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आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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॥ श्री गणेशाय नमः ॥
अथ आल्हखण्ड ॥
बेलाकेसतीहोनेकेसमयकायुद्धवर्णन ॥
सवैया ॥
भक्तन हेतु सबयं तनुधारि सदा बिपदा सुरसाधुहरी ।
हिरणाकश्यप दुःख दियउ तब रूपकियो नरसिंह हरी ॥
प्रह्लाद विभीषण औ हनुमान महानन में इन रेखपरी ।
अँवरीष औ अंगद की समता ललिते जगमें अब कौनकरी १
सुमिरन ॥
तुम्हैं विनायक मैं सुमिरत हौं गणपति गणाध्यक्ष महराज ॥
बिघन हरण लम्बोदर स्वामी पूरणकरो हमारे काज १
हे जगतारण भवभय हारण स्वामी एकदन्त महराज ॥
विपति विदारण सब सुखकारण राखनहार जगतमें लाज २
तुमहीं ब्रह्मा औ विष्णु हौ तुमहीं शम्भु सुरासुर काल ॥
तुम्हीं गोसइयाँ दीनबन्धु हौ स्वामी शिवाशम्भु के बाल ३

२ आल्हखण्ड । ६०६
तुम्हैं मनावैं औ ध्यावैं हम गावैं सदा तुम्हारी गाथ ॥
यह वरपावैं गणनायक जी दर्शन देयँ मोहिं रघुनाथ ४
छूटि सुमिरनी गणनायक कै शाका सुनो शूरमन केर ॥
सत्ती होई बेला रानी ठानी युद्ध पिथौरा फेर ५
अथ कथाप्रसंग ॥
खम्भ आयगे जब चन्दन के बेला करनलागि अनुमान ॥
मोहवा दिल्ली के डाँड़े पर हमरो होय सती अस्थान १
यहै विचारत मन धारत सो आरत हृदय भई अधिकाय ॥
तबलों लाखनि को सँग लैकै आये तहाँ बनाफरराय २
बेला बोली तब ऊदन ते मानो साँच लहुरवाभाय ॥
मोहवा दिल्ली के डाँड़े पर हमरो सरादेउ रचवाय ३
इतना सुनिकै ऊदनठाकुर चन्दन तहाँ दीनपहुँचाय ॥
चारि चहद्दी के डाँड़े पर बेला सरादीन रचवाय ४
कनउज मोहवे की फौजें सब ऊदनतुरत लीन सजवाय ॥
सरा रचायो जहँ बेला का सबदल दीन्ह्यों तहाँ टिकाय ५
जितनी रैयति परिमालिक कै देखन हेतु गई सब आय ॥
बेलारानी त्यहि औसर मा भूषण वसन सजे अधिकाय ६
को गति वरणै तहँ बेला कै षोड़श पूरकीन शृंगार ॥
लाश संगलै चन्देले की सरपर गई सती त्यहिबार ७
गाहरिकारा ह्याँ दिल्ली मा राजै खबरि जनाई जाय ॥
खबरि पायकै पृथीराज ने अपनी फौज लीन सजवाय ८
को गति वरणै त्यहि समया कै मानो इन्द्र अखाड़े जाय ॥
आदिभयङ्कर के ऊपर चढ़ि मनमें शम्भु शिवापद ध्याय ९
चाँड़ा धाँधू वीर भुगन्ता लैकै कूच दीन करवाय ॥

