भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
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शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
सुखदेव को भूख हड़ताल के दौरान
भगतसिंह का एक और पत्र
भूख हड़ताल शुरू होने के बाद भारतीय जनता की चेतना में भगतसिंह व
बटुकेश्वर दत्त गहरे उतरते गये। भगतसिंह के शब्दों में 'हमारा कष्ट सहना फलीभूत
हुआ। सारे देश में एक जन-आन्दोलन छिड़ गया। हम अपने लक्ष्य में सफल रहे।'
13 सितम्बर, 1929 को यतीन्द्रनाथ दास 63 दिन की भूख हड़ताल के बाद शहीद
हो गये। जब उनका पार्थिव शरीर लाहौर से कलकत्ता ले जाया जा रहा था तो हर
बड़े शहर के स्टेशन पर लाखों की भीड़ उनके अन्तिम दर्शनों के लिए उमड़ पड़ती
थी। कलकत्ता में 4 लाख लोग उनके अन्तिम संस्कार में शामिल हुए।
इन दिनों भगतसिंह अपने किन विचारों के माध्यम से अपनी सारी लड़ाई लड़
रहे थे, इसका स्पष्ट पता उस पत्र में चलता है, जो उन्होंने सुखदेव के साथ चल
रहे विचार-संघर्ष के सन्दर्भ में लिखा था। खेद है कि सुखदेव के जिस पत्र के उत्तर
में भगतसिंह ने यह महत्त्वपूर्ण ख़त लिखा था, वह आज उपलब्ध नहीं है। फिर भी
विचार और बहस के अन्तर्गत आने वाले प्रायः सभी बिन्दु यहाँ स्पष्ट हैं। – स.
कष्टों से भागना कायरता है
प्रिय भाई,
मैंने आपके पत्र को कई बार ध्यानपूर्वक पढ़ा। मैं अनुभव करता हूँ कि बदली
हुई परिस्थितियों ने हम पर अलग-अलग प्रभाव डाला है। जिन बातों से जेल के
बाहर घृणा करते थे, वे आपके लिए अब अनिवार्य हो चुकी हैं। इसी प्रकार मैं जेल
से बाहर जिन बातों का विशेष रूप से समर्थन करता था, वे अब मेरे लिए विशेष
महत्त्व नहीं रखतीं। उदाहरणार्थ, मैं व्यक्तिगत प्रेम को विशेष रूप से मानने वाला
था, परन्तु अब इस भावना का मेरे हृदय एवं मस्तिष्क में कोई विशेष स्थान नहीं
रहा। बाहर आप इसके कड़े विरोधी थे, परन्तु इस सम्बन्ध में अब आपके विचारों
में भारी परिवर्तन एवं क्रान्ति आ चुकी है। आप इसे मानव-जीवन का एक अत्यन्त
आवश्यक एवं अनिवार्य अंग अनुभव करते हैं और अनुभूति से आपको एक प्रकार
का आनन्द भी प्राप्त हुआ है।
जेल की सलाख़ों के पीछे से / 401
आपको याद होगा कि एक दिन मैंने आत्महत्या के विषय में आपसे चर्चा की
थी। तब मैंने आपको बताया था, कई परिस्थितियों में आत्महत्या उचित हो सकती
है, परन्तु आपने मेरे इस दृष्टिकोण का विरोध किया था। मुझे उस चर्चा का समय
एवं स्थान भली प्रकार याद है। हमारी यह बात शहंशाही कुटिया में शाम के समय
हुई थी। आपने मज़ाक़ के रूप में हँसते हुए कहा था कि इस प्रकार की कायरता
का कार्य कभी उचित नहीं माना जा सकता। आपने कहा था कि इस प्रकार का
कार्य भयानक और घृणित है, परन्तु इस विषय पर भी मैं देखता हूँ कि आपकी
राय बिल्कुल बदल चुकी है। अब आप उसे कुछ अवस्थाओं में न केवल उचित,
वरन अनिवार्य एवं आवश्यक अनुभव करते हैं। मेरी इस विषय में अब वही राय
है, जो पहले आपकी थी, अर्थात् आत्महत्या एक घृणित अपराध है, यह पूर्णतः
कायरता का कार्य है। क्रान्तिकारी का तो कहना ही क्या, कोई भी मनुष्य ऐसे कार्य
को उचित नहीं ठहरा सकता।
आप कहते हैं कि आप यह नहीं समझ सके कि केवल कष्ट-सहन करने से
आप अपने देश की सेवा किस प्रकार कर सकते हैं। आप जैसे व्यक्ति की ओर
से ऐसा प्रश्न करना बड़े आश्चर्य की बात है; क्योंकि नौजवान भारत सभा के ध्येय
‘सेवा द्वारा कष्टों को सहन करना एवं बलिदान करना’ को हमने सोच-समझकर
कितना प्यार किया था। मैं यह समझता हूँ कि आपने अधिक से अधिक सम्भव
सेवा की। अब वह समय है कि जो कुछ आपने किया है, उसके लिए कष्ट उठायें।
दूसरी बात यह है कि यही वह अवसर है, जब आपको सारी जनता का नेतृत्व करना
है।
मानव किसी भी कार्य को उचित मानकर ही करता है, जैसेकि हमने
लेजिस्लेटिव असेम्बली में बम फेंकने का कार्य किया था। कार्य करने के पश्चात
उसका परिणाम और उसका फल भोगने की बारी आती है। क्या आपका यह विचार
है कि यदि हमने दया के लिए गिड़गिड़ाते हुए दण्ड से बचने का प्रयत्न किया
होता, तो हमारा यह कार्य उचित होता? नहीं, इसका प्रभाव लोगों पर उल्टा होता।
