भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
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शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
कर देते हैं – चाँदनी रात में ताजमहल को देखो और जिस दिल की यह समझ
का परिणाम था, उसकी महानता की कल्पना करो। सोचो एक बंगाली उपन्यासकार
ने लिखा है कि हममें 'यह हमारे आँसू ही जम-जमकर पत्थर बन गये हैं।' वह
भी वापस वेदों की ओर ही लौट चलने का आह्वान करते हैं। आपने अपने पूना वाले
भाषण में 'राष्ट्रवादिता' के सम्बन्ध में कहा है कि अन्तरराष्ट्रीयतावादी, राष्ट्रीयतावाद
को एक संकीर्ण दायरे वाली विचारधारा बताते हैं, लेकिन यह भूल है। हिन्दुस्तानी
राष्ट्रीयता का विचार ऐसा नहीं है। वह न संकीर्ण है। न निजी स्वार्थ से प्रेरित है
और न उत्पीड़नकारी है, क्योंकि इसकी जड़ या मूल तो यह 'सत्यम शिवम
सुन्दरम' है, अर्थात 'सच, कल्याणकारी और सुन्दर।'
यह भी वही छायावाद है। कोरी भावुकता है। साथ ही उन्हें भी अपने पुरातन
युग पर बहुत विश्वास है। वह प्रत्येक बात में अपने पुरातन युग की महानता देखते
हैं। पंचायतीराज का ढंग उनके विचार में कोई नया नहीं। 'पंचायती राज और जनता
का राज' वे कहते हैं कि हिन्दुस्तान में बहुत पुराना है। वे तो यहाँ तक कहते हैं
कि साम्यवाद भी हिन्दुस्तान के लिए नयी चीज़ नहीं। ख़ैर, उन्होंने सबसे ज़्यादा उस
दिन के भाषण में ज़ोर जिस बात पर दिया था वह यह थी कि हिन्दुस्तान का दुनिया
के लिए एक विशेष सन्देश है। पण्डित जवाहरलाल आदि के विचार इसके बिल्कुल
विपरीत हैं। वे कहते हैं –
“जिस देश में जाओ वही समझता है कि उसका दुनिया के लिए एक विशेष
सन्देश है। इंग्लैण्ड दुनिया को संस्कृति सिखाने का ठेकेदार बनता है। मैं तो कोई
विशेष बात अपने देश के पास नहीं देखता। सुभाष बाबू को उन बातों पर बहुत
यक़ीन है।” जवाहरलाल कहते हैं – "Every youth must rebel. Not only in
political sphere, but in social, economic and religious spheres also. I have
not much use for any man who comes and tells me that such and such thing
is said in Koran, Every thing unreasonable must be discarded even if they
find authority for it in the Vedas and Koran." (यानी) “प्रत्येक नौजवान को
विद्रोह करना चाहिए। राजनीतिक क्षेत्र में ही नहीं बल्कि सामाजिक, आर्थिक और
धार्मिक क्षेत्र में भी। मुझे ऐसे व्यक्ति की कोई आवश्यकता नहीं जो आकर कहे
कि फलाँ बात कुरान में लिखी हुई है। कोई बात जो अपनी समझदारी की परख
में सही साबित न हो उसे चाहे वेद और कुरान में कितना ही अच्छा क्यों न कहा
गया हो, नहीं माननी चाहिए।”
यह एक युगान्तकारी के विचार हैं और सुभाष के एक राजपरिवर्तनकारी के
विचार हैं। एक के विचार में हमारी पुरानी चीजें बहुत अच्छी हैं और दूसरे के
विचार में उनके विरुद्ध विद्रोह कर दिया जाना चाहिए। एक को भावुक कहा
322 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
जाता है और एक को युगान्तकारी और विद्रोही! पण्डित जी एक स्थान पर कहते
हैं – "To those who still fondly cherish old ideas and are striving to bring
back the conditions which prevailed in Arabia 1300 years ago or in the
vedic Age in India. I say, that it is inconcievable that you can bring back
the hoary past. The world of reality will not retrace its steps, the world of
imagiation may remain stationary."
वे कहते हैं कि जो अब भी क़ुरान के ज़माने के, अर्थात 1300 बरस पीछे
के अरब की स्थितियाँ पैदा करना चाहते हैं या जो पीछे वेदों के ज़माने की ओर
देख रहे हैं उनसे मेरा यही कहना है कि यह तो सोचा भी नहीं जा सकता कि वह
युग वापस लौट आयेगा, वास्तविक दुनिया पीछे नहीं लौट सकती, काल्पनिक
दुनिया को चाहे कुछ दिन यहीं स्थिर रखो। और इसीलिए वे विद्रोह की आवश्यकता
महसूस करते हैं।
सुभाष बाबू पूर्ण स्वराज के समर्थन में हैं क्योंकि वे कहते हैं कि अंग्रेज़ पश्चिम
के वासी हैं। हम पूर्व के। पण्डित जी कहते हैं, हमें अपना राज क़ायम करके सारी
सामाजिक व्यवस्था बदलनी चाहिए। उसके लिए पूरी-पूरी स्वतन्त्रता प्राप्त करने की
आवश्यकता है।
सुभाष बाबू मज़दूरों से सहानुभूति रखते हैं और उनकी स्थिति सुधारना चाहते
हैं। पण्डित जी एक क्रान्ति करके सारी व्यवस्था ही बदल देना चाहते हैं। सुभाष
भावुक हैं – दिल के लिए नौजवानों को बहुत कुछ दे रहे हैं, पर मात्र दिल के
लिए। दूसरा युगान्तकारी है जोकि दिल के साथ-साथ दिमाग़ को भी बहुत कुछ
दे रहा है – "They should aim at Swaraj for the masses based on socialism.
