सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

पृष्ठ 474, कुल 592 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 474

४६० [ आठवां पञ्चिका
कोई क्षत्रिय यज्ञ करे तो बृहत् पृष्ठ को काम में लावे क्योंकि
इससे यज्ञ समृद्ध हो जाता है। (३)
४—( राजसूय यज्ञ के ) होत्रकों ( मैत्रावरुण, ब्राह्मणाच्छंसी
और अच्छावाक ) के कृत्य वही हैं जो ऐकाहिक यज्ञों में होते
हैं। ये जो ऐकाहिक कृत्य हैं वह शांति के लिये हैं, क्लृप्त
( अर्थात् समर्थ ) और प्रतिष्ठा के लिये हैं। और यह यज्ञ को
पूरा करते हैं और त्रुटि नहीं रहने देते। वे सर्वरूप और सर्व-
समृद्ध होते हैं अर्थात् उनमें कोई कमी नहीं होती। इससे यज्ञ
सर्वरूप और सर्वसमृद्ध हो जाता है। जो क्षत्रिय इसको करता
है वह समझता है, "इन होत्रकों के सर्वरूप और सर्वसमृद्ध
कृत्यों से मेरी कामनायें पूर्ण हों"। इसलिये जहाँ कहीं एकाहों
में स्तोम या पृष्ठ पूरे नहीं होते वहाँ होत्रकों के ऐकाहिक कृत्यों
से उनको समृद्ध बना देते हैं।
कहते हैं कि उक्थ्य को १५ स्तोम और शस्त्र वाला होना
चाहिये। क्योंकि इन्द्रियों की तीव्रता शक्ति है और ओज पन्द्रह
अंक वाला है। क्षत्र वीर्य है। क्षत्रिय बल है। इस प्रकार वह
ओज, क्षत्र और वीर्य से युक्त होता है।
इसके स्तोम और शस्त्र तीस ( पन्द्रह-पन्द्रह ) होते हैं।
विराट् छन्द में तीस अक्षर होते हैं। विराट् अन्न है। विराट्
में स्थापना करने का अर्थ यह है कि वह उसको अन्न में
स्थापित करता है। इसलिये वह उक्थ १५ अंकों वाला होना
चाहिये।
अग्निष्टोम जो ज्योतिष्टोम का भाग है यहाँ ठीक होगा।
त्रिवृत स्तोम ब्रह्म है और पंद्रह अंकों वाला क्षत्रिय। ब्रह्म क्षत्र
से पहले हैं। ( राजा को सोचना चाहिये ) "अगर ब्रह्म प्रथम हो
जायगा तो हमारा राष्ट्र सुदृढ़ और व्यथा-रहित हो जायगा"।
सत्रह वैश्यों का अंक है और इक्कीस शूद्रों का। स्तोमों में