अब हम अपने लक्ष्य में पूर्णतया सफल हुए हैं।
बन्दी होने के समय हमारी संस्था के राजनीतिक बन्दियों की दशा अत्यन्त
दयनीय थी। हमने उसे सुधारने का प्रयास प्रारम्भ कर दिया। मैं आपको पूरी
गम्भीरता से बताता हूँ कि हमें यह विश्वास था कि हम बहुत कम समय के भीतर
ही मर जायेंगे। हमें उपवास की स्थिति में कृत्रिम रीति से भोजन दिये जाने का न
तो ज्ञान ही था, न हमें यह विचार सूझता ही था। हम तो मृत्यु के लिए तैयार थे।
क्या आपका यह अभिप्राय है कि हम आत्महत्या करना चाहते थे? नहीं, प्रयत्नशील
होना एवं श्रेष्ठ और उत्कृष्ट आदर्श के लिए जीवन दे देना कदापि आत्महत्या नहीं
कही जा सकती। हमारे मित्र (श्री यतीन्द्रनाथ दास) की मृत्यु तो स्पृहणीय है। क्या
402 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
आप इसे आत्महत्या कहेंगे? हमारा कष्ट सहन करना फलीभूत हुआ। समस्त देश
में एक विराट और सर्वव्यापी आन्दोलन शुरू हो गया। हम अपने लक्ष्य में सफल
हुए। इस प्रकार के संघर्ष में मरना एक आदर्श मृत्यु है।
इसके अतिरिक्त हममें से जिन लोगों को यह विश्वास है कि उनको
मृत्युदण्ड दिया जायेगा, उनको धैर्यपूर्वक उस दिन की प्रतीक्षा करनी चाहिए जब
यह सज़ा सुनायी जायेगी और तत्पश्चात उन्हें फाँसी दी जायेगी। यह मृत्यु भी
सुन्दर होगी, परन्तु आत्महत्या करना, केवल कुछ दुखों से बचने के लिए अपने
जीवन को समाप्त कर देना, तो कायरता है। मैं आपको बताना चाहता हूँ कि
विपत्तियाँ व्यक्ति को पूर्ण बनाने वाली होती हैं। मैं और आप, वरन मैं कहूँगा,
हममें से किसी ने भी किंचित कष्ट सहन नहीं किया है। हमारे जीवन का यह
भाग तो अभी आरम्भ होता है।
आपको यह याद होगा कि अनेक बार इस विषय पर हमने बातचीत की है
कि रूसी साहित्य में प्रत्येक स्थान पर जो वास्तविकता मिलती है, वह हमारे
साहित्य में कदापि नहीं दिखायी देती। हम उनकी कहानियों में कष्टों और दुखदायी
स्थितियों को बहुत पसन्द करते हैं, परन्तु कष्ट-सहन की उस भावना को अपने
भीतर अनुभव नहीं करते। हम उनके उन्माद और उनके चरित्र की असाधारण
ऊँचाइयों के प्रशंसक हैं, परन्तु इसके कारणों पर सोच-विचार करने की कभी चिन्ता
नहीं करते। मैं कहूँगा कि केवल विपत्तियाँ सहन करने के उल्लेख ने ही उन
कहानियों में सहृदयता, दर्द की गहरी टीस और उनके चरित्र तथा साहित्य में ऊँचाई
उत्पन्न की है। हमारी दशा उस समय दयनीय और हास्यास्पद हो जाती है, जब हम
अपने जीवन में अकारण ही रहस्यवाद प्रविष्ट कर लेते हैं, यद्यपि इसके लिए कोई
प्राकृतिक या ठोस आधार नहीं होता। हमारे जैसे व्यक्तियों को, जो प्रत्येक दृष्टि से
क्रान्तिकारी होने का गर्व करते हैं, सदैव हर प्रकार से उन विपत्तियों, चिन्ताओं, दुखों
और कष्टों को सहन करने के लिए तत्पर रहना चाहिए जिनको हम स्वयं आरम्भ
किये संघर्ष के द्वारा आमन्त्रित करते हैं एवं जिनके कारण हम अपनेआप को
क्रान्तिकारी कहते हैं।
मैं आपको बताना चाहता हूँ कि जेलों में और केवल जेलों में ही कोई व्यक्ति
अपराध एवं पाप जैसे महान सामाजिक विषय का प्रत्यक्ष अध्ययन करने का अवसर
पा सकता है। मैंने इस विषय का कुछ साहित्य पढ़ा है और जेलें ही ऐसे विषयों
का स्वाध्याय करने के सबसे अधिक उपयुक्त स्थान हैं। स्वाध्याय का सर्वश्रेष्ठ भाग
है : स्वयं कष्टों को सहना।
आप भली प्रकार जानते हैं कि रूस में राजनीतिक बन्दियों का बन्दीगृहों में
विपत्तियाँ सहन करना ही ज़ारशाही का तख़्ता उलटने के पश्चात उनके द्वारा जेलों
के प्रबन्ध में क्रान्ति लाये जाने का सबसे बड़ा कारण था। क्या भारत को ऐसे
जेल की सलाख़ों के पीछे से / 403
व्यक्तियों की आवश्यकता नहीं है, जो इस विषय से पूर्णतया परिचित हों और इस
समस्या का निजी अनुभव रखते हों। केवल यह कह देना कि दूसरा कोई इस काम
को कर लेगा या इस कार्य को करने के लिए बहुत लोग हैं, किसी प्रकार भी उचित
नहीं कहा जा सकता। इस प्रकार जो लोग क्रान्तिकारी क्षेत्र के कार्यों का भार दूसरे
लोगों पर छोड़ने को अप्रतिष्ठापूर्ण एवं घृणित समझते हैं, उन्हें पूरी लगन के साथ
