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ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

४४६ [ सातवीं पञ्चिका
हैं जैसे जल में जल या अग्नि में अग्नि डाली जाती है। इसमें न
तो अत्याचार है न यजमान को कोई हानि पहुँचती है। इस-
लिये यह यजमान का भाग ब्राह्मण को देना चाहिये।
कुछ ऋत्विज इसकी अग्नि में यह पढ़ कर आहुति दे-
देते हैं।
प्रजापते र्विभान्नाम लोकस्तस्मिंस्त्वादधामि सह यजमानेन स्वाहा।
परन्तु ऐसा न करना चाहिये। यजमान भाग यजमान ही
है। इसलिये जो यजमान भाग को अग्नि में छोड़ता है वह
यजमान को अग्नि में छोड़ता है। (जिसको ऐसा करते देखे)
उससे कहे "तूने यजमान को अग्नि में जला दिया। उसके
प्राण अग्नि जला देगी और वह मर जायगा।" सदा ऐसा ही
होता है। इसलिये ऐसा न करना चाहिये।(८)
ऐतरेय ब्राह्मण की सातवीं पञ्चिका का चौथा अध्याय समाप्त हुआ।

पाँचवाँ अध्याय
२७-सुपद्मा के लड़के विश्वतर ने श्यापर्णों को यज्ञ के
अधिकार से वंचित कर दिया। उन श्यापर्णों ने यह सुना तो
उसके यज्ञ में जाकर वेदी के भीतर बैठ गये। उनको देखकर
विश्वन्तर ने कहा, “यह पाप कर्म करने वाले यहाँ बैठे हैं। यह
दूसरे का नाम डुबोते हैं। इनको निकाल दो और वेदी के भीतर
मत बैठने दो।” नौकरों ने सुन कर उनको निकाल दिया।' वे
उठकर चिल्लाने लगे, “परीक्षित के पुत्र जनमेजय ने जब कश्यपों
के बिना यज्ञ करना आरंभ किया तो कश्यपों में से असितमृग
लोगों ने भूतवीरों को (जो कश्यपों के स्थान में यज्ञ के लिये
बुलाये गये थे) यज्ञ से निकाल दिया। यह असितमृग लोग
वीर थे। क्या हम में भी कोई ऐसा बलवान है जो इस
सोमपान को जीत ले (अर्थात् हमको यज्ञ में से वंचित न
होने दे)!”
( १४७ )

ब्राह्मण को कहते हैं ), तू जो कोई हो बता तो सही कि तूने

:४४८ [ सातवीं पञ्चिका
मृगंगु के पुत्र राम ने उत्तर दिया कि "वह वीर पुरुष मैं
हूँ"। यह राममार्गवेय श्यापर्ण था जिसने वेदों का अध्ययन
किया था। जब श्यापर्ण उठने लगे तो उसने राजा से कहा,
"हे राजन्, क्या तुम वेदी से ( मुझ जैसे ) वेदपाठी को भी
निकाल दोगे ?" उसने पूछा, "हे ब्रह्म बंधु (ब्रह्मबंधु पतित
ब्राह्मण को कहते हैं ), तू जो कोई हो बता तो सही कि तूने
यह ज्ञान कहाँ प्राप्त किया ?" (१)
२८—( राम ने उत्तर दिया ) कि "जब इन्द्र ने त्वष्टा के पुत्र
विश्वरूप का अपमान किया, वृत्र को मारा, यतियों को गीदड़ों
के सामने फेंक दिया, अरुन्मखों को मार डाला, ( अपने गुरु )
बृहस्पति को धिक्कारा, तो देवों ने इन्द्र को निकाल दिया और
सोमपान से वंचित कर दिया। जब इन्द्र सोमपान से बहिष्कृत
हो गया तो अन्य सब क्षत्रिय भी सोमपान से वंचित हो गये।
जब इन्द्र ने त्वष्टा से सोम चुरा लिया तो उसको भी उसमें से
फिर भाग मिल गया ! परन्तु क्षत्रिय अब भी सोमपान के
अधिकार से वंचित हैं। यहाँ केवल एक आदमी है जो जानता
है कि किस प्रकार सोमपान से वंचित क्षत्रिय को फिर सोमपान
का अधिकार मिल सकता है। तेरे नौकर ऐसे आदमी को वेदी
से क्यों निकालते हैं ?"
राजा ने पूछा, "हे ब्राह्मण, क्या तू इस विधि को जानता
है ?" राम ने कहा, "हाँ, मैं जानता हूँ।" राजा ने कहा, "हे
ब्राह्मण, मुझे बता"। राम ने कहा, "राजन्, मैं बताऊँगा।" (२)
२९-ऋत्विज् लोग इन भक्ष्य चीज़ों में से किसी एक को
ले सकते हैं—सोम, या दही या जल। अगर वे सोम को
लेंगे जो ब्राह्मणों का भक्ष है तो तू इस भक्ष के द्वारा ब्राह्मणों
को प्रसन्न करेगा। तेरी सन्तान में ब्राह्मत्व आ जायगा। वह
दान, सोमपान और भोजन के इच्छुक होंगे और इच्छानुसार

