तुम्हरे साख जो छीन्ह न काऊ । मारेउँ पीठ खदेरेउँ राऊ ॥२
आनों चीर देख तोर अह । सगरँ चीर मोर मुख चह ॥३
हौं सो आइ धनि कँकू तोरा । खाँड परत जँ अग न मोरा ॥४
महर काजि में जीउ निपारेउँ । गार पमेरू तहाँ रोह हारेउँ ॥५

१४

पुरुख न आपु सराहे, पूंछति कहइ मात ।६
चोर पोल सो मारै, जो मन बाउर रात ॥७

टिप्पणी—(१) बिगहसि—पहचानती हो । गहन—ग्रहण । उघारइँ—उद्धार
रिया ।
(२) सान्ध—साथ । न्हेडैइँ—भगाया ।
(३) सगरै—सभी ।
(४) गार—गिरा ।
(७) बाउर—पागल । रात—अनुरक्त होकर ।

२१५

( रीलैण्ड्स १० अ )
सखन करने चाँदा दर मेहानते लोरक
( चाँदाका लोरकका उपहास करना )

आपुहि बीर सराहसि काहा । आत गुवार आइ घरबाहा ॥१
इमरैं सेर सहस एक भाईहिँ । काज कहा नही तिह एक न छेबहिँ ॥२
अति फकान जो पूँछ बढ़ाबा । असबारहि कहँ फेरि न आवा ॥३
जाकहँ छोर कीन्हि मिताई । सिंह के मंदिर कस पैठेउ धाइ ॥४
ऐसें नर जो सेउ करावइ । साईं दोइ अस छोइ न आवइ ॥५
सुन सो पावइ महर अस, गोवरा परिहँइँ बेरि ।६
एक घरति सो मरि पहँ, तूँ डोलहु किह फेरि ॥७

टिप्पणी—(१) गुवार—ग्वाल । आइ—हो ।
(७) परिहँइँ—देँगी । बेरि—बेड़ी ।

२१६

( रीलैण्ड्स १ ब )
जवाब दादने लोरक बर चाँदा रा
( लोरकका उत्तर )

साईं दोइ अस बोलैं नारी । रात आइ अहनाहूँ मारी ॥१
कै पायन बिरुवार सँचारै । कै दिनाय पूनों महँ सारै ॥२

२०५
शेकरैं काज बीठ लै दीजा। ताकहँ चाँद दोह कइ कीजा ॥३
महर काज घसि गोबरौं लेऊँ। बीठ जो माँग फाड़ि कै देऊँ ॥४
हमरैं दोह न कीजै घनों। दोहैं करहिं तिन्ह कोइ न गुनों ॥५
गुन अवगुन सम कोइ न जानै, जो मन आइ सरीर ।६
पायन् पाउ घर आयउँ, हाँ बूड़ेउँ मझ नीर ॥७
टिप्पणी—(१) जइगातैं—अनायास, बिना किसी कारणके ।
(२) बायस—निमन्त्रण। विथाय—वाद ।
(३) शेकरैं—जिसके ।
२१७
( रीडिङ्ग्स १०१क )
सवाल कर्दन चाँदा बर लोरक दर इश्क
( चाँदका लोरकस प्रेम प्रश्न )
पूँछेउँ लोरक कहु सत मोही । (के) एती बुधि दीन्हें तोही ॥१
सत्तैंन्हि तरै सायर महँ नावा । बिनु सत बूड़े थाह न पावा ॥२
जिहँ सत होइ सो लागै तीरा । सत कइ इनैं बूड़ मँझ नीरा ॥३
सत गुन खीचि तीर लै लावा । सत छाड़ैं गुन तोर पठावा ॥४
सत सँभार तो पावहू थाहा । बिनु सत थाह होइ अवगाहा ॥५
सत साथी सत साँमल, सत्त नाव गुनधार ।६
कह सत कित तँ आयसि, यह पुछ दइ करतार ॥७
मूलपाठ—(१) के (लिप्तिकार काफ़ के ऊपर मरकज़ देना भूल गया है)।
टिप्पणी—(१) एती—इतनी ।
( ) सायर—सागर ।
(४) गुन—रस्सी ।
(६) गुनधार—यह 'कँडहार' भी पढ़ा जा सकता है। पदमावत और मधु
मालति में यह शब्द अनेक बार आया है और वहाँ इसे माताप्रसाद
गुप्तने 'कँडहार' ही पढ़ा है और उसे 'कर्णधार' का रूप बताया है।
वासुदेवशरण अग्रवालने भी इस रूपको स्वीकार कर उसका अर्थ
'पतवार धारण करनेवाला (माझी)' किया है। वस्तुतः उनके लिए

