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आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

आल्हानिकासी । ३५६
बाजे डंका अदहंतंका के हाहाकार शब्दगा छाय ५८
आगे आल्हा हैं पपिहापर ऊदन बेंदुलपर असवार ॥
हंसामनि घोड़े के ऊपर इन्दल आल्हाकेर कुमार ५९
आय कै पहुँचे सब मोहबे में मल्हना महल पहुँचे जाय ॥
बड़ी खुशाली सों महरानी आदरभावकीन अधिकाय ६०
खबरि पायकै सब रानी फिरि मल्हना महल पहुँचीं आय ॥
रोवनलागीं सब रानी तहँ दारुण बिपतिकहीना जाय६१
मल्हनाबोली फिरि आल्हा ते साँची सुनो बनाफरराय ॥
तुम्हें मुनासिब यह नाहीं है जो अब कूचदेउ करवाय ६२
घाटि न जाना हम ब्रह्मासों चारो आय बनाफरराय ॥
कहा न मानो अब काहूको बैठो धाम आपने जाय ६३
इतना सुनिकै ऊदन बोले दोऊ हाथ जोरि शिरनाय ॥
अब नहिं रहिबे हम मोहबे माँ माता साँचदीन बतलाय ६४
गऊरक्त सम जलको जानै भोजन गऊमाँस सममान ॥
करै मेहरिया कै संगति जो होवै बहिनी संगसमान ६५
ऐसी बातें महराजा की माता काहगई बौराय ॥
जो हम बिलमैं अब मोहबेमाँ तौ सब क्षत्री धर्म नशाय ६६
तुम्हें मुनासिब यह नाहीं है राखो हमें फेरि जो माय ॥
दर्शन द्वैगे सब मातन के अब हम कूच द्यहूँ करवाय६७
इतना कहिकै ऊदन ठाकुर डोला तुरत लीन मँगवाय ॥
औ ललकारा फिरि माता का अब तुम कूच देउ करवाय ६८
सुनि सुनि बातें उदयसिंह की मल्हना बार बार पछिताय ॥
तुरतै धावन को बुलवायो सिरसागढ़ै दीन पठवाय ६९
लागि कचहरी मलखाने कै धावन वहाँ पहुँचा जाय ॥

कही हकीकति सब आल्हाकी धावन हाथ जोरि शिर नाय ७०
सुनिकै बातें धावन मुख की मलखे घोड़ी लीन मँगाय ॥
मल्हना केरे फिरि महलन ते आल्हा कूच दीन करवाय ७१
बाजे डंका अहतंका के कनउज चले बनाफरराय ॥
ब्याकुल रैयत भै गोहबे कै काहू धीर धरा ना जाय ७२
भोजन कीन्ह्यो कोउ तादिनना सोवन रात दीन बिसराय ॥
जहँ तहँ गाथा बघऊदन की घर घर रहे नारिनर गाय ७३
चढ़ा कबूतरी पर मलखाने मारग मिला तुरतही आय ॥
कुशल पूँछिकै आल्हा ठाकुर आपनिकुशलदीन बतलाय ७४
जो कछु भाषा परिमालिक ने आल्हा सत्य सत्य गे गाय ॥
मलखे बोले तब आल्हा ते दोऊ हाथ जोरि शिरनाय ७५
चलिकै रहिये तुम सिरसा में करिहै काह चँदेलोराय ॥
इतना सुनिकै ऊदन बोले दादा साँच देयँ बतलाय ७६
अब नहिं टिकिहैं हम सिरसा में चहु तुम कोटिनकरो उपाय ॥
राज्य छोड़िकै परिमालिक की जयचँद पुरी जायँ हम भाय ७७
जब सुधिआवै नृप बातन कै तब मन पीर होय अधिकाय ॥
बात के मारे जो मरिहै ना मरिहै काह लात के घाय ७८
आज तो घोड़ा पिरथी मांगा काल्हिको तिरिया लेत मँगाय ॥
यहु मर्दाना को बाना ना आपन घोड़ देयँ पठवाय ७६
इतना सुनिकै मलखे बोले मानो कही बनाफरराय ॥
सयन चिरैया ना घर छोड़ै नाव निजराव निजको जाय ८०
अस गति नाहीं है पिरथी की तुम्हरे घोड़ लेयँ मँगवाय ॥
इतना सुनिकै आल्हा ठाकुर बोले फेरि बचन समुझाय ८१
लिखी विधाता की मिटिहैना सिरसा लौटिजाउ मलखान ॥

