ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
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अधिक हो । अग्नि गायत्री से, सविता उष्णिक् से, सोम अनु-
ष्टुभ् से, बृहस्पति बृहत् से, मित्रावरुण पंक्ति से, इन्द्र त्रिष्टुभ् से,
विश्वेदेवा जगती से । अब यह दो मंत्र पढ़े जाते हैं :—
अग्नेर्गायत्र्यभवत् सयुग्वो...( ४ )
विवराङ्मित्रावरुणयो...( ५ ) ( ऋ० १०।१३०।४-५ )
जो राजा इस प्रकार इन देवों के पीछे तख्त पर चढ़ता है
उसका उत्तरोत्तर योग क्षेम होता है । श्री को प्राप्त होता है। और
प्रजा का ऐश्वर्य और आधिपत्य प्राप्त करता है ।
जब पुरोहित राजा का अभिषेक करता है तो जलों की
शान्ति के लिये यह मंत्र बुलवाता है :—
“शिवेन मा चक्षुषा पश्यतापः शिवयातन्वोपस्पृशत त्वचं मे सर्वाँ
अग्नीँरप्सु षदो हुवे वो मयि वर्चो बलमोजो निधत्त ।”
“हे जलो, मुझको कल्याणकारी आँख से देखो, मेरी त्वचा
को अपने कल्याणकारी अंगों से छुओ । जो अग्नियाँ जलों में
हैं उन सब को मैं बुलाता हूँ कि वे वर्च, बल और ओज को
मुझ में धारण करावें ।”
यदि जलों का आह्वान न किया जाय तो वे अशांत होकर
उस अभिषेक वाले क्षत्रिय से वीर्य को छीन लेते हैं । (२)
७—अब उदुंबर की शाखा को उसके सिर पर रखकर जल
छिड़कते हैं और यह मंत्र पढ़ते जाते हैं :—
“इमा आपः शिवतमा इमाः सर्वस्य भेषजीः । इमा राष्ट्रस्यबर्ध नीरिमा
राष्ट्रभृतोऽमृताः । याभिरिन्द्रमभ्यषिंचत् प्रजापतिः सोमं राजानं वरुणं
यमं मनुं ताभिरद्भिरभिषिंचामि त्वामहं राज्ञां त्वमधिराजो भवेह । महान्तं
त्वा महीनां सम्राजं चर्षणीनां देवी जनित्र्यजीजनद् भद्रा जनित्र्य जीजनद्
देवस्य त्वा सवितुः प्रसवे ऽश्विनोर्बाहुभ्यां पूष्णो हस्ताभ्यामग्नेस्तेजसा
सूर्य्यस्य वर्चसे न्द्रियेणाभिषिंचामि । बलाय श्रियै यशसेऽन्नाद्याय ।”