पाँचवाँ अध्याय ] ४४९
विचरेंगे । यदि क्षत्रिय में कोई दोष होगा, तो संतान में ब्राह्मणत्व
आवेगा । दूसरी या तीसरी पीढ़ी में वह ब्राह्मण जैसा पैदा
हो जायगा और वह ब्राह्मण लोगों के साथ रहना पसन्द
करेगा ।
अगर दही लेंगे जो कि वैश्यों का भक्ष्य है तो इससे तू
वैश्यों को प्रसन्न करेगा । तेरी सन्तान में वैश्यत्व आयेगा ।
वे दूसरों को कर देंगे, दूसरे उनको अपनी इच्छानुसार भोगेंगे ।
यदि उस क्षत्रिय में कोई दोष आ जायगा तो उसकी सन्तान
वैश्य होगी और दो या तीन पीढ़ियों में वे पूरे वैश्य हो जायँगे
और वैश्यों में रहना पसन्द करेंगे ।
यदि जल लेंगे जो कि शूद्रों का भक्ष्य है तो तू इस भक्ष्य से
शूद्रों को प्रसन्न करेगा । तेरी सन्तान में शूद्रत्व आयेगा । वह
दूसरों की सेवा करेंगे और दूसरे उनकी इच्छानुसार ताड़ना
करेंगे । यदि क्षत्रिय में कोई दोष आजायगा तो उसकी सन्तान
शूद्र होगी, और दो तीन पीढ़ियों में पूरी शूद्र हो जायगी और
शूद्रों के साथ रहने लगेगी । (३)
३०—“हे राजन्, यह तीन भक्ष हैं जिनमें से क्षत्रिय को
किसी को भी नहीं लेना चाहिये । परन्तु एक भाग उसी का है
जिसको उसे लेना चाहिये । न्यग्रोध वृक्ष की नीचे लटकने वाली
जड़ें, उदुम्बर, अश्वत्थ और प्लाक्ष के फल । इन का रस
निकाल कर पिये । यह उसी का भाग है।
जब देवता लोग यज्ञ करके स्वर्ग लोक को गये तो जिस
चमसे में सोम था वह टेढ़ा हो गया ( न्युब्जन् ) । उसकी बूँदों
के फैलने से न्यग्रोध वृक्ष हो गया, यह न्यग्रोध पहले कुरुक्षेत्र
में उपजे थे, अन्य स्थानों पर उन्हीं में से उपज उठे । इस लिये
कुरुक्षेत्र में अब तक न्यग्रोध को न्युब्ज कहते हैं । जो नीचे की
ओर बढ़े ( रोहन् ) उसको कहेंगे “न्यङ्ग्रोह” । उसी से 'न्यग्रोध'
२९

४५० [ सातवाँ पञ्चिका
हुआ । और उसी का न्यग्रोध हो गया क्योंकि उसकी शाखायें
नीचे को चलती हैं। देव परोक्ष प्रिय होते हैं। इसलिये
“न्यग्रोह” कहकर कुछ उलट कर (परोक्ष बनाकर) न्यग्रोध
कर लिया । (४)
३१—इस सोम रस में से जो नीचे गिरा उसकी नीचे
जाने वाली शाखायें हो गईं और जो ऊपर को गया उसके फल
हो गये। इसलिये जो क्षत्रिय न्यग्रोध की नीचे जाने वाली
जड़ें और उसके फल को खाता है वह अपने निज भक्ष्य से
वंचित नहीं होता । इसके सिवाय वह प्रतिनिधि रूप में सोम-
पान कर लेता है, क्योंकि यद्यपि वह सोमपान नहीं करता
किन्तु सोम के रूपान्तर का पान अवश्य करता है, क्योंकि
न्यग्रोध सोम का रूपान्तर है। वह परोक्ष रूप से ही ब्राह्मणत्व
को प्राप्त होता है। अर्थात् अपने पुरोहित, अपनी दीक्षा और
पुरोहित के प्रवर द्वारा । जैसे वृक्षों में न्यग्रोध है वैसे ही मनुष्यों
में क्षत्रिय। क्षात्र शक्ति (न्यग्रोध की भांति) सृष्टि में फैलती
है। उन्हीं का राष्ट्र होता है। न्यग्रोध भूमि में गढ़ा भी होता
है और अपनी शाखायें नीचे फैलाकर बढ़ता जाता है। जो
क्षत्रिय यज्ञ में न्यग्रोध की जड़ों और फलों का रस पान करता
है वह राष्ट्र में न्यग्रोध की सी प्रतिष्ठा पाता है और उसका
राष्ट्र सुदृढ़ हो जाता है। जैसे वृक्षों में न्यग्रोध प्रतिष्ठित होता
है वैसे ही क्षत्रिय राष्ट्र में प्रतिष्ठित है। जैसे न्यग्रोध अपनी
जड़ों को ज़मीन में भेज कर बहुत मज़बूत हो जाता है वैसे ही
राजा अपनी शक्ति की स्थापना करता है। और उसका राज्य
नष्ट नहीं होने पाता । (५)
३२—यह जो उदुम्बर के फल हैं यह अन्न के रस से उत्पन्न
हुये हैं और वनस्पतियों में सब से अधिक रस वाले हैं।
(उदुम्बर के फल का रस पीकर) राजा क्षत्रियत्व को वन-