९६
'करिया' शब्द है। पतवारवाहक का काम नावको नदी के बीच सम्हाले
रहना है। नावको किनारे से रस्सी खींचनेवाला माँझी ही होता है।
अतः प्रस्तुत प्रसंग मे उचित पाठ 'गुनधार' होगा 'कँडहार' नहीं।
२१८
(रैडिंग्स १०१ब)
जवाब दादन लोरक चाँदा रा
( लोरकका उत्तर )
जिहँ दिन चाँद गयउँ जेउनारा। देख बिमाहेउँ रूप तुम्हारा ॥१
तुम्हरे जोत भयउ उजियारा। परेउँ पतंग होइ मैं बिसमौँरा ॥२
सो रंग रहा न चित हुत जाइ। जिसहिँ माँझ रंग गड़िया छाई ॥३
रंग जेउँ रंग भोजन करउँ। रंग बिन जियउँ न रंग बिन मरउँ ॥४
तिहि रंग नैन नीर नइ पहा। बिनु सच घूड़ होइ अवगाहा ॥५
रंग जो देहि मन मारी, बिन रंग उठे न पाउ ।६
जीउ पाइ रंग डोलहि, सुन चाँदा सचभाउ ॥७
२१९
(रैडिंग्स ११८ब)
गुफ्तने चाँदा हिकायते इश्क
(चाँदा प्रेमकी बात कहना)
रंग क बात कहउँ सुनु लोरा। कैसें रात मोह मन चोरा ॥१
जात अहीर रंग आइ न तोही। रंग बिनु निरग न राता होई ॥२
कहु दुख जो तैं सम निस सहा। बिन दुख यह रंग कैसे रहा ॥४
धो न दिप नर राँडइ घाऊ। रंग रत एक होइ न फाडू ॥४
अगिन झार बिनु रंग न हाइ। जिहि रंग होइ आवत मर साइ ॥५
अन न रूप रंग पड़ा, बाइ नींद निसि जाग ।६
मात पूत तूँ लारक, कहु कैसें रंग लाग ॥७

२०७
२२०
( रीड्स १०२ब )
जवाब दादन लोरक चाँदा रा
( लोरकका चाँदको उत्तर )
मान भयेउँ चाँदा तिहि जोगू । सर दइ खेलेउँ चित घर मोगू ॥१
काट गहेउँ अस सोवा सारी । खांढ पेम दोइ कीन्हेउँ मारी ॥२
आविस फादि कीन्ह दोई आधा । आवसु चाँद में आपुहि साधा ॥३
पिरह दगध हौं वो तों कीन्हा । जरत नीर तिइ ऊपर दीन्हा ॥४
अन छाड़तँ बिरह कँ झारा । पानी के हौं रहेउँ अधारा ॥५
कहैं धिरत सब आपन, आप जो पूछहु पास ।६
अधर घर के पेरें, तिहि रंग बारें रात ॥७
२२१
( रीड्स १०३अ )
गुफ्तने चाँदा हिकायते मैना बा लोरक
( चाँदका लोरकसे मैनाकी प्रार्थना )
सुरग सेज मरि फूल बिछावसि । फेँवल फली तस मना रावसि ॥१
अस घनि छाड़ जो अनतँ धावा । किये सनेह तो हँइ छुटकारा ॥२
भँवर फूल पर रहइ लुभाइ । रमल बाकहि फिरि नहि जाइ ॥३
काइ लाग तूँ कुवरी करमी । सनेह के लिलार फूँट न धरमी ॥४
अरे लोर हूँ फिरँ परावमु । तिहँ पराउ जहाँ कछु पावसु ॥५
का अछत हाँ पाउडर, कें तू लोर धोरायसि ।६
कें सनेह महँ झरँबयस, जिग भावइ तित जायसि ॥७
टिप्पणी-(१) अनतँ—अन्यत्र ।
(३) बाकहिं—दशन । फिरि—लौटकर ।
(५) परावमु—भुलावा देता है; बहकाता है। पराउ—दरवाजा ।

