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ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

६२८ [ पाँचवीं पञ्चिका
“अग्ने मृडमहाँ असि” ( ऋ० ४६ )
इसमें 'महद्' आया है । यह आठवें दिन का रूप है ।
यह सब गायत्री छन्द में हैं, इस त्र्यह के तीसरे सवन का
वाहक छन्द गायत्री है । ( ४ )
ऐतरेय ब्राह्मण की पाँचवीं पञ्चिका का तीसरा अध्याय समाप्त हुआ ।

चौथा अध्याय
२०—यह जो समानोदर्क है वह नवें दिन का रूप हैं यह
वही है जो तीसरे दिन का। इसकी विशेषतायें यह हैं :-
अश्व, अन्त, पुनरावृत्ति, पुनर्निवृत्ति, रमण करना, पर्यास,
तीन की संख्या, अन्त का रूप, अन्त के पद में देवता का
निर्वचन, स्वर्ग लोक का उल्लेख, शुचि, सत्य, क्षेति अर्थात्
रहना, गत (गुज़र जाना), ओक (घर) और भूतकालिक
क्रिया। यह तीसरे दिन के रूप हैं। यही नवें दिन के भी।
नवें दिन का आज्य सूक्त यह हैं :—
अगन्म महा नमसा यविष्ठम् (ऋ० ७।१।२)
इसमें 'गत' शब्द है। यह नवें दिन का रूप हैं। छन्द त्रिष्टुभ्
है। इस त्र्यह के प्रातः सवन का छन्द त्रिष्टुभ् है।
प्र उग शस्त्र के मंत्र यह हैं:—
प्र-वीरया शुचयो दद्रिरे वामध्वयु भिर्मधुमन्तः सुतासः। वह वायो।
नियुतो याह्यच्छा पिबा सुतस्यान्धसोमदाय ॥ ( ऋ० ७।६०।१ )
( ३२९ )

३३० [ पाँचवीं पञ्चिका
ते सत्येन मनसा दीध्यानाः स्वेन युक्तासः
ऋतुना वहन्ति । इन्द्रवायू वीरवाहं रथं
वामीशानयोरभि पृक्षः सचन्ते ॥ ( ऋ० ७।६०।५ )
दिवि क्षयन्ता रजसः पृथिव्यां प्र वां घृतस्य निर्णिजो ददीरन् । हव्यं
-नो मित्रो अर्यमा सुजातो राजा सुक्षत्रो वरुणो जुषन्त । (ऋ० ७।६४। १)
आ विश्ववाराश्विना गतं नः प्र तत् स्थानमवाचि वां पृथिव्याम् ।
अश्वो न वाजी शुनपृष्ठो अस्थादा यत्सेदुश्चुर्वसे न योनिम् ॥
सिषक्ति सा वां सुमतिश्चनिष्ठोऽतापि घर्मो मनुषो दुरोणे ।
यो वां समुद्रान्सरितः पिपर्त्येत्तग्वा चिन्न सुयुजा युजानः ॥
यानि स्थान्यश्विना दधाथे दिवो यह्वीष्वोषधीषु विक्षु ।
नि पर्वतस्य मूर्धनि सदन्तेषं जनाय दाशुषे वहन्ता ॥
( ऋ० ७।७०।१-३)
अयं सोम इन्द्र तुभ्यं सुन्व आ तु प्र याहि हरिवस्तदोकः ।
पिबत्वस्य सुषुतस्य चारोर्ददो मघानि मघवन्नियानः ॥
ब्रह्मन् वीर ब्रह्मकृतिं जुषाणोऽर्वाचीनो हरिभिर्याहि तूयम् । अस्मिन्न्
षु सवने मादयस्वोप ब्रह्माणि शृणव इमा नः ॥
का ते अस्त्यरंकृतिः सूक्तैः कदा नूनं ते मघवन् दाशेम विश्वा मतीरा
ततने त्वायाऽधाम इन्द्र शृणवो हवेमा । ( ऋ० ७।२६।१-३ )
प्र ब्रह्माणो अङ्गिरसो नक्षन्त प्र क्रन्दनुर्नभन्यस्य वेतु । प्र धेनव
उदप्रुतो नवन्त युज्यतामद्री अध्वरस्य पेशः ॥
सुगस्तै अग्ने सनवित्तो अध्वा युक्ष्वा सुते हरितो रोहितश्च । ये
वा सधस्रषा वीरवाहो हुवे देवानां जनिमानि सक्तः ॥
समु वो यज्ञं महयन्नमोभिः प्र होता मन्द्रो रिरिच उपाके ।
यजस्व सु पुरुणीक देवानां यज्ञियामरमतिं ववृत्याः ॥
( ऋ० ७।४२।१-३ )
सरस्वतीं देवयन्तो हवन्ते सरस्वतीमध्वरे तायमाने । सरस्वतीं
सुकृतो अह्वयन्त सरस्वती दाशुषे वार्यं दात् ॥

