ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 62, कुल 592 में से
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४८ [ प्रथम पञ्चिका
अब पढ़ता है :—
प्र देवं देववीतये भरता वसुवित्तमम् । आ स्वे योनौ निषीदतु ॥
(ऋ० ६।१६।४१)
यह मन्त्र उस समय के लिये उपयुक्त है जब अग्नि आहव-
नीय कुण्ड में डाला जाता है ।
“आ स्वे योनौ निषीदतु” (वह अपने घर में बैठे) का तात्पर्य
यह है कि आहवनीय अग्नि का उचित स्थान है ।
आ जातं जात वेदसि प्रियं शिशीतातिथिम् । स्योन आ गृहपतिम् ॥
(ऋ० ६।१६।४२)
इस मन्त्र में 'जातं' एक (अर्थात् अग्नि) है और 'जातवेद'
दूसरा (अर्थात् आहवनीय) । 'प्रियं शिशीतातिथिम्' से यह जो
(मथा हुआ) अग्नि है वह दूसरे अग्नि (अर्थात् आहवनीय) का
प्यारा अतिथि है । “स्योन आ गृहपतिम्” से (ऋत्विज् अग्नि)
को शान्ति के साथ (आहवनीय) में स्थापित करता है ।
अग्निनाग्निः समिध्यते कविर्गृहपतिर्युवा । हव्यवाड् जुह्वास्यः ॥
(ऋ० १।१२।६)
यह मन्त्र तो यज्ञ का अभिरूप ही है और ठीक है ।
त्वं ह्यग्ने अग्निना विप्रो विप्रेण सन्सता । सखा सख्या समिध्यसे ॥
(ऋ० ८।४३।१४)
इस मन्त्र में एक अग्नि एक विप्र है और दूसरी अग्नि दूसरा
विप्र । एक अग्नि एक सत्ता है और दूसरी अग्नि दूसरी सत्ता ।
'सखा सख्या समिध्यसे' में एक सखा एक अग्नि है और दूसरा
'सखा दूसरी अग्नि है ।
तं मर्ज्यन्त सुक्रतुं पुरो यावानमाजिषु । स्वेषु क्षयेषु वाजिनम् ॥
(ऋ० ८।८४।८)
इस मन्त्र में 'स्वेषु क्षयेषु' का अर्थात् यह है कि एक अग्नि
दूसरी अग्नि का अपना ही घर है ।
CC-0.Panini Kanya Maha Vidyalaya Collection.