आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबेलासती अन्तमैदान । ६१५ ११
ग्यारह लंघन परिमालिक करि सुरपुर गये तड़ाका धाय १०६
सत्ती हैंकै रानी मल्हना अपनो दीन्ह्यो प्राण गँवाय ॥
मोहबा दिल्ली औ कनउज में मानों गिरी गाजअरराय १०७
बने चबूतरा बहु सत्तिन के ठौरन ठौरन परैं दिखाय ॥
बड़ बड़ राजन की महरानी रणमाखाकबटौरेनि आय १०८
बचे बचाये महभारत के यामें बंश अस्त भै भाय ॥
जेठ चतुर्दशि वनइस छप्पन अवलों सुदी पक्ष दर्शाय १०६
ललिते आल्हा को पूरण करि पूरणमासी चहँ अन्ह्याय ॥
पै यह वादा है कलियुग का सोनहिं ठीकठाक ठहराय ११०
आशिर्बाद देउँ मुंशी सुत जीवो प्रागनरायण भाय ॥
हुकुम तुम्हारो जो पावत ना ललितेकहतकथाकसगाय १११
रहै समुन्दर में जबलों जल जबलों रहैं चन्द औ सूर ॥
मालिक ललिते के तबलों तुम यशसों रहौ सदा भरपूर ११२
माथ नवायौं पितु माता को जिनबल पूरी भई यह गाथ ॥
मालिक स्वामी अरुसरबस तुम जगमें एक रामरघुनाथ ११३
कृपा न करतेउ रघुनन्दन जो तौ यह पूरी करत को गाथ ॥
माता पितुमा सचराचर में ब्यापकतूम्हीरामरघुनाथ ११४
तुम्ही रखैया हौ दुर्बल के स्वामी रामचन्द्र महराज ॥
कृपा तुम्हारी जब जस होती तबतस होत जगतमें राज ११५
अब महरानी सुखदानी जो हमरी माननीय शिरताज ॥
सब गुणखानी विक्टोरिया रानी राखैं सदा जगत में लाज ११६
जिन बल छाजत बल हमरो है राजन राजनीति नितराज ॥
जोनहिं अनुचित चल दुनिया में तौनहिंहोय सजाय हिराज ११७
अब महरानी सब सुखदानी युग युग अटल करैं यह राज ॥