ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
दूसरा अध्याय ] ३७
कह कर पुरोडाश को निकालते और आहुति देते हैं तो यजमान
उस लोक को चले जाते हैं (प्रयन्ति)। परन्तु इन लोगों का यह
कथन अविद्यावश है।
प्रायणीय और उदयनीय इष्टियों के याज्य और अनुवाक्य
मन्त्रों में इस प्रकार उलट फेर होना चाहिये कि प्रायणीय इष्टि
का अनुवाक्य उदयनीय इष्टि का याज्य मन्त्र हो जाता है और
प्रायणीय इष्टि का याज्य मन्त्र उदयनीय इष्टि का अनुवाक्य हो
जाता है। होता इस उलट फेर को इसलिये करता है कि दोनों
लोकों में समृद्धि प्राप्त हो, दोनों लोकों में प्रतिष्ठा प्राप्त हो। जो
इस रहस्य को समझता है वह दोनों की समृद्धि और दोनों लोकों
की प्रतिष्ठा पा लेता है। अदिति के लिये जो चरु प्रायणीय इष्टि
में और जो उदयनीय इष्टि में दिया जाता है, वह यज्ञ के धारण
करने के लिये, यज्ञ के बांधने के लिये अर्थात् इसलिये दिया जाता
है कि यज्ञ हाथ से निकलने न पावे। किसी ने कहा है कि यह
ऐसे ही है जैसे किसी रस्सी के दोनों सिरे बांधने से वह रस्सी हाथ
से छूटने नहीं पाती। इसी प्रकार प्रायणीय और उदयनीय इष्टियों
में अग्नि को चरु देकर होता यज्ञ के दोनों शिरों को बांध देता
है। 'पथ्या स्वस्ति' के साथ ही उदयनीय इष्टियों में समाप्त कर
देते हैं। इस प्रकार यजमान स्वस्ति के साथ यहां आरम्भ करते हैं
और स्वस्ति के साथ वहां (परलोक में) समाप्त कर देते हैं। (५)
ऐतरेय ब्राह्मण की पहली पञ्चिका का दूसरा अध्याय समाप्त
तीसरा अध्याय
सोम-क्रय, अग्नि-मथन, आतिथ्य-इष्टि
१२—देवों ने राजा सोम को पूर्व दिशा में खरीदा था। इस
लिये यह पूर्व दिशा में ही खरीदा जाता है। उन्होंने तेरहवें महीने
से सोम खरीदा था, इसलिये तेरहवां महीना निन्दनीय है। सोम
का बेचना निन्दनीय है। इसलिये सोम का बेचने वाला पापी है।
जब उसको मोल लेकर मनुष्यों के पास लाये तो उसकी शक्तियां
तथा इन्द्रियां सब दिशाओं में फैल गईं। उन्होंने उनको एक
ऋचा के द्वारा इकट्ठा करने की चेष्टा की। परन्तु वह न कर
सके। तब उन्होंने दो, तीन, चार, पांच, छः और सात मन्त्रों से
यत्न किया। परन्तु वह उनको इकट्ठा न कर सके। तब आठ
मन्त्रों से सफल हुये और उनको प्राप्त किया। अष्ट (आठ) को
अष्ट इसलिये कहते हैं कि इससे अश्नुते अर्थात् प्राप्ति होती है।
('अष्ट' अश् धातु से बनता है जिसका अर्थ है प्राप्त करना)।
जो इस रहस्य को समझता है वह जो चाहता है उसी को पा
लेता है। इसीलिये इन कर्मों में आठ आठ मन्त्र होते हैं जिससे
सोम की इन्द्रियां और शक्तियां इकट्ठी हो सकें। (१)
( ३८ )
तीसरा अध्याय ] ३६
१३—अब अध्वर्यु होता से कहता है, "खरीदे हुये और
लाये हुये सोम के लिये मन्त्र पढ़ो।" वह कहता है—"भद्रादभि-
श्रेयः प्रेहि *" अर्थात् "इस लोक से चल कर इससे श्रेष्ठ लोक
को जा।" यह लोक भद्र है। इसलिये 'भद्र' से तात्पर्य है इस
लोक का। स्वर्ग लोक इस लोक से 'श्रेयः' अर्थात् श्रेष्ठ है।
इसके कहने से होता यजमान को परलोक को भेजता है। अब
कहता है :—
बृहस्पतिः पुर एता तेऽअस्तु । ( मन्त्र का दूसरा पाद )
"बृहस्पति तेरा पथ प्रदर्शक हो" ।
ब्रह्म ही बृहस्पति है। ब्रह्म को पथ प्रदर्शक बनाने से यज्ञ में
विघ्न न होगा ।
अब कहता है—
अथैमवस्य वरऽआ पृथिव्या । ( मन्त्र का तीसरा पाद )
"इसे पृथ्वी के ऊपर ठहराओ" (अथ ईं अवस्य)
- भद्रादभिश्रेयः प्रेहि बृहस्पतिः पुर एता ते अस्तु ।
अथै मवस्य वर आ पृथिव्या आरे शत्रून् कृणुहि सर्ववीरः ॥
( तैत्तिरीय संहिता, १।२।३।२ )
भद्रादधि श्रेयः प्रेहि बृहस्पतिः पुर एता ते अस्तु ।
अथैममस्या वर आ पृथिव्या आरे शत्रुं कृणुहि सर्ववीरम् ॥
( अथर्व ७।८।१ )
इन दोनों मन्त्रों में थोड़ा सा भेद है। तै० में 'अभि' है। अथर्व०
में अधि; तै० में अथैमवस्य ( अथ ईं अवस्य ) है। अथर्व० में 'अथै-