चौथा अध्याय ] ३३१
सरस्वति या सरथं ययाथ स्वधामिद्वि पितृभिर्मदन्ती । आसद्यास्मिन्
बर्हिषि मादयस्वऽनमीवा इष आ वेह्यस्मे ॥
सरस्वतीं यां पितरो हवन्ते दक्षिणा यज्ञमभिनक्षमाणाः । सहस्रा-
र्घमिडो अत्र भागं रायस्पोषं यजमानेषु धेहि ॥ ( ऋ० १०।१७।७ ६ )
आ नो दिवो बृहतः पर्वतादा सरस्वती यजता गन्तुयज्ञम् । हवं देवी
जुजुषाणा घृताची शग्मां नो वाचमुशती शृणोतु ॥
आ वेशसं नीलपृष्ठं बृहन्तं बृहस्पतिं सदनं सादयध्वम् । सादद्योनि
दम आ दीदिवांसं हिरण्यवर्णमरुषं सपेम ॥
आ धर्षत्सिन्वँ इन्दिनोराणो विश्वेभिर्गन्त्वोममिहुवानः । ग्ना वसान
ओषधीरमृतृन्त्रिधातुशृङ्गो वृषभो वयोधाः ॥ (ऋ० ५।४३।११-१३)
सरस्वत्यभि नो नेषि वस्यो माप स्फरीः पयसा मा न आ धक् ।
जुषस्व नः सख्या वेश्या च मा त्वत् क्षेत्राण्यरणानि गन्म ॥
( ऋ० ६।६१।१४ )
इन मंत्रों में शुचि, सत्य, चेति, गत, ओक आये हैं । यह
नवें दिन का रूप है । छन्द त्रिष्टुभ् है । इस त्र्यह के प्रातः
सवन का छन्द त्रिष्टुभ् ही है ।
जो तीसरे दिन के आतान हैं वही नवें के । वही नवें दिन
का रूप हैं :—
अर्थात्
तं तमिद्राधसे मह...... ( ऋ० ८.६८।७ )
इन्द्रस्य सोमा......
इन्द्र नेदीय एदहि...... ( ऋ० ८।५३।५ )
प्रनूनं ब्रह्मणस्पतिः...... ( ऋ० १।४०।५ )
अग्निर्नैतात्वं सोमक्रतुभिः......
पिन्वन्त्यपो...... ( ऋ० १।६४।६ )
न किः सुदासो रथम्...... ( ऋ० ७।३२।१० )
इन्द्रः स्वाहा पिबतु यस्य सोमः ( ऋ० ३।५० )