१८
२२२
( रौङ्गस १०३५ )
जवाब दादने लोरक चाँदा रा
( लोरकस चाँदाको उत्तर )
जिहँ दिन चाँद देखो फङ्गा । तिह दिन देखि तोर रंग चढ़ा ॥१
(बिसरा लोग कुटुँब घर बारा) । बिसरा अरथ दरब मोबारा ॥२
सुख तँबोल सिर तेल बिसारा । बिसरा परिमल फूल कँ हारा ॥३
अन न रूख निसि नीद बिसारी । बिसरी सेज सफ़ल फुलवारी ॥४
बुध बिसरी रंग भयलैं समाइ । ताकहँ न रंग गड़े माराइ ॥५
नेह तोरें रग पुरावा, हिरईं लागेउँ आइ ।६
कूहष सरग भइ धरती, जे सर बाइ तो बाइ ॥७
मूलपाठ—(२) बिसरा लोग कुटुँब घर बार निथारा ।
२२३
( रौङ्गस १०३७ )
गुफ़्तन चाँदा हिकायते इश्के खुद बर लोरक रा
( चाँदाका लोरकस अपने प्रेमकी बात कहना )
जिहि दिन सारक रन मिति आयहु । पैठि नगर धाइ दिखरायहु ॥१
तिह दिन हुत मैं अन न करायी । परी न नीदु सेज न सुहाई ॥२
पेट पैसि जिठ लीन्हा फाड़ी । बिनु सीठ नारि बीउ बर ठाड़ी ॥३
मैं तुम्ह लाग बेठनार कराइ । अंतस फरी पिवहिं हँकराइ ॥४
महु तुम्ह एक टक देखैं पायेउँ । देख रूप मुख नैन सराहेउँ ॥५
तिहि दिन हुत हौं भूखेउँ, मोर जीउ तुम्हकौं भानु ।६
चिर बिथा पिरम तुम्हारा, तोर धुनि करियहि फाडु ॥७

२०१
२२४
( रोसिएड्स १०३ ब )
बैसियत दर पन्वह व आगे शब गुजरानीदन
( हँसी मजारमें रात बिताना )
अमरित पचन चाँठ अनुसारा । हँसा लोर भा घोल अपारा ॥१
हँसि कै लार धीर कर गहा । मोतिह हार टूटि कै रहा ॥२
चौं कहा जिन एफ मँभारहु । हार त्रुटि गा मोतिह सँभारहु ॥३
पीनि मोति भय चीर उठावहु । तों चढ़ि मेज पिरम रस रानहु ॥४
मोति उठावत रैन बिहानी । उठा सुर पै साध न मानी ॥५
बीर टरान भार भा, मन कै चेख गँवाउ ।६
मेज इठ लै धौंदै, सूरज दिवस लुफाउ ॥७
टिप्पणी—(७) इठ—नाचे ।
( सम्भव है यहाँ कुछ और कड़वक रहे हो )
२२५
( रोसिएड्स १०५ )
मुबामबत कर्दने तरफ बा चॉदा
( लोरक-चाँदाका प्रणय )
गिन एक हाय पाय सँग आये । पुन रे भिर दुहुँ हींउर लाये ॥१
यदि सुहाग दइ दूसर घर । सूझे ऊठि जनु सोंगे भिर ॥२
अधर अधर कर कर गह । नाभी नाँद भा बान रह ॥३
जाँग आर तन पैं नै राय । अनु गप मयन परकहुँ आय ॥४
काम सुतृति रस पहि जिमि आई । पुनरुइ बहुत अपरप न भय ॥५
चाँद धरटि सूरज आधा, रैन समासी हाइ ।६
पाँचभूत आत्मा मिलन, अस पिरमा मद फाह ॥७
१४

२१
२२६
( रीफ्रेंस १०६ )
बस्ते सुबह गाना कर्ने चाँदा लोरक बा बेर एकत
( प्राताकाल चाँदका लोरकको सीसराने भींचे उठाना )
केलि करत सब रैन बिहानी । देख घर धनि उठी डरानी ॥१
जाँलहि चेरी उठै न पावा । साँलहि चाँदै सुरुज लुकावा ॥२
मन सँउ आपुन नाहीं लोरा । मत कुछ होइ सुल टर तोरा ॥३
मत कोइ चेरी देख पावा । जाइ महर पहँ बात जनावा ॥४
जो कोइ तिहको देख आई । हाँ पुन मरों तोहु बिख खाई ॥५
पिरम खेलैँ सो कर साहस, सो तरि लागे पार ।६
माँझ समुद होइ थाके, तीर लाउ करतार ॥७
२२७
( रीफ्रेंस १०० )
आब आवदने कनीज़गान व रूये चाँदा शुस्तन व आमदने सहैलियान
( दासियोंका पानी लाकर चाँदका मुँह धुलाना ; सहेलियोंका आना )
भोर चेरि पानी लै आयीं । मुख धोवा और सखी बुलायीं ॥१
फेंफर मुख निसि चाँद न सोभा । चीर फाट कहुवाँ सइ गाभा ॥२
फिरी माँग केस उधियानी । फूल झरि मरि रही कुम्लानी ॥३
सखिहँ देखि दो बातें अइसे । तोर चाँद कर आँगी कैसे ॥४
भये अनन्द लोयन रतनारी । रंग रस तंबोल पियारी ॥५
चोली चीर सँवारहु, सीस सिन्दूरहु माँग ।६
भँवर फूल पर बैठो, लाग दीख तिइ ऑँग ॥७
२२८
( रीफ्रेंस १०८ )
बज़म दादन चाँदा मर सहैलियान अज़ बहाना
( चाँदका सहेलियोंसे बहाना करना )
चाँद सहलिन सा अस कहा । एकउ चेरि न जागत रहा ॥१