That was a revolutionary change which they could not bring about without
revolutionary methods....Mere reform or gradual repairing of the existing
machinery could not achieve the real proper Swaraj for the General
Masses." (अर्थात) हमारा आदर्श समाजवादी सिद्धान्तों के अनुसार पूर्ण स्वराज्य
होना चाहिए, जोकि युगान्तकारी तरीक़ों के बिना प्राप्त नहीं हो सकता। केवल सुधार
और मौजूदा सरकार की मशीनरी की धीमी-धीमी की गयी मरम्मत जनता के लिए
वास्तविक स्वराज्य नहीं ला सकती।
यह उनके विचारों का ठीक-ठीक अक्स है। सुभाष बाबू राष्ट्रीय राजनीति की
ओर उतने समय तक ही ध्यान देना आवश्यक समझते हैं जितने समय तक दुनिया
की राजनीति में हिन्दुस्तान की रक्षा और विकास का सवाल है। परन्तु पण्डित जी
राष्ट्रीयता के संकीर्ण दायरों से निकलकर खुले मैदान में आ गये हैं।
अब सवाल यह है कि हमारे सामने दोनों विचार आ गये हैं। हमें किस ओर
झुकना चाहिए। एक पंजाबी समाचारपत्र ने सुभाष की तारीफ़ के पुल बाँधकर
नौजवान भारत सभा और राष्ट्रीय नेतृत्व का मूल्यांकन / 323
पण्डित जी आदि के बारे में कहा था कि ऐसे विद्रोही पत्थरों से सिर मार-मारकर
मर जाते हैं। ध्यान रखना चाहिए कि पंजाब पहले ही बहुत भावुक प्रान्त है। लोग
जल्द ही जोश में आ जाते हैं और जल्द ही झाग की तरह बैठ जाते हैं।
सुभाष आज शायद दिल को कुछ भोजन देने के अलावा कोई दूसरी मानसिक
खुराक नहीं दे रहे हैं। अब आवश्यकता इस बात की है कि पंजाब के नौजवानों
को इन युगान्तकारी विचारों को ख़ूब सोच-विचारकर पक्का कर लेना चाहिए। इस
समय पंजाब को मानसिक भोजन की सख़्त ज़रूरत है और यह पण्डित जवाहरलाल
नेहरू से ही मिल सकता है। इसका अर्थ यह नहीं है कि उनके अन्धे पैरोकार बन
जाना चाहिए। लेकिन जहाँ तक विचारों का सम्बन्ध है, वहाँ तक इस समय पंजाबी
नौजवानों को उनके साथ लगना चाहिए, ताकि वे इन्क़लाब के वास्तविक अर्थ,
हिन्दुस्तान में इन्क़लाब की आवश्यकता, दुनिया में इन्क़लाब का स्थान क्या है,
आदि के बारे में जान सकें। सोच-विचार के साथ नौजवान अपने विचारों को स्थिर
करें ताकि निराशा, मायूसी और पराजय के समय में भी भटकाव के शिकार न हों
और अकेले खड़े होकर दुनिया से मुक़ाबले में डटे रह सकें। इसी तरह जनता
इन्क़लाब के ध्येय को पूरा कर सकेगी।
324 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
साण्डर्स की हत्या के बाद :
दो नोटिस
17 नवम्बर, 1928 को लाला लाजपत राय का देहान्त हुआ। अक्टूबर में साइमन
कमीशन के विरोध में लाहौर में हुए विशाल प्रदर्शन का लाला जी ने नेतृत्व किया था
और पुलिस ने उन पर लाठियाँ बरसायी थीं। यही लाठियाँ लाला जी की मृत्यु का कारण
बनीं। लाला जी की मृत्यु से देश में दुख व आतंक छा गया। श्रीमती चितरंजन दास
ने ऐसे माहौल में सवाल किया था, ‘क्या देश में मानवता व जवानी अभी बाक़ी है?’
लाला लाजपत राय के प्रति बहुत अच्छी राय न होने के बावजूद, क्रान्तिकारियों
ने लाला जी की मृत्यु को राष्ट्रीय अपमान का मुद्दा बनाया और इसका बदला लाला
जी पर लाठियाँ बरसाने वाले ब्रिटिश पुलिस अधिकारी साण्डर्स को मारकर लिया।
हालाँकि वरिष्ठ पुलिस अधिकारी स्काट क्रान्तिकारियों से बच गया।
साण्डर्स की हत्या 17 दिसम्बर को की गयी। 18 दिसम्बर को पूरे लाहौर में
हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातान्त्रिक सेना के कमाण्डर इन चीफ़ के हस्ताक्षर से एक
परचा बाँटा गया। 23 दिसम्बर को फिर एक नोटिस लगाया गया। – स.
‘हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातान्त्रिक सेना’
नोटिस
नौकरशाही सावधान!
जे.पी. साण्डर्स की मृत्यु से लाला लाजपत राय जी की हत्या का
बदला ले लिया गया।
यह सोचकर कितना दुख होता है कि जे.पी. साण्डर्स जैसे एक मामूली पुलिस
अफ़सर के कमीने हाथों देश की तीस करोड़ जनता द्वारा सम्मानित एक नेता पर
हमला करके उनके प्राण ले लिये गये। राष्ट्र का यह अपमान हिन्दुस्तानी नवयुवकों
और मर्दों को चुनौती थी।
आज संसार ने देख लिया है कि हिन्दुस्तान की जनता निष्प्राण नहीं हो गयी
नौजवान भारत सभा और राष्ट्रीय नेतृत्व का मूल्यांकन / 325
है, उनका (नौजवानों) ख़ून जम नहीं गया, वे अपने राष्ट्र के सम्मान के लिए प्राणों
की बाज़ी लगा सकते हैं। और यह प्रमाण देश के उन युवकों ने दिया है जिनकी
स्वयं देश के नेता निन्दा और अपमान करते हैं।
अत्याचार सरकार सावधान!
इस देश की दलित और पीड़ित जनता की भावनाओं को ठेस मत लगाओ!
अपनी शैतानी हरकतें बन्द करो। हमें हथियार न रखने देने के लिए बनाये तुम्हारे
सब क़ानूनों और चौकसी के बावजूद पिस्तौल और रिवाल्वर इस देश की जनता
के हाथ में आते ही रहेंगे। यदि वह हथियार सशस्त्र क्रान्ति के लिए पर्याप्त न भी
हुए तो भी राष्ट्रीय अपमान का बदला लेते रहने के लिए तो काफ़ी रहेंगे ही।
हमारे अपने लोग हमारी निन्दा और अपमान करें। विदेशी सरकार चाहे हमारा
कितना भी दमन कर ले, परन्तु हम राष्ट्रीय सम्मान की रक्षा करने और विदेशी
अत्याचारियों को सबक सिखाने के लिए सदा तत्पर रहेंगे। हम सब विरोध और
दमन के बावजूद क्रान्ति की पुकार को बुलन्द रखेंगे और फाँसी के तख़्तों पर से
भी पुकार कर कहेंगे –
इन्क़लाब ज़िन्दाबाद!