वर्तमान व्यवस्था के विरुद्ध संघर्ष आरम्भ कर देना चाहिए। उन्हें चाहिए कि वे उन
विधियों का उल्लंघन करें, परन्तु उन्हें औचित्य का ध्यान रखना चाहिए, क्योंकि
अनावश्यक एवं अनुचित प्रयत्न कभी भी न्यायपूर्ण नहीं माना जा सकता। इस प्रकार
का आन्दोलन क्रान्ति के कार्यकाल को बहुत सीमा तक कम कर देगा। जितने
आन्दोलन अब तक आरम्भ हुए हैं, उन सबसे पृथक रहने के लिए आपने जो तर्क
दिये हैं, मैं उन्हें समझने में असमर्थ हूँ। कुछ मित्र ऐसे हैं, जो या तो मूर्ख हैं या
नासमझ। वे आपके इस व्यवहार को (जिसे वे स्वयं कहते हैं कि हमें किंचित भी
नहीं समझ सकते, क्योंकि आप उनसे बहुत ऊँचे और उनकी समझ से बहुत परे
हैं) अनोखा और अद्भुत समझते हैं।
वास्तव में यदि आप यह अनुभव करते हैं कि बन्दीगृह का जीवन वास्तव में
अपमानपूर्ण है, तो आप उसके विरुद्ध आन्दोलन करके उसे सुधारने का प्रयास क्यों
नहीं करते? सम्भवतया आप यह कहेंगे कि यह संघर्ष सफल नहीं हो सकता, परन्तु
यह तो वही तर्क है, जिसकी आड़ लेकर साधारणतया निर्बल लोग प्रत्येक
आन्दोलन से बचना चाहते हैं। यह वह उत्तर है, जिसे हम उन लोगों से सुनते रहे
हैं, जो जेल से बाहर क्रान्तिकारी प्रयत्नों में सम्मिलित होने से जान बचाना चाहते
थे। क्या आज यही उत्तर मैं आपके मुख से सुनूँगा? कुछ मुट्ठीभर कार्यकर्ताओं के
आधार पर संगठित हमारी पार्टी अपने लक्ष्यों और आदर्शों की तुलना में क्या कर
सकती थी? क्या हम इससे यह निष्कर्ष निकालें कि हमने इस काम के प्रारम्भ
करने में नितान्त भूल की है? नहीं, इस प्रकार का परिणाम निकालना उचित नहीं
होगा। इससे तो उस व्यक्ति की भीतरी निर्बलता प्रकट होती है; जो इस प्रकार
सोचता है।
आगे चलकर आप लिखते हैं कि चौदह वर्ष तक बन्दीगृह के कष्टों से भरपूर
जीवन बिताने के पश्चात किसी व्यक्ति से यह आशा नहीं की जा सकती कि उस
समय भी उसके विचार वही होंगे, जो जेल से पूर्व थे, क्योंकि जेल का वातावरण
उसके समस्त विचारों को रौंदकर रख देगा। क्या मैं आपसे पूछ सकता हूँ कि क्या
जेल से बाहर का वातावरण हमारे विचारों के अनुकूल था? फिर भी असफलताओं
के कारण क्या हम उसे छोड़ सकते थे? क्या आपका आशय यह है कि यदि हम
इस क्षेत्र में न उतरे होते, तो कोई भी क्रान्तिकारी कार्य कदापि नहीं हुआ होता?
यदि ऐसा है तो आप भूल कर रहे हैं। यद्यपि यह ठीक है कि हम भी वातावरण
404 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
को बदलने में बड़ी सीमा तक सहायक सिद्ध हुए हैं, तथापि हम तो केवल अपने
समय की आवश्यकता की उपज हैं।
मैं तो यह भी कहूँगा कि साम्यवाद का जन्मदाता मार्क्स, वास्तव में इस विचार
को जन्म देने वाला नहीं था। असल में यूरोप की औद्योगिक क्रान्ति ने ही एक विशेष
प्रकार के विचारों वाले व्यक्ति उत्पन्न किये थे। उनमें मार्क्स भी एक था। हाँ, अपने
स्थान पर मार्क्स भी निस्सन्देह कुछ सीमा तक समय के चक्र को एक विशेष प्रकार
की गति देने में आवश्यक सहायक सिद्ध हुआ है।
मैंने (और आपने भी) इस देश में समाजवाद और साम्यवाद के विचारों को
जन्म नहीं दिया, वरन यह तो हमारे ऊपर हमारे समय एवं परिस्थिति के प्रभाव का
परिणाम है। निस्सन्देह हमने इन विचारों का प्रचार करने के लिए कुछ साधारण एवं
तुच्छ कार्य अवश्य किया है, इसलिए मैं कहता हूँ कि जब हमने इस प्रकार एक
कठिन कार्य को हाथ में ले ही लिया है, तो हमें उसे जारी रखना चाहिए और आगे
बढ़ना चाहिए। विपत्तियों से बचने के लिए आत्महत्या कर लेने से जनता का
मार्गदर्शन नहीं होगा, वरन यह तो एक प्रतिक्रियावादी कार्य होगा।
जेल के नियमों के अनुसार जीवन की निराशाओं, दबाव और हिंसा के असीम
परीक्षायुक्त वातावरण का विरोध करते हुए हम कार्य करते रहे। जिस समय हम
अपना कार्य करते थे, उस समय नाना प्रकार से हमें कठिनाइयों का निशाना बनाया
जाता था। यहाँ तक कि जो लोग अपनेआप को महान क्रान्तिकारी कहने का गौरव
अनुभव करते थे, वे भी हमको छोड़ गये। क्या ये परिस्थितियाँ असीम परीक्षायुक्त
न थीं? फिर अपने आन्दोलन एवं प्रयासों को जारी रखने के लिए हमारे पास क्या
कारण और तर्क था?
