भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates
शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
पृष्ठ 344, कुल 788 में से
संदर्भ में पढ़ेंलोगों की जानें बचायी जा सकती हैं और व्यर्थ की मुसीबतों से उनकी रक्षा की
जा सकती है। आगाही देने का यह भार अपने ऊपर लेकर हमने अपना कर्त्तव्य
पूरा किया है।
क्या है क्रान्ति?
( भगतसिंह से नीचे की अदालत में पूछा गया था कि क्रान्ति से उन लोगों का क्या
मतलब है? इस प्रश्न के उत्तर में उन्होंने कहा था कि) क्रान्ति के लिए खूनी
लड़ाइयाँ अनिवार्य नहीं हैं और न ही उसमें व्यक्तिगत प्रतिहिंसा के लिए कोई स्थान
है। वह बम और पिस्तौल का सम्प्रदाय नहीं है। क्रान्ति से हमारा अभिप्राय है –
अन्याय पर आधारित मौजूदा समाज-व्यवस्था में आमूल परिवर्तन।
समाज का प्रमुख अंग होते हुए भी आज मज़दूरों को उनके प्राथमिक अधिकार
से वंचित रखा जा रहा है और उनकी गाढ़ी कमाई का सारा धन शोषक पूँजीपति
हड़प जाते हैं। दूसरों के अन्नदाता किसान आज अपने परिवार सहित दाने-दाने के
लिए मुहताज हैं। दुनियाभर के बाज़ारों को कपड़ा मुहैया करने वाला बुनकर अपने
तथा अपने बच्चों के तन ढँकनेभर को भी कपड़ा नहीं पा रहा है। सुन्दर महलों का
निर्माण करने वाले राजगीर, लोहार तथा बढ़ई स्वयं गन्दे बाड़ों में रहकर ही अपनी
जीवन-लीला समाप्त कर जाते हैं। इसके विपरीत समाज के जोंक शोषक पूँजीपति
ज़रा-ज़रा-सी बातों के लिए लाखों का वारा-न्यारा कर देते हैं।
यह भयानक असमानता और ज़बरदस्ती लादा गया भेदभाव दुनिया को एक
बहुत बड़ी उथल-पुथल की ओर लिये जा रहा है। यह स्थिति अधिक दिनों तक
क़ायम नहीं रह सकती। स्पष्ट है कि आज का धनिक समाज एक भयानक
ज्वालामुखी के मुख पर बैठकर रंगरेलियाँ मना रहा है और शोषकों के मासूम बच्चे
तथा करोड़ों शोषित लोग एक भयानक खड्ड की कगार पर चल रहे हैं।
आमूल परिवर्तन की आवश्यकता
सभ्यता का यह प्रासाद यदि समय रहते सँभाला न गया तो शीघ्र ही चरमराकर बैठ
जायेगा। देश को एक आमूल परिवर्तन की आवश्यकता है। और जो लोग इस बात
को महसूस करते हैं उनका कर्त्तव्य है कि साम्यवादी सिद्धान्तों पर समाज का
पुनर्निर्माण करें। जब तक यह नहीं किया जाता और मनुष्य द्वारा मनुष्य का तथा एक
राष्ट्र द्वारा दूसरे राष्ट्र का शोषण, जिसे साम्राज्यवाद कहते हैं, समाप्त नहीं कर दिया
जाता तब तक मानवता को उसके क्लेशों से छुटकारा मिलना असम्भव है, और तब
तक युद्धों को समाप्त कर विश्व-शान्ति के युग का प्रादुर्भाव करने की सारी बातें
महज ढोंग के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं हैं। क्रान्ति से हमारा मतलब अन्ततोगत्वा
एक ऐसी समाज-व्यवस्था की स्थापना से है जो इस प्रकार के संकटों से बरी होगी
338 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़