हमें एक आदमी की हत्या करने का खेद है। परन्तु यह आदमी उस निर्दयी,
नीच और अन्यायपूर्ण व्यवस्था का अंग था जिसे समाप्त कर देना आवश्यक है। इस
आदमी की हत्या हिन्दुस्तान में ब्रिटिश शासन के कारिन्दे के रूप में की गयी है।
यह सरकार संसार की सबसे अत्याचारी सरकार है।
मनुष्य का रक्त बहाने के लिए हमें खेद है। परन्तु क्रान्ति की वेदी पर
कभी-कभी रक्त बहाना अनिवार्य हो जाता है। हमारा उद्देश्य एक ऐसी क्रान्ति से
है जो मनुष्य द्वारा मनुष्य के शोषण का अन्त कर देगी।
‘इन्क़लाब ज़िन्दाबाद!’
ह. बलराज
18 दिसम्बर, 1928 ‘सेनापति, पंजाब हि.स.प्र.स.’
326 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातान्त्रिक सेना
नोटिस
17 दिसम्बर की घटना सम्बन्धी
अब कोई रहस्य नहीं! कोई अनुमान नहीं!
जे.पी. साण्डर्स मारा गया!
लाला लाजपत राय का बदला ले लिया गया!!
हि.स.प्र.स. की नियमावली (नियम 10-बी व सी) के अनुसार इस बात की सूचना
दी जाती है कि यह सीधी राजनीतिक प्रकृति की बदले की कार्रवाई थी। भारत
के महान बुजुर्ग लाला लाजपत राय पर किये गये अत्यन्त घृणित हमले से उनकी
मृत्यु हुई। यह इस देश की राष्ट्रीयता का सबसे बड़ा अपमान था और अब इसका
बदला ले लिया गया है।
इसके बाद सभी से यह अनुरोध है कि हमारे शत्रु पुलिस को हमारा
पता-ठिकाना बताने में किसी क़िस्म की सहायता न दें। जो कोई इसके विपरीत
काम करेगा, उस पर सख़्त कार्रवाई की जायेगी।
इन्क़लाब ज़िन्दाबाद!
हस्ताक्षर बलराज
23 दिसम्बर, 1928 कमाण्डर-इन चीफ़
नौजवान भारत सभा और राष्ट्रीय नेतृत्व का मूल्यांकन / 327
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VII.
बहरों को सुनाने के लिए
बम का धमाका
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असेम्बली हॉल में फेंका गया परचा
8 अप्रैल, सन् 1929 को असेम्बली में बम फेंकने के बाद भगतसिंह और
बटुकेश्वर दत्त द्वारा बाँटे गये अंग्रेज़ी परचे का हिन्दी अनुवाद। - स.
‘हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातान्त्रिक सेना’
सूचना
“बहरों को सुनाने के लिए बहुत ऊँची आवाज़ की आवश्यकता होती है”, प्रसिद्ध
फ़्रांसीसी अराजकतावादी शहीद वैलियाँ के ये अमर शब्द हमारे काम के औचित्य
के साक्षी हैं।
पिछले दस वर्षों में ब्रिटिश सरकार ने शासन-सुधार के नाम पर इस देश का
जो अपमान किया है उसकी कहानी दोहराने की आवश्यकता नहीं और न ही
हिन्दुस्तानी पार्लियामेण्ट पुकारी जाने वाली इस सभा ने भारतीय राष्ट्र के सिर पर
पत्थर फेंककर उसका जो अपमान किया है, उसके उदाहरणों को याद दिलाने की
आवश्यकता है। यह सब सर्वविदित और स्पष्ट है। आज फिर जब लोग ‘साइमन
कमीशन’ से कुछ सुधारों के टुकड़ों की आशा में आँखें फैलाये हैं और इन टुकड़ों
के लोभ में आपस में झगड़ रहे हैं, विदेशी सरकार ‘सार्वजनिक सुरक्षा विधेयक’
(पब्लिक सेफ़्टी बिल) और ‘औद्योगिक विवाद विधेयक’ (ट्रेड्स डिस्प्यूट्स
बिल) के रूप में अपने दमन को और भी कड़ा कर लेने का यत्न कर रही है।
इसके साथ ही आने वाले अधिवेशन में ‘अख़बारों द्वारा राजद्रोह रोकने का क़ानून’
(प्रेस सैडिशन एक्ट) जनता पर कसने की भी धमकी दी जा रही है। सार्वजनिक
काम करने वाले मज़दूर नेताओं की अन्धाधुन्ध गिरफ़्तारियाँ यह स्पष्ट कर देती हैं
कि सरकार किस रवैये पर चल रही है।
राष्ट्रीय दमन और अपमान की इस उत्तेजनापूर्ण परिस्थिति में अपने उत्तरदायित्व
की गम्भीरता को महसूस कर ‘हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातन्त्र संघ’ ने अपनी सेना
को यह क़दम उठाने की आज्ञा दी है। इस कार्य का प्रयोजन है कि क़ानून का
बहरों को सुनाने के लिए बम का धमाका / 331
यह अपमानजनक प्रहसन समाप्त कर दिया जाये। विदेशी शोषक नौकरशाही जो
चाहे करे परन्तु उसकी वैधानिकता की नकाब फाड़ देना आवश्यक है।
जनता के प्रतिनिधियों से हमारा आग्रह है कि वे इस पार्लियामेण्ट के पाखण्ड
को छोड़ कर अपने-अपने निर्वाचन क्षेत्रों को लौट जायें और जनता को विदेशी दमन
और शोषण के विरुद्ध क्रान्ति के लिए तैयार करें। हम विदेशी सरकार को यह बतला
देना चाहते हैं कि हम 'सार्वजनिक सुरक्षा' और 'औद्योगिक विवाद' के दमनकारी
क़ानूनों और लाला लाजपत राय की हत्या के विरोध में देश की जनता की ओर
से यह क़दम उठा रहे हैं।
हम मनुष्य के जीवन को पवित्र समझते हैं। हम ऐसे उज्ज्वल भविष्य में
विश्वास रखते हैं जिसमें प्रत्येक व्यक्ति को पूर्ण शान्ति और स्वतन्त्रता का अवसर
मिल सके। हम इन्सान का ख़ून बहाने की अपनी विवशता पर दुखी हैं। परन्तु क्रान्ति
द्वारा सबको समान स्वतन्त्रता देने और मनुष्य द्वारा मनुष्य के शोषण को समाप्त कर
देने के लिए क्रान्ति में कुछ न कुछ रक्तपात अनिवार्य है।
इन्क़लाब ज़िन्दाबाद!