चौथा अध्याय ] ४५१
स्पतियों के ओज से सम्पन्न कर देता है । अश्वत्थ वनस्पतियों
के तेज से उत्पन्न हुआ है । अश्वत्थ वनस्पतियों का राजा और
तेज है । ( इस का रस पीने से ) क्षत्रियत्व में साम्राज्य और
तेज धारण करता है ।
यह जो प्लाक्ष है वह वनस्पतियों के यश से उत्पन्न हुआ
है । इसमें वनस्पतियों का साम्राज्य और तेज है । इस प्रकार
क्षत्रिय क्षत्रियत्व में वनस्पतियों का साम्राज्य और यश धारण
करा देता है ।
जब यह चीजें उपस्थित हो जाती हैं तो सोमराजा को
खरीदते हैं । और उपवास के कृत्य करते हैं । उसी प्रकार जैसे
असली सोम यज्ञ में किया जाता है ।
उपवास के दिन ( यज्ञ से एक दिन पूर्व ) अध्वर्यु के पास
सोम निचोड़ने के सभी सामान आ जाने चाहियें जैसे चर्म,
दो तख्ते, द्रोण, कलश दशापवित्र ( छन्ना ), पत्थर, पूतभृत,
आधवनीय, स्थाली, उदंचन और चमसा । यह जो राजा के
लिये रस निचोड़ा गया इसके दो भाग करने चाहिये एक प्रातः-
सवन के लिये, दूसरा दोपहर के सवन के लिये । (६)
३३—जब त्रैत चमसों को आहुति के लिये उठाते हैं तब
यजमान के चमसों को भी उठाते हैं । उसमें तो तरुण दर्भ डाल
कर । और वषट् कार कहकर परिधि समिधाओं पर डालते हैं ।
एक दर्भ डालकर—
दधिक्राव्णो अकारिषम्... ऋ० ४।३६।६ )
यह मंत्र पढ़ते हैं उसमें स्वाहा जोड़ कर और वषट्कार
करके ।
दूसरा दर्भ डालकर यह मंत्र पढ़ते हैं—
आ दधिक्राः शवसा पंच कृष्टीः... ( ऋ० ४।६८।१० )

४५२ [ सातवीं पञ्चिका
जब ऋत्विज अपने चमसों को पीने के लिये उठावें, उस
समय यजमान भी अपने चमसे को उठावे।
जब होता 'इडा' कहे तब यजमान भी अपने चमसे को
पिये यह कहता हुआ:—
"यदत्र शिष्टं रसिनः सुतस्य यदिन्द्रो अपिबच्छचीभिः।
इदं तदस्य मनसा शिवेन सोमं राजानमिह भक्षयामि।"
अर्थात् "जो सोम इन्द्र ने इन्द्राणियों के साथ पिया और
उसमें से बच रहा उसको मैं प्रसन्नचित्त होकर पीता हूँ।"
यह वनस्पति का रस प्रसन्न चित्त से पिया जाकर हितकर
होता है। और उसका राष्ट्र उग्र और व्यथा-रहित होता है,
जो इस प्रकार सोम का भक्षण करता है।
नीचे का मंत्र पढ़कर मुँह पोंछता है:—
शं नः एधि हृदेपीतः प्रण आयूंजी'वसे सोम तारीरिति।
"हे सोम, तुम जो पिये गये हो हमारे हृदय के लिये
कल्याणकारी होओ। हमारे जीवन को बढ़ाओ।"
यदि वह मुँह न पोंछे तो सोम कहेगा कि किस नालायक
ने मुझे पिया और वह उसकी आयु को कम कर देगा। और
जो मुँह को पोंछ डालेगा तो उसका जीवन बढ़ेगा।
नीचे के दो मंत्रों से चमसा को आशीर्वाद देता है:—
आ प्यायस्व समेतु...( ऋ० १।६१।१६ )
सं ते पयांसि समु यन्तु वाजः...( ऋ० १।६१।१८ )
इसमें रूप समृद्धता है। जिसमें रूप समृद्धता होती है वही
सफल होता है। (७)
३४—जब ऋत्विज त्रैत चमसों को रख दें तो यजमान
भी अपने चमसे को रख दे। जब वे अपने चमसों को हिलावें
तो यजमान भी हिलावे।

