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सर्वकोश
ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

पृष्ठ 61, कुल 592 में से

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पृष्ठ 61

दूसरा अध्याय ] ४७
यह नौ मंत्र यह हैं :—
(१) अग्ने हंसि न्यत्रिणं दीद्यन् मर्त्येष्वा । स्वे क्षये शुचिव्रत ॥
(२) उत्तिष्ठसि स्वाहुतो घृतानि प्रति मोदसे । यत् त्वा स्रुचः समस्थिरन् ॥
(३) सन्नाहुतो विरोचतेऽग्निरीलेन्यो गिरा । स्रुचा प्रतीकमज्यते ॥
(४) घृतेनाग्निः समज्यते मधुप्रतीक आहुतः । रोचमानो विभावसुः ॥
(५) जरमाणः समिध्यसे देवेभ्यो हव्यवाहन । तं त्वा हवन्ते मर्त्याः ॥
(६) तं मर्ता अमर्त्यं घृतेनाग्निं सपर्यत । अदाभ्यं गृहपतिम् ॥
(७) अदाभ्येन शोचिषाग्ने रक्षस्त्वं दह । गोपा ऋतस्य दीदिहि ॥
(८) सत्वमग्ने प्रतीकेन प्रत्योष यातुधान्यः । उरुक्षयेषु दीद्यत् ॥
(६) तं त्वा गीर्भिरुरुक्षया हव्यवाहं समीधिरे । यजिष्ठं मानुषे जने ॥
(ऋ० १०।११८।१-६)
यह मंत्र राक्षसों के मारने के लिये पढ़े जाते हैं क्योंकि जब
अग्नि उत्पन्न नहीं होता या देर में उत्पन्न होता है तो राक्षस उसे
पकड़ लेते हैं ।
जब एक या दो या अधिक मंत्र पढ़ने पर अग्नि उत्पन्न हो
जाय तो उत्पत्ति के योग्य नीचे का मंत्र पढ़ना चाहिये :—
उत ब्रुवन्तु जन्तव उदग्निवृत्रहाजनि ।
धनञ्जयो रणे रणे ॥ (ऋ० १।७४।३)
जो यज्ञ का रूप-समृद्ध होता है उसी से यज्ञ सफल होता
है । अब यह मंत्र पढ़ता है :—
अयं हस्तेन खादि॒नं शिशुं जातं न बिभ्रति । विशामग्निं स्वध्वरम् ॥
(ऋ० ६।१६।४०)
मंत्र मे "हस्त" (हाथ) आया है । हाथ से ही तो अग्नि को
मथते हैं । 'शिशुं जातं" (पैदा हुआ बच्चा) शब्द आया है । जैसे
बच्चा उत्पन्न होता है उसी प्रकार अग्नि उत्पन्न होता है । "न
बिभ्रति" इत्यादि में जो 'न' है वह 'ओ३म्' अर्थात् स्वीकारी के
अर्थ में है । जैसे देवों के लिये, उसी प्रकार मनुष्यों के लिये ।