२११
रैन चौखण्डी चढ़िइ बिरारी । लै ऊँदर घुस गा बिलारी ॥२
ऊपर परी सोह मैं जागा । नखथन लाग चीर फुनि भागा ॥३
तोइ हुसें मोर नींद उड़ानी । इत फुनि जागत रैन बिहानी ॥४
हाथ पाँव में सर न सँभारा । फिरी माँग सीस औ पारा ॥५
तिह गुन नैन रात मोर, मुख फेंकर कुँबलान ।६
आइस रात मैंइ दमर, मंदिर न फोरु सान ॥७
टिप्पणी—(२) बिरारी—बिलारी बिल्ली। ऊँदर—(सं उन्दुर)—चूहा। बिलारी—
बिछौना।
(३) सम—खान ।
२२९
( रीडंग्स १०९ )
रफ़्तने बिरस्पत बर महरि ब कैफियते गिरिया उफ्तादन साज नमूदून
( बिरस्पतका महरिको चाँदके डर जानेकी सूचना देना )
जाइ बिरस्पत महरि जुहारी । कइ जुहारि फुनि पात उमारी ॥१
रैन डरानी चाँद डुलारी । बिसथै ऊपर परी मँझारी ॥२
चीर फाट मुख गा कुँभलाइ । चाँद चितहि मैंह बहुत लजाई ॥३
जेगें सोइ भा अँधियारा । जागत चाँद भयउ भिनसारा ॥४
अन न रूच औ माठ न पानी । फूल घाम वस चाँद सुखानी ॥५
चला महरि कुछ देखउ, औ कुछ धरहु उत्तारि ।६
सोवत बैस झरँकी, अस भई चाँदा नारि ॥७
टिप्पणी—(२) बिसथ—बिस्तर । मँझारी (सं० माजारी)—बिल्ली ।
(४) भिनसारा—प्रातःकाल ।
२३०
( रीडंग्स १८ )
आमदने मादरो पिदरे ब दर दास्तान चाँदा खुद रा
( चाँदके माता पिताका आना : चाँदका सोनेका बहाना करना )
माता पिता लोग जन आवा । कुँवरि चाँदहि मुख ढरसावा ॥१
एक अपुहि अस अगरग लायसु । औ तिह ऊपर सुरुज लुकायसु ॥२

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२२१
चलत पाइ फर आरो पावा । कहा पँवरियहिँ तसकर आवा ॥४
चाँद कहा मैं घेरि भुलावउ । फूलहिं कहँ फुलवारि पठाऊअ ॥५
अखरैं पँवर घजर कै, बीर समुँद या मागि ।६
चाँद चढ़ी चौखण्डी, पँवर बझर होइ लागि ॥७
टिप्पणी—(४) आरो—आहट । तसकर—तस्कर, चोर ।
२३३
( रौकेन्स १६३ )
मुवज्जिमै शिमुर्दने लोरक चाँदा बर कस खुद रफ्तन
(चाँदाका धौरहर पर जाकर लोरकका ग्रह देखना )
चाँदा धौराहर चढ़ि अस चाहा । बुरुज कौन मंदिर दिन आहा ॥१
जनम अस्थान छाड़ पग धरा । पाँच आठ सत्रह दिन फिरा ॥२
मीन राशि जो फरकाहिँ आहइ । संग परोस नियर होइ आहइ ॥३
तुलाँ रैन दिन दूसम आवहिँ । पन्थ बराबर बैरी पावहिँ ॥४
पाछे मरै गगन चढ़ आवइ । रैन चाँद कस घेरी पावइ ॥५
यहि दिन होइ मिलावा, चाँद गुनि देखी राशि ।६
गांग लाँधि कै लोरक, जो हरदीँ लै बासि ॥७
२३४
( रौकेन्स १६४ )
पुरसीदने मैना मर लोरक रा जेह शव कुजा बूद
( मैनाका लोरकसे रातको गायब रहनेकी बात पूछना )
मैना पूछहि कहाँ निसि कीन्ह । कौन नारि मोर कँ दीन्ह ॥१
रकत न देह हरद बनु लाइ । औ मसि मुख पै दीन्हि चढ़ाई ॥२
पियर पात अस लोरक डोलसि । मुर मुर हँस निरग भा बोलसि ॥३
हौं मनुसहिं ओहट पहचानी । बात कहौ नैन देख बानी ॥४
धीरु फाछ सत आप गँवाया । सत कहि हंजस तुम घर आवा ॥५