पाँचवाँ अध्याय ] ४५३
अब नराशंस चमसे को उठावे और यह पढ़कर पियेः-
"देव सोम ते मति विदं ऊमैः पितृभिर्भक्षितस्य भक्ष्यामि"
"हे देव सोम, मैं तुम को पीता हूँ। तुम, जो मेरे मन को
जानते हो और जिनका "ऊम" पितरों ने पिया है।" इस प्रकार
यजमान नराशंस चमसे को प्रातः सवन में पीता है। दोपहर
के सवन में 'ऊमैः' के स्थान में 'ऊर्वैः' कहता है और तीसरे
सवन में "काव्यैः"। क्योंकि पितर लोग प्रातः काल को 'ऊम'
होते हैं, दोपहर को 'ऊर्व' और शाम को 'काव्य'। इस प्रकार
वह अमृत पितरों को सोम का पान कराता है।
प्रियव्रत सोम पीने वाले (सोमपा) ने कहा था, "जो सोम
पीता है और जिसके पितर सोम पीते हैं, उसके पितर अमर हो
जाते हैं और उसका राज दृढ़ और व्यथारहित हो जाता है।
प्रत्यभिमर्श (मुँह पोंछने की विधि) और आप्यायन
(चमसे को पानी से धोने की विधि) समान ही हैं अर्थात्
वही हैं जैसी ऊपर बयान की गईं। प्रातः सवन में उसी प्रकार
कार्य्य करना चाहिये जैसे सोमरस निकालने में, मध्य सवन
में भी उसी तरह और तृतीय सवन में भी उसी तरह। (तात्पर्य
यह है कि जैसे असली सोमरस निकालने में क्रिया की जाती
है उसी तरह राजा के लिये न्यग्रोध आदि का रस निकालने
में भी वही क्रिया करनी चाहिये)।
इस विधि को राम मार्गवेय ने सुषद्मान के पुत्र विश्वंतर से
कहा था। इस पर राजा ने कहा, 'हे ब्राह्मण, हम तुझे एक
हजार गौवें देते हैं। मेरे यज्ञ में श्यापर्ण लोग आवे"।
इसी विधि का कथन कवष के पुत्र तुर ने परीक्षित के लड़के
जन्मेजय से किया और इसी का पर्वत और नारद ने सहदेव
के पुत्र सोमक से। फिर यह बात सहदेव सार्जय से कही गई।
फिर बभ्रव दैवावृध से, फिर भीम वैदर्भ से, फिर नग्नजित

४५४ [ सातवीं पञ्चिका
गांधार से। इसका कथन अग्नि ने सनश्रुत अरिन्दम से किया,
ऋतुविद् जानकि से, वशिष्ठ ने पैजवन सुदास से।
वे सब इस प्रकार पान करके बड़े हो गये। ये सब महा-
राजा थे। जो क्षत्रिय यजमान इस प्रकार पान करता है उसकी
श्री सूर्य्य के समान चमकती है। सब दिशाओं से वह सूर्य्य के
समान बलि† (कर) लेता है और उसका राज्य व्यथा-रहित
हो जाता है। (८)
ऐतरेय ब्राह्मण की सातवीं पञ्चिका का पाँचवाँ अध्याय समाप्त हुआ
ऐतरेय ब्राह्मण की सातवीं पञ्चिका समाप्त हुई।
†बलि का अर्थ है कर या महसूल! बलि का अर्थ मांस या पशु-
वध नहीं है।

आठवीं पञ्चिका

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri
CC-0.Panini Kanya Maha Vidyalaya Collection.