३३२ [ पाँचवीं पञ्चिका .
इस सूक्त में स्वाहाकार अन्त वाला है। 'अन्त' नवें दिन
का रूप है।
गायन्त्साम नभन्यं यथावेः ( ऋ० १।१७३ )
इस सूक्त में "अर्चाम तद्वावृधानं स्वर्वत्" इसमें "स्वः"
अन्त वाला है। अन्त नवें दिन का रूप है।
"तिष्ठा हरी रथ आ युज्यमाना" ( ऋ० ३।३५ )
इसमें 'स्था' अन्त वाला है। और 'अन्त' नवें दिन का
रूप है।
"इमा उ त्वा पुरुतमस्य कारोः" ( ऋ० ६।२१ )
इसमें "धियोरथेष्ठा" में 'स्था' अन्त वाला है। अन्त नवें
दिन का रूप है।
यह त्रिष्टुभ् छन्द में हैं। इस प्रतिष्ठित पद से सवन को
क़ायम रखता है और गिरने नहीं देता।
प्रमन्दिने पितुमदर्चंतावच......( ऋ० १।१०१ )
यह सूक्त समानोदर्कं है। यह नवें दिन का रूप है। यह
जगती छन्द में है। इस त्र्यह के मध्य सवन का वाहक छन्द
जगती है। जो छन्द वाहक होता है उसी में निविद् रक्खा
जाता है। इस लिये निविद् जगती छन्द में रक्खा गया है।
यह मिथुन सूक्त पढ़े गये, त्रिष्टुभ् भी और जगती भी।
पशु मिथुन हैं। पशु छन्दोम हैं। पशुओं की वृद्धि के लिये यह
पाँच सूक्त पढ़े जाते हैं। पंक्ति में पाँच पद होते हैं। यज्ञ पाँच
पद वाला होता है। पशु पाँच पद वाले होते हैं। पशु
छन्दोम हैं। पशुओं की वृद्धि के लिये ऐसा किया जाता है।
नवें दिन के बृहत् पृष्ठ यह हैं :—
त्वामिद्धि हवामहे...... ( ऋ० ६।४६।१ )
त्वं ह्यहि चेरवे...... ( ऋ० ८।६१।७ )

चौथा अध्याय ] ३३३
धाय्या वही है—
यद् वावान्...... (ऋ० १०।ऽ४।६)
अभित्वा शूर नोनुम...... (ऋ० ७।३२।२२)
इससे सबको योनि की ओर लौटाते हैं क्योंकि यह क्रम
के अनुसार रथंतर है।
सामप्रगाथ यह है :-
इन्द्र त्रिधातु शरणं त्रिवरूथं स्वस्तिमत् । छर्दिर्य॑च्छ मघवद्भ्यश्च
मह्यं च यावया दिद्युमेभ्यः ॥
ये गव्यता मनसा शत्रुमादभुरभिप्रघ्नन्ति धृष्णुया । अद्य स्मा नो
मघवन्निन्द्र गिर्वणस्तनूपा अन्तमो भव ॥ (ऋ० ६।४६।६—१०)
इसमें 'त्रि' है यह नवें दिन का रूप है।
तार्क्ष्या वही है :—
त्यमूर्षु वाजिनं देवजूतम् ॥ (ऋ० १०।१७८।१)
सं च त्वे जग्मुर्गिर इन्द्र पूर्वी......(ऋ० ६।३४)
२१—इसमें 'गत' शब्द है। यह नवें दिन का रूप है।
"कदा सुवन् रथन्त्याणि ब्रह्म"......(ऋ० ६।३५)
इसमें 'द्येति' है। 'द्येति' अन्त वाला है। यह नवें दिन का
रूप है।
आ सत्यो यातु मघवाँ ऋजीषी...(ऋ० ४।१६)
इसमें 'सत्य' है। यह नवें दिन का रूप हैं।
तत्त इंद्रियं परमं पराचैः (ऋ० १।१०३), इसमें 'परमं'
अन्त वाला है। यह नवें दिन का रूप है। यह त्रिष्टुभ् छन्द
में हैं। इस प्रतिष्ठित पद के द्वारा सवन को धारण करता है
और गिरने नहीं देता।
अहं भुव वसुनः पूर्व्य॑स्पतिः (ऋ० १०।४८।१)
इसमें "अहं धनानि संजयामि शश्वतः" में 'जितं' अन्त
वाला है। 'अन्त' नवें दिन का रूप है।