क्या स्वयं यही तर्क हमारे विचारों को शक्ति नहीं देता है? और क्या ऐसे
क्रान्तिकारी कार्यकर्ताओं के उदाहरण हमारे सामने नहीं हैं, जो जेलों से दण्ड भोगकर
लौटे और अब भी कार्य कर रहे हैं? यदि बाकुनिन ने आपके समान सोच-विचार
किया होता, तो वह प्रारम्भ में ही आत्महत्या कर लेता। आज आपको असंख्य ऐसे
क्रान्तिकारी दिखायी देते हैं, जो रूसी राज्य में उत्तरदायी पदों पर विराजमान हैं और
जिन्होंने अपने जीवन का अधिकतर भाग दण्ड भोगते हुए जेलों में बिताया है। मनुष्य
को अपने विश्वासों पर दृढ़तापूर्वक अडिग रहने का प्रयत्न करना चाहिए। कोई नहीं
कह सकता कि भविष्य में क्या घटना होने वाली है।
क्या आपको याद है कि जब हम इस विषय पर चर्चा कर रहे थे कि हमारी
बम-फ़ैक्टरियों में अत्यन्त तीव्र एवं प्रभावकारी विष भी रखा जाना चाहिए, तो
आपने बड़ी दृढ़ता से इसका विरोध किया था। आप इस विचार से ही घृणा करते
थे। आपको इस पर विश्वास नहीं था। फिर अब क्या हुआ? यहाँ तो ऐसी विकट
और जटिल परिस्थितियाँ भी नहीं हैं। मुझे तो इस प्रश्न पर विचार करने में भी घृणा
जेल की सलाख़ों के पीछे से / 405
होती है। आपको उस मनोवृत्ति से भी घृणा थी, जो आत्महत्या करने की अनुमति
देती है। आप मुझे यह कहने के लिए क्षमा करें कि यदि आपने अपने बन्दी बनाये
जाने के समय ही इन विचारों के अनुकूल कार्य किया होता (अर्थात आपने विष
खाकर उस समय आत्महत्या कर ली होती) तो आपने क्रान्तिकारी कार्य की बहुत
बड़ी सेवा की होती, परन्तु इस समय तो इस कार्य पर विचार करना भी हमारे लिए
हानिकारक है।
एक और विशेष बात, जिस पर मैं आपका ध्यान आकर्षित करना चाहता हूँ,
यह है कि हम लोग ईश्वर, पुनर्जन्म, नरक-स्वर्ग, दण्ड एवं पारितोषिक, अर्थात
भगवान द्वारा किये जाने वाले जीवन के हिसाब आदि में कोई विश्वास नहीं
रखते। अतः हमें जीवन एवं मृत्यु के विषय में भी नितान्त भौतिकवादी रीति से
सोचना चाहिए। एक दिन जब मुझे पहचाने जाने के लिए दिल्ली से यहाँ लाया
गया था, तो गुप्तचर विभाग के कुछ अधिकारियों ने मेरे पिता जी की उपस्थिति
में मुझसे इस विषय पर बातचीत की थी। उन्होंने कहा था कि मैं कोई भेद
खोलने और इस प्रकार अपना जीवन बचाने के लिए तैयार नहीं हूँ, इससे यह
सिद्ध होता है कि मैं जीवन से बहुत दुखी हूँ। उनका तर्क था कि मेरी यह मृत्यु
तो आत्महत्या के समान होगी, परन्तु मैंने उनको उत्तर दिया था कि मेरे जैसे
विश्वास और विचारों वाला व्यक्ति व्यर्थ में ही मरना कदापि सहन नहीं कर
सकता। हम तो अपने जीवन का अधिक से अधिक मूल्य प्राप्त करना चाहते हैं।
हम मानवता की अधिक से अधिक सम्भव सेवा करना चाहते हैं। विशेषकर मेरे
जैसा भला मनुष्य, जिसका जीवन किसी भी रूप में दुखी या चिन्तित नहीं है,
किसी समय भी, आत्महत्या करना तो दूर रहा, उसका विचार भी हृदय में लाना
ठीक नहीं समझता। वही बात मैं इस समय आपसे कहना चाहता हूँ।
आशा है कि आप मुझे अनुमति देंगे कि मैं आपको यह बताऊँ कि मैं अपने
बारे में क्या सोचता हूँ। मुझे अपने लिए मृत्युदण्ड सुनाये जाने का अटल विश्वास
है। मुझे किसी प्रकार की पूर्ण क्षमा या नम्र व्यवहार की तनिक भी आशा नहीं है।
यदि कोई क्षमा हुई भी तो पूर्णतः सबके लिए न होगी, वरन वह भी हमारे अतिरिक्त
अन्य लोगों के लिए नितान्त सीमित एवं कई बन्धनों से जकड़ी हुई होगी। हमारे
लिए तो न क्षमा हो सकती है और न वह होगी ही। इस पर भी मेरी इच्छा है कि
हमारी मुक्ति का प्रस्ताव सम्मिलित रूप में और विश्वव्यापी हो और उसके साथ
ही मेरी अभिलाषा यह है कि जब यह आन्दोलन अपनी चरम सीमा पर पहुँचे, तो
हमें फाँसी दे दी जाये। मेरी यह इच्छा है कि यदि कोई सम्मानपूर्ण और उचित
समझौता होना कभी सम्भव हो जाये, तो हमारे जैसे व्यक्तियों का मामला उसके
मार्ग में कोई रुकावट या कठिनाई उत्पन्न करने का कारण न बने। जब देश के भाग्य
का निर्णय हो रहा हो तो व्यक्तियों के भाग्य को पूर्णतया भुला देना चाहिए। हम
406 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
क्रान्तिकारी होने के नाते अतीत के समस्त अनुभवों से पूर्णतया अवगत हैं। इसलिए
हम नहीं मान सकते कि हमारे शासकों और विशेषकर अंग्रेज़ जाति की भावनाओं
में इस प्रकार का आश्चर्यजनक परिवर्तन उत्पन्न हो सकता है। इस प्रकार का
परिवर्तन क्रान्ति के बिना सम्भव ही नहीं है। क्रान्ति तो केवल सतत कार्य करते
रहने से, प्रयत्नों से, कष्ट सहन करने एवं बलिदानों से ही उत्पन्न की जा सकती
है, और की जायेगी।
जहाँ तक मेरे दृष्टिकोण का सम्बन्ध है, मैं तो केवल उसी दशा में सबके लिए