ह. बलराज
कमाण्डर इन चीफ़
332 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
बमकाण्ड पर सेशन कोर्ट में बयान
असेम्बली में बम फेंकने के बाद, 6 जून, 1929 को दिल्ली के सेशन जज
मि. लियोनार्ड मिडिल्टन की अदालत में दिया गया भगतसिंह और बटुकेश्वर दत्त का
ऐतिहासिक बयान। – स.
हमारे ऊपर गम्भीर आरोप लगाये गये हैं। इसलिए यह आवश्यक है कि हम भी
अपनी सफ़ाई में कुछ शब्द कहें। हमारे कथित अपराध के सम्बन्ध में निम्नलिखित
प्रश्न उठते हैं : (1) क्या वास्तव में असेम्बली में बम फेंके गये थे, यदि हाँ तो
क्यों? (2) नीचे की अदालत में हमारे ऊपर जो आरोप लगाये गये हैं, वे सही हैं
या ग़लत?
पहले प्रश्न के पहले भाग के लिए हमारा उत्तर स्वीकारात्मक है, लेकिन
तथाकथित चश्मदीद गवाहों ने इस मामले में जो गवाही दी है वह सरासर झूठ
है। चूँकि हम बम फेंकने से इन्कार नहीं कर रहे हैं इसलिए यहाँ इन गवाहों
के बयानों की सच्चाई की परख भी हो जानी चाहिए। उदाहरण के लिए, हम
यहाँ बता देना चाहते हैं कि सार्जेण्ट टेरी का यह कहना कि उन्होंने हममें से
एक के पास से पिस्तौल बरामद की, एक सफ़ेद झूठ-मात्र है, क्योंकि जब
हमने अपनेआप को पुलिस के हाथों में सौंपा तो हममें से किसी के पास कोई
पिस्तौल न थी। जिन गवाहों ने कहा है कि उन्होंने हमें बम फेंकते देखा था,
वे झूठ बोलते हैं। न्याय तथा निष्कपट व्यवहार को सर्वोपरि मानने वाले लोगों
को इन झूठी बातों से एक सबक लेना चाहिए। साथ ही हम सरकारी वकील
के उचित व्यवहार तथा अदालत के अभी तक के न्यायसंगत रवैये को भी
स्वीकार करते हैं।
पहले प्रश्न के दूसरे हिस्से का उत्तर देने के लिए हमें इस बमकाण्ड जैसी
ऐतिहासिक घटना के कुछ विस्तार में जाना पड़ेगा। हमने वह काम किस
अभिप्राय से तथा किन परिस्थितियों के बीच किया, इसकी पूरी एवं खुली
सफ़ाई आवश्यक है।
जेल में हमारे पास कुछ पुलिस अधिकारी आये थे। उन्होंने हमें बताया कि
लॉर्ड इर्विन ने इस घटना के बाद ही असेम्बली के दोनों सदनों के सम्मिलित
बहरों को सुनाने के लिए बम का धमाका / 333
अधिवेशन में कहा है कि “यह विद्रोह किसी व्यक्ति-विशेष के ख़िलाफ़ नहीं, वरन
सम्पूर्ण शासन-व्यवस्था के विरुद्ध था।” यह सुनकर हमने तुरन्त भाँप लिया कि
लोगों ने हमारे इस काम के उद्देश्य को सही तौर पर समझ लिया है।
मानवता को प्यार करने में हम किसी से पीछे नहीं हैं। हमें किसी से व्यक्तिगत
द्वेष नहीं है और हम प्राणि-मात्र को हमेशा आदर की नज़र से देखते आये हैं। हम
न तो बर्बरतापूर्ण उपद्रव करने वाले देश के कलंक हैं, जैसाकि सोशलिस्ट कहलाने
वाले दीवान चमनलाल ने कहा है, और न ही हम पागल हैं, जैसाकि लाहौर के
‘ट्रिब्यून’ तथा कुछ अन्य अख़बारों ने सिद्ध करने का प्रयास किया है। हम तो
केवल अपने देश के इतिहास, उसकी मौजूदा परिस्थिति तथा अन्य मानवोचित
आकांक्षाओं के मननशील विद्यार्थी होने का विनम्रतापूर्वक दावाभर कर सकते हैं।
हमें ढोंग तथा पाखण्ड से नफ़रत है।
एक अपकारजनक संस्था
यह काम हमने किसी व्यक्तिगत स्वार्थ अथवा विद्वेष की भावना से नहीं किया है।
हमारा उद्देश्य केवल उस शासन-व्यवस्था के विरुद्ध प्रतिवाद करना था जिसके हर
एक काम से उसकी अयोग्यता ही नहीं वरन अपकार करने की उसकी असीम
क्षमता भी प्रकट होती है। इस विषय पर हमने जितना विचार किया उतना ही हमें
इस बात का दृढ़ विश्वास होता गया कि वह केवल संसार के सामने भारत की
लज्जाजनक तथा असहाय अवस्था का ढिंढोरा पीटने के लिए ही क़ायम है और
वह एक ग़ैर-ज़िम्मेदार तथा निरंकुश शासन का प्रतीक है।
जनता के प्रतिनिधियों ने कितनी ही बार राष्ट्रीय माँगों को सरकार के सामने
रखा, परन्तु उसने उन माँगों की सर्वथा अवहेलना करके हर बार उन्हें रद्दी की
टोकरी में डाल दिया। सदन द्वारा पास किये गये गम्भीर प्रस्तावों को भारत की
तथाकथित पार्लियामेण्ट के सामने ही तिरस्कारपूर्वक पैरों तले रौंदा गया है,
दमनकारी तथा निरंकुश क़ानूनों को समाप्त करने की माँग करने वाले प्रस्तावों को
हमेशा अवज्ञा की दृष्टि से ही देखा गया है और जनता द्वारा निर्वाचित सदस्यों ने
सरकार के जिन क़ानूनों तथा प्रस्तावों को अवांछित एवं अवैधानिक बताकर रद्द कर
दिया था, उन्हें केवल क़लम हिलाकर ही सरकार ने लागू कर लिया है।
संक्षेप में, बहुत कुछ सोचने के बाद भी एक ऐसी संस्था के अस्तित्व का
