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सर्वकोश
ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

पृष्ठ 55, कुल 592 में से

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पृष्ठ 55

तीसरा अध्याय ] ४१.
वाला सखा" है। वही "किल्विषस्पृत्" या दोषों से रक्षा करने
वाला है। जो कोई "किल्विषं" या दोषी हो जाता है उसी की
वह रक्षा करता है।
जो श्रेष्ठ होता है वही दोषी हो जाता है (अर्थात् पहले ठीक
ठीक मंत्र उच्चारण करता है, फिर थक जाता है)। इसीलिये कहते
हैं (होता के प्रति), "अब मत पढ़ो"। (अध्वर्यु के प्रति) "अब
कृत्य मत करो"। जिससे जल्दी में गड़बड़ न हो जाय।
वह "पितुषणि" है। 'पितु' का अर्थ है 'अन्न' और 'सनि'
का अर्थ है 'दान'। 'पितु' दक्षिणा को भी कहते हैं। (यजमान
ऋत्विजों को सोमयज्ञ करने के बदले) दक्षिणा देता है। इस
प्रकार वह (सोम-राजा को ऋत्विजों के अर्थ) अन्न का देने वाला
बनाता है। "अरंहितो भवति वाजिनाय"। यहाँ इन्द्रियों की
शक्तियों का नाम "वाजिन" है। जो इस रहस्य को समझता है
उसकी इन्द्रियों की शक्ति बुढ़ापे तक क्षीण नहीं होती।
अब होता नीचे के मंत्र को पढ़ता है :-
आगन् देव ऋतुभिर्वर्धतु क्षयं दधातु नः सविता सुप्रजामिषम्।
स नः क्षपाभिरहभिश्च जिन्वतु प्रजावन्तं रयिमस्मे समिन्वतु ॥ ※
(ऋ० ४।५३।७)
“देव सविता ऋतुओं के साथ आवे। घर को समृद्ध करे।
और हमको सन्तान और धन से युक्त करे। वह हम पर रातों
और दिनों में कृपा करे। वह हमको सन्तान के सहित धन दे।”
'आगन् देवः' का अर्थ है, "वह (सोम) यहाँ आ गया है"।
“ऋतुभिर्वर्धतु क्षयं” में ऋतुयें सोम राजा के भाई हैं। जैसे
मनुष्यों में राजों के भाई हुआ करते हैं उसी प्रकार। होता इस
※ यह मन्त्र ऐ० ब्रा० में 'सोम' के लिये आया है। परन्तु ऋग्वेद
में यह सविता विषयक है। क्या सोम और सविता पर्याय हैं ? ले०