ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचौथा अध्याय ] ४५१
स्पतियों के ओज से सम्पन्न कर देता है । अश्वत्थ वनस्पतियों
के तेज से उत्पन्न हुआ है । अश्वत्थ वनस्पतियों का राजा और
तेज है । ( इस का रस पीने से ) क्षत्रियत्व में साम्राज्य और
तेज धारण करता है ।
यह जो प्लाक्ष है वह वनस्पतियों के यश से उत्पन्न हुआ
है । इसमें वनस्पतियों का साम्राज्य और तेज है । इस प्रकार
क्षत्रिय क्षत्रियत्व में वनस्पतियों का साम्राज्य और यश धारण
करा देता है ।
जब यह चीजें उपस्थित हो जाती हैं तो सोमराजा को
खरीदते हैं । और उपवास के कृत्य करते हैं । उसी प्रकार जैसे
असली सोम यज्ञ में किया जाता है ।
उपवास के दिन ( यज्ञ से एक दिन पूर्व ) अध्वर्यु के पास
सोम निचोड़ने के सभी सामान आ जाने चाहियें जैसे चर्म,
दो तख्ते, द्रोण, कलश दशापवित्र ( छन्ना ), पत्थर, पूतभृत,
आधवनीय, स्थाली, उदंचन और चमसा । यह जो राजा के
लिये रस निचोड़ा गया इसके दो भाग करने चाहिये एक प्रातः-
सवन के लिये, दूसरा दोपहर के सवन के लिये । (६)
३३—जब त्रैत चमसों को आहुति के लिये उठाते हैं तब
यजमान के चमसों को भी उठाते हैं । उसमें तो तरुण दर्भ डाल
कर । और वषट् कार कहकर परिधि समिधाओं पर डालते हैं ।
एक दर्भ डालकर—
दधिक्राव्णो अकारिषम्... ऋ० ४।३६।६ )
यह मंत्र पढ़ते हैं उसमें स्वाहा जोड़ कर और वषट्कार
करके ।
दूसरा दर्भ डालकर यह मंत्र पढ़ते हैं—
आ दधिक्राः शवसा पंच कृष्टीः... ( ऋ० ४।६८।१० )