औचित्य हमारी समझ में नहीं आ सका जो, बावजूद उस तमाम शानो-शौक़त
के, जिसका आधार भारत के करोड़ों मेहनतकशों की गाढ़ी कमाई है, केवल
मात्र दिल को बहलाने वाली, थोथी, दिखावटी और शरारतों से भरी हुई एक
संस्था है। हम सार्वजनिक नेताओं की मनोवृत्ति को समझ पाने में भी असमर्थ
हैं। हमारी समझ में नहीं आता कि हमारे नेतागण भारत की असहाय परतन्त्रता
334 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
की खिल्ली उड़ाने वाले इतने स्पष्ट एवं पूर्वनियोजित प्रदर्शनों पर सार्वजनिक
सम्पत्ति एवं समय बरबाद करने में सहायक क्यों बनते हैं।
हम इन्हीं प्रश्नों तथा मज़दूर आन्दोलन के नेताओं की धरपकड़ पर विचार कर
ही रहे थे कि सरकार औद्योगिक विवाद विधेयक लेकर सामने आयी। हम इसी
सम्बन्ध में असेम्बली की कार्यवाही देखने गये। वहाँ हमारा यह विश्वास और भी
दृढ़ हो गया कि भारत की लाखों मेहनतकश जनता एक ऐसी संस्था से किसी बात
की भी आशा नहीं कर सकती जो भारत के बेबस मेहनतकशों की दासता तथा
शोषकों की गलाघोंटू शक्ति की अहितकारी यादगार है।
अन्त में वह क़ानून, जिसे हम बर्बर एवं अमानवीय समझते हैं, देश के
प्रतिनिधियों के सरों पर पटक दिया गया और इस प्रकार करोड़ों संघर्षरत भूखे
मज़दूरों को प्राथमिक अधिकारों से भी वंचित कर दिया गया और उनके हाथों से
उनकी आर्थिक मुक्ति का एकमात्र हथियार भी छीन लिया गया। जिस किसी ने
भी कमरतोड़ परिश्रम करने वाले मूक मेहनतकशों की हालत पर हमारी तरह सोचा
है वह शायद स्थिर मन से यह सब नहीं देख सकेगा। बलि के बकरों की भाँति
शोषकों – और सबसे बड़ी शोषक स्वयं सरकार है – की बलिवेदी पर आये दिन
होने वाली मज़दूरों की इन मूक कुर्बानियों को देखकर जिस किसी का दिल रोता
है वह अपनी आत्मा की चीत्कार की उपेक्षा नहीं कर सकता।
गवर्नर जनरल की कार्यकारिणी समिति के भूतपूर्व सदस्य स्वर्गीय श्री एस.आर.
दास ने अपने प्रसिद्ध पत्र में अपने पुत्र को लिखा था कि इंग्लैण्ड की स्वप्ननिद्रा
भंग करने के लिए बम का उपयोग आवश्यक था। श्री दास के इन्हीं शब्दों को
सामने रखकर हमने असेम्बली भवन में बम फेंके थे। हमने वह काम मज़दूरों की
तरफ़ से प्रतिरोध प्रदर्शित करने के लिए किया था। उन असहाय मज़दूरों के पास
अपने मर्मान्तिक क्लेशों को व्यक्त करने का और कोई साधन भी तो नहीं था। हमारा
एकमात्र उद्देश्य था 'बहरों को सुनाना' और उन पीड़ितों की माँगों पर ध्यान न देने
वाली सरकार को समय रहते चेतावनी देना।
हमारी ही तरह दूसरों की भी परोक्ष धारणा है कि प्रशान्त सागर रूपी भारतीय
मानवता की ऊपरी शान्ति किसी भी समय फूट पड़ने वाले एक भीषण तूफ़ान की
द्योतक है। हमने तो उन लोगों के लिए सिर्फ़ ख़तरे की घण्टी बजायी है जो आने
वाले भयानक ख़तरे की परवाह किये बग़ैर तेज़ रफ़्तार से आगे की तरफ़ भागे जा
रहे हैं। हम लोगों को सिर्फ़ यह बता देना चाहते हैं कि 'काल्पनिक अहिंसा' का
युग अब समाप्त हो चुका है और आज की उठती हुई नयी पीढ़ी को उसकी व्यर्थता
में किसी भी प्रकार का सन्देह नहीं रह गया है।
मानवता के प्रति हार्दिक सद्भाव तथा अमिट प्रेम रखने के कारण उसे व्यर्थ
के रक्तपात से बचाने के लिए हमने चेतावनी देने के इस उपाय का सहारा लिया
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है। और उस आने वाले रक्तपात को हम ही नहीं, लाखों आदमी पहले से ही देख
रहे हैं।
काल्पनिक अहिंसा
ऊपर हमने 'काल्पनिक अहिंसा' शब्द का प्रयोग किया है। यहाँ पर उसकी व्याख्या
कर देना भी आवश्यक है। आक्रामक उद्देश्य से जब बल का प्रयोग होता है उसे
हिंसा कहते हैं, और नैतिक दृष्टिकोण से उसे उचित नहीं कहा जा सकता। लेकिन
जब उसका उपयोग किसी वैध आदर्श के लिए किया जाता है तो उसका नैतिक
औचित्य भी होता है। किसी हालत में बल-प्रयोग नहीं होना चाहिए, यह विचार
काल्पनिक और अव्यावहारिक है। इधर देश में जो नया आन्दोलन तेज़ी के साथ
उठ रहा है, और जिसकी पूर्व सूचना हम दे चुके हैं वह गुरु गोविन्द सिंह, शिवाजी,
कमाल पाशा, रिज़ा खाँ, वाशिंगटन, गैरीबाल्डी, लफ़ायत और लेनिन के आदर्शों से
ही प्रस्फुरित है और उन्हीं के पद-चिह्नों पर चल रहा है। चूँकि भारत की विदेशी
सरकार तथा हमारे राष्ट्रीय नेतागण दोनों ही इस आन्दोलन की ओर से उदासीन
लगते हैं और जानबूझकर उसकी पुकार की ओर से अपने कान बन्द करने का
प्रयत्न कर रहे हैं, अतः हमने अपना कर्त्तव्य समझा कि हम एक ऐसी चेतावनी दें