ममस्याः' ( अथ इमम् अस्याः ) है । तै० में शत्रून् ( बहुवचन ) है,
अथर्व में एक वचन शत्रुं; तै० में सर्ववीरः ( प्रथमा ) है और अथर्व०
में सर्ववीरम् ( द्वितीया ) ।
४० [ प्रथम पञ्चिका
‘वर’ का अर्थ है देव भजन अर्थात् यज्ञ का स्थान। इस
प्रकार वह यज्ञ-स्थान पृथिवी पर सोम को ठहराता है।
अब कहता है :—
आरे शत्रून् कृणुहि सर्ववीरः। (मन्त्र का तीसरा पाद)
“सर्व शक्तिमान् होकर शत्रुओं को भगा”।
ऐसा कहने से होता यजमान के साथ अहित करने वाले
शत्रु को भगा देता है और उसको सबसे नीचा स्थान दिलाता है।
अब वह “सोमा यास्ते मयोभुव” ✤ वाले तीन मन्त्र जो गायत्री
छन्द में हैं पढ़ता है।
इस प्रकार वह सोम राजा को उसी के देवता और उसी के
छन्द द्वारा लाकर प्रसन्न करता है।
अब वह (होता) पढ़ता है।
सर्वे नंदं ति यशसा गतेन सभासाहेन सख्या सखायः।
किल्बिषस्पृत् पितुषणि र्ह्येषामरं हितो भवति वाजिनाय॥
(ऋ० १०।७१।१०)
“सब मित्र ऐसे मित्र के आने पर जो सभा में जीत कर
यश के साथ आता है प्रसन्न होते हैं। उनकी दोषों से रक्षा करने
वाला और अन्न देने वाला और उनकी इन्द्रियों को शक्ति प्रदान
करने वाला होता है”।
सोम राजा ही “यश” है। इसके मोल लेने पर सभी आनन्द
मनाते हैं, वह जिनको यज्ञ में कुछ मिलेगा और वह जिनको न
मिलेगा। यह जो सोम राजा है वह ब्राह्मणों का “सभा में जीतने
✤ सोम यास्ते मयोभुव ऊतयः सन्ति दाशुषे। ताभिर्नोऽविताभव॥
इमं यज्ञमिदं वचो जुजुषाण उपागहि। सोम त्वं नो वृधेभव॥
सोम गीर्भिष्ट्वावयं वर्धयामो वचोविदः। सुमृडीको न आविश॥
(ऋ० १।९१।६, १०, ११)
तीसरा अध्याय ] ४१.
वाला सखा" है। वही "किल्विषस्पृत्" या दोषों से रक्षा करने
वाला है। जो कोई "किल्विषं" या दोषी हो जाता है उसी की
वह रक्षा करता है।
जो श्रेष्ठ होता है वही दोषी हो जाता है (अर्थात् पहले ठीक
ठीक मंत्र उच्चारण करता है, फिर थक जाता है)। इसीलिये कहते
हैं (होता के प्रति), "अब मत पढ़ो"। (अध्वर्यु के प्रति) "अब
कृत्य मत करो"। जिससे जल्दी में गड़बड़ न हो जाय।
वह "पितुषणि" है। 'पितु' का अर्थ है 'अन्न' और 'सनि'
का अर्थ है 'दान'। 'पितु' दक्षिणा को भी कहते हैं। (यजमान
ऋत्विजों को सोमयज्ञ करने के बदले) दक्षिणा देता है। इस
प्रकार वह (सोम-राजा को ऋत्विजों के अर्थ) अन्न का देने वाला
बनाता है। "अरंहितो भवति वाजिनाय"। यहाँ इन्द्रियों की
शक्तियों का नाम "वाजिन" है। जो इस रहस्य को समझता है
उसकी इन्द्रियों की शक्ति बुढ़ापे तक क्षीण नहीं होती।
अब होता नीचे के मंत्र को पढ़ता है :-
आगन् देव ऋतुभिर्वर्धतु क्षयं दधातु नः सविता सुप्रजामिषम्।
स नः क्षपाभिरहभिश्च जिन्वतु प्रजावन्तं रयिमस्मे समिन्वतु ॥ ※
(ऋ० ४।५३।७)
“देव सविता ऋतुओं के साथ आवे। घर को समृद्ध करे।
और हमको सन्तान और धन से युक्त करे। वह हम पर रातों
और दिनों में कृपा करे। वह हमको सन्तान के सहित धन दे।”
'आगन् देवः' का अर्थ है, "वह (सोम) यहाँ आ गया है"।
“ऋतुभिर्वर्धतु क्षयं” में ऋतुयें सोम राजा के भाई हैं। जैसे
मनुष्यों में राजों के भाई हुआ करते हैं उसी प्रकार। होता इस
※ यह मन्त्र ऐ० ब्रा० में 'सोम' के लिये आया है। परन्तु ऋग्वेद
में यह सविता विषयक है। क्या सोम और सविता पर्याय हैं ? ले०
४२ [प्रथम पञ्चिका
मन्त्र को पढ़ कर मानो सोम के साथ उसके भाइयों को ले आता
है। “दधातु नः सविता सुप्रजामिषम्” आशीर्वाद है। और
“वह हमको सन्तान के सहित धन दे” यह भी आशीर्वाद है।
अब होता पढ़ता है :—
या ते धामानि हविषा यजन्ति ता ते विश्वा परिभूरस्तु यज्ञम् ।
गयस्फानः प्रतरणः सुवीरोऽवीरहा प्रचरा सोम दुर्यान् ॥ (ऋ० १।६१।१६)
“तेरे जिन गुणों का हवि द्वारा गान करते हैं वे सब गुण
इस यज्ञ में हर जगह आ जावें । हे सोम हमारे घरों में आ ।
हमारी गायों❀ को बढ़ाता हुआ, रक्षा करता हुआ । वीरों को
देता हुआ और वीरों को न मारता हुआ ।”