बेलासती अन्तमैदान । ६०७ ३
भारी लश्कर महराजाका गर्जत चला समरको जाय १०
थोड़े अरसा मा महराजा आये सरापास नगच्याय ॥
बाजै बाजा ह्याँ सती के हाहाकार शब्दगा छाय ११
बोला पिथौरा हाथी परते ओ महराज कनौजीराय ॥
बंश चँदेले के जो होवै सो सर देवै आगि लगाय १२
जायँ नगीचे नहिं ऊदन अब हैं अकुलीन बनाफरराय ॥
सुनिकै बातें पृथीराज की बोला तुरत लहुरवाभाय १३
हमै आज्ञा है बेला कै की सरदेवो आगिलगाय ॥
इतना कहिकै उदयसिंह ने दीन्ह्यो चितातुरतदँदकाय १४
यह गति दीख्यो पृथीराजने तुरतै हुक्म दीन फरमाय ॥
जान न पावैं मोहेबे वाले सब के देवो मूंड़ गिराय १५
हुकुम पायकै पृथीराज का चौंड़ा धाँधू उठे रिसाय ॥
बीर भुगन्ता गर्जन लाग्यो मारन लाग तड़ाका धाय १६
सय्यद देवा ऊदन ठाकुर इनहुन खैंचिलीन तलवार ॥
को गति वरणै त्यहि समया कै लागी होन भड़ामड़मार १७
हौदा हौदा यकमिल ह्वैगे घोड़न भिड़ी रानमें रान ॥
पहिया रथ के रथमा भिड़िगे तीरन भिड़िगे तीर्रकमान १८
मर मर मर मर ढालैं बोलैं खन खन तूण बाण चिल्लायँ ॥
सन् सन् सन् सन् गोली बरसें कायर भागैं समर पराय १६
घम् घम् घम् घम् बजैं नगारा मारा मारा परै सुनाय ॥
झलझलझलझलझीलम झलकैं नीलम रंग परै दिखराय २०
चम् चम् चम् चम् तेगा चमकैं दमकैं छुरी कटारी भाय ॥
कोगति वरणै त्यहि समया कै अद्भुत समर कहानाजाय २१
फिरैं भुशुण्डा बिन मुण्डा के रुण्डा करैं खूब तलवार ॥

४ आल्हखण्ड । ६०८
मुण्डन केरे मुड़ धौरा भे औ रुण्डन के लगे पहार २०
मारे मारे तलवारिन के नदिया बही रक्तकी धार ॥
कायर भागे समर भूमि ते अपने डारि डारि हथियार २३
भूरा सय्यद का मुर्चा भा दूनों लड़न लागि सरदार ॥
दूनों मारैं तलवारी सों दूनों लेयँ ढाल पर वार २४
उसरिन उसरिन दूनों खेलैं जैसे कुवाँ भरै पनिहारि ॥
वार चूकिया भूरा जबहीं सय्यद हना तुरत तलवारि २५
मूड़ बिसानी सो भूरा के तुरतै गिरा भरहराखाय ॥
भूरा जूझयो जब खेतन में आयो तुरत भुगन्ता धाय २६
सो ललकारयो फिरि सय्यदको अब रण सावधान है जाय ॥
धोखे भूरा के भूल्यो ना अबहीं यमपुर देउँ दिखाय २७
इतना कहिकै वीर भुगन्ता तुरतै लीन्ह्यो तीर चढ़ाय ॥
खैंचि कमानिया ते मारत भा सय्यद लैगे वार बचाय २८
घोड़ बढ़ायो फिरि सय्यद ने लैकै गुर्ज पहुंच्यो जाय ॥
वीर भुगन्ता को ललकारा क्षत्री खबरदार है जाय २६
वार हमारी ते बचि है ना दोजख अबै देउँ पहुँचाय ॥
इतना कहिकै क्रोधिन हैकै सय्यद मारयो गुर्ज घुमाय ३०
वार बचाई वीर भुगन्ता फिरित्यहिखैंचिली न तलवार ॥
ऐँचि कै मारा वीर भुगन्ता जूझयो बनरस का सरदार ३१
सय्यद जूझयो जब मुर्चा में तब चढ़ि अयो कनौजीराय ॥
गंगा ठाकुर तिन पाछे करि आगे गयो तड़ाकाधाय ३२
वीर भुगन्ता औ गंगा का परिगासमर बरोबरि आय ॥
लखै पिथौरा औ कनौजिया अद्भुतसमर कहा ना जाय ३३
आदिभयङ्कर पर पिरथी है लाखनि भूरी पर असवार ॥