जिसकी अवहेलना न की जा सके।
हमारा अभिप्राय
अभी तक हमने इस घटना के मूल उद्देश्य पर ही प्रकाश डाला है। अब हम अपना
अभिप्राय भी स्पष्ट कर देना चाहते हैं।
यह बताने की आवश्यकता नहीं है कि इस घटना के सिलसिले में मामूली
चोटें खाने वाले व्यक्तियों अथवा असेम्बली के किसी अन्य व्यक्ति के प्रति हमारे
दिलों में कोई वैयक्तिक विद्वेष की भावना नहीं थी। इसके विपरीत हम एक बार
फिर स्पष्ट कर देना चाहते हैं कि हम मानव-जीवन को अत्यन्त पवित्र मानते हैं
और किसी अन्य व्यक्ति को चोट पहुँचाने के बजाय हम मानवजाति की सेवा में
हँसते-हँसते अपने प्राण विसर्जित कर देंगे। हम साम्राज्यवाद की सेना के भाड़े के
सैनिकों जैसे नहीं हैं जिनका काम ही हत्या होता है। हम मानव-जीवन का आदर
करते हैं और बराबर उसकी रक्षा का प्रयत्न करते हैं। इसके बाद भी हम स्वीकार
करते हैं कि हमने जान-बूझकर असेम्बली भवन में बम फेंके।
घटनाएँ स्वयं हमारे अभिप्राय पर प्रकाश डालती हैं। और हमारे इरादों की परख
हमारे काम के परिणाम के आधार पर होनी चाहिए न कि अटकल एवं मनगढ़न्त
परिस्थितियों के आधार पर। सरकारी विशेषज्ञ की गवाही के विरुद्ध हमें यह कहना
है कि असेम्बली भवन में फेंके गये बमों से वहाँ की एक ख़ाली बेंच को ही कुछ
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नुक़सान पहुँचा और लगभग आधे दर्जन लोगों को मामूली-सी खरोंचेंभर आयीं।
सरकारी वैज्ञानिकों ने कहा है कि बम बड़े ज़ोरदार थे और उनसे अधिक नुक़सान
नहीं हुआ, इसे एक अनहोनी घटना ही कहना चाहिए। लेकिन हमारे विचार से उन्हें
वैज्ञानिक ढंग से बनाया ही ऐसा गया था। पहली बात, दोनों बम बेंचों तथा डेस्कों
के बीच की ख़ाली जगह में ही गिरे थे। दूसरे, उनके फूटने की जगह से दो फिट
पर बैठे हुए लोगों को भी, जिनमें श्री पी.आर. राउ, श्री शंकर राव तथा सर जॉर्ज
शुस्टर के नाम उल्लेखनीय हैं, या तो बिल्कुल ही चोटें नहीं आयी या मात्र मामूली
आयीं। अगर उन बमों में ज़ोरदार पोटैशियम क्लोरेट और पिक्रिक एसिड भरा होता,
जैसाकि सरकारी विशेषज्ञ ने कहा है, तो इन बमों ने उस लकड़ी के घेरे को तोड़कर
कुछ गज की दूरी पर खड़े लोगों तक को उड़ा दिया होता। और यदि उनमें कोई
और भी शक्तिशाली विस्फोटक भरा जाता तो निश्चय ही वे असेम्बली के
अधिकांश सदस्यों को उड़ा देने में समर्थ होते। यही नहीं, यदि हम चाहते तो उन्हें
सरकारी कक्ष में फेंक सकते थे जोकि विशिष्ट व्यक्तियों से खचाखच भरा था।
या फिर उस सर जॉन साइमन को अपना निशाना बना सकते थे, जिसके अभागे
कमीशन ने प्रत्येक विचारशील व्यक्ति के दिल में उसकी ओर से गहरी नफ़रत पैदा
कर दी थी और जो उस समय असेम्बली की अध्यक्ष दीर्घा में बैठा था। लेकिन
इस तरह का हमारा कोई इरादा नहीं था और उन बमों ने उतना ही काम किया
जितने के लिए उन्हें तैयार किया गया था। यदि उससे कोई अनहोनी घटना हुई तो
यही कि वे निशाने पर अर्थात् निरापद स्थान पर गिरे।
एक ऐतिहासिक सबक
इसके बाद हमने इस कार्य का दण्ड भोगने के लिए अपनेआप को जान-बूझकर
पुलिस के हाथों समर्पित कर दिया। हम साम्राज्यवादी शोषकों को यह बता देना
चाहते थे कि मुट्ठीभर आदमियों को मारकर किसी आदर्श को समाप्त नहीं
किया जा सकता और न ही दो नगण्य व्यक्तियों को कुचलकर राष्ट्र को दबाया
जा सकता है। हम इतिहास के इस सबक पर ज़ोर देना चाहते थे कि परिचय-पत्र
या परिचय-चिह्न (Letter de catchet) तथा बास्तीय (फ्रांस की कुख्यात जेल
जहाँ राजनीतिक बन्दियों को घोर यन्त्रणाएँ दी जाती थीं) फ्रांस के क्रान्तिकारी
आन्दोलन को कुचलने में समर्थ नहीं हुए थे, फाँसी के फन्दे और साइबेरिया की
ख़ानें रूसी क्रान्ति की आग को बुझा नहीं पायी थीं। तो फिर क्या अध्यादेश और
सेफ़्टी बिल्स भारत में आज़ादी की लौ को बुझा सकेंगे? षड्यन्त्रों का पता
लगाकर या गढ़े हुए षड्यन्त्रों द्वारा नौजवानों को सज़ा देकर या एक महान आदर्श
के स्वप्न से प्रेरित नवयुवकों को जेलों में ठूँसकर क्या क्रान्ति का अभियान रोका
जा सकता है? हाँ, सामयिक चेतावनी से, बशर्ते कि उसकी उपेक्षा न की जाये,
बहरों को सुनाने के लिए बम का धमाका / 337
लोगों की जानें बचायी जा सकती हैं और व्यर्थ की मुसीबतों से उनकी रक्षा की
जा सकती है। आगाही देने का यह भार अपने ऊपर लेकर हमने अपना कर्त्तव्य
पूरा किया है।
क्या है क्रान्ति?