२१४
हँसि लोर अस बोला, राधा रात भुझायउँ ।६
कौतुक रैन बिहानि, तिह देखत नैन न लायउँ ॥७
२३७
(रीडिंग्स १८५)
खबर याफ़्तने मादरौ पिदरे चाँदा अज आमदने कसी बीगाना दर कफ़
(परपुरुषके महकमें आनेकी बात चाँदाके माता-पिताको ज्ञात होना)
महरी महर पासँ अस जाहा । मदिर पुरुख एक आवहि आहा ॥१
घेरी घेर नाथ औ भारी । तिह सुन पुर घर बात सँधारी ॥२
गोवरौ मात घना फुनि मयी । और कुछ मैनाँ पँह फुनि गयी ॥३
फूल घाम बस रही सुखाई । फुनि मैना गइ कुँभलाई ॥४
घर घर महरी खीस कड़ही । सुन कै अगरग धिसैंहिन बरहीँ ॥५
मालिन कङ्गा लोर करैई, रोवत मैना जाइ ।६
आग लाग सुन बिस्तर, बरतें जाइ बुझाई ॥७
२३६
(रीडिंग्स १८६)
पुरसीदन रोसिन मर मैनाँ रा अज बगीदरे हाले ऊ
(रोसिनका मैनासे चमककर तबीयत खराब होनेका कारण पूछना)
रोसिन मैनाहि देखतें अहा । कहसि तिह कुरषी कैं कछु कहा ॥१
चरन रात साँवर तोर फाबँ । चरन सँवर रात होइ चाबै ॥२
मैंह कहु सुनी कछु तँ बाबा । लोर बीर भयउ किंवा राबा ॥३
बारी उतर बेस न मोही । कै कुछ आइ कहा है तोही ॥४
जीभ काढ़ि ताकर हीं खारीँ । परहिँ छुड़ाइ तिह देस निसारौं ॥५
ठरघ फाट हाँ मरिहतँ, कहसि तिह बेदन फाइ ।६
सुंदर रूप तोर, भोर बदरी ढाँकत आइ ॥७

२१५
२३७
( रीसैन्ड्स १८७८ )
मुनफ़िर शुदने श्लोबिन बह मन रीच नमीदानम
( श्लोभिका अपनी अनभिज्ञता प्रकट करना )
ओही पोइ मोर मानी हो[ऊ*]। मँह आगि जो कहि कुछ कोऊ ॥१
हाँ दोखी जो कछु न जानाँ। अनजाने कम काह पखानाँ ॥२
दई ठाँठ भल बार न पाऊँ। जान मुनि जिह जो तोहि झुकाऊँ ॥३
सो कम आइ राँड भैंठहाइ । सेज छाँड़ि जो आने जाइ ॥४
घर कें धिय कीन्हि पराइ । अपने कीतस आन घुराइ ॥५
ताहि लाग जिठ धाँधउँ, जीउ मोर सूँ आहि ।६
कड़मि तिह कान महहाइ, देस निसारउँ ताहि ॥७
२३८
( रीकंग्रह्म १८७९ )
बाज गुफ़्तन मैनों बर श्लोबिन रा
( श्लोभिनसे मैनाका कथन )
माइ मोर तुम माम न डोहू। बोलेउँ चितहि उठा जो कोहू ॥१
साकर नित उठि पाठ गुहाराँ। ताकर ओछ कहे का पारी ॥२
कडु बियाइ पारी हों आनीं । साँसहि न माँगहि गहउँ न पानी॥३
मँवर पास कूँवरी कें राता। कँवल कली इन पूछि न बाता ॥४
अमरित कुण्ड ओ आछत मरा। सो सरवर लै अनसँ धरा ॥५
बाइ दखु माइ खोलिन, लोरक हूँ सत डल ।६
सारस बर रर मराँ, पिउ बिन रैन अकेल ॥७
टिप्पणी—(७) सारसकी जोडीका प्रेम प्रसिद्ध है। एककी मृत्यु हो जान पर दूसरा
भी उसके वियोगमें झिसक झिसककर प्राण दे देता है।