पहला अध्याय
१—( राजसूय यज्ञ के ) प्रातःसवन और तृतीय सवन के
स्तोत्र और शस्त्र ( सोम यज्ञ के ) ऐकाहिकों के ही समान होते
हैं। क्योंकि ऐकाहिक के दोनों सवन शांत और प्रतिष्ठा-युक्त
हैं और शांति और प्रतिष्ठा के देने वाले हैं। ( परन्तु मध्य
सवन में भेद है ) । माध्यं दिन के पवमान का वर्णन हो चुका ।
जिसके पृष्ठ स्तोत्र में दोनों साम बृहत् सहित होते हैं। और
दोनों साम गाये जाते हैं। रथंतर साम का पहला मंत्र यह
है :—
आ त्वा रथं यथोतये……(१)
तुविष्म तुविक्रतो……(२)
यस्य ते महिना……(३) (ऋ० ८।४६।१-३)
और रथंतर का पिछला मंत्र यह है :—
इदं वसो सुतमन्धः……(१)
( ४५७ )

४५८ [आठवीं पञ्चिका
नृभिर्धूतः सुतो……(२)
तं ते यवं यथा……(३) (ऋ० ८।२१-३)
पवमान उक्थ मरुत्वतीय शस्त्र है जिसमें रथंतर साम है।
(मध्य सवन में) पवमान स्तोत्र को रथंतर की रीति से
गाते हैं। सहारा देने के लिये बृहत् पृष्ठ है। पहले और पिछले
स्तुति के मन्त्रों को रथंतर से गाते हैं। रथंतर ब्राह्मण है, बृहत्
क्षत्रिय है। ब्राह्मण क्षत्रिय से पहले होता है। राजा को समझना
चाहिये कि जब ब्राह्मण मेरे आगे हैं तो मेरा राष्ट्र सुदृढ़ और
विघ्नरहित होगा। रथन्तर अन्न है। पहले रखने से वह राजा
को खाना प्राप्त कराता है। रथन्तर यह पृथ्वी है, यह प्रतिष्ठा
है। पहले रखने से यह राजा को प्रतिष्ठा देता है।
इन्द्र को बुलाने का प्रगाथ वही है बिना किसी तबदीली के
(अविभक्तः) जो कि और सोम दिनों का है। ब्रह्मणस्पति का
प्रगाथ जिसकी विशेषता “उत्” है दोनों सामों में एक सा है।
धाय्या भी वही है बिना तबदीली के। मरुत्वतीय प्रगाथ
ऐकाहिकों का विशेष है। (१)
२—(पवमान उक्थ्य) का निविद् सूक्त यह है :—
जनिष्ठा उग्रः……(ऋ० १०।७३)
इसमें 'उग्र' भी है और 'सह' भी। यह क्षत्र का रूप है।
'ओजिष्ठ' भी क्षत्र का रूप है। 'बहुलाभिमानः' में 'अभि' शब्द
है जो 'पराजित करने का' रूप है। इस सूक्त में ११ ऋचायें हैं।
त्रिष्टुभ् में ११ अक्षर होते हैं। क्षत्रिय त्रिष्टुभ् का रूप है।
ओज इन्द्र का बल है। यह त्रिष्टुभ् है। ओज क्षत्रिय का
वीर्य है। इस प्रकार वह राजा को ओज, क्षत्र और वीर्य से
सम्पन्न करता है। यह 'गौरिवीत' सूक्त है। इससे मरुत्वतीय
शस्त्र समृद्ध हो जाता है। इसका ब्राह्मण पहले कहा जा
चुका है।

पहला अध्याय ] ४५९
त्वामिद्धि हवामहे......(१)
स त्वं नश्चित्र......(२) (ऋ० ६।४६।१-२)
यह बृहत् पृष्ठ है। बृहत् साम क्षत्र है। क्षत्र से राजा समृद्ध
होता है। बृहत् ज्यैष्ठ्य है। इस ज्यैष्ठ्य से राजा समृद्ध होता
है। बृहत् श्रेष्ठता है। इस श्रेष्ठता से राजा समृद्ध होता है।
"अभित्वासूर नोनुमः" यह रथंतर बृहत् साम का अनुरूप
है। यह लोक रथन्तर है, वह लोक बृहत् है। इस लोक का
वह लोक अनुरूप है, और उस लोक का यह लोक अनुरूप
है। इस प्रकार रथन्तर को बृहत् का अनुरूप बना लेते हैं
और दोनों लोकों का यजमान को भोग प्राप्त कर लेते हैं।
ब्रह्म रथन्तर है, क्षत्र बृहत् । ब्रह्म में क्षत्र प्रतिष्ठित है। और
क्षत्र में ब्रह्म। इस प्रकार दोनों सामों को सयोनिता प्राप्त
होती है।
धाय्या वही है,
यद् वावान (ऋ० १०।७४।६) । इसका ब्राह्मण पहले कहा
जा चुका।
साम प्रगाथ यह है :-
उभयं शृणवच्च न......(१)
तं हि स्वराजं......(२) (ऋ० ८।६१।१-२)
यह दोनों सामों का रूप है जो गाये जाते हैं। (२)
३-त मुष्टुहि यो अभिभूत्योजा......(ऋ० ६।१८)
इसमें 'अभिभूति' में 'अभि' है। 'अषाळ्हम्' 'उग्रं', 'सह-
मानम्' क्षत्र के भी रूप हैं। इसमें पन्द्रह मन्त्र हैं। ओज,
क्षत्र और वीर्य पन्द्रह अंक वाला है। इस ओज, क्षत्र तथा वीर्य
से राजा सम्पन्न होता है। यह भरद्वाज का सूक्त है। बृहत्
साम को भी भारद्वाज ने ही निकाला था। और यह आर्ष है।
वह राजसूय समृद्ध हो जाता है जिसमें बृहत् होता है। जब