आल्हानिकासी । ३६१ ६
काह हकीकतिहै मानुष के सुख दुख देनहार भगवान ८२
बातें सुनिकै ये आल्हा की मलखे ठीक लीन ठहराय ॥
क्यहु समुझायेते मनिहैं ना आल्हाउदयसिंह दोउ भाय ८३
मिला भेंट करि सब काहू सों मलखे कूच दीन करवाय ॥
जायकै पहुंचे सिरसागढ़ में महलन खबरि बताई जाय ८४
नदी बेतवा को उतरत भे दूनों भाय बनाफरराय ॥
ढाई दिनके फिरि अर्सा में झावर गये बनाफर आय ८५
बिजुली चमकै कउँधा लपकै कहुँ कहुँ मेघ रहे गहराय ॥
मेढ़ुक बोलैं चौगिर्दा ते वीछी साँपनकी अधिकाय ८६
नचैं मुरैला कहुँ जंगल में झींगुर कहुं करैं झनकार ॥
किह्यो बसेरा तटयमुना के नाहर उदयसिंह त्यहिबार ८७
बनी रसोई रजपूतन की सबहिन जेंव लीन ज्यौनार ॥
भोर भुरहरे मुर्गा बोलत उतरे घाट कालपी क्यार ८८
तहँते चलिकै परडुल पहुंचे दूनों भाय बनाफरराय ॥
दिना द्वैक रहि त्यहि थान में तहँते कूच दीन करवाय ८९
जायकै पहुँचे अस .... में जहँ पानीको कष्टाय ॥
इन्दल बेंदुल दोउ प्यासे भे इनके ..... । ११०
रहा न बीरा तहँ पानन का जो बनाफरराय ॥
ताकि व्यविरया इन्दल बेंदुल पानी .... ल्हुरवाभाय ११५
आधा पानी आधी माटी जाब तिन्हैं लीन लुटवाय ॥
हाय मुसीबत अस परिगैहै सेहुको अन्नदीन छिरकाय ११६
सुनवाँ रोई त्यहि समया में बुताफलहू दीन चलाय ॥
फाटै छाती नहिं द्यावलि कै चिं वापू रहे मचाय ११७
आल्हा सोचैं त्यहि समया में ऊदन छप्पर दीन गिराइ ॥

यहाँ पृष्ठ का पंक्ति-दर-पंक्ति लिप्यंतरण प्रस्तुत है:

१२ आल्हखण्ड । ३६४
तेलि तँबोली कलवारन की दुर्गति भई तहांपर आय ११८
लैलै टेंटुवा बनियां चलिभे मनमें बार बार पछिताय ॥
हाय रुपैया बैरी द्वैगा ह्वाँ अबगई प्राणपर आय ११६
भा खलभल्ला औ हल्ला अति पहुंचे बहुत राज दरबार ॥
रोय रोयकै बनियाँ बोलै राजन मानो कही हमार १२०
अजयपाल औ रतीभान भे एकते एक शूर सरदार ॥
ऐसि दुर्दशा भै कबहूंना जैसी भई आय यहिवार १२१
ऊदन आये मोहबे वाले तिन सब लीन बजारलुटाय ॥
इतना सुनिकै जयचँद राजा लाखनिरानालीनबुलाय १२२
कहि समुझावा लखराना को तोपन आगिदेउ लगवाये ॥
सुनिकै बातें महराजा की लाखनिचला शीशकोनाय १२३
सवैया ॥
चर्खन में सब तोप चढ़ाय औ फौज तयार कियो लखराना ।
बाजत डंक निशंक तहाँ औ यथा घन सावन को गहराना ॥
विज्जु छटासों कटा करवे कहँ चमकत खड्ग तहाँ मरदाना ।
मौहर बाजत हाव किये लखिते यह भाव न जात बखाना १२४
भई तयारी समरभूमि की छत्रिनबांधि लीन हथियार ॥
मीराताल्हन बनरस वाला पहुंचा तबै राजदरबार १२५
किह्यो बन्दगी महराजा को औ यह हाल कह्योसमुझाय ॥
गरि मचायो नहिं कनउज में आल्हाऊदन लेउ बसाय १२६
मोर्चा फेरा इन पिरथी त द्वारे हाथी दीन पछार ॥
बड़े लड़ैया द्यावलिवाले इनसे हारि गई तलवार १२७
जयचंद बोले तब सय्यद ते नाहर बनरस के सरदार ॥

[Header] आल्हानिकासी। ३६५ १३

जौंरा भौंरा दुइ हाथिन को हमरे द्वारे देयँ पछार १२८
खता माफ करि हम आल्हाकै औ कनउज माँ लेंय बसाय ॥
इतना सुनिकै सय्यद् बोले धावन पठै लेउ बुलवाय १२६
तब महराजा कनउज वाला तुरतै धावन दीन पठाय ॥
खबरि सुनाई त्यहि आल्हा को तुमको राजा रहे बुलाय १३०
मीरासय्यद् तहँ बैठे हैं तिनहिन हमें दीन पठवाय ॥
इतना सुनिकै आल्हाऊदन दोऊ भाय बनाफरराय १३१
अपनी अपनी असवारिनचढ़ि तहँते कूच दीन करवाय ॥
जौंरा भौंरा मस्ता हाथी जयचंद द्वारेदीन ढिलाय १३२
आल्हा ऊदन दोऊ भाई पहुंचे तुरत द्वारपर आय ॥
जयचंद बोले तब आल्हाते मानो कही बनाफरराय १३३
हथी पछारो जो द्वारे पर तौ तकसीर माफ द्वैजाय ॥
इतना सुनिकै उदयसिंहने मनमांसुमिरिशारदामाय १३४
ताकिकै मस्तक इक हाथी के भाला हना लघुरवा भाय ॥
पैठिग भांला त्यहि हाथी के तुरतै गिरा पछारा खाय १३५
दन्त पकारकै फिरि दूसरे के ऊदन दीन्ह्यो द्वार लिटाय ॥
देखि वीरता उदयसिंह की जयचंद बहुतगयो हर्षाय १३६
बाँह पकरिकै फिरि आल्हा कै औ दरबार पहुँचा जाय ॥
कीनि खातिरी भल ऊदन की खालीमहलदीनकरवाय १३७
लै कै लश्कर तब कनउज मां बसिगे तहां बनाफरराय ॥
खेत छूटिगा दिननायक सों झण्डागड़ानिशाकोआय १३८
परे आलसी खटिया तकितकि सन्तन धुनी दीन परचाय ॥
आशिर्वाद देउँ मुन्शीसुत जीवो प्रागनरायण भाय १३६
रहै समुन्दर में जबलों जल जबलों रहै चन्द औ सूर ॥