सुविधाओं और क्षमादान का स्वागत कर सकता हूँ जब उसका प्रभाव स्थायी हो
और देश के लोगों के हृदयों पर हमारी फाँसियों से कुछ अमिट चिह्न अंकित हो
जायें। बस यही; इससे अधिक कुछ नहीं।
जेल की सलाख़ों के पीछे से / 407
क्रान्तिकारी साथी जयदेव के नाम पत्र
24 फ़रवरी, 1930
बेहद ज़रूरी
न. 103/फाँसी कोठरी
केन्द्रीय जेल, लाहौर
मेरे प्रिय जयदेव,
मुझे उम्मीद है कि तुमने 16 दिन के बाद हमारी भूख हड़ताल छोड़ने की बात
सुन ली होगी और तुम अन्दाज़ा लगा सकते हो कि इस समय तुम्हारी मदद की
हमें कितनी ज़रूरत है। हमें कल कुछ सन्तरे मिले, लेकिन कोई मुलाक़ात नहीं हुई।
हमारा मुक़दमा दो सप्ताह के लिए स्थगित कर दिया गया है। इसलिए एक टिन
घी और एक 'क्रेवन-ए' सिगरेट का टिन भेजने की तुरन्त कृपा करो। कुछ रसगुल्लों
के साथ कुछ सन्तरों का भी स्वागत है। सिगरेट के बिना दल की हालत ख़राब
है। अब हमारी ज़रूरतों की अनिवार्यता समझ सकते हो।
अग्रिम आभार सहित
सच्ची भावनाओं सहित तुम्हारा
भगतसिंह
408 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
जयदेव के नाम एक और पत्र
28 मई, 1930
प्रिय भाई जयदेव,
आज फिर तुम्हें कुछ तकलीफ़ देने के लिए मैं यह ख़त लिख रहा हूँ, उम्मीद
है कि तुम बुरा नहीं मानोगे। कृपया मेरे लिए पैरों का फ़लीट जूता भेजने का प्रबन्ध
करना। 9-10 नम्बर का चल जायेगा। चप्पल से बहुत बेआरामी है। कृपया इन्हें
शुक्रवार या शनिवार को कुलबीर के हाथ भेजने की कोशिश करना, जब वह हमारी
मुलाक़ात के लिए आयेगा। सच में मैं बहुत उदास हूँ कि मुझे तुम्हारे साथ अभी
तक मुलाक़ात की इजाज़त नहीं मिली है। यदि मुक़दमे में यह गतिरोध न आया
होता तो मैंने अधिकारियों से तुम्हारे साथ मुलाक़ात की इजाज़त के लिए बार-बार
आग्रह किया होता। जो भी हो, इस समस्या के सुलझते ही मुलाक़ात की इजाज़त
की फिर कोशिश करूँगा। मुझे उम्मीद है कि तुम जूते अवश्य ही और बिना देर
किए भेज दोगे। इन दिनों मेरे पास एक ही किताब है और वह भी बहुत शुष्क।
देखना अगर हाल में प्रकाशित कुछ दिलचस्प उपन्यास भेज सको। कृपया दोस्तों
को मेरी याद पहुँचाना।
सच्ची भावनाओं के साथ तुम्हारा
भगतसिंह
तारीख़ 26/5/30
लाहौर डाकखाने की मोहर 28/5/30
पता – जयदेव प्रसाद गुप्त द्वारा स. किशन सिंह
ब्रैडले हॉल, लाहौर
जेल की सलाख़ों के पीछे से / 409
बचपन के दोस्त जयदेव को
भगतसिंह का पत्र
सेण्ट्रल जेल, लाहौर
3 जून, 1930
मेरे प्रिय जयदेव,
'विक्ट्री' जूते और 'किंक' दवात भेजने के लिए मेरी ओर से धन्यवाद
स्वीकारो! आपके शब्दानुसार जैसाकि कुलबीर ने कहा है, मैं यह ख़त कुछ अन्य
चीज़ें मँगवाने के लिए लिख रहा हूँ।
आपका बहुत धन्यवाद होगा अगर आप एक दूसरा जोड़ा कपड़े के जूते श्री
दत्त के लिए भेज सको। लेकिन दुकानदार से उन्हें पूरा न आने की स्थिति में वापसी
की शर्त से लें। मैं इस बारे में अपने पहले ख़त में ही लिख सकता था, लेकिन
उस समय श्री दत्त अच्छे मूड में नहीं थे। मगर मेरे लिए यह बहुत कठिन बात है
कि मैं अकेला ही इन जूतों को पहनूँ। मैं उम्मीद करता हूँ कि अगली मुलाक़ात
के समय जूतों का एक और जोड़ा यहाँ पड़ा होगा।
कृपया 34 नम्बर छाती की सफ़ेद शेक्सपीयर कालर वाली आधी आस्तीन
वाली खेल शर्ट भेजना। यह भी श्री दत्त के लिए चाहिए। यह न सोचना कि जेल
में होते हुए भी हमने अपना रहन-सहन का ख़र्चीला ढंग नहीं त्यागा। क्योंकि यह
फिर भी आवश्यक ज़रूरतें हैं, विलासिताएँ नहीं। किसी मुलायम कपड़े के बने हुए
दो लँगोट नहाने और वर्जिश करने के लिए भेज दो। और कपड़े धोने के लिए साबुन
की कुछ टिक्की भेज देना। साथ ही थोड़े बादाम और एक स्वान इंक की दवात
भी भेज देना। सरदार जी का क्या हाल है? क्या वे लुधियाना से आ गये हैं?
आजकल कचहरी बन्द रहेगी। मुक़दमा नहीं चल रहा होगा। यदि वे आज अभी तक
वापस नहीं आये तो उनको लाने के लिए किसी को भेज देना। फिर उनके और
मेरे मुक़दमों का फ़ैसला होने वाला है। कहा नहीं जा सकता कि हमें आपस में
मुलाक़ात का भी मौक़ा मिलेगा अथवा नहीं, इसलिए आप उन्हें फ़ौरन बुला लें
ताकि वे इस हफ़्ते के भीतर मुझसे दो मुलाक़ातें कर सकें और अगर यदि वे जल्द
410 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
नहीं आ पा रहे तो कृपया कुलबीर और बहन अमर कौर को मुझसे मुलाक़ात के
लिए कल या फिर परसों भेज दें। मित्रों को मेरी ओर से याद कहें।
साथ ही, क्या आप उर्दू अनुवाद के साथ एक फ़ारसी क़ायदा भेज सकते हो?
आपका,
भगतसिंह
जेल की सलाख़ों के पीछे से / 411
जयदेव को एक और पत्र
सेण्ट्रल जेल, लाहौर
24 जुलाई, 1930
मेरे प्रिय जयदेव!