३३४ [ पाँचवीं पञ्चिका
यह जगती छन्द में है। इस त्र्यह के मध्य सवन का वाहक
छन्द जगती है। जो छन्द वाहक होता है उसी में निविद
रक्खा जाता है। इसीलिये निविद जगती छन्द में रक्खा
गया है।
मिथुन सूक्त पढ़े जाते हैं, त्रिष्टुभ् भी और जगती भी।
पशु मिथुन हैं। पशु छन्दोम हैं। पशुओं की वृद्धि के लिये।
पाँच सूक्त पढ़े जाते हैं। पंक्ति में पाँच पद होते हैं। यज्ञ में
पाँच पद होते हैं। पशु पाँच पद वाले हैं। पशु छन्दोम हैं।
पशुओं की वृद्धि के लिये।
दो बार पाँच पाँच दस हो जाते हैं। विराट् दश वाली है।
अन्न विराट् है। पशु अन्न हैं। पशु छन्दोम हैं। पशुओं की
वृद्धि के लिये।
वैश्वदेव के प्रति पद् और अनुचर क्रमशः यह हैं :—
तत्सवितुर्वृणीमहे...... (ऋ० ५।८२।१)
अद्या नो देव सवितः...... (ऋ० ५।८२।४)
यह रथन्तर हैं। यह नवें दिन का रूप है।
सविता का निविद् सूक्त यह हैं :—
दोषो आगात्......( ? )
इसमें “सावित्रमंतो वैगतम्” अन्त वाला है। 'अन्त' नवें
दिन का रूप है।
द्यावा पृथिवी का निविद यह है।
प्र वां महि चवी अभिः...( ऋ० ४।५६।५-७ )
इसमें 'शुची उप प्रशस्त' में 'शुचि' शब्द आया है। यह
नवें दिन का रूप है।
ऋभुओं का निविद यह हैं।
इन्द्र इषे ददातु नः। (ऋ० ८।६३।३४)
ते नो रत्नानि धत्तन (ऋ० १।२०।७-८)

चौथा अध्याय ] ३३५
इसमें 'त्रि' शब्द आया है। यह नवें दिन का रूप है।
बभ्रुरेको विषुणः सूनरो युव......( ऋ० ८।२६ )
दो पद वाले मंत्र हैं। मनुष्य दो पाया है। पशु चौपाये
हैं। पशु छन्दोम हैं। पशुओं की वृद्धि के लिये। दो पद वाले
वाले मंत्र इस लिये पढ़े जाते हैं कि यजमान की पशुओं में
प्रतिष्ठा हो।
वैश्व देवों का निविद् सूक्त यह है :-
ये त्रिंशति त्रयस्परः......( ऋ० ८।१२ )
इसमें 'त्रि' शब्द आया है। यह नवें दिन का रूप है।
यह गायत्री छन्द में हैं। इस त्र्यह के तीसरे सवन का छन्द
गायत्री है।
अग्नि मारुत शस्त्र का प्रतिपद् यह है :-
वैश्वानरो न ऊतये......( आश्व० ८।११ )
इसमें 'अ प्रयातु परावत' में 'परावत' अन्त वाला है।
'अन्त' नवें दिन का रूप है।
मरुतों का निविद् यह है : -
मरुतो यस्य हि क्षये......( ऋ० १।८६ )
इसमें 'क्षेति' अन्त वाला है। 'अन्त' नवें दिन का रूप है।
मानों कोई किसी स्थान पर जाकर पहुँचता है।
जातवेद का मन्त्र वही है :-
जातवेदसे सुनवाम सोमम्......( ऋ० १।६६ )
जातवेद का निविद् सूक्त यह है :-
प्राग्नये वाचमीरय ( ऋ० १०।१८७ )
यह समानोदर्क है। यह नवें दिन का रूप है। "सनः
पर्षदति द्विषः" इस पद का दो बार पाठ करता है। इस नवरात्र
में बहुत से कृत्य हैं और चूक होना सम्भव है। इसलिए "सनः
पर्षदति द्विषः" ( यह अग्नि हमारे शत्रुओं पर विजयी हो और