१४ · आल्हखण्ड । ३६६
मान्त्रिक ललिते के तवलों तुम यशसों रहौ सदा भरपूर १४०
माथ नवावौं पितु अपनेको ह्याँ ते करौं तरंग को अन्त ॥
राम रमा मिलि दर्शन देवो इच्छायही मोरि भगवन्त १४१
इति श्रीलखनऊनिवासि ( सी,आई,ई ) मुंशीनवलकिशोरात्मजवाबूप्रयाग
नारायणजीकी आज्ञानुसार उन्नामप्रदेशान्तर्गत पँड़रीकलांनिवासि
मिश्रवंशोद्भवद्वुकृपाशङ्करसूनु पं०ललिताप्रसादकृत आल्हा
कन्नौजवासवर्णनोनामप्रथमस्तरंगः ॥ १ ॥
आल्हा निकासी सम्पूर्ण ॥
इति ॥

अथ आल्हाखण्ड ॥
लाखनिका विवाह अथवा बूँदी की लड़ाई ॥
सवैया ॥
फूलन कारिखै हमदन कै दशस्यन्दन के सुत को यश गावैं ।
र्तना सुनिकै ॐ रघुनन्दन बन्दन कै अतिही सुखपावैं ॥
कहा आयो चरण सदा प्रभुकी करणी बरणी नहिं जावै ।
क्षेम संदेश नप करियो ललिते पदपङ्कज नित्त मनावै १
सुमिरन ॥
फूलमती कनउज की देवी जिनयशप्रकटआजयहिकाल॥
करैं मनोरथ पूरण सबके ध्यावैं जवान वृद्ध चहुकाल १
हैं महरानी सब सुखदानी रक्षाकरैं बिकट कलिकाल ॥
अवलम्बा तिनअम्बाका लाखनि ब्याह बखानों हाल २
सहाई अब माई तुम जाते चलाजाउँ भवपार ॥
बूड़े भवसागर में माता तुम्हीं निवाहन हार ३
पार लगायो जस ऊदन का तैसे पारकरो यहिबार ॥
माता भ्राता अरु ताता ये स्वारथ मित्र सबै संसार ४

२ आल्हखण्ड । ३६वां
साँचौँ माता अरु त्राता तुम धाता सृष्टि माँझ यहिकाल ॥
लखियै ऐसे नर दुर्बल को माता जानु आपनो बाल ५
छूटि सुमिरनी गै देवीकै लाखनिब्याहसुनोयहिकाल ॥
गंगाधर बूँदी का राजा ता घर ब्याह होयगो हाल ६
अथ कथाप्रसंग ॥
कुसुमा बेटी गंगाधरकी राजा बूँदी का सरदार ॥
खेलत देखा सो बेटी का यौवन जानिपरा त्यहिबार १
लाग विचारन मन अपने मा बेटी ब्याहन के अनुसार ॥
नव अरु आठ दशै वर्षनमा ज्योतिपशास्त्रदीनअधिकार २
फिरि तौ गिनती ना कन्याकी यह मन कीन्ह्यो खूब विचार ॥
म्वती जवाहर दो बेटाथे तिनका बोलिलीन त्यहिबार ३
हाल बतावा मन अपने का राजा बार [बार समझाय] ॥
घरवर नीको जहँ तुम देखो त्यहिघर टीका [दीजो जाय]
एक मोहोवे तुम जायो ना तहँपर रहें [बनाफर राय] ॥
जाति बनाफर की हीनी है हल्ला देश दे[श महँ] काय ५
इतना कहिकै महराजा ने सबियाँ सामा दीन मँगाय ॥
चला जवाहर तब बूँदी ते राजै बार बार शिरनाय ६
तीनिलाख को टीका लै कै दील्लीशहर पहुँचा जाय ॥
हाल जानिकै पृथीराज ने टीका तुरत दीन लौटाय ७
चौरीगढ़ में वीरशाह घर पहुंचा फेरि जवाहरजाय ॥
सोऊ जादूकी शंका ते टीका तुरत दीन लौटाय ८
तहँतेचलिकै फिरिविसहिनगा जहँपर बसैं बिसेनेराय ॥
लागि कचहरी गजराजा की शोभा कही बूत ना जाय ६
सोने सिंहासनपर सोहत है राजा बिसहिन का सरदार ॥