कृपया निम्नलिखित किताबें द्वारकानाथ पुस्तकालय से मेरे नाम पर जारी
करवाकर शनिचरवार को कुलबीर के हाथ भेज देना :
मैटीरियेलिज़्म : कार्ल लीब्नेखत
व्हाईमैन फाइट – बी. रसेल
सोवियट्स एट वर्क
कोलेप्स ऑफ़ सेकिण्ड इण्टरनेशनल
लेफ्ट विंग कम्युनिज़्म
म्यूचुअल एण्ड प्रिन्स क्रोपोटकिन
फ़ील्ड्स फ़ेक्ट्रीज एण्ड वर्कशाप्स
सिविल वार इन फ्रांस : मार्क्स
लैण्ड रिवोल्यूशन इन एशिया, और
अप्टन सिंक्लेयर की ‘स्पाई’
कृपया यदि हो सके तो मुझे एक और किताब भेजने का प्रबन्ध करना, जिसका
नाम ‘थ्योरी ऑफ़ हिस्टोरिकल मैटिरियेलिज़्म : बुखारिन’ है। (यह पंजाब पब्लिक
लाइब्रेरी से मिल जायेगी)। और पुस्तकालयाध्यक्ष से यह मालूम करना कि कुछ
किताबें क्या बोर्स्टल जेल में भेजी गयी हैं? उन्हें किताबों की बहुत ज़रूरत है।
उन्होंने सुखदेव के भाई जयदेव के हाथों एक सूची भेजी थी, लेकिन उनको अभी
तक किताबें नहीं मिलीं। अगर उनके (पुस्तकालय) पास कोई सूची न हो तो
कृपया लाला फ़िरोज़चन्द से जानकारी ले लेना और उनकी पसन्द के अनुसार कुछ
रोचक किताबें भेज देना। इस रविवार जब मैं वहाँ जाऊँ तो उनके पास किताबें
पहुँची हुई होनी चाहिए। कृपया यह काम किसी भी हालत में कर देना। इसके साथ
ही डार्लिंग की ‘पंजाब पेजेण्ट्री इन प्रॉस्पैरिटी एण्ड डैट’ और इसी तरह की
412 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
एक-दो अन्य किताबें किसान समस्या पर डॉ. आलम के लिए भेज देना।
आशा है तुम इन कष्टों को ज़्यादा महसूस न करोगे। भविष्य के लिए तुम्हें
यक़ीन दिलाता हूँ कि तुम्हें कभी भी कोई कष्ट न दूँगा। सभी मित्रों को मेरी याद
कहना और लज्जावती जी को मेरी ओर से अभिवादन। उम्मीद है कि अगर दत्त
की बहन आयीं तो वे मुझसे मुलाक़ात करने का कष्ट करेंगी।
आदर के साथ,
भगतसिंह
जेल की सलाख़ों के पीछे से / 413
बटुकेश्वर दत्त की बहन प्रोमिला को
भगतसिंह का पत्र
सेण्ट्रल जेल, लाहौर
17 जुलाई, 1930
प्यारी बहन,
कल बत्तू¹ ने आपको चिट्ठी लिखी थी। आपको यह ख़बर देने के लिए कि
जब तक आपको उसकी दूसरी चिट्ठी न मिले, आप यहाँ न आयें। बत्तू को कल
रात किसी अन्य जेल में भेज दिया गया है। अभी तक हम उसके पड़ाव के बारे
में अनजान हैं। इसलिए मैं आपसे अर्ज़ करता हूँ कि आप बनारस से लाहौर के लिए
तब तक न चलें जब तक उसकी चिट्ठी न मिले। उसका बिछोह मेरे लिए भी
असहनीय है। आज भी मैं बड़ी परेशानी महसूस कर रहा हूँ। हर पल बोझिल बन
गया है। सच में ऐसे दोस्त से बिछड़ना जोकि मेरे अपने भाइयों से ज़्यादा प्यारा हो,
बहुत दुखद है। ख़ैर, हमें यह सबकुछ हौसला करके सहना चाहिए। मैं आपसे अर्ज़
करता हूँ कि आप धीरज रखें; कोई चिन्ता न करें।
समय बीतने से कोई अच्छा ही परिणाम निकलेगा।
आपका भाई,
भगतसिंह
- बटुकेश्वर दत्त का लाड़ का नाम।
414 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
छोटे भाई कुलबीर को
भगतसिंह का पत्र
सेण्ट्रल जेल, लाहौर
16 सितम्बर, 1930
प्यारे भाई कुलबीर जी,
सत श्री अकाल!
तुम्हें मालूम ही होगा कि उच्च अधिकारियों के आदेशानुसार मुझसे मुलाक़ातों
पर पाबन्दी लगा दी गयी है। इन स्थितियों में फ़िलहाल मुलाक़ात न हो सकेगी और
मेरा विचार है कि जल्द ही फ़ैसला सुना दिया जायेगा। इसके कुछ दिनों बाद किसी
दूसरी जेल में भेज दिया जायेगा। इसलिए किसी दिन जेल में आकर मेरी किताबें
और काग़ज़ात आदि चीजें ले जाना। मैं बरतन, कपड़े, किताबें और अन्य काग़ज़ात
जेल के डिप्टी सुपरिण्टेण्डेण्ट के दफ़्तर में भेज दूँगा। आकर ले जाना। पता नहीं
क्यों, मेरे मन में बार-बार यह विचार आ रहा है कि इसी हफ़्ते के किसी दिन या
अधिक से अधिक इसी माह में फ़ैसला और चालान हो जायेगा। इन स्थितियों में
अब तो किसी अन्य जेल में मुलाक़ात होगी। यहाँ तो उम्मीद नहीं।
वकील को भेज सको तो भेजना। मैं प्रिवी कौंसिल के सिलसिले में एक
ज़रूरी मशवरा करना चाहता हूँ। माँजी को दिलासा देना, घबराएँ नहीं।
तुम्हारा भाई,
भगतसिंह
जेल की सलाख़ों के पीछे से / 415
कुलबीर को एक और पत्र
सेण्ट्रल जेल, लाहौर
25 सितम्बर, 1930
प्रिय भाई कुलबीर सिंह जी,
सत श्री अकाल!
मुझे यह जानकर कि एक दिन तुम माँजी को साथ लेकर आये और मुलाक़ात
का आदेश न मिलने से निराश होकर वापस लौट गये, बहुत दुख हुआ। तुम्हें तो
पता चल चुका था कि जेल में मुलाक़ात की इजाज़त नहीं देते। फिर माँजी को
साथ क्यों लाये? मैं जानता हूँ कि इस समय वे बहुत घबरायी हुई हैं, लेकिन इस
घबराहट और परेशानी का क्या फ़ायदा, नुक़सान ज़रूर है, क्योंकि जब से मुझे पता
चला कि वे बहुत रो रही हैं, मैं स्वयं भी बेचैन हो रहा हूँ। घबराने की कोई बात
नहीं, फिर इससे कुछ मिलता भी नहीं। सभी साहस से हालात का मुक़ाबला करें।
आख़िरकार दुनिया में दूसरे लोग भी तो हज़ारों मुसीबतों में फँसे हुए हैं। और फिर
अगर लगातार एक बरस तक मुलाक़ातें करके भी तबीयत नहीं भरी तो और दो-चार
मुलाक़ातों से भी तसल्ली न होगी। मेरा ख़याल है कि फ़ैसले और चालान के बाद
मुलाक़ातों से पाबन्दी हट जायेगी, लेकिन माना कि इसके बावजूद मुलाक़ात की
इजाज़त न मिले तो...इसलिए घबराने से क्या फ़ायदा?