बेलासतीअन्त मैदान। ६०६ ५
तेहा राखे रजपूती का कीन्हे जंग केर श्रृंगार ३४
भाला बरछी दूनों लीन्हे दूनों लिये ढाल तलवार ॥
पाग बैजनी शिरपर धारे कनउज दिल्ही के सरदार ३५
कलँगी सोहैं दोउ पगियन में दोउन हीरा करैं बहार ॥
रूप उजागर सबगुण आगर कनउज दिल्हीके सरदार ३६
तेहेदारी की समता है समता राज काज ब्यवहार ॥
समता वय में नहिं लाखनिकी थोरी उमर केर सरदार ३७
गंगा मामा कुड़हरिवाले तिनते कहा तहाँ ललकार ॥
मारो मारो अब जल्दीते मामा काह लगाई बार ३८
इतना सुनिकै गंगा ठाकुर अपनी खैंचि लीन तलवार ॥
बीरभुगन्ता तब मारत भा गंगा लीन ढालपरवार ३६
ऐंचि सिरोही गंगामारा तुरतै दीन्ह्यो मूड गिराय ॥
वीरभुगन्ता के जूझतखन धाँधू गयो तड़ाकाआय ४०
धाँधू गंगा का मुर्चाभा अद्भुत समर कहा ना जाय ॥
दूनों मारैं तलवारी से दूनों लेवैं वार बचाय ४१
कोऊ काहू ते कमती ना दोउ रण परा बरोबरिआय ॥
वार चूकिगे गंगा ठाकुर धाँधू मारा गुर्ज घुमाय ४२
परिगै मस्तक सो गंगा के तुरतै गिरा भरहरा खाय ॥
गिरिगे गंगा जब हाथी पर तुरतै अटा कनौजीराय ४३
लाखनि धाँधू का मुर्चा भा दोऊ लड़न लागिसरदार ॥
दोऊ मारैं तलवारी सों दोऊ लेयँ ढाल पर वार ४४
कोऊ काहू ते कमती ना दोऊ करैं भड़ाभड़ मार ॥
भौंरानँद पर धाँधू ठाकुर लाखनि भूरी पर असवार ४५
दोउ हौदा यकमिल हैगे दोऊ करैं समर ललकार ॥
११

६ आल्हखण्ड । ६१०
छुरी कटारी भाला बरछी होवै कड़ाबीन की मार ४६
तीर तमंचा गुर्ज चलावैं दोऊ समर शूर त्यहि बार ॥
वार चूकिगे धाँधू ठाकुर मारा कनउज के सरदार ४७
धाँधू जूझ्यो जब मुर्चा में आयो तुरत पिथौगराय ॥
आदिभयङ्करज्यहि दिशिदावै त्यहिदिशिहटतफौजसब जाय ४८
को गति बरणै पृथीराज की नाहर समरथनी चौहान ॥
ज्यहि दिशि दाबै समर भूमिमें त्यहिदिशिहोतजात मैदान ४६
सुफना बोल्यो हाँ लाखनि ते ओ महराज कनौजीराय ॥
आदिभयङ्कर दाबे आवै यहु महराज पिथौराराय ५०
कोऊ सहायक अब तुम्हरो ना स्वामी आप एक यहिकाल ॥
इत उत फिरिकै चहुँदिशि देखा नहिंकोउदेखिपरै महिपाल ५१
करै आतमा की रक्षा नर धन औ स्त्री संग बिहाय ॥
धन सों स्त्री की रक्षा कर यह मर्याद नीति की आय ५२
त्यहिते तुमका समुझाइत है ओ महराज कनौजीराय ॥
इतना सुनिकै लाखनि बोले सुफना काह गये बौराय ५३
कहा न माना चंदेलेका हटका मातु हमारी आय ॥
अब नहिं भागैं हम मुर्चा ते चहु तन धजी २ उड़िजाय ५४
रही न देही रामचन्द्र कै रहिनहिं गये कृष्ण महराज ॥
यशै इकेलै बाकी रहिगा सो कस तजैं समरमें लाज ५५
रही न देही क्यहु मानुष की सबजग नाशवान दिखलाय ॥
त्यहिते हाथी जहँ पिरथी का सुफना चलौ तहाँपर धाय ५६
प्राण निछावरि रण करि देबे तौ यशरही जगत में छाय ॥
जो अब भागैं समर भूमि ते कायर कहैं लोक सबगाय ५७
सुनिकै बातें लखराना की सुफना हाथी दीन बढ़ाय ॥