४६० [ आठवां पञ्चिका
कोई क्षत्रिय यज्ञ करे तो बृहत् पृष्ठ को काम में लावे क्योंकि
इससे यज्ञ समृद्ध हो जाता है। (३)
४—( राजसूय यज्ञ के ) होत्रकों ( मैत्रावरुण, ब्राह्मणाच्छंसी
और अच्छावाक ) के कृत्य वही हैं जो ऐकाहिक यज्ञों में होते
हैं। ये जो ऐकाहिक कृत्य हैं वह शांति के लिये हैं, क्लृप्त
( अर्थात् समर्थ ) और प्रतिष्ठा के लिये हैं। और यह यज्ञ को
पूरा करते हैं और त्रुटि नहीं रहने देते। वे सर्वरूप और सर्व-
समृद्ध होते हैं अर्थात् उनमें कोई कमी नहीं होती। इससे यज्ञ
सर्वरूप और सर्वसमृद्ध हो जाता है। जो क्षत्रिय इसको करता
है वह समझता है, "इन होत्रकों के सर्वरूप और सर्वसमृद्ध
कृत्यों से मेरी कामनायें पूर्ण हों"। इसलिये जहाँ कहीं एकाहों
में स्तोम या पृष्ठ पूरे नहीं होते वहाँ होत्रकों के ऐकाहिक कृत्यों
से उनको समृद्ध बना देते हैं।
कहते हैं कि उक्थ्य को १५ स्तोम और शस्त्र वाला होना
चाहिये। क्योंकि इन्द्रियों की तीव्रता शक्ति है और ओज पन्द्रह
अंक वाला है। क्षत्र वीर्य है। क्षत्रिय बल है। इस प्रकार वह
ओज, क्षत्र और वीर्य से युक्त होता है।
इसके स्तोम और शस्त्र तीस ( पन्द्रह-पन्द्रह ) होते हैं।
विराट् छन्द में तीस अक्षर होते हैं। विराट् अन्न है। विराट्
में स्थापना करने का अर्थ यह है कि वह उसको अन्न में
स्थापित करता है। इसलिये वह उक्थ १५ अंकों वाला होना
चाहिये।
अग्निष्टोम जो ज्योतिष्टोम का भाग है यहाँ ठीक होगा।
त्रिवृत स्तोम ब्रह्म है और पंद्रह अंकों वाला क्षत्रिय। ब्रह्म क्षत्र
से पहले हैं। ( राजा को सोचना चाहिये ) "अगर ब्रह्म प्रथम हो
जायगा तो हमारा राष्ट्र सुदृढ़ और व्यथा-रहित हो जायगा"।
सत्रह वैश्यों का अंक है और इक्कीस शूद्रों का। स्तोमों में

पहला अध्याय ] ४६१
त्रिवृत् तेज है, पंचदश वीर्य है, सप्तदश सन्तान है और इक्कीस
प्रतिष्ठा है। इस प्रकार इसको तेज, वीर्य, सन्तान और प्रतिष्ठा
से सम्पन्न करता है। इसलिये ज्योतिष्टोम चाहिये। इसमें २४
स्तोम और शस्त्र चाहिये। संवत्सर में २४ अर्द्धमास होते हैं।
संवत्सर में सम्पूर्ण अन्न होते हैं। इस प्रकार वह यजमान
को सब प्रकार के अन्न से संयुक्त करता है। इसलिये
ज्योतिष्टोम का अग्निष्टोम चाहिये।
ऐतरेय ब्राह्मण की आठवीं पञ्चिका का पहला अध्याय समाप्त हुआ।