“गयस्फानः प्रतरणः सुवीरः” का तात्पर्य है कि गायों का
बढ़ाने वाला और रक्षा करने वाला हो । “अवीरहा प्रचरा सोम
दुर्यान्” का तात्पर्य यह है कि ‘दुर्यान्’ अर्थात् यजमान के ‘घर’
आये हुये सोम राजा से डरते हैं। इस मंत्र को पढ़ कर वह सोम
को शान्त करता है जिससे वह शांत हुआ सोम प्रजा और पशुओं
की हिंसा न करे ।
अब होता वरुण सम्बन्धी नीचे के मन्त्र से समाप्त करता
है :—
इमां धियं शिक्षमाणस्य देव क्रतुं दक्षं वरुण सं शिशाधि । यया-
ति विश्वा दुरिता तरेम सुतर्माणमधि नावं रुहेम ॥ (ऋ० ८।४२।३ )
“हे देव वरुण ! शिष्य को बुद्धि, कर्त्तव्यता और होशियारी
दो । जिससे हम सब बुराइयों को तर जायं और अच्छी तरह
पार करने वाली नाव पर चढ़ें ।” (सोम) जब तक (कपड़े में)
❀ऐतरेय में ‘गयस्फान’ का अर्थ किया है ‘गवां नः स्फावयिता’
( हमारी गायों को बढ़ाने वाला )। वस्तुतः ‘गय’ का अर्थ है प्राण ।
‘गयस्फान’ का अर्थ हुआ ‘प्राण शक्ति को बढ़ाने वाला ।’
तीसरा अध्याय ] ४३
बंधा रहता है और (यज्ञ शाला के प्राग्वंश अर्थात् आगे के भाग
में) लाया जाता है, उस समय तक यह अरुण देवता का होता
है। इसलिये इस मन्त्र को पढ़ कर यह सोम को उसी के देवता
और उसी के छन्द से समृद्ध करता है। 'शिक्षमाणस्य' उसके
लिये आया है जो यज्ञ करता है क्योंकि वह सीखता है। 'ऋतुं
दक्षं वरुण संशिशाधि' से तात्पर्य है कि 'हे वरुण तुम वीर्य और
प्रजा को दो।' 'नाव' से तात्पर्य है यज्ञ का, जिससे भली भांति
मार्ग को तर जायं। काला मृग चर्म सुमार्ग है और वाणी नाव।
इस मन्त्र को पढ़ कर यजमान वाणी रूप नाव पर चढ़ता है और
स्वर्ग को पहुँच जाता है।
यह आठों मन्त्र पूर्ण रीत्या रूप-समृद्ध हैं। जिस मन्त्र में
जो क्रिया करनी हो उसी का विधान हो वह मन्त्र रूप-समृद्ध
होता है। ऐसे ही मन्त्र से यज्ञ सफल होता है।
इनमें से पहले (अद्रादभिश्चेय इति) और पिछले मन्त्र (इमां
धियमिति) को तीन तीन बार पढ़ा जाता है। इस प्रकार यह
बारह हो जाते हैं। बारह ही महीने वर्ष के होते हैं। वर्ष ही
प्रजापति है। जो इस रहस्य को समझता है वह प्रजापति के इन
मन्त्रों द्वारा सफल हो जाता है। पहले और पिछले मन्त्रों को
तीन तीन बार पढ़ कर वह यज्ञ रूपी रस्सी की दोनों गांठों को
कड़ी बांधता है जिससे वह फिसल न जाय। (२)
१४—(जिस गाड़ी में सोम राजा लाया जाता है) उसके एक
बैल को जुता रखते हैं और एक का खोल देते हैं। तब वह उसको
गाड़ी में से उतारते हैं। यदि दोनों बैलों को खोल कर उतारा
जाय तो वह सोम राजा "पितृदेवत्य" (पितरों के आधीन) हो
जाय। यदि दोनों बैलों को जुते हुये उतारें तो प्रजा के लिये
४४ [प्रथम. पञ्चिका
योगक्षेम✤ न हो। प्रजा तितर बितर हो जाय। विमुक्त बैल
घर में रहती हुई सन्तान का स्थानापन्न हैं और जो जुता हुआ
है वह क्रियाओं का रूप है। जो एक बैल को खोल कर और
एक को जुते हुये सोम को उतारता है वह दोनों प्रकार का कुशल
प्राप्त करता है अर्थात् वर्तमान और भविष्य।
देव और असुर इन लोकों में लड़े। वे पूर्व दिशा में लड़े।
वहाँ से असुर जीत गये। वे पश्चिम दिशा में लड़े। वहाँ से असुर
जीत गये। वह उत्तर दिशा में लड़े। वहाँ से भी असुर जीत
गये। वह उत्तर दिशा में लड़े। वहाँ देव न हारे। यही दिशा
अपराजिता है। इसलिये इसी दिशा में कार्य करे या करावे।
इसी दिशा से उसके ऋण दूर हो जायेंगे।
देवों ने कहा कि राजा न होने के कारण (असुर) हमको
जीत लेते हैं। इसलिये एक राजा चुन लें। सब ने कहा,
“अच्छा”। उन्होंने सोम राजा को चुना। उन्होंने सोम राजा
की सहायता से सब दिशायें जीत लीं। यह सोम राजा ही है
जो यज्ञ करता है। जब उसे (गाड़ी पर) रखते हैं तो वह पूर्वाभि-
मुख होता है। इस प्रकार यजमान पूर्व दिशा को जीत लेता है।
वे गाड़ी को दक्षिण को मोड़ते हैं। इस प्रकार दक्षिण दिशा को
जीतते हैं। जब गाड़ी उत्तर दिशा की ओर होती है वह (सोम
