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सर्वकोश
ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

पृष्ठ 464, कुल 592 में से

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४५० [ सातवाँ पञ्चिका
हुआ । और उसी का न्यग्रोध हो गया क्योंकि उसकी शाखायें
नीचे को चलती हैं। देव परोक्ष प्रिय होते हैं। इसलिये
“न्यग्रोह” कहकर कुछ उलट कर (परोक्ष बनाकर) न्यग्रोध
कर लिया । (४)
३१—इस सोम रस में से जो नीचे गिरा उसकी नीचे
जाने वाली शाखायें हो गईं और जो ऊपर को गया उसके फल
हो गये। इसलिये जो क्षत्रिय न्यग्रोध की नीचे जाने वाली
जड़ें और उसके फल को खाता है वह अपने निज भक्ष्य से
वंचित नहीं होता । इसके सिवाय वह प्रतिनिधि रूप में सोम-
पान कर लेता है, क्योंकि यद्यपि वह सोमपान नहीं करता
किन्तु सोम के रूपान्तर का पान अवश्य करता है, क्योंकि
न्यग्रोध सोम का रूपान्तर है। वह परोक्ष रूप से ही ब्राह्मणत्व
को प्राप्त होता है। अर्थात् अपने पुरोहित, अपनी दीक्षा और
पुरोहित के प्रवर द्वारा । जैसे वृक्षों में न्यग्रोध है वैसे ही मनुष्यों
में क्षत्रिय। क्षात्र शक्ति (न्यग्रोध की भांति) सृष्टि में फैलती
है। उन्हीं का राष्ट्र होता है। न्यग्रोध भूमि में गढ़ा भी होता
है और अपनी शाखायें नीचे फैलाकर बढ़ता जाता है। जो
क्षत्रिय यज्ञ में न्यग्रोध की जड़ों और फलों का रस पान करता
है वह राष्ट्र में न्यग्रोध की सी प्रतिष्ठा पाता है और उसका
राष्ट्र सुदृढ़ हो जाता है। जैसे वृक्षों में न्यग्रोध प्रतिष्ठित होता
है वैसे ही क्षत्रिय राष्ट्र में प्रतिष्ठित है। जैसे न्यग्रोध अपनी
जड़ों को ज़मीन में भेज कर बहुत मज़बूत हो जाता है वैसे ही
राजा अपनी शक्ति की स्थापना करता है। और उसका राज्य
नष्ट नहीं होने पाता । (५)
३२—यह जो उदुम्बर के फल हैं यह अन्न के रस से उत्पन्न
हुये हैं और वनस्पतियों में सब से अधिक रस वाले हैं।
(उदुम्बर के फल का रस पीकर) राजा क्षत्रियत्व को वन-