( भगतसिंह से नीचे की अदालत में पूछा गया था कि क्रान्ति से उन लोगों का क्या
मतलब है? इस प्रश्न के उत्तर में उन्होंने कहा था कि) क्रान्ति के लिए खूनी
लड़ाइयाँ अनिवार्य नहीं हैं और न ही उसमें व्यक्तिगत प्रतिहिंसा के लिए कोई स्थान
है। वह बम और पिस्तौल का सम्प्रदाय नहीं है। क्रान्ति से हमारा अभिप्राय है –
अन्याय पर आधारित मौजूदा समाज-व्यवस्था में आमूल परिवर्तन।
समाज का प्रमुख अंग होते हुए भी आज मज़दूरों को उनके प्राथमिक अधिकार
से वंचित रखा जा रहा है और उनकी गाढ़ी कमाई का सारा धन शोषक पूँजीपति
हड़प जाते हैं। दूसरों के अन्नदाता किसान आज अपने परिवार सहित दाने-दाने के
लिए मुहताज हैं। दुनियाभर के बाज़ारों को कपड़ा मुहैया करने वाला बुनकर अपने
तथा अपने बच्चों के तन ढँकनेभर को भी कपड़ा नहीं पा रहा है। सुन्दर महलों का
निर्माण करने वाले राजगीर, लोहार तथा बढ़ई स्वयं गन्दे बाड़ों में रहकर ही अपनी
जीवन-लीला समाप्त कर जाते हैं। इसके विपरीत समाज के जोंक शोषक पूँजीपति
ज़रा-ज़रा-सी बातों के लिए लाखों का वारा-न्यारा कर देते हैं।
यह भयानक असमानता और ज़बरदस्ती लादा गया भेदभाव दुनिया को एक
बहुत बड़ी उथल-पुथल की ओर लिये जा रहा है। यह स्थिति अधिक दिनों तक
क़ायम नहीं रह सकती। स्पष्ट है कि आज का धनिक समाज एक भयानक
ज्वालामुखी के मुख पर बैठकर रंगरेलियाँ मना रहा है और शोषकों के मासूम बच्चे
तथा करोड़ों शोषित लोग एक भयानक खड्ड की कगार पर चल रहे हैं।
आमूल परिवर्तन की आवश्यकता
सभ्यता का यह प्रासाद यदि समय रहते सँभाला न गया तो शीघ्र ही चरमराकर बैठ
जायेगा। देश को एक आमूल परिवर्तन की आवश्यकता है। और जो लोग इस बात
को महसूस करते हैं उनका कर्त्तव्य है कि साम्यवादी सिद्धान्तों पर समाज का
पुनर्निर्माण करें। जब तक यह नहीं किया जाता और मनुष्य द्वारा मनुष्य का तथा एक
राष्ट्र द्वारा दूसरे राष्ट्र का शोषण, जिसे साम्राज्यवाद कहते हैं, समाप्त नहीं कर दिया
जाता तब तक मानवता को उसके क्लेशों से छुटकारा मिलना असम्भव है, और तब
तक युद्धों को समाप्त कर विश्व-शान्ति के युग का प्रादुर्भाव करने की सारी बातें
महज ढोंग के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं हैं। क्रान्ति से हमारा मतलब अन्ततोगत्वा
एक ऐसी समाज-व्यवस्था की स्थापना से है जो इस प्रकार के संकटों से बरी होगी
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और जिसमें सर्वहारा वर्ग का आधिपत्य सर्वमान्य होगा। और जिसके फलस्वरूप
स्थापित होने वाला विश्व-संघ पीड़ित मानवता को पूँजीवाद के बन्धनों से और
साम्राज्यवादी युद्ध की तबाही से छुटकारा दिलाने में समर्थ हो सकेगा।
सामयिक चेतावनी
यह है हमारा आदर्श। और इसी आदर्श से प्रेरणा लेकर हमने एक सही तथा पुरज़ोर
चेतावनी दी है। लेकिन अगर हमारी इस चेतावनी पर ध्यान नहीं दिया गया और
वर्तमान शासन-व्यवस्था उठती हुई जनशक्ति के मार्ग में रोड़े अटकाने से बाज न
आयी तो क्रान्ति के इस आदर्श की पूर्ति के लिए एक भयंकर युद्ध का छिड़ना
अनिवार्य है। सभी बाधाओं को रौंदकर आगे बढ़ते हुए उस युद्ध के फलस्वरूप
सर्वहारा वर्ग के अधिनायकतन्त्र की स्थापना होगी। यह अधिनायकतन्त्र क्रान्ति के
आदर्शों की पूर्ति के लिए मार्ग प्रशस्त करेगा। क्रान्ति मानवजाति का जन्मजात
अधिकार है जिसका अपहरण नहीं किया जा सकता। स्वतन्त्रता प्रत्येक मनुष्य का
जन्मसिद्ध अधिकार है। श्रमिक वर्ग ही समाज का वास्तविक पोषक है, जनता की
सर्वोपरि सत्ता की स्थापना श्रमिक वर्ग का अन्तिम लक्ष्य है। इन आदर्शों के लिए
और इस विश्वास के लिए हमें जो भी दण्ड दिया जायेगा, हम उसका सहर्ष स्वागत
करेंगे। क्रान्ति की इस पूजा-वेदी पर हम अपना यौवन नैवेद्य के रूप में लाये हैं,
क्योंकि ऐसे महान आदर्श के लिए बड़े से बड़ा त्याग भी कम है। हम सन्तुष्ट हैं
और क्रान्ति के आगमन की उत्सुकतापूर्वक प्रतीक्षा कर रहे हैं।
(6 जून, 1929) इन्क़लाब ज़िन्दाबाद!