को) उतार लेते हैं। इससे उत्तर दिशा को जीत लेते हैं। जो इस
रहस्य को जानता है वह सोम राजा की सहायता से सब दिशायें
जीत लेता है। (३)
✤योग का अर्थ है कार्यपरायणता और क्षेम का अर्थ है विश्राम।
जुता हुआ बैल 'योग' का प्रतिनिधि है और खुला हुआ 'क्षेम' का।
—तै०,
तीसरा अध्याय ] ४५
१५—सोम राजा के आने पर आतिथ्य हवि बनाई जाती
है। सोमराजा यजमान के घरों में आता है। उसके लिये यह
आतिथ्य हवि तैय्यार की जाती है। इसीलिये इसको आतिथ्य-
हवि कहते हैं। (यह पुरोडाश) नौ कपालों में होता है। प्राण
नौ हैं। प्राणों के बनाने और प्राणों का ज्ञान प्राप्त करने के लिये।
यह पुरोडाश विष्णु का होता है क्योंकि विष्णु ही यज्ञ है। उसी
के देवता और उसी के छन्द से यज्ञ को सम्पादित करते हैं।
जब सोम खरीदा जाता है तो सब छन्द और सब पृष्ठ (सामवेद
के दो मंत्रों के जोड़े) उसके साथ आते हैं। जो-जो लोग राजा
के साथ आते हैं उन सभी का सत्कार किया जाता है।
जब सोम राजा आ जाता है तो अग्नि का मंथन किया जाता
है। जब कोई राजा या अन्य पुरुष आता है तो बैल या बांझ
गाय को मारते हैं। इसी प्रकार अग्नि का मथना भी पशु मारने के
तुल्य है क्योंकि अग्नि देवों का पशु है। ✡ (४)
१६—अध्वर्यु (होता से) कहता है "मथी हुई अग्नि के लिये
पढ़"। इस पर वह इस सविता सम्बन्धी अर्थात् सावित्री ऋचा
को पढ़ता है :—
अभि त्वा देव सवितरीशानं वार्याणाम्।
सदावन् भागमीमहे ॥ (ऋ० १।२४।३)
यहाँ प्रश्न उठता है कि मथी हुई अग्नि के लिये मंत्र बोलना
था और बोला सविता के लिये। यह क्यों ? इसका उत्तर यह
✡सायण ने 'उक्षाणं' का अर्थ 'वृषभ' किया है और 'वेहत्' का
'गर्भघातिनीं वृद्धां गां'। अगले खण्ड में सविता के विषय में जो कहा
गया वह तो बैल या गाय मारने की उपमा को सुसंगत नहीं करता।
यह समस्त प्रकरण विचारणीय है। बहुत से विद्वानों के मत में
अतिथि के लिये बैल या गाय मारने की बात भ्रममूलक है। —ले०
४६ [ प्रथम पञ्चिका
है कि सविता तो सभी उत्पत्तियों का स्वामी है। सविता की
प्रेरणा से ही अग्नि मथी जाती है। इस लिये सविता का मन्त्र
पढ़ा गया।
अब नीचे का द्यावा-पृथिवी का मन्त्र पढ़ा जाता है :—
मही ※द्यावा पृथिवी इह ज्येष्ठे रुचा भवतां शुचयद्भि॒िरर्कैः । यत्
सीं वरिष्ठे बृहती विमिन्वन् रूवद्धोक्षा प्रथानेभिरेवैः । (ऋ० ४।५६।१)
यहाँ प्रश्न उठता है कि जब मथी हुई अग्नि के लिये मन्त्र
पढ़ना है तो द्यावा-पृथिवी के लिये क्यों पढ़ते हैं। इसका उत्तर
यह है कि जब अग्नि उत्पन्न हुआ तो देवों ने उसे द्यौ और पृथिवी
के बीच में ग्रहण किया और द्यावा-पृथिवी के बीच में ही पकड़े
रक्खा। इस लिये द्यावा-पृथिवी का मंत्र पढ़ते हैं।
अग्नि को मथते समय तीन अग्नि की ऋचाओं को जो
गायत्री छन्द में पढ़ते हैं :—
त्वामग्ने पुष्करादध्यथर्वा निरमन्थत। मूर्ध्नो विश्वस्य वाघतः ॥
तमु त्वा दध्यङ् ऋषिः पुत्रईंधे अथर्वणः। वृत्रहणं पुरन्दरम् ॥
तमुत्या पाथ्यो वृषा समीधे दस्युहन्तमम्। धनञ्जयं रणे रणे ॥
(ऋ० ६।१६।१३, १४, १५)
इसी प्रकार वह अग्नि को उसी के देवता और उसी के छन्दों
द्वारा समृद्ध करता है। “अथर्वा निरमंथत” ऐसा कहने से मंत्र
रूप-समृद्ध हो जाता है। अर्थात् जो क्रिया करनी होती है यदि
वही मंत्र में भी वर्णित हो तो उस मंत्र को रूप-समृद्ध कहते हैं।
रूप-समृद्ध मंत्र से ही क्रिया सफल होती है।
यदि अग्नि न उत्पन्न हो या देर में उत्पन्न हो तो राक्षसों को
मारने वाली नीचे की ऋचायें पढ़ी जाती हैं :—
※ऐतरेय ब्राह्मण में “मही द्यौः पृथिवी चन” ऐसा पाठ है। क्या
यह यही मंत्र पाठान्तर के साथ है या अन्य कोई मंत्र ? —ले०
दूसरा अध्याय ] ४७
यह नौ मंत्र यह हैं :—
(१) अग्ने हंसि न्यत्रिणं दीद्यन् मर्त्येष्वा । स्वे क्षये शुचिव्रत ॥
(२) उत्तिष्ठसि स्वाहुतो घृतानि प्रति मोदसे । यत् त्वा स्रुचः समस्थिरन् ॥
