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सर्वकोश
ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

पृष्ठ 57, कुल 592 में से

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पृष्ठ 57

तीसरा अध्याय ] ४३
बंधा रहता है और (यज्ञ शाला के प्राग्वंश अर्थात् आगे के भाग
में) लाया जाता है, उस समय तक यह अरुण देवता का होता
है। इसलिये इस मन्त्र को पढ़ कर यह सोम को उसी के देवता
और उसी के छन्द से समृद्ध करता है। 'शिक्षमाणस्य' उसके
लिये आया है जो यज्ञ करता है क्योंकि वह सीखता है। 'ऋतुं
दक्षं वरुण संशिशाधि' से तात्पर्य है कि 'हे वरुण तुम वीर्य और
प्रजा को दो।' 'नाव' से तात्पर्य है यज्ञ का, जिससे भली भांति
मार्ग को तर जायं। काला मृग चर्म सुमार्ग है और वाणी नाव।
इस मन्त्र को पढ़ कर यजमान वाणी रूप नाव पर चढ़ता है और
स्वर्ग को पहुँच जाता है।
यह आठों मन्त्र पूर्ण रीत्या रूप-समृद्ध हैं। जिस मन्त्र में
जो क्रिया करनी हो उसी का विधान हो वह मन्त्र रूप-समृद्ध
होता है। ऐसे ही मन्त्र से यज्ञ सफल होता है।
इनमें से पहले (अद्रादभिश्चेय इति) और पिछले मन्त्र (इमां
धियमिति) को तीन तीन बार पढ़ा जाता है। इस प्रकार यह
बारह हो जाते हैं। बारह ही महीने वर्ष के होते हैं। वर्ष ही
प्रजापति है। जो इस रहस्य को समझता है वह प्रजापति के इन
मन्त्रों द्वारा सफल हो जाता है। पहले और पिछले मन्त्रों को
तीन तीन बार पढ़ कर वह यज्ञ रूपी रस्सी की दोनों गांठों को
कड़ी बांधता है जिससे वह फिसल न जाय। (२)
१४—(जिस गाड़ी में सोम राजा लाया जाता है) उसके एक
बैल को जुता रखते हैं और एक का खोल देते हैं। तब वह उसको
गाड़ी में से उतारते हैं। यदि दोनों बैलों को खोल कर उतारा
जाय तो वह सोम राजा "पितृदेवत्य" (पितरों के आधीन) हो
जाय। यदि दोनों बैलों को जुते हुये उतारें तो प्रजा के लिये