[Header] बेलासती अन्त मैदान । ६११ ७

आवत देख्यो लखराना को बोल्यो तुरत पिथौराराय ५८
आवो आवो लाखनिराना हमरे संग मिलौ तुम आय ॥
हमरी सरवरि को तुमहीं हौ ओ महराज कनौजीराय ५६
नीच बनाफर उदयसिंह है तासँग काहगयो बौराय ॥
सोलह रानिन के इकलौता नाहक प्राण गँवायो आय ६०
अबै मामिला कछु बिगरा ना मानो कही कनौजीराय ॥
हमै सोच है इक कनउज का की निर्वंश राज है जाय ६१
बृद्ध चँदेले जयचँदराजा मानो कही कनौजीराय ॥
सात पुत्र रण खेतन जूझे हमखोवंश नाश भय आय ६२
अस नहिं चाहें जस हम हैंगे मानो कही कनौजीराय ॥
उमिरि तुम्हारी अतियोरी है कच्ची बुद्धि गयो बौराय ६३
दोष हमारो सब कोउ दैहें बालक हना पिथौराराय ॥
त्यहिते तुमका समुझाइत है कच्ची बुद्धि कनौजीराय ६४
हमरी तुम्हरी कछु अटनस ना जो रण प्राण गँवावो आय ॥
काह बिगारा हम जयचँद का कच्ची बुद्धि कनौजीराय ६५
सुखनहिंदेख्यो कछु दुनियाका नाहक प्राण गँवावो आय ॥
अब नहिंकैहैं कछुलाखनिहम कच्ची बुद्धि कनौजीराय ६६
ताहर नाहर की समता हौ कच्ची बुद्धि गयो बौराय ॥
जो नहिं आवो हमरे दल में तौ अब कूच जाउकरवाय ६७
पारस पैहौ जो दल ऐहौ कनउज गये प्राण रहिजायँ ॥
इतना सुनिकै लाखनि बोले मानो कही पिथौराराय ६८
तुम्हरी बातें सब साँची हैं सो हम जानि दीन विमराय ॥
पै अब बदला संयोगिनि का लेबे समर भूमि में आय ६६
यामें संशय कछु नाहीं है मानो साँच पिथौराराय ॥

८ आल्हखण्ड । ६१२
घर घर दिल्ली को लुटवैबै तब छाती का डाह बुताय ७०
इतना कहिकै लाखनिराना तुरतै लीन्यो तीर उठाय ॥
खैंचि कमनियांते छाँड़त भे गौरा पारवती को ध्याय ७१
आवत दीख्यो शर लाखनिको राजा काटि तड़ाका दीन ॥
बड़े क्रोधसों पृथ्वीराजा दूसर बाण हाथमें लीन ७२
शर संधान्यो बड़े वेगसों मार्यो तुरत पिथौराराय ॥
खण्डन कीन्ह्यो त्यहि लखराना आपो मार्यो तीर चलाय ७३
ताहि पिथौरा खण्डन करिकै यकइस मारे बाण रिसाय ॥
तिनको खण्डन लाखनिकीन्ह्यो राजा गये मनै शर्माय ७४
यहु महराजा कनउज वाला आला वंश चंदेलाराय ॥
धेला एको ज्यहि डर नाहीं हाथिन हेला दीन गिराय ७५
बड़ बड़ मेला रजपूतन के रणमा लाखनि दीन हटाय ॥
फूल चमेला औ बेला जस तस अलबेला कनौजीराय ७६
उठै सुगंधै जस बेला में तस यशगयो जगतमें छाय ॥
बाण लागि गा लखराना के हौदा उपर गये मुरझाय ७७
जूझि कनौजी गे खेतन में सुमिरिकै मित्र बनाफरराय ॥
कड़कै धड़कै औ फड़कै अति मेचा आसमान थहराय ७८
प्रलयकाल की बेला आई जब मरिगये कनौजीराय ॥
ऐसे अशकुन के देखत खन ऊदन गये सनाकाखाय ७६
चित्त न लागै कछु मुर्चा में व्याकुल सुमिरि कनौजीराय॥
यहां चौंडिया धरि धरि धमकै ऊदन लेवैं वार बचाय ८०
हाथ चौंड़िया पर छाँड़ै ना ब्याकुल चित्त रहे अकुलाय ॥
तहिले धावन इक चौंड़ाते लाखनि हाल बतावाआय ८१
सुना बनाफर उदयसिंह यह की मरिगये कनौजीराय ॥