(३) सन्नाहुतो विरोचतेऽग्निरीलेन्यो गिरा । स्रुचा प्रतीकमज्यते ॥
(४) घृतेनाग्निः समज्यते मधुप्रतीक आहुतः । रोचमानो विभावसुः ॥
(५) जरमाणः समिध्यसे देवेभ्यो हव्यवाहन । तं त्वा हवन्ते मर्त्याः ॥
(६) तं मर्ता अमर्त्यं घृतेनाग्निं सपर्यत । अदाभ्यं गृहपतिम् ॥
(७) अदाभ्येन शोचिषाग्ने रक्षस्त्वं दह । गोपा ऋतस्य दीदिहि ॥
(८) सत्वमग्ने प्रतीकेन प्रत्योष यातुधान्यः । उरुक्षयेषु दीद्यत् ॥
(६) तं त्वा गीर्भिरुरुक्षया हव्यवाहं समीधिरे । यजिष्ठं मानुषे जने ॥
(ऋ० १०।११८।१-६)
यह मंत्र राक्षसों के मारने के लिये पढ़े जाते हैं क्योंकि जब
अग्नि उत्पन्न नहीं होता या देर में उत्पन्न होता है तो राक्षस उसे
पकड़ लेते हैं ।
जब एक या दो या अधिक मंत्र पढ़ने पर अग्नि उत्पन्न हो
जाय तो उत्पत्ति के योग्य नीचे का मंत्र पढ़ना चाहिये :—
उत ब्रुवन्तु जन्तव उदग्निवृत्रहाजनि ।
धनञ्जयो रणे रणे ॥ (ऋ० १।७४।३)
जो यज्ञ का रूप-समृद्ध होता है उसी से यज्ञ सफल होता
है । अब यह मंत्र पढ़ता है :—
अयं हस्तेन खादि॒नं शिशुं जातं न बिभ्रति । विशामग्निं स्वध्वरम् ॥
(ऋ० ६।१६।४०)
मंत्र मे "हस्त" (हाथ) आया है । हाथ से ही तो अग्नि को
मथते हैं । 'शिशुं जातं" (पैदा हुआ बच्चा) शब्द आया है । जैसे
बच्चा उत्पन्न होता है उसी प्रकार अग्नि उत्पन्न होता है । "न
बिभ्रति" इत्यादि में जो 'न' है वह 'ओ३म्' अर्थात् स्वीकारी के
अर्थ में है । जैसे देवों के लिये, उसी प्रकार मनुष्यों के लिये ।
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४८ [ प्रथम पञ्चिका
अब पढ़ता है :—
प्र देवं देववीतये भरता वसुवित्तमम् । आ स्वे योनौ निषीदतु ॥
(ऋ० ६।१६।४१)
यह मन्त्र उस समय के लिये उपयुक्त है जब अग्नि आहव-
नीय कुण्ड में डाला जाता है ।
“आ स्वे योनौ निषीदतु” (वह अपने घर में बैठे) का तात्पर्य
यह है कि आहवनीय अग्नि का उचित स्थान है ।
आ जातं जात वेदसि प्रियं शिशीतातिथिम् । स्योन आ गृहपतिम् ॥
(ऋ० ६।१६।४२)
इस मन्त्र में 'जातं' एक (अर्थात् अग्नि) है और 'जातवेद'
दूसरा (अर्थात् आहवनीय) । 'प्रियं शिशीतातिथिम्' से यह जो
(मथा हुआ) अग्नि है वह दूसरे अग्नि (अर्थात् आहवनीय) का
प्यारा अतिथि है । “स्योन आ गृहपतिम्” से (ऋत्विज् अग्नि)
को शान्ति के साथ (आहवनीय) में स्थापित करता है ।
अग्निनाग्निः समिध्यते कविर्गृहपतिर्युवा । हव्यवाड् जुह्वास्यः ॥
(ऋ० १।१२।६)
यह मन्त्र तो यज्ञ का अभिरूप ही है और ठीक है ।
त्वं ह्यग्ने अग्निना विप्रो विप्रेण सन्सता । सखा सख्या समिध्यसे ॥
(ऋ० ८।४३।१४)
इस मन्त्र में एक अग्नि एक विप्र है और दूसरी अग्नि दूसरा
विप्र । एक अग्नि एक सत्ता है और दूसरी अग्नि दूसरी सत्ता ।
'सखा सख्या समिध्यसे' में एक सखा एक अग्नि है और दूसरा
'सखा दूसरी अग्नि है ।
तं मर्ज्यन्त सुक्रतुं पुरो यावानमाजिषु । स्वेषु क्षयेषु वाजिनम् ॥
(ऋ० ८।८४।८)
इस मन्त्र में 'स्वेषु क्षयेषु' का अर्थात् यह है कि एक अग्नि
दूसरी अग्नि का अपना ही घर है ।
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तीसरा अध्याय ] ४६
यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवास्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन् ।
ते ह नाक महिमानः सचन्त यत्र पूर्वे साध्याः सन्ति देवाः ।
(ऋ० १।१६४।५०)
इस मन्त्र से समाप्त करता है । देवों ने यज्ञ द्वारा ही यज्ञ
किया । अग्नि द्वारा ही अग्नि में यज्ञ करके देव स्वर्ग को गये
थे । "यह पहले धर्म थे ।" "वे बड़े लोग (महिमानः) उसी स्वर्ग
को प्राप्त हो गये जहां पहले साध्य लोग हैं । छन्द ही 'साध्य देव'
हैं जिन्होंने पहले अग्नि द्वारा अग्नि में यज्ञ किया । उन्होंने स्वर्ग
लोग की प्राप्ति की । वे आदित्य और अंगिरा थे । उन्होंने अग्नि
द्वारा अग्नि में यज्ञ किया । वह स्वर्ग लोक को प्राप्त हो गये ।