दूसरा अध्याय
५—अब जिस क्षत्रिय ने दीक्षा ली है और जिसको नया
छत्र प्राप्त हुआ है उसके पुनरभिषेक का प्रश्न है। अवभृथ स्नान
और पशुबंध्य कृत्य के पश्चात् अन्तिम इष्टि की जाती है।
इष्टि की समाप्ति पर पुनरभिषेक होता है। इसका सामान
पहले से ही तैयार होता है। उदुंबर की लकड़ी का तख्त हो।
उसके पाये प्रादेश मात्र (अंगूठे और उसके पास की उंगली के
बीच के स्थान के बराबर) हों। आधे हाथ के शीर्ष हों, मूंज के
बंधन हों, तख्त पर बिछाने के लिये शेर का चमड़ा हो, उदुंबर
का चमसा हो, उदुंबर की शाखा हो। उस उदुंबर के चमसे
में आठ चीजें हों :—दही, शहद, घी, धूप में बरसने वाला
मेंह का पानी, शष्प, तोक्म (जौ के पौधे), सुरा और दूर्व।
स्फ्या से लकीर खींचकर दक्षिण की ओर तख्त रखते हैं। और
उसका आगे का भाग पूर्व की ओर होता है। उसके दो पाये
( ४६२ )

दूसरा अध्याय ] ४६३
वेदी के भीतर होते हैं दो बाहर । यह पृथ्वी श्री है । जो वेदी
के भीतर है वह उसका परिमित रूप है । और जो वेदी के बाहर
है वह अपरिमित रूप है। अब यह जो वेदी के भीतर दो पाये
हैं और वेदी के बाहर दो पाये, इनसे वे सब कामनायें पूर्ण होती
हैं जो वेदी के भीतर से पूरी होती हैं या वेदी के बाहर से । (१)
६—तख्त को शेर के चमड़े से इस प्रकार ढक देता है कि
लोमं ऊपर को रहें और गर्दन पूर्व को । व्याघ्र जंगल के पशुओं
में क्षत्र है । राजा भी क्षत्र है । इस प्रकार क्षत्र से क्षत्र की समृद्धि
होती है । राजा उस पर बैठने के लिये पीछे से आता है। घुटने
टेक कर इस प्रकार बैठता है कि दाहिनी जाँघ ज़मीन से छू जाय
और दोनों हाथों से तख्त को पकड़ कर इस मंत्र का पाठ करता
है :—
“अग्निष्ट्वा गायत्र्या सयुक् छन्दसारोहत्व सवितोष्णिहा सोमोऽनुष्टुभा
बृहस्पतिर्बृ॑हत्या मित्रावरुणौ पंक्त्येंद्र॑स्त्रिष्टुभा विश्वेदेवा जगत्या तानह-
मनुराज्याय साम्राज्याय भौज्याय स्वाराज्याय वैराज्याय पारमेष्ठ्याय
राज्याय माहाराज्यायाधिपत्याय स्वावश्यायातिष्ठायारोहामि ।”
“हे तख्त, तुझ पर अग्नि गायत्री छन्द से चढ़े । सविता
उष्णिक् से, सोम अनुष्टुभ् से, बृहस्पति बृहत् से, मित्रावरुण
पंक्ति से, इन्द्र त्रिष्टुभ् से, विश्वेदेवा जगती से । इनके पीछे मैं
चढ़ूं, अनुराज्य, साम्राज्य, भोग, स्वाराज्य, वैराज्य, के लिये
और प्रजापति के लोक में जाने के लिये, राज्य के लिये, महा-
राज्य के लिये आधिपत्य के लिये, स्वतंत्रता के लिये, और
दीर्घ काल तक ठहरने के लिये ।”
इस मंत्र को पढ़कर राजा पहले दाहिना घुटना रखता है
फिर बायां । ऐसा होता है । यह लोगों का कहना है ।
देव तख्त रूपी श्री के ऊपर इस प्रकार छंदों से युक्त होकर
चढ़े कि अगला अगला छन्द पिछले पिछले छन्द से चार अक्षर

