चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)
Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary
मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा
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( रीकेन्ह्स १६८५ )
गुवाश्तने चाँदा मुये खरे लोरक व गिरफ्तने कमरबन्दे ऊ
( चाँदाका केश छोड़कर काँचुक पकड़ना )
लोर मन उठा सरोहू । चाँदा चितईं भुझानेवँ कोहू ॥१
केस छाड़ि धनि आँचर गहा । चाँद बैठि नर ठाढ़ा रहा ॥२
धोर नाँव आपुन कहु मोही । बोल सबद मकु चीन्हों तोही ॥३
कउन जात तुर घर है कहाँ । कउन लोक तुम्ह आछ जहाँ ॥४
मता पिता तोरें चिन्त न करिहैँ । रैन फिरत तिहि धाघ न घरिहैँ ॥५
कहत बचन मईं अस भा, फारुहिँ फरियहुँ तोहि ।६
महर रोस लै फरहिँ, सर हत्या फुनि मोहि ॥७
टिप्पणी—(२) धनि—स्त्री । आँचर—आँचल । गहा—ग्रहण किया, पकड़ा ।
ठाढ़ा—खड़ा ।
(३) नाँव—नाम ।
(४) कउन—कौन । तुर—तेरा । आछ—रहते हो ।
(७) रोस—रोष क्रोध ।
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( रीकेन्ह्स १६९ )
जवाब दायने लोरक चाँदा रा
( चाँदाको लोरकका उत्तर )
आजु कहु चाँद न चीन्हसि मोही । गहनें लेत उपारेउँ तोही ॥१
तुम्हरे साख जो छीन्ह न काऊ । मारेउँ पीठ खदेरेउँ राऊ ॥२
आनों चीर देख तोर अह । सगरँ चीर मोर मुख चह ॥३
हौं सो आइ धनि कँकू तोरा । खाँड परत जँ अग न मोरा ॥४
महर काजि में जीउ निपारेउँ । गार पमेरू तहाँ रोह हारेउँ ॥५