यह जो अग्नि की आहुति है वह स्वर्ग में ले जाने वाली आहुति
है । यदि यज्ञ करने वाला ठीक ब्राह्मण न हो या दुराचारी हो तो
भी यह आहुति देवताओं तक पहुँच जाती है । पापी से मिल कर
दूषित नहीं होती । जो इस रहस्य को समझता है उसकी आहुति
अवश्य ही देवताओं तक पहुँच जाती है । पापी से मिल कर
दूषित नहीं होती ।
यह तेरह मन्त्र हैं और सभी "रूप समृद्ध" हैं । यज्ञ तभी
सफल होता है जब मन्त्र यज्ञ का 'रूप समृद्ध' हो अर्थात् उसमें
वही वर्णन हो जैसी क्रिया करनी है । इन तेरह मन्त्रों में पहला
और अन्तिम तीन तीन बार बोला जाता है । इस प्रकार यह
सत्रह हो जाते हैं । 'प्रजापति' भी सत्रह अंगों वाला है । एक
सम्वत्सर या बारह मास और पांच ऋतुयें । प्रजापति ही संवत्सर
है । जो इस रहस्य को समझता है वह प्रजापति सम्बन्धी ऋचाओं
द्वारा सफल हो जाता है । पहले और पिछले मन्त्र को तीन तीन
बार पढ़ कर वह यज्ञ के आगे और पीछे में गांठ लगा देता है
जिससे वह यज्ञ बीच में से फिसल न सके । (५)
४
५० [ प्रथम पञ्चिका
१७—दोनों आज्य भागों के पुरोनुवाक्य यह हैं :—
समिधाग्नि दुवस्यत घृतैर्बोधयतातिथिम् । आस्मिन् हव्या जुहोतन ॥
(ऋ० ८।४४।१)
आ प्यायस्व समेतु ते विश्वतः सोम वृष्ण्यम् । भवा वाजस्य
सङ्गथे ॥ (ऋ० १।९१।१६)
इन दोनों ऋचाओं में आतिथ्य का वर्णन है। इसलिये यह
दोनों रूप-समृद्ध हैं। ऋचा की रूप-समृद्धता यही है कि जो क्रिया
करनी हो उसका उसमें विधान हो। पहली 'अतिथि' वाली ऋचा
का देवता अग्नि है। दूसरी का देवता सोम है, उसमें 'अतिथि'
शब्द नहीं आया। यदि सोम को सम्बोधित करने वाली किसी
ऋचा में 'अतिथि' शब्द आता तो उस ऋचा का प्रयोग किया
जाता। परन्तु यह ऋचा (ऋ० १।९१।१६) भी अतिथि के ही
लिये है क्योंकि इसमें 'आपीन' अर्थात् मोटे होने की ओर
संकेत करते हैं। जब अतिथि का सत्कार करते हैं तो मानों उसे
मोटा करते हैं।
अग्नि और सोम दोनों का याज्य मन्त्र 'जुषाणः' से आरम्भ
होता है। अनुवाक्य यह है :—
इदं विष्णुर्वि चक्रमे त्रेधा निदधे पदम् । समूळ्हमस्य पांसुरे ॥
(ऋ० १।२२।१७)
और याज्य मन्त्र यह है :—
तदस्य प्रियमभि पाथो अश्यां नरो यत्र देवयवो मदन्ति । उरुक्रमस्य
स हि बन्धुरित्था विष्णोः पदे परमे मध्व उत्सः ॥ (ऋ० १।१५४।५)
यह दोनों ऋचायें विष्णु सम्बन्धी हैं। पहली में तीन पद
हैं। उसको बोल कर दूसरी के चार पदों को बोलता है। इस
प्रकार सात पद हो जाते हैं।
आतिथ्य यज्ञ का सिर है। सिर में सात प्राण होते हैं।
तीसरा अध्याय ] ५१
इस कृत्य को करके होता यजमान के सिर में मानो सातों प्राणों
को रखता है।
स्विष्टकृत् के दो संयाज्य मन्त्र यह हैं :-
होतारं चित्ररथमध्वरस्य यज्ञस्य यज्ञस्य केतुं रुशन्तम्। प्रत्यर्धि
देवस्य देवस्य मह्ला श्रिया त्वग्निमतिथिं जनानाम् ॥ (ऋ० १०।९१।३)
प्र प्रायमग्निर्भरतस्य शृण्वे वि यत् सूर्यो न रोचते बृहद् भाः।
अभि यः पूरुं पृतनासु तस्थौ द्युतानो दैव्यो अतिथिः शुशोच ॥
(ऋ० ७।८।४)
यह दोनों अतिथि सम्बन्धी ऋचायें हैं। इसलिये रूप-समृद्ध
हैं। जो ऋचायें रूप समृद्ध होती हैं वे यज्ञ के लिये ठीक होती
हैं। क्योंकि ऋचाओं में वही बात होती है जिसको करना
होता है।
यह दोनों त्रिष्टुभ् हैं इसलिये इन्द्र की शक्ति पाने के लिये
ठीक हैं।
यज्ञ-अवशिष्ट खाने से कृत्य समाप्त हो जाता है। देवों ने
अतिथि-इष्टि के अन्त में यज्ञ शेष खाया। उसी से वह सन्तुष्ट
हो गये। इसलिये इस इष्टि की अन्तिम क्रिया यज्ञ-शेष का
भोग है।
इस इष्टि में प्रयाज आहुतियां दी जाती हैं। अनुयाज नहीं।
प्रयाज और अनुयाज दोनों ही प्राण हैं। शिर के प्राण प्रयाज
हैं। जो शरीर के निचले भाग के प्राण हैं वह अनुयाज हैं। जो
अनुयाज आहुतियां देना चाहे वह ऐसा ही होगा मानो बीच के
प्राणों को काट कर शिर में रख दे। यह अर्थ है कि शिर के
प्राण और निचले प्राण सब एक ही स्थान पर मिलें। इसलिये