बेलासती अन्त मैदान । ६१३
ऊदन बोले तब चौंड़ा ते मानो कही चौंड़ियाराय ८२
मरिगे लाखनि जो मोर्चा में तौ नहिं जियैं बनाफरराय ॥
बिना इकेले लखराना के मरिहैं कौन साथक्यहि आय ८३
मित्र कनौजी अस मरिगे जब जीहै कौन समर तब भाय ॥
मारु चौंड़िया अब जल्दी सों हमरो शोक मोख मिटिजाय ८४
इतना कहिकै उदयसिंह ने तुरतैं खैंचिलीन तलवार ॥
ऐंड़ लगावा रसबेंदुल के हौदा उपर गयो त्यहिवार ८५
काटि महावत औ हाथी को आपन शीश दीन पकराय ॥
काटि शीश तब चौंड़ा लीन्ह्यो औ धड़ गिरा धरणिमें आय ८६
ऊदन देवा जगनायक जी सब कोउ मरे समर में आय ॥
चौंड़ा पिरथी आल्हा इन्द्दल रहिगे शेष चारि ये भाय ८७
ऊदन जूझे समरभूमि में आल्हा चले तड़ाका धाय ॥
देवी शारदा का वरदानी अम्मर कहै लोक सब गाय ८८
सुना बनाफर जब कानन ते की मरिगये लहुरवा भाय ॥
पकरि बनाफर तब चौंड़ा को मर्दन कीन देह में लाय ८६
मींजि माँजिकै त्यहि चौंड़ाको आगे हाथी दीन बढ़ाय ॥
आदिभयङ्कर जहँ ठाढ़ो थो आल्हा तहाँ पहूंचे जाय ६०
पकरिकै बाहू तहँ पिरथी की आल्हा बाँधिलीनत्यहिठायँ ॥
नील डरायो नृप आँखिन में बंधन तुरत दीन छुड़वाय ६१
खबरि मोहोबे औ दिल्ली गै की रण बचे तीन जन भाय ॥
आल्हा इन्द्दल पिरथी राजा और न चौथकउदिखलाय ६२
सुनवाँ फुलवा द्यावलि माता सुनतै चलीं तड़ाकाधाय ॥
सुनवाँ बोली समर भूमि में आल्हा डार्यो बन्धु मराय ६३
आल्हा मुखते सुनि सुनवाँ के मनमा ठीक लीन ठहराय ॥

१० आल्हखण्ड । ६१४
धर्म न रहै क्यहु कलियुगमा सब बिन धर्म जगतह्वैजाय ६४
यहै सोचिकै आल्हा ठाकुर इन्दल बोले बचन सुनाय ॥
माता तुम्हरी नाम हमारो लीन्ह्यो सुनो बनाफरराय ६५
दुर्गति होई अब कलियुग मा ताते देयँ पूत बतलाय ॥
करो तयारी बन कजरी की अपनो मया मोह बिसराय ६६
इतना कहिकै आल्हा ठाकुर हाथी चढ़े तड़ाका धाय ॥
इन्दल बैठे फिरि घोड़े पर साथै कूच दीन करवाय ६७
इन्दल इन्दल कै गुहरायो सुनवाँ चली पछारी धाय ॥
पूँछ पकरिकै पचशब्दा कै सुनवाँ गजैघसीटतिजाय ६८
ऐंचि खड्ग को आल्हा ठाकुर तुरतै दीन्ह्यो पूँछ गिराय ॥
बिना पूँछ का पचशब्दा फिरि कजरी बनै पहूँचा जाय ६६
रही न आशा क्यहु जीवनकी सबहिन दीन्ही देहजराय ॥
प्राण आपने नारी तजि कै सुरपुर गईं तड़ाका धाय १००
सुनवाँ फुलवा चित्तररेखा व्यावुलिसहित मरींसबआय ॥
मोहबा दिल्ली दुउ शहरन में राँड़न झुंडभये अधिकाय १०१
छाय उदासी गै दोऊ दिशि बिपदा कही बूत ना जाय ॥
रानी मल्हना मोहबे वाली मनमासोचिसोचिरहिजाय १०२
तुम्हें विधाता अस चाही ना जैसी बिपति दीन अधिकाय ॥
दुःखित ह्वैकै महरानी फिरि पारस पत्थर लीन उठाय १०३
जाय सिरायो सो सागर में चन्दन अक्षत फूल चढ़ाय ॥
धूप दीप औ कीन आरती मेवा मिश्री भोग लगाय १०४
हवन ब्राह्मण को भोजन दै बोली हाथ जोरि शिरनाय ॥
जो कोउ राजा हो मोहवे में पारस रह्यो तासु घरआय १०५
इतना कहिकै रानी मल्हना महलन फेरि पहूँची आय ॥