लाखनिका विवाह । ३६६ ३

दीन जबाहिर तहँ चिट्ठी को, राजा पढ़नलाग त्यहिबार १०
पढ़िकै चिट्ठी गंगाधरकै टीका तुरत दीन लौटाय ॥
तबै जबाहिर मन खिसियाने पहुँचे फेरि कनौजै जाय ११
लागि कचहरी तहँ जयचँदकै भारी लाग राज दरबार ॥
आल्हा ऊदन तहँ बैठे हैं बैठे बड़े बड़े सरदार १२
दीन जबाहिर तहँ चिट्ठी को जयचँद आँकु आँकु पढ़िलीन ॥
पढ़िकै चिट्ठी वापस दीन्ह्यो हाँहूँ कछू नहीं नृप कीन १३
तबै जबाहिर यह बोलत भा दोऊ हाथजोरि शिरनाय ॥
लाखनि काँरे हैं तुम्हरे घर यह हम आयनपताल गाय १४
आयसु पावैं महाराजा को तौ हम टीका देयँ चढ़ाय ॥
इतना सुनिकै जयचँद बोले तुमते साँचदेयँ बतलाय १५
ब्याह न करिबे हम तुम्हरे घर डाँपर जादू को अधिकाय ॥
इतना सुनिकै ऊदन बोले दोऊ हाथ जोरि शिरनाय १६
टीका आयो घर तुम्हरे है राजन लीजै आप चढ़ाय ॥
कौन दुसरिहा नृप तुम्हरो है ज्यहिभयकरौ कनौजीराय १७
औरो बोले त्यहि समया मा साँची कहौ बनाफरराय ॥
सम्मत सब का जयचँद लै कै तब पण्डितते कहा सुनाय १८
देखो साइति यहि समया मा टीका लीनजाय चढ़वाय ॥
सुनिकै वातैं महाराजा की पंडित साइति दीन बताय १९
पाख अँधरिया तिथि तेरसिऔ फागुन मास सुनो महराज ॥
भौरिन केरी शुभ साइति है ह्वैहैं सुफल आपके काज २०
पै यहि बिरिया शुभ साइति में टीका आप लेउ चढ़वाय ॥
इतना सुनिकै महराजा ने महलन खबरिदीन पठवाय २१
खबरि पायके महरानी ने चौका तुरत लीन लिपवाय ॥
२४

४ आल्हखण्ड । ३७०
चौक पुराई गजमोतिन सों चन्दन पीढ़ा दीन डराय २१
तापर बैठे लखराना जब गावन लगीं सुहागिल आय ॥
द्यो जवाहिर गंगाधर का तहँ पर टीका दीन चढ़ाय २३
बीरा दीन्ह्यो जब लाखनि को सम्मुख छींक भई तब आय ॥
रानी तिलका त्यहि समया में बोली राजै वचन सुनाय २४
ब्याह न करिबे हम बूँदी मा टीका आप देयँ लौटाय ॥
परम पियारे लखराना के बीरा लेत छींकमै आय २५
इतना सुनिकै ऊदन बोले दोऊ हाथ जोरि शिरनाय ॥
जो कछु होवै इनके जीका हमरो लीन्ह्यो मूडकटाय २६
टीका फेरयो महरानी ना जान्यो शकुन छींककामाय ॥
सो सवरमा यहि मानुष का पौवन नाक गिगवतजाय २७
यहिकी छींकनका अशकुन ना माता भरम देउ बिसराय ॥
राजा बोले फिरि रानी ते साँची कहै बनाफरराय २८
जो अस हालत सबहोती ना टीका तुरत देत लौटाय ॥
इतना सुनिकै तिलका रानी अपनो भरमदीन विसराय २६
फेरि जवाहिर सब नेगिन को सुवरण कड़ा दीन पहिराय ॥
जितनी सामारह टीका की सो आँगनमा दीन धराय ३०
राजाजयचंद उन नेगिन का सुवरण कड़ा दीन पहिराय ।
साल दुसाला मोहनमाला इनहून दीन तहाँपर आय ३१
बड़ी खुशानी दुहुँ तरफाके नेगिन मनै भई अधिकाय ।
विदामँगिकै चला जवाहिर बूँदी शहर पहूँचा जाय ३२
हाल बतायो महराजा का जाविधि टीका भयो चढ़ाय ॥
भई खुशहाली गंगाधर के फूले अंग न सके समाय ३३
नामी राजा कनउज वाले बेटा कीनकाज खुबजाय ॥