इस इष्टि में यदि अनुयाज न हों, केवल प्रयाज ही हों तो अनु-
याज करने वाले का अभिप्राय भी सिद्ध हो ही जाता है। (६)
ऐतरेय ब्राह्मण की पहली पञ्चिका का तीसरा अध्याय समाप्त।
चौथा अध्याय
प्रवर्ग्य-इष्टि
१८—यज्ञ देवतों के पास से यह कह कर चला गया कि मैं
तुम्हारा अन्न नहीं बनूँगा। देवों ने कहा, “न जा, तू ही हमारा
अन्न होगा।” देवों ने उसको अंग-भंग कर दिया। अंग-भंग
किया हुआ यज्ञ उनके लिये प्रभावयुक्त (हितकर) न हुआ। देवों
ने कहा, “अंग-भंग किया यज्ञ हमारा अन्न नहीं बन सकता। इस
लिये इस यज्ञ को पूर्ण करना चाहिये। उन्होंने उसको पूर्ण
किया। जब पूर्ण हो गया तो उन्होंने कहा, “हे अश्विनौ ! तुम
दोनों इस यज्ञ को चंगा कर दो। दो अश्विन् देवों के चिकित्सक
हैं। अश्विन् देवों के अध्वर्यु हैं। इसलिये दोनों अध्वर्यु ✤ धर्म
(अर्थात् प्रवर्ग्य के लिये जो कुछ सामग्री होती है उस) को इकट्ठा
कर देते हैं। ऐसा करके वह कहते हैं :—
“ब्रह्म, हम प्रवर्ग्य-इष्टि करना चाहते हैं। होता ! तुम स्तुति
पढ़ो”। (१)
✤ एक अध्वर्यु और दूसरा प्रति-प्रस्थाता दोनों मिलकर दो
अध्वर्यु हुये।
( ५२ )
चौथा अध्याय ] ५३
१९—होता इस मंत्र से आरंभ करता है :—
ब्रह्म जज्ञानं प्रथमं पुरस्ताद् वि सीमतः सुरुचो वेन आवः। स
बुध्न्या उपमा अस्य विष्ठाः सतश्च योनिमसत्श्च विवः ॥
(यजु० १३।३; आश्व० श्रौ० सू० ४।६)
ब्रह्म ही वृहस्पति है। ब्रह्म के द्वारा ही इस (प्रवर्ग्य) की
चिकित्सा की जाती है।
इयं पित्रे राष्ट्र्येत्यग्रे प्रथमायजनुषेभूमनेष्ठाः ।
तस्मा एतं सुरुचं द्वारमह्यं धर्मे श्रीणंति प्रथमस्यधासेः ॥
(आश्व० श्रौ० सू० ४।६)
यह मंत्र पढ़ कर (होता) प्रवर्ग्य में वाणी का धारण करा
देता है। क्योंकि राष्ट्री अर्थात् महारानी वाणी है।
महान् मही अस्त भायद्द्विजातोद्यां पिता सद्म पार्थिवंचरजः ।
सबुध्नादाष्ट्रजनुषामभ्युग्रं बृहस्पतिर्देवता तस्य सम्राट् ॥
(आश्व० श्रौ० सू० ४।६)
यह ऋचा ब्रह्मणस्पति के प्रति है। ब्रह्म ही वृहस्पति है। ब्रह्म
के द्वारा ही इस (प्रवर्ग्य) की चिकित्सा करता है।
अभित्यं देवँसवितारमोण्योः कविक्रतुमर्चामि सत्य सवरत्न धाम-
म्भिप्रियं मतिं कविं। ऊर्ध्वायास्या मतिर्भा अदि द्युतत् सवीमनि हिरण्य
पाणिरमिमीत सुक्रतुः कृपास्वः ॥ (यजु० ४।२५; आश्व० श्रौ० सू० ४।६)
यह सविता के प्रति है। प्राण ही सविता है। इस प्रकार
इसमें प्राण धारण कराता है।
सं सीदस्व मँहाँ असि शोचस्व देववीतमः ।
वि धूममग्ने अरुषं मियेध्य सृज प्रशस्त दर्शतम् ॥ (ऋ० १।३६।६)
इस मंत्र से वह (प्रवर्ग्य को) बिठाते हैं।
अञ्जन्ति यं प्रथयन्तो न विप्रा वपावन्तं नाग्निना तपन्तः। पितुर्न
पुत्र उपसि प्रेष्ठ आ घर्मो अग्निमृतयन् नसादि ॥ (ऋ० ५।४३।७)
५४ [ प्रथम पञ्चिका
यह मंत्र घी लगाने के लिये उपयुक्त है। जिसमें रूप-समृद्धता
होती है वही मंत्र यज्ञ की क्रिया के लिये अधिक उपयुक्त होता
है।
पतङ्गमक्तमसुरस्य मायया हृदा पश्यन्ति मनसा विपश्चितः। समुद्रे
अन्तः कवयो विचक्षते मरीचीनां पदमिच्छन्ति वेधसः ॥
(ऋ० १०।१७७।१)
यो नः सनुत्यो अभिदासदग्ने यो अन्तरो मित्रमहो वनुष्यात्। तम-
जरेभिर्वृ'षभिस्तव स्वैस्तपा तपिष्ठ तपसा तपस्वान्। (ऋ० ६।५।४)
भवा नो अग्ने सुमना उपेतौ सखेव सख्ये पितरेव साधुः। पुरुद्रुहो
हि क्षितयो जनानां प्रति प्रतीचीर्दहतादरातीः। (ऋ० ३।१।२१)
इनमें पहली और दूसरी ऋचायें उपयुक्त हैं। जो रूप-समृद्ध
है वही यज्ञ में सिद्ध है।
नीचे की पाँच ऋचायें राक्षस को मारने के लिये हैं।
कृणुष्व पाजः प्रसितिं न पृथ्वीं याहि राजेवामवां इभेन। तृष्वीमनु
प्रसितिं द्रूणानोऽस्तासि विध्यरक्षसस्तपिष्ठैः ॥ (ऋ० ४।४।१
तव भ्रमास आशुया पतन्त्यनु स्पृश धृषता शोशुचानः। तपूंष्यग्ने
जुह्वा पतङ्गानसंदितो विसृज विष्वगुल्काः ॥ (ऋ० ४।४।२)
