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आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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पृष्ठ 615

१० आल्हखण्ड । ६१४
धर्म न रहै क्यहु कलियुगमा सब बिन धर्म जगतह्वैजाय ६४
यहै सोचिकै आल्हा ठाकुर इन्दल बोले बचन सुनाय ॥
माता तुम्हरी नाम हमारो लीन्ह्यो सुनो बनाफरराय ६५
दुर्गति होई अब कलियुग मा ताते देयँ पूत बतलाय ॥
करो तयारी बन कजरी की अपनो मया मोह बिसराय ६६
इतना कहिकै आल्हा ठाकुर हाथी चढ़े तड़ाका धाय ॥
इन्दल बैठे फिरि घोड़े पर साथै कूच दीन करवाय ६७
इन्दल इन्दल कै गुहरायो सुनवाँ चली पछारी धाय ॥
पूँछ पकरिकै पचशब्दा कै सुनवाँ गजैघसीटतिजाय ६८
ऐंचि खड्ग को आल्हा ठाकुर तुरतै दीन्ह्यो पूँछ गिराय ॥
बिना पूँछ का पचशब्दा फिरि कजरी बनै पहूँचा जाय ६६
रही न आशा क्यहु जीवनकी सबहिन दीन्ही देहजराय ॥
प्राण आपने नारी तजि कै सुरपुर गईं तड़ाका धाय १००
सुनवाँ फुलवा चित्तररेखा व्यावुलिसहित मरींसबआय ॥
मोहबा दिल्ली दुउ शहरन में राँड़न झुंडभये अधिकाय १०१
छाय उदासी गै दोऊ दिशि बिपदा कही बूत ना जाय ॥
रानी मल्हना मोहबे वाली मनमासोचिसोचिरहिजाय १०२
तुम्हें विधाता अस चाही ना जैसी बिपति दीन अधिकाय ॥
दुःखित ह्वैकै महरानी फिरि पारस पत्थर लीन उठाय १०३
जाय सिरायो सो सागर में चन्दन अक्षत फूल चढ़ाय ॥
धूप दीप औ कीन आरती मेवा मिश्री भोग लगाय १०४
हवन ब्राह्मण को भोजन दै बोली हाथ जोरि शिरनाय ॥
जो कोउ राजा हो मोहवे में पारस रह्यो तासु घरआय १०५
इतना कहिकै रानी मल्हना महलन फेरि पहूँची आय ॥