लाखनिका बिवाह । ३७१ ५
भई तयारी ह्‍वाँ ब्याहे की फागुन मास पहूँचा आय ३४
न्यवत पठावा सब राजन को राजा कनउज के सरदार ॥
पावत चिट्ठी के राजा सब कनउज आयगये त्यहिबार ३५
तेल औ मायन नहखुरआदिक ब्याहन कुँवाँक्यार व्यवहार ॥
नेग चार सब पूरन ह्वैगे लागे सजन शूर सरदार ३६
झीलमबखतर पहिरि सिपाहिन हाथम लई ढाल तलवार ॥
सुमिरि भवानीसुत गणेश को राजा जयचंद भये तयार ३७
आल्हा बैठे पचशब्दापर ऊदन बेंदुल पर असवार ॥
गंगापाँवर कुड़हरि दाला मामा लाखनि का सरदार ३८
सूरज राजा परहुल वाला सोऊ बेगि भयो तय्यार ॥
सिर्गी घोड़े की पीठि पर सय्यद बनरस का सरदार ३६
पूंजि गोबर्द्धनि संदोहिनि अरु लाखनि फूलमती त्यहिबार ॥
सुमिरि भवानीसुत गणेश को पलकी ऊपर भये असवार ४०
बाजे डङ्का अहतक के बारालाख फौज तैयार ॥
आगे हलका भा हाथिन का पाछे चलन लागि असवार ४१
चले सिपाही त्यहि पीछेसों रब्बाचले पवन की चाल ॥
मारु मारुकै मौहरि बाजी बाजी हाव हाव करनाल ४२
गर्द उड़ानी अति मारग में लोपे अन्धकार सों भान ॥
हाथी चिघरैं घोड़ा हींसैं घूमत जावैं लाल निशान ४३
भयो कलाहल अति मारग में जंगल जीव गये थर्राय ॥
उनइस दिन के फिरि अर्सा में बूँदी पास गये नगच्याय ४४
चार कोस जब बूँदी रहिगै जयचंद तम्बू दीन गड़ाय ॥
गड़िगे तम्बू सब राजन के सब रंग ध्वजा रहे फहराय ४५
अपने अपने सब तम्बुन में राजा नृत्य रहे करवाय ॥

६ आल्हाखण्ड । ३७२
गमकैं तबला सब तम्बुन में सावन यथा मेघ गहरायँ ४६
ओढ़े सारी काशमीर की धारी शिरन सोहनी भाय ॥
बनी मोहनी अति मूरति है मूरति वरण नहीं कछु जाय ४७
ऊदन बोले तब रूपन ते ऐपनवारी दे पहुँचाय ॥
रूपनबारी तब बोलत भा दोऊ हाथ जोरि शिरंनाय ४८
ऐपनवारी बारी लैके आपन मूड़ कटावै जाय ॥
आये बारी बहु कनउज के ऐपनवारी देउ पठाय ४६
बातें सुनिकै ये रूपन की बोला फेरि बनाफरराय ॥
बाना राखै रजपूती का बारी कौन बतावै भाय ५०
इतना सुनिकै रूपन बोले बेंदुल घोड़ देउ मँगवाय ॥
सुनिकै बातें उदयसिंह ने बेंदुल बाग दीन पकराय ५१
ऐपनवारी बारी लैके बेंदुल उपर भयो असवार ॥
सवापहर के फिरि अर्सा मा पहुँचाजाय नृपति के द्वार ५२
सवैया ॥
देखिकै रूपनि को दरवानि कहा इमि बानि सो बेगि सुनाई।
कौनसो देश बसौ क्यहिग्राम औ कौनसोकाज गये तुम आई॥
जायकहाँ नृपसों चलिकै भलिकै निजहाल जो देउ बताई।
बानि सुन्यो ललिते जब रूपनि बोलि उठ्यो तब मोदबढ़ाई ५३
ऐपनवारी बारी लावा राजै खबरि सुनावो जाय ॥
हमें पठावा आल्हा ऊंदन ब्याहनअये कन्नौजीराय ५४
इतना सुनिकै द्वारपाल चलि राजै खबरि दीन बतलाय ॥
सुनिकै बातें द्वारपाल की राजा गये दुआरे आय ५५
द्वारे आगे जब गंगाधर रूपन बोला शीश नवाय ॥

लाखनिका विवाह । ३७३ ७

ब्याहन आये लखनाको अगुआकार बनाफरराय ५६
आल्हा ऊदन के बारीहन रूपन जानो नाम हमार ॥
ऐपनवारी लै आयन है पावैं नेग आपके द्वार ५७
कीरति गावत रूपनबारी जावैं आल्हाके दरबार ॥
इतना सुनिकै राजा बोले चाहिये नेग काह तब द्वार ५८
रूपन बोले महराजाते चाहैं यही आपके द्वार ॥
दुइघंटाभरि चलै सिरोही द्वारे बहै रक्तकी धार ५६
कीरति गावत रूपन जावै होवै जगमें नाम तुम्हार ॥
बारी आवा बघऊदन का द्वारे कठिन कीन तलवार ६०
इतना सुनिकै गंगाधर ने फाटक बन्द लीन करवाय ॥
जाय न पावै रूपन बारी आरी होय लोहके घाय ६१
इतना सुनिकै रजपूतन ने अपनी खैंचिलीन तलवार ॥
रूपन बारी बेंदुल परते गरुई हाँक दीन ललकार ६२
प्राणपियारे ज्यहि होवैं ना सोई लड़ै आय सरदार ॥
धावा कीन्ह्यो रजपूतनने बेंदुल भली मचाई रार ६३
टापन मारे रजपूतन का काहू दाँतन लेय चबाय ॥
जब मनपावै सो रूपनका तड़पत उड़ा दूरलगजाय ६४
का गति वरणौं तहँ रूपनकौ दूनों हाथ करै तलवार ॥
बड़े लड़ैया बूँदीवाले तेऊ हनैं अपनी वार ६५
दुइ दश पन्द्रह बीसक तीसक गिरिगे समरभूमि मैदान ॥
देखि तमाशा गंगाधर जी द्वारे बहुत भये हैरान ६६
क्रोधित हैकै महराजा ने आपै खैंचिलीन तलवार ॥
ऐंड़ लगायो तब रूपन ने घोड़ा चला गयो वापार ६७
मारु मारु औ हल्ला करिकै पाछे चले बहुत सरदार ॥