बहरों को सुनाने के लिए बम का धमाका / 339
बमकाण्ड पर हाईकोर्ट में बयान
दिल्ली के सेशन जज ने असेम्बली बम केस में भगतसिंह को आजीवन
कारावास का दण्ड दिया था। लाहौर हाईकोर्ट में उसकी अपील की गयी। दिल्ली
अदालत के निर्णय की आलोचना करते हुए भगतसिंह ने हाईकोर्ट में यह दूसरा बयान
दिया।
हमारे उद्देश्य पर ध्यान दें
माई लॉर्ड,
हम न वकील हैं, न अंग्रेज़ी विशेषज्ञ हैं और न हमारे पास डिग्रियाँ ही हैं,
इसलिए हमसे शानदार भाषणों की आशा न की जाये। हमारी प्रार्थना है कि हमारे
बयान की भाषा-सम्बन्धी त्रुटियों पर ध्यान न देते हुए, उसके वास्तविक अर्थ को
समझने का प्रयत्न किया जाये। दूसरे तमाम नुक्तों को अपने वकीलों पर छोड़ते
हुए मैं स्वयं एक मुद्दे पर अपने विचार प्रकट करूँगा। यह मुद्दा इस मुक़दमे में
बहुत महत्त्वपूर्ण है। मुद्दा यह है कि हमारी नीयत क्या थी और हम किस हद तक
अपराधी हैं।
यह बड़ा पेचीदा मामला है, इसलिए कोई व्यक्ति भी आपकी सेवा में
विचारों के विकास की वह ऊँचाई प्रस्तुत नहीं कर सकता, जिसके प्रभाव में हम
एक ख़ास ढंग से सोचने और व्यवहार करने लगे थे। हम चाहते हैं कि इसे दृष्टि
में रखते हुए ही हमारी नीयत और अपराध का अनुमान लगाया जाये। प्रसिद्ध
क़ानून-विशारद सालोमन के अनुसार किसी भी व्यक्ति को उसके अपराधी
आचरण के लिए उस समय तक सज़ा नहीं मिलनी चाहिए, जब तक उसका
उद्देश्य क़ानून-विरोधी सिद्ध न हो।
सेशन जज की अदालत में हमने जो लिखित बयान दिया था, वह हमारे
उद्देश्य की व्याख्या भी करता है और उस रूप में हमारी नीयत की व्याख्या करता
था, लेकिन सेशन जज महोदय ने क़लम की एक ही नोक से यह कहकर कि
“आमतौर पर अपराध को व्यवहार में लाने वाली बात क़ानून के कार्य को प्रभावित
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नहीं करती और इस देश में क़ानूनी व्याख्याओं में कभी-कभार उद्देश्य और नीयत
की चर्चा होती है", हमारी सब कोशिशें बेकार कर दीं।
माई लॉर्ड, इन परिस्थितियों में सुयोग्य सेशन जज के लिए उचित होता कि
या तो अपराध का अनुमान परिणाम से लगाते या हमारे बयान की मदद से
मनोवैज्ञानिक पहलू का फ़ैसला करते, पर उन्होंने इन दोनों में से एक भी काम
नहीं किया।
विचारणीय बात यह है कि असेम्बली में हमने जो दो बम फेंके, उनसे
किसी भी व्यक्ति की शारीरिक या आर्थिक हानि नहीं हुई। इस दृष्टिकोण से हमें
जो सज़ा दी गयी है वह कठोरतम ही नहीं, बदला लेने की भावना वाली भी है।
यदि दूसरे दृष्टिकोण से देखा जाये तो जब तक अभियुक्त की मनोभावना का
पता न लगाया जाये, उसके असली उद्देश्य का पता ही नहीं चल सकता। यदि
उद्देश्य को पूरी तरह भुला दिया जाये तो किसी भी व्यक्ति के साथ न्याय नहीं हो
सकता, क्योंकि उद्देश्य को नज़रों में न रखने पर संसार के बड़े-बड़े सेनापति
साधारण हत्यारे नज़र आयेंगे, सरकारी कर वसूल करने वाले अधिकारी चोर,
जालसाज दिखायी देंगे और न्यायाधीशों पर भी क़त्ल करने का अभियोग लगेगा।
इस तरह तो समाज-व्यवस्था और सभ्यता ख़ूनखराबा, चोरी और जालसाजी
बनकर रह जायेगी। यदि उद्देश्य की उपेक्षा की जाये, तो किसी हुकूमत को क्या
अधिकार है कि समाज के व्यक्तियों से न्याय करने को कहे? उद्देश्य की उपेक्षा
की जाये तो हर धर्मप्रचारक झूठ का प्रचारक दिखायी देगा और हरेक पैग़म्बर पर
अभियोग लगेगा कि उसने करोड़ों भोले और अनजान लोगों को गुमराह किया।
यदि उद्देश्य को भुला दिया जाये तो हज़रत ईसा मसीह गड़बड़ कराने वाले,
शान्ति भंग करने वाले और विद्रोह का प्रचार करने वाले दिखायी देंगे और क़ानून
के शब्दों में 'ख़तरनाक व्यक्तित्व' माने जायेंगे, लेकिन हम उनकी पूजा करते हैं,
उनके लिए हमारे दिलों में बेहद आदर है, उनकी मूर्ति हमारे दिलों में
आध्यात्मिकता का स्पन्दन पैदा करती है। यह क्यों? यह इसलिए कि उनके
प्रयत्नों का प्रेरक एक ऊँचे दरजे का उद्देश्य था। उस युग के शासकों ने उनके
उद्देश्य को नहीं पहचाना, उन्होंने उनके बाहरी व्यवहार को ही देखा, लेकिन उस
समय से लेकर इस समय तक उन्नीस शताब्दियाँ बीत चुकी हैं, क्या हमने तब
से लेकर अब तक कोई तरक़्क़ी नहीं की? क्या हम ऐसी गलतियाँ दोहरायेंगे?
अगर ऐसा हो तो मानना पड़ेगा कि इन्सानियत की कुर्बानियाँ, बड़े शहीदों के
प्रयत्न बेकार रहे और आज भी हम उसी स्थान पर हैं, जहाँ आज से बीस
शताब्दी पहले थे?
क़ानूनी दृष्टि से उद्देश्य का प्रश्न ख़ास महत्त्व रखता है। जनरल डायर का
उदाहरण लीजिये। उसने गोली चलायी और सैकड़ों निरपराध और शस्त्रहीन
बहरों को सुनाने के लिए बम का धमाका / 341