तुम्हारा भाई,
भगतसिंह
416 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
पिता जी के नाम भगतसिंह का पत्र
30 सितम्बर, 1930 को भगतसिंह के पिता सरदार किशन सिंह ने ट्रिब्यूनल को
एक अर्जी देकर बचाव पेश करने के लिए अवसर की माँग की। सरदार किशन
सिंह स्वयं देशभक्त थे और राष्ट्रीय आन्दोलन में जेल जाते रहते थे। उन्हें व कुछ
अन्य देशभक्तों को लगता था कि शायद बचाव-पक्ष पेश कर भगतसिंह को फाँसी
के फन्दे से बचाया जा सकता है, लेकिन भगतसिंह और उनके साथी बिल्कुल अलग
नीति पर चल रहे थे। उनके अनुसार, ब्रिटिश सरकार बदला लेने की नीति पर चल
रही है व न्याय सिर्फ़ ढकोसला है। किसी भी तरीक़े से उसे सज़ा देने से रोका नहीं
जा सकता। उनका मानना था कि उनका नाम भारतीय क्रान्ति का प्रतीक बन गया
है और अपनी कुर्बानी से वे जनता में इन्क़लाबी भावनाएँ जगाना चाहते थे। पिता द्वारा
दी गयी अर्ज़ी से भगतसिंह की भावनाओं को ठेस लगी थी, लेकिन अपनी भावनाओं
को नियन्त्रित कर अपने उसूलों पर ज़ोर देते हुए उन्होंने 4 अक्टूबर, 1930 को यह
पत्र लिखा जो उनके पिता को देर से मिला। 7 अक्टूबर, 1930 को मुक़दमे का
फ़ैसला सुना दिया गया। – स.
4 अक्टूबर, 1930
पूज्य पिता जी,
मुझे यह जानकर हैरानी हुई कि आपने मेरे बचाव-पक्ष के लिए स्पेशल
ट्रिब्यूनल को एक आवेदन भेजा है। यह ख़बर इतनी यातनामय थी कि मैं इसे
ख़ामोशी से बरदाश्त नहीं कर सका। इस ख़बर ने मेरे भीतर की शान्ति भंग कर
उथल-पुथल मचा दी है। मैं यह नहीं समझ सकता कि वर्तमान स्थितियों में और
इस मामले पर आप किस तरह का आवेदन दे सकते हैं?
आपका पुत्र होने के नाते मैं आपकी पैतृक भावनाओं और इच्छाओं का पूरा सम्मान
करता हूँ लेकिन इसके बावजूद मैं समझता हूँ कि आपको मेरे साथ सलाह-मशवरा
किये बिना ऐसे आवेदन देने का कोई अधिकार नहीं था। आप जानते हैं कि राजनीतिक
क्षेत्र में मेरे विचार आपसे काफ़ी अलग हैं। मैं आपकी सहमति या असहमति का
ख़याल किये बिना सदा स्वतन्त्रतापूर्वक काम करता रहा हूँ।
जेल की सलाख़ों के पीछे से / 417
मुझे यक़ीन है कि आपको यह बात याद होगी कि आप आरम्भ से ही मुझसे
यह बात मनवा लेने की कोशिशें करते रहे हैं कि मैं अपना मुक़दमा संजीदगी से
लड़ूँ और अपना बचाव ठीक से प्रस्तुत करूँ, लेकिन आपको यह भी मालूम है
कि मैं सदा इसका विरोध करता रहा हूँ। मैंने कभी भी अपना बचाव करने की इच्छा
प्रकट नहीं की और न ही मैंने कभी इस पर संजीदगी से गौर किया है।
आप जानते हैं कि हम एक निश्चित नीति के अनुसार मुक़दमा लड़ रहे हैं।
..मेरा हर क़दम इस नीति, मेरे सिद्धान्तों और हमारे कार्यक्रम के अनुरूप होना
चाहिए। आज स्थितियाँ बिल्कुल अलग हैं। लेकिन अगर स्थितियाँ इससे कुछ और
भी अलग होतीं तो भी मैं अन्तिम व्यक्ति होता जो बचाव प्रस्तुत करता। इस पूरे
मुक़दमे में मेरे सामने एक ही विचार था और वह यह कि हमारे विरुद्ध जो संगीन
आरोप लगाये गये हैं, बावजूद उनके हम पूर्णतया इस सम्बन्ध में अवहेलना का
व्यवहार करें। मेरा नज़रिय यह रहा है कि सभी राजनीतिक कार्यकर्ताओं को ऐसी
स्थितियों में उपेक्षा दिखानी चाहिए और उनको जो भी कठोरतम सज़ा दी जाये, वह
उन्हें हँसते-हँसते बरदाश्त करनी चाहिए। इस पूरे मुक़दमे के दौरान हमारी योजना
इसी सिद्धान्त के अनुरूप रही है। हम ऐसा करने में सफल हुए या नहीं, यह फ़ैसला
करना मेरा काम नहीं। हम खुदगर्जी को त्यागकर अपना काम कर रहे हैं।
वायसराय ने लाहौर साज़िश केस आर्डिनेंस जारी करते हुए इसके साथ जो
वक्तव्य दिया था, उसमें उन्होंने कहा था कि इस साज़िश के मुजरिम
शान्ति-व्यवस्था को समाप्त करने के प्रयास कर रहे हैं। इससे जो हालात पैदा हुए
उसने हमें यह मौक़ा दिया कि हम जनता के समक्ष यह बात प्रस्तुत करें कि वह
स्वयं देख ले कि शान्ति-व्यवस्था एवं क़ानून समाप्त करने की कोशिशें हम कर
रहे हैं या हमारे विरोधी? इस बात पर मतभेद हो सकते हैं। शायद आप भी उनमें
से एक हों जो इस बात पर मतभेद रखते हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि
आप मुझसे सलाह किये बिना मेरी ओर से ऐसे क़दम उठायें। मेरी ज़िन्दगी इतनी
क़ीमती नहीं जितनी कि आप सोचते हैं। कम से कम मेरे लिए तो इस जीवन की