८ आल्हखण्ड । ३७४
उड़ा बेंडुला त्यहि समया मा तम्बुनपास गयो असवार ६८
क्षत्री लौटे बूँदी वाले बैठे आय राज दरबार ॥
रूपन बारी को देखत खन बोला उदयसिंह सरदार ६६
कैसी गुजरी कहु बूँदी में रूपन रङ्ग विरङ्गा ज्वान ॥
इतना सुनिकै रूपन बोले भैया भलो कीन मैदान ७०
नामी ठाकुर का बारी है जान्यो सबै राजदरबार ॥
दुइ घण्टा भरि चली सिरोही द्वारे बही रक्तकी धार ७१
मातु शारदा तुम्हरी बशिमा लाला देशराज के लाल ॥
सरबर तुम्हरी का दुनिया मा दूसर नहीं आज नरपाल ७२
सुनो हकीकति अब बूँदी कै भारी लाग राजदरबार ॥
रूपन बारी की चरचा का खरचाहोनलाग त्यहिवार ७३
म्वती जवाहर दोउ पुत्रन को राजा पास लीन बैठाय ॥
कही हकीकति सब ऊदन की पुत्रन वार वार समुझाय ७४
जाति बनाफर की हीनी है अगुवाकार भये सो आय ॥
कैसे व्याहब हम बेटीका हँसि हैं जातिपांतिकेभाय ७५
लड़िकै जितिबे नहिं ऊदनते यहहू साँच दीन बतलाय ॥
धोखा दैकै लखराना का अब हम कैदलेयँ करवाय ७६
तौ तौ इज्जत हमरी रहिहै नहिं सब जैहै काम नशाय ॥
तुम अब जावो त्यहि तम्बूमा जहँ पर बैठ कनौजीराय ७७
समय आयगा अब भौरिनका इकलो लड़का देउ पठाय ॥
देश हमारे यह रीती है कहियो वारंवार समुझाय ७८
इतना सुनिकै चला जवाहर चारो नेगी संग लिवाय ॥
जहाँ कनौजी का तम्बूथा पहुँचा तहाँ जवाहरआय ७६
कही हकीकति सब राजा सों दोऊ हाथ जोरि शिरनाय ॥

लाखनिका विवाह । ३७५

देश हमारे की रीती यह इकलो लड़का देउ पठाय ८०
नाई बारी दूनों नेगी इनको लेवें संग लिवाय ॥
इतना सुनिकै ऊदन बोले दोउ हाथ जोरि शिरनाय ८१
ग्यारह नेगी औ सहिबाला इतने पठै देउ महराज ॥
इतना सुनिकै राजा बोले भावै करो तौन तुमकाज ८२
जो मन भावै सो करु ऊदन तुमको दीन पूर अधिकार ॥
बनि सहिबाला तब ऊदन गे नेगी बने और सरदार ८३
बैठि पालकी में लखराना अपनी लिये ढालतलवार ॥
संग जवाहर के चलि दीन्हे नेगीबने शूर सरदार ८४
आसा लीन्हे कोउ हाथेमा मुरछल कोऊ डुलावत जाय ॥
झण्डी लीन्हे कोऊ नेगी कोऊ रहे मशाल दिखाय ८५
बूँदी केरे नर नारी सब भारी भीर कीन अधिकाय ॥
रूप देखिकै लखराना का मनमें कामदेव शर्माय ८६
धरी पालकी गै फाटक पर बैठे सबै शूर सरदार ॥
यक यक भाला दुइ दुइ बरछी कम्मर परी एकेतलवार ८७
बाहर आये तब गंगाधर औ लाखनिते कह्यो सुनाय ॥
जल्दी चलिये तुम भीतर को भौंरीसमयगयो नगच्याय ८८
इतना सुनिकै ऊदन ठाकुर नेगी लीन्हे संग लिवाय ॥
भीतर पहुँचा जब मन्दिर के तहँ नहिंखम्भपरादिखराय ८६
लौटन लाग्यो जब बाहर को आये शूरवीर तब धाय ॥
मारु मारु कै हल्ला करिकै ऊदन उपर पहुँचे आय ६०
चली सिरोही तब आँगनमा हाहाकार शब्दगा छाय ॥
नेगी बनिकै जे क्षत्री गे तेसब दीन्ह्यो जूझ मचाय ६१
तेरा क्षत्री कनउजवाले बूँदी केर पाँचमै जवान ॥