बेलासती अन्तमैदान । ६१५ ११
ग्यारह लंघन परिमालिक करि सुरपुर गये तड़ाका धाय १०६
सत्ती हैंकै रानी मल्हना अपनो दीन्ह्यो प्राण गँवाय ॥
मोहबा दिल्ली औ कनउज में मानों गिरी गाजअरराय १०७
बने चबूतरा बहु सत्तिन के ठौरन ठौरन परैं दिखाय ॥
बड़ बड़ राजन की महरानी रणमाखाकबटौरेनि आय १०८
बचे बचाये महभारत के यामें बंश अस्त भै भाय ॥
जेठ चतुर्दशि वनइस छप्पन अवलों सुदी पक्ष दर्शाय १०६
ललिते आल्हा को पूरण करि पूरणमासी चहँ अन्ह्याय ॥
पै यह वादा है कलियुग का सोनहिं ठीकठाक ठहराय ११०
आशिर्बाद देउँ मुंशी सुत जीवो प्रागनरायण भाय ॥
हुकुम तुम्हारो जो पावत ना ललितेकहतकथाकसगाय १११
रहै समुन्दर में जबलों जल जबलों रहैं चन्द औ सूर ॥
मालिक ललिते के तबलों तुम यशसों रहौ सदा भरपूर ११२
माथ नवायौं पितु माता को जिनबल पूरी भई यह गाथ ॥
मालिक स्वामी अरुसरबस तुम जगमें एक रामरघुनाथ ११३
कृपा न करतेउ रघुनन्दन जो तौ यह पूरी करत को गाथ ॥
माता पितुमा सचराचर में ब्यापकतूम्हीरामरघुनाथ ११४
तुम्ही रखैया हौ दुर्बल के स्वामी रामचन्द्र महराज ॥
कृपा तुम्हारी जब जस होती तबतस होत जगतमें राज ११५
अब महरानी सुखदानी जो हमरी माननीय शिरताज ॥
सब गुणखानी विक्टोरिया रानी राखैं सदा जगत में लाज ११६
जिन बल छाजत बल हमरो है राजन राजनीति नितराज ॥
जोनहिं अनुचित चल दुनिया में तौनहिंहोय सजाय हिराज ११७
अब महरानी सब सुखदानी युग युग अटल करैं यह राज ॥

१२ आल्हखण्ड । ६१६
जो नहिं अनुचितकरुदुनिया में तौनहिंहोयसजायहिराज ११८
इन रजधानी में रहिकै मैं कबहुँनकष्ट सहा क्यहुकाल ॥
पिता पितामह औ मोसंयुत कबहुँनपर्यनबिपतिकेजाल ११९
चोर छिनारन बदगासन की पिंडुरी थहर थहर थर्थायँ ॥
मोढ़ा टेवै सज्जन बैठे नहिंकहुँमसातलकभन्नाय १२०
यह सब गावत हैं सज्जन मन नित प्रति बना रहे यह-राज ॥
जीवैं रानी महरानी ई जिनवलसुजनसुखीसवसाज १२१
इनअसिमाता अब मिलिहैं ना यह मन नित्त लीन ठहराय ॥
मिलैं प्रबन्धौ असकर्त्ता ना जसकछुआजकाल्हादिखलायँ १२२
यहौ कथा अब पूरण करिकै ललिते करत मंगलाचार ॥
करों वन्दना मैं तुलसी की हुलसीजासु काव्यसंसार १२३
ज्यहि अवलोकन के करतैखन मनके छूटि जात सब ताप ॥
सोई प्यारी तुलसी गाथा ललितेकीनबहुतदिनजाप १२४
खेत छूटिगा दिननायक सों झण्डा गड़ा निशाको आय ॥
तारागण सब चमकन लागे सन्तनधुनी दीन परचाय १२५
पूरि तरंग यहाँ सों ह्वैहै तब पद सुमिरि भवानीकन्त ॥
राम रमा मिलि दर्शन देवैं इच्छायही मोरिभगवन्त १२६
इति श्रीलखनऊनवासि(सी,आई,ई)मुंशीनवलकिशोरात्मज बाबूप्रयागनारायण
जीकी आज्ञानुसार उन्नामप्रदेशान्तर्गत पँड़रीकलांनिवासि मिश्र
वंशोद्भव बुध कृपाशंकरसूनु पण्डितललिताप्रसादकृत वेलासती
व्याख्यावर्णनोनामप्रथमस्तरंगः १ ॥
वेलासती अर्थात सर्वआल्हखण्डसमाप्तशुभमस्तु ॥
इति ॥

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