इतनी क़ीमत नहीं कि इसे सिद्धान्तों को कुर्बान करके बचाया जाये। मेरे अलावा
मेरे और साथी भी हैं जिनके मुक़दमे इतने ही संगीन हैं जितना कि मेरा मुक़दमा।
हमने एक संयुक्त योजना अपनायी है और इस योजना पर हम अन्तिम समय तक
डटे रहेंगे। हमें इस बात की कोई परवाह नहीं कि हमें व्यक्तिगत रूप में इस बात
के लिए कितना मूल्य चुकाना पड़ेगा।
पिता जी, मैं बहुत दुख का अनुभव कर रहा हूँ। मुझे भय है, आप पर दोषारोपण
करते हुए या इससे बढ़कर आपके इस काम की निन्दा करते हुए मैं कहीं सभ्यता
की सीमाएँ न लाँघ जाऊँ और मेरे शब्द ज़्यादा सख्त़ न हो जायें। लेकिन मैं स्पष्ट
शब्दों में अपनी बात अवश्य कहूँगा। यदि कोई अन्य व्यक्ति मुझसे ऐसा व्यवहार
418 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
करता तो मैं इसे ग़द्दारी से कम न मानता, लेकिन आपके सन्दर्भ में मैं इतना ही
कहूँगा कि यह एक कमज़ोरी है – निचले स्तर की कमज़ोरी।
यह एक ऐसा समय था जब हम सबका इम्तिहान हो रहा था। मैं यह कहना
चाहता हूँ कि आप इस इम्तिहान में नाकाम रहे हैं। मैं जानता हूँ कि आप भी इतने
ही देशप्रेमी हैं, जितना कि कोई और व्यक्ति हो सकता है। मैं जानता हूँ कि आपने
अपनी पूरी ज़िन्दगी भारत की आज़ादी के लिए लगा दी है, लेकिन इस अहम मोड़
पर आपने ऐसी कमज़ोरी दिखायी, यह बात मैं समझ नहीं सकता।
अन्त में मैं आपसे, आपके अन्य मित्रों एवं मेरे मुक़दमे में दिलचस्पी लेने वालों
से यह कहना चाहता हूँ कि मैं आपके इस क़दम को नापसन्द करता हूँ। मैं आज
भी अदालत में अपना कोई बचाव प्रस्तुत करने के पक्ष में नहीं हूँ। अगर अदालत
हमारे कुछ साथियों की ओर से स्पष्टीकरण आदि के लिए प्रस्तुत किये गये आवेदन
को मंज़ूर कर लेती, तो भी मैं कोई स्पष्टीकरण प्रस्तुत न करता।
भूख हड़ताल के दिनों में ट्रिब्यूनल को जो आवेदन पत्र मैंने दिया था और उन
दिनों में जो साक्षात्कार दिया था उन्हें ग़लत अर्थों में समझा गया है और अख़बारों
में यह प्रकाशित कर दिया गया कि मैं अपना स्पष्टीकरण प्रस्तुत करना चाहता हूँ,
हालाँकि मैं हमेशा स्पष्टीकरण प्रस्तुत करने के विरोध में रहा। आज भी मेरी वही
मान्यता है जो उस समय थी।
बोर्स्टल जेल में बन्दी मेरे साथी इस बात को मेरी ओर से ग़द्दारी और
विश्वासघात ही समझ रहे होंगे। मुझे उनके सामने अपनी स्थिति स्पष्ट करने का
अवसर भी नहीं मिल सकेगा।
मैं चाहूँगा कि इस सम्बन्ध में जो उलझनें पैदा हो गयी हैं, उनके विषय में
जनता को असलियत का पता चल जाये। इसलिए मैं आपसे प्रार्थना करता हूँ कि
आप जल्द से जल्द यह चिट्ठी प्रकाशित कर दें।
आपका आज्ञाकारी,
भगतसिंह
जेल की सलाख़ों के पीछे से / 419
बटुकेश्वर दत्त को भगतसिंह का पत्र
सेण्ट्रल जेल, लाहौर
अक्टूबर, 1930
प्रिय भाई,
मुझे सज़ा सुना दी गयी है और फाँसी का हुक्म हुआ है। इन कोठरियों में मेरे
अलावा फाँसी का इन्तज़ार करने वाले बहुत-से मुजरिम हैं। ये लोग यही प्रार्थनाएँ
कर रहे हैं कि किसी तरह वे फाँसी से बच जायें। लेकिन उनमें से शायद मैं अकेला
ऐसा आदमी हूँ जो बड़ी बेसब्री से उस दिन का इन्तज़ार कर रहा हूँ जब मुझे अपने
आदर्श के लिए फाँसी के तख़्ते पर चढ़ने का सौभाग्य मिलेगा। मैं खुशी से फाँसी
के तख़्ते पर चढ़कर दुनिया को दिखा दूँगा कि क्रान्तिकारी अपने आदर्शों के लिए
कितनी वीरता से कुर्बानी दे सकते हैं।
मुझे फाँसी की सज़ा मिली है, मगर तुम्हें उम्रक़ैद। तुम ज़िन्दा रहोगे और
ज़िन्दा रहकर तुम्हें दुनिया को यह दिखा देना है कि क्रान्तिकारी अपने आदर्शों
के लिए सिर्फ़ मर ही नहीं सकते, बल्कि ज़िन्दा रहकर हर तरह की यातनाओं
का मुक़ाबला भी कर सकते हैं। मौत सांसारिक मुसीबतों से छुटकारा पाने का
साधन नहीं बननी चाहिए, बल्कि जो क्रान्तिकारी संयोगवश फाँसी के फन्दे से
बच गये हैं उन्हें ज़िन्दा रहकर दुनिया को यह दिखा देना चाहिए कि वे न
सिर्फ़ अपने आदर्शों के लिए फाँसी पर चढ़ सकते हैं, बल्कि जेलों की अँधेरी
कोठरियों में घुट-घुटकर हद दर्जे के अत्याचारों को भी सहन कर सकते हैं।
तुम्हारा,
भगतसिंह
420 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़