१० | आल्हाखण्ड । १७६
मारे मारे तलवारिन के मचिगा घोर शोर घमसान ६१
ऊदन मारैं ज्यहि क्षत्री को सो मुहभरा तुरत गिरि जाय ॥
पास न जावै कोउ ऊदन के रणमा बढ़ा बनाफरराय ६३
कागति वरणौं तहँ लाखनि कै दूनों हाथ करै तलवार ॥
मारे मारे तलवारिन के आँगन बही रक्तकी धार ६४
मोती जवाहिर दोनों भाई आँगन खूनकीन मैदान ॥
लड़ै बहादुर भीपमवाला देवा मैनपुरी चौहान ६५
घायल ह्वैकै ग्यारह नेगी आँगन गिरे पछाराखाय ॥
लाखनि ऊदन त्यहि समयमा चालिस क्षत्री दीनगिराय ६६
तबै जवाहिर सम्मुख आवा गरई हाँक देत ललकार ॥
काह सिपाहिन का मारो तुम हमरे साथ करौ तलवार ६७
इतना सुनिकै लाखनि ऊदन सम्मुख चले तुरतही धाय ॥
आगे पीछे चौगिर्दा ते परिगे गाँस फाँसमें आय ६८
लाखनि ऊदन दोऊ ठाकुर मोती कैदलीन करवाय ॥
घैहानेगी जे आँगन में तिनहुन तुरतलीन बँधवाय ६९
लाखनि ऊदन दोउ क्षत्रिनको राजै खंदक दीनडराय ॥
यह सुधिपाई जब मालिनिने कुसुमा पास पहुँची जाय १००
हाल बतायो त्यहि बेटी को मालिनि बार बार समुझाय ॥
ब्याहन तुमका लाखनि आये राजै खन्दक दीन डराय १०१
देश देश में जब फिरि आये टीका लीन कनौजीराय ॥
ऐस मुनासिब नहिं राजाको जोअबदीन्हेनिजझमचाय १०२
गली गली में यह चरचाहै नीकिन कीन बात महराज ॥
रूप उजागर सब गुण आगर खन्दक परे तुम्हारेकाज १०३
इतना सुनिकै कुसुमा बेटी मनमें बारबार पछिताय ॥

लाखनका विवाह । ३७७ ११-
हमें न भाई यह आली है तुमते साँच दीन बतलाय १०४
बयस बराबरीकी मालिनि हौ अब गाढ़े माँ होउ सहाय ॥
राति अँधेरिया की बिरिया है खन्दक मोहिंदेइ दिखराय १०५
मोरे कारण महराजा सुत कैदी भये यहांपर आय ॥
उत्तम शय्या केरि स्ववैया खन्दकदीन बाप डरवाय १०६
मोहिं दिखावै त्यहि क्षत्री को जियरा धीरधरा ना जाय ॥
इतना सुनिकै मालिनि दौरी पलकीलाई तुरतलिआय १०७
बैठि पालकी मा दूनो फिरि खन्दक पास गई नियराय ॥
दीन अशर्फी तहँ चकरन का तिनफिरतहाँदीनपहुँचाय १०८
कुसुमा बोली तहँ लाखनि ते स्वामी बार बार बलिजायँ ॥
मोहिं अभागिनि के कारणसों तुमपरबिपतिपरीअधिकाय१०६
अब तुम निकरो यहि खन्दकते रस्ता देउँ कन्त लटकाय ॥
इतना सुनिकै ऊदन बोले तुमते साँचदेयँ बतलाय ११०
जो तुम चाहौ लखराना को फौजन खबरि देउ पहुँचाय ॥
चहै सहारा जो नारी को तौ सब क्षत्रीधर्म नशाय १११
शंका लावो मन अन्तर ना महलन जाउ तड़ाका धाय ॥
खबरि पायकै आल्हा ठाकुर हमरीबिपतिविदरिहैंआय११२
कुसुमा बोली फिरि ऊदन ते क्षत्री भोजन देउँ पठाय ॥
ऊदन बोले तब कुसुमा ते यहनहिंउचितयहाँपरआय११३
चोरी चोरा कछु दैहै ना शाहंशाह कनौजीराय ॥
भोर भवरहरे मुरगा बोलत फौजन खबरिदेउ पठवाय ११४
और न चाहें कछु तुमते ये साँचे हाल दीन बतलाय ॥
इतना सुनिकै कुसुमा बेटी महलनफेरिपहुँची आय ११५
सोचत सोचत राति पारभे प्रातःकाल गयो नगणाय ॥

१२ आल्हखण्ड । ३७८
कहि समुझावा तब मालिनिको फौजन तुरतदीन पठवाय ११६
नाइनि बारिनि तेलि तँबोलिनि मालिनिधोबिनि के समुदाय ॥
साँची दूती रस ग्रन्थन में भाषा चतुरन खूब बनाय ११७
सोई मालिनि चलि बूँदी ते फौजन अटी तड़ाका धाय ॥
पता लगायो तहँ आल्हा को चँकरन तम्बूदीन बताय ११८
बेला चमेलिन के हरवा को मालिनि तुरत दीन पहिराय ॥
कह्यो सँदेशा तहँ ऊदन का मालिनि वारवार सब गाय ११९
जो सुधि पावैं बूँदी वाले हमरो पेट देयँ फरवाय ॥
भुसा भरावैं ते पेटेमा तुमकासाँच दीन बतलाय १२०
इतना सुनिकै आल्हा ठाकुर मुहरें सात दीन पकराय ॥
मालिनि चलिभै तब फौजनते बेटी पास पहुँची आय १२१
खबरिसुनाई सब जयचँद को आल्हा वार वार समुझाय ॥
तब महराजा कनउज वाला डंका तुरतदीन बजवाय १२२
हथी चढ़ैया हाथिन चढ़िगे बाँके घोड़न मे असवार ॥
झीलमबख्तर पहिरि सिपाहिन हाथम लई ढाल तलवार १२३
तोपैं चढ़ि गईं सब चर्खन मा गोला तुरत दीन छुटवाय ॥
चढ़े जवाहर औ मोती दोउ तोपनआगिदीनलगवाय १२४
तोपैं छूटीं दुहुँ तरफा ते धुवना रहा सरग में छाय ॥
बड़ी दुर्दशा भै तोपन मा तबफिरिमारुवन्द है जाय १२५
गोली ओला सम वर्षत भइँ सननन सन्न सन्न सन्नाय ॥
दुनो गोल आगे का बढ़िगे सम्मुख भये समरमें आय १२६
भाला बलछी तलवारिन की लागी होन भड़ाभड़ मार ॥
मारे मारे तलवारिन के नदिया बही रक्तकी धार १२७
ना मुहँ फेरैं बूँदी वाले ना ई कनउज के सरदार ॥