३३६ [ पाँचवीं पञ्चिका
हमारे यज्ञ को अन्त तक पहुँचावे ) । इस पद का बार-बार
पाठ करता है, जिससे शान्ति हो जाय । ऐसा करने से वह
उन सब को पाप से छुड़ा देता है । यह गायत्री छन्द में हैं । इस
त्र्यह के तीसरे सवन का छन्द गायत्री है । (२)
२२—पृष्ठ्य षडह ( द्वादशाह के पहले छः दिन ) मुख्य
हैं । और ( सातवाँ, आठवाँ, नवाँ दिन ) अर्थात् छन्दोमा मुख
के भाग हैं । जैसे जिह्वा, तालु, दाँत । दशवाँ दिन ऐसा है
जिससे वाणी की विवेचना होती है या स्वादु और बेस्वादु
जाना जाता है । या पृष्ठ्य षडह नाक के नथुनों के समान हैं ।
और छन्दोमा उसके जो नथनों के बीच में हो । और दशवाँ
दिन ऐसा है जिसके द्वारा गंधों की पहचान की जाती है । या
पृष्ठ्य षडह आँखों के समान है । छन्दोमा आँख के काले
भाग के समान है और दसवाँ दिन पुतली के समान, जिससे
देखते हैं ।
या पृष्ठ्य षडह कान के समान है । छन्दोमा कान के
भीतर का आकाश है । और दसवाँ दिन वह है जिससे
सुनते हैं ।
दसवाँ दिन श्री है । जो दसवें दिन में प्रवेश करते हैं वे
श्रीमान् होते हैं । दसवें दिन मौन रहते हैं । श्री से कोई नहीं
बोलता । श्री बोलने की चीज नहीं है ।
अब ऋत्विज् लोग चलते हैं, स्नान करते है और पत्नीशाला
में जाते हैं । उनमें से जो इस आहुति को जाने वह कहे, “सम-
न्वारभध्वम् ।”
“इह रमेहरमध्वमिह धृतिरिहस्वधृतिरग्ने वाट् स्वाहा वाट्”
अब इस मन्त्र को पढ़ कर आहुति दे :—
“इत रम” ( यहां रमण कर ) से उन सब यजमानों को

चौथा अध्याय ] ३६७
जो इस लोक में हैं खुश करता है। "इह रमध्व" से इन लोकों
में सन्तान को खुश करता है।
“इह धृतिः, इहस्वधृतिः” से यजमानों को प्रजा और वाणी
धारण कराता है। 'अग्ने वाट् ' रथन्तर है। और 'स्वाहावाट्'
बृहत् साम है। रथन्तर और बृहत् देवों के मिथुन हैं। मिथुन से
मिथुन होता है और सन्तान होती है। उत्पत्ति के लिये ऐसा
किया जाता है। जो इस रहस्य को समझता है वह प्रजा और
पशुओं से सम्पन्न होता है।
अब वे सब चलते हैं और स्नान कर के अग्नीध्र के स्थान
को जाते हैं। उनमें से जो इस आहुति को जानता हो वह कहे
"समन्वारभध्वम्" और यह पढ़ कर आहुति दे :-
"उपसृजं धरुणं मातरं धरुणोधयन्। रायस्पोषमिषमूर्ज मस्मा
सुदीधरत् स्वाहा"।
जो इस रहस्य को समझ कर आहुति देता है वह अपने लिये
और यजमानों के लिये धन, शक्ति, स्वास्थ्य और तेज प्राप्त कर
लेता है। (३)
२३-वे वहाँ से चलते हैं। और सदस् में पहुँचते हैं।
( उत्तर वेदी के दक्षिण पूर्वी कोने में एक स्थान होता है उसे
सदस् कहते हैं )। जिधर को जो चाहें उधर को ही ( अर्थात्
यह नियम नहीं है कि इसी दिशा में चलें )। अन्य ऋत्विज्
भिन्न-भिन्न दिशाओं में चलते हैं। लेकिन उद्गाता लोग साथ
चलते हैं। वे सर्पराज्ञी वाली ऋचायें पढ़ते हैं। यह ( पृथिवी )
सर्पराज्ञी है क्योंकि जितने चलने वाले हैं उन