४६४ [ आठवीं पञ्चिका
अधिक हो । अग्नि गायत्री से, सविता उष्णिक् से, सोम अनु-
ष्टुभ् से, बृहस्पति बृहत् से, मित्रावरुण पंक्ति से, इन्द्र त्रिष्टुभ् से,
विश्वेदेवा जगती से । अब यह दो मंत्र पढ़े जाते हैं :—
अग्नेर्गायत्र्यभवत् सयुग्वो...( ४ )
विवराङ्मित्रावरुणयो...( ५ ) ( ऋ० १०।१३०।४-५ )
जो राजा इस प्रकार इन देवों के पीछे तख्त पर चढ़ता है
उसका उत्तरोत्तर योग क्षेम होता है । श्री को प्राप्त होता है। और
प्रजा का ऐश्वर्य और आधिपत्य प्राप्त करता है ।
जब पुरोहित राजा का अभिषेक करता है तो जलों की
शान्ति के लिये यह मंत्र बुलवाता है :—
“शिवेन मा चक्षुषा पश्यतापः शिवयातन्वोपस्पृशत त्वचं मे सर्वाँ
अग्नीँरप्सु षदो हुवे वो मयि वर्चो बलमोजो निधत्त ।”
“हे जलो, मुझको कल्याणकारी आँख से देखो, मेरी त्वचा
को अपने कल्याणकारी अंगों से छुओ । जो अग्नियाँ जलों में
हैं उन सब को मैं बुलाता हूँ कि वे वर्च, बल और ओज को
मुझ में धारण करावें ।”
यदि जलों का आह्वान न किया जाय तो वे अशांत होकर
उस अभिषेक वाले क्षत्रिय से वीर्य को छीन लेते हैं । (२)
७—अब उदुंबर की शाखा को उसके सिर पर रखकर जल
छिड़कते हैं और यह मंत्र पढ़ते जाते हैं :—
“इमा आपः शिवतमा इमाः सर्वस्य भेषजीः । इमा राष्ट्रस्यबर्ध नीरिमा
राष्ट्रभृतोऽमृताः । याभिरिन्द्रमभ्यषिंचत् प्रजापतिः सोमं राजानं वरुणं
यमं मनुं ताभिरद्भिरभिषिंचामि त्वामहं राज्ञां त्वमधिराजो भवेह । महान्तं
त्वा महीनां सम्राजं चर्षणीनां देवी जनित्र्यजीजनद् भद्रा जनित्र्य जीजनद्
देवस्य त्वा सवितुः प्रसवे ऽश्विनोर्बाहुभ्यां पूष्णो हस्ताभ्यामग्नेस्तेजसा
सूर्य्यस्य वर्चसे न्द्रियेणाभिषिंचामि । बलाय श्रियै यशसेऽन्नाद्याय ।”

दूसरा अध्याय ] ४६५
“ये जल कल्याणकारी, सब की औषध, राज के बढ़ाने
वाले, राज को क़ायम रखने वाले और अमृत हैं। इन्हीं के
द्वारा प्रजापति ने इन्द्र का, सोम राजा का, वरुण का, यम का
और मनु का राज्याभिषेक किया था। इन्हीं जलों से मैं तेरा
राज्याभिषेक करता हूँ, कि तू इस संसार में अधिराज हो।
तेरी माता देवी ने तुझे लोगों के ऊपर महान् राज करने के लिये
जना। तेरी भद्रा मा ने तुझे जना। देव सविता की प्रेरणा से,
अश्विनों के बाहुओं से, पूषा के दोनों हाथों से, अग्नि के तेज से,
इन्द्र की शक्ति से मैं तेरा अभिषेक करता हूँ कि तुझे बल, श्री,
यश और अन्न आदि प्राप्त हों।”
यदि पुरोहित चाहे कि राजा को अकेले ही बल आदि की
प्राप्ति हो तो ‘भू’ कहे, यदि दो की ( पुत्र सहित ) तो ‘भूः-
भुवः’ कहे। यदि तीन की ( पुत्र पौत्र सहित ), तो “भूर्भुवः
स्वः” कहे।
कुछ लोगों का कहना है कि चूंकि यह व्याहृतियाँ सब
चीजों की प्राप्ति कराती हैं, इसलिये इनके उच्चारण से दूसरों के
लिये ही कार्य्य होता है, अपने लिये नहीं। इसलिये यहाँ
“भूर्भुवःस्वः” व्याहृतियाँ न कहनी चाहियें। केवल ‘देवस्य त्वा
सवितुः’ इत्यादि बोलना चाहिये।
कुछ की राय है कि व्याहृतियों को छोड़कर पढ़ने से केवल
पहले जन्म के ऊपर ही अधिकार होता है, इस जन्म के लिये
नहीं।
सत्यकाम जाबाल का कथन है कि यदि व्याहृतियों को
छोड़कर मंत्र बोला जाय और अभिषेक किया जाय तो इसी
जीवन की सिद्धि होती है। उद्दालक आरुणि कहते हैं कि जो
व्याहृतियों सहित अभिषेक होता है उसमें राजा विजय पाकर
सभी चीज़ों की प्राप्ति कर लेता है।
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