लाखनिका विवाह। ३७५ १३
शूर सिपाही सम्मुख रहिगे कायरछोड़िभागि हथियार १२८
कटि कटि मूड़ गिरैं धरणीमा उठि उठि रुण्ड करें तलवार ॥
मूड़न केरे मुड़चौरा भे औरुरुडूनके लाग पहार १२६
सात कोस के तहँ गिर्दा मा कौवा गीध रहे मड़राय ॥
घैहा करहैं समरभूमि मा दैया बापू रहे मचाय १३०
हाय रुपैया बैरी द्वैगे हमरे गई प्राणपर आय ॥
सात रुपैया के कारण ते छूटे लोग कुटुम औभाय १३१
तहिले बिरिया मै संध्या कै तब फिरि मारु बन्द है जाय ॥
जीबे लायक जितने घैहा तिनकीलोथिल्रीनउठवाय १३२
दईलाख दल कनउज वाला बूँदी डेढ़लाख सरदार ॥
इतने जूझे दुहुँ तरफा ते करिकरि मारुतहाँपरयार १३३
आल्हा आये जब तम्बू मा आसनअगलगीनबिछवाय ॥
श्वास चढ़ाई फिरि ऊपर का शारदसुमिरिबनाफरराय १३४
बिनती कीन्ही भल शारद की आल्हा बार बार शिरनाय ॥
तव अवलम्बा जगदम्बा है दूसर करिहै कौन सहाय १३५
बिनती करिकै आल्हा ठाकुर सोये सेज आपनी जाय ॥
देबी शारदा महिरवाली निशिमास्वप्न दिखायो आय १३६
मलखे ब्रह्मा को बुलगाओ द्वैहै जीति बनाफरराय ॥
स्वपन देखिकै आल्हा ठाकुर प्रातःकाल उठे हर्षाय १३७
लिखिकै चिट्ठी मलखाने को धावन हाथ दीन पठवाय ॥
चढ़ा साँड़िया मा धावन तब सिरसागढ़ै पहुँवाजाय १३८
चिट्ठी दीन्ही मलखाने को धावन बार बार शिरनाय ॥
पढ़िकै चिट्ठी मलखेठाकुर औ यहबोले वचनसुनाय १३९
हम समुझावा भल ऊदन का सिरसा बसो बनाफरराय ॥

१४ आल्हाखण्ड । ३८०
कहा न माना आल्हा ऊदन खन्दकपरे लहुरवाभाय १४०
मनते हमरे यह आवति है की बूँदी का जाय वलाय ॥
जैसो कीन्हेोनि तस फलपायनि दूनोभाय बनाफरराय १४१
करैं तयारी नहिं बूँदी की तवहूं ठीक नहीं ठहराय ॥
इतना कहिकै मलखेठाकुर फौजनहुकुमदीनकरवाय १४२
करो तयारी सब बूँदी की खन्दक परा लहुरवाभाय ॥
इतना कहिकै मलखेठाकुर अपने महल पहुँचेजाय १४३
पढ़िकै चिट्ठी गजमोतिनि को मलखे हाल दीन समुझाय ॥
हम ना जैबै अब बूँदी का प्यारी साँच दीन बतलाय १४४
इतना सुनिकै प्यारी बोली दोऊ हाथ जोरि शिरनाय ॥
आजु साँकरा बघऊदन का स्वामीगाढ़े होउ सहाय १४५
बिना सहायक अब दादा को स्वामीदुःख होय अधिकाय ॥
आजु साँकरा है दादापर यहुदिनपरीरोज ना आय १४६
ब्याना सहिबे घबरानिन का होई पीर रोज अधिकार ॥
धर्म विहीनी हीनी ह्वैकै जीनो जन्मजनमधिकार १४७
धर्म न रहै जब देही मा करि है कौन्दकाहि उपकार ॥
धर्म निशाना मर्दाना है अर्जुनसकदीनोकसरदार १४८
सारथि कीन्ह्यो नारायण जे ध्रुव कृष्ण कहि दीन्ह्यो महराज ॥
बुद्धीद्वारा करि दिखलावा ताकी राखि लई सबके काज १४६
करौं किहानी जो पूरी मैं ताको सिन्ध बड़ा विस्तार ॥
सुनी किहानी जो विप्रन ते सोई कहौ सत्य भतार १५०
ह्रवै दवाई दुखदाई यह नींवी हरै अनेकन रोग ॥
जो कोउ पीवै चंगा होवै याको कैस नीक संयोग १५१
धर्म दवाइन के पीने मा स्वामिन सत्य सत्य आरोग ॥