प्रतिस्पशो विसृज तूर्णितमो भवा पायुर्विशो अस्या अदब्धः। यो
नो दूरे अघशंसो यो अन्त्यग्ने माकिष्टे व्यथिरा दधर्षीत् ॥
(ऋ० ४।४।३)
उदग्नेतिष्ठ प्रत्यातनुष्व न्यमित्राँ ओषतात्तिग्महेते। यो नो अरातिं
समिधान चक्रे नीचा तं धक्ष्यतसं न शुष्कम् ॥ (ऋ० ४।४।४)
ऊर्ध्वो भव प्रति विध्याध्यस्मदाविष्कृणुष्व दैव्यान्यग्ने। अव स्थिरा
तनुहि यातुजूनां जामिमजामिं प्रमृणीहि शत्रून् ॥ (ऋ० ४।४।५)
परि त्वा गिर्वणो गिर इमा भवन्तु विश्वतः। वृद्धायुमनु वृद्धयो
जुष्टा भवन्तु जुष्टयः ॥ (ऋ० १।१०।१२)
चौथा अध्याय ] ५५
अधि द्वयोरदधा उक्थ्यं वचो यतस्रुचा मिथुना या सपर्यतः ।
असंयत्त व्रते ते क्षेति पुष्यति भद्रा शक्तिर्यजमानाय सुन्वते ॥
(ऋ० १।८३।३)
शुक्रं ते अन्यद् यजतं ते अन्यद् विषुरूपे अहनी द्यौरिवासि । विश्वा
हि माया अवसि स्वधावो भद्रा ते पूषन्निह रातिरस्तु ॥
(ऋ० ६।५८।१)
अपश्यं गोपामनिपद्यमान मा च परा च पथिभिश्चरन्तम् । स
सध्रीचीः स विषूचीर्वसान आ वरीवर्ति भुवनेष्वन्तः ॥ (ऋ० १०।१७७।३)
यह अकेली चार ऋचायें हैं । सब मिल कर इक्कीस हो
जाती हैं । इस पुरुष के भी इक्कीस अंग हैं । १० हाथ की
उंगलियां, दस पैर की, और एक आत्मा । इस प्रकार आत्मा
को २१ अंग वाला बना देता है । (२)
२०—अब नौ पवमानी ऋचायें आती हैं :—
ऋध्वे द्रप्सस्य धमतः समस्वरन्नृतस्य योना समरन्त नाभयः ।
त्रीनत्स मूर्ध्नो असुरश्चक्र आरभे सत्यस्य नावः सुकृतमपीपरन् ॥१॥
सम्यक् सम्यञ्चो महिषा अहेषत सिन्धोरूर्म्यावधि वेना अवीविपन् ।
मधोर्धारामिर्जनयन्तो अर्कमित् प्रियमिन्द्रस्य तन्वमवीवृधन् ॥२॥
पवित्रवन्तः परि वाचमासते पितैषां प्रत्नो अभिरक्षति व्रतम् ।
महः समुद्रं वरुणस्तिरोधधे धीरा इच्छेकुरुरुणोन्भारभम् ॥३॥
सहस्र धारेऽव ते समस्वरन् दिवो नाके मधुजिह्वा असश्चतः ।
अस्य स्पशो न निमिषन्ति भूर्णयः पदेपदे पाशिनः सन्ति सेतवः ॥४॥
पितुर्मातुर्ध्या ये समस्वरन्नृचा शोचन्तः सन्दहन्तो अव्रतान् ।
इन्द्रद्विष्टामप धमन्ति मायया त्वचमसिक्नीं भूमनो दिवस्परि ॥५॥
प्रत्नान् मानादध्या ये समस्वरञ्छू लोकयन्त्रासो रभसत्य मन्तवः ।
अपानद्वासो बधिरा अहासत ऋतस्य पन्थां न तरन्ति दुष्कृतः ॥६॥
सहस्र धारे वितते पवित्र आ वाचं पुनन्ति कवयो मनीषिणः ।
रुद्रास एषामिषिरासो अद्रुहः स्पशः स्वञ्चः सुदृशो नृचक्षसः ॥७॥
५६ [प्रथम पञ्चिका
ऋतस्य गोपा न दभाय सुक्रतु स्त्री ष पवित्रा हृद्यन्तरादधे ।
विद्वांस विश्वा भुवनाभि पश्यत्यवाजुष्टान् विध्यति कर्ते अव्रतान् ॥८॥
ऋतस्य तन्तुर्विततः पवित्र आ जिह्वाया अग्रे वरुणस्य मायया ।
धीराश्चित्तत् समिनक्षन्त आशताऽत्रा कर्तमव पदात्यप्रभुः ॥६॥
(ऋ० ९।७३।१-६)
प्राण नौ हैं। इन नौ ऋचाओं से वह (प्रवर्ग्य में) प्राण
स्थापित करता है।
अब वह कहता है :—
अयं वेनश्चोदयत् पृश्निगर्भा ज्योतिर्जरायू रजसो विमाने ।
इममपां सङ्गमे सूर्यस्य शिशुं न विप्रा मतिभी रिहन्ति ॥
(ऋ० १०।१२३।१)
( इस मन्त्र को पढ़ते हुये जब 'अयं' का उच्चारण करता
है तब होता अपनी नाभि की ओर संकेत करता है)। 'अयं'
नाभि के लिये आया है। क्योंकि कुछ प्राण नाभि के ऊपर
"वेनंति" अर्थात् चलते हैं और कुछ नीचे। इसलिये 'वेन' का
अर्थ है नाभि। क्योंकि प्राण नाभि से चलते हैं। 'नाभि' का
नाभित्व यही है। इस मन्त्र का उच्चारण करके 'होता' 'प्रवर्ग्य'
में प्राण-प्रतिष्ठा करता है।
अब वह कहता है :—
पवित्रं ते विततं ब्रह्मणस्पते प्रभुर्गात्राणि पर्येषि विश्वतः । अतप्त
तनूर्न तदामो अश्नुते शृतास इदद्वहन्तस्तत् समाशत ॥ (ऋ० ९।८३।१)
ꕤवियत् पवित्रंधिषणा अतन्वत···
इन मन्त्रों में 'पवित्र' शब्द आया है। इसलिये प्राण पवित्र
होते हैं। यह निचले अंग के प्राण हैं। इसलिये इन तीन मन्त्रों
को पढ़ कर वह प्रवर्ग्य में वीर्य, मूत्र और पुरीष धारण कराता
है। (३)
- ꕤपता नहीं कि यह कहां का मंत्र है। देखो आश्व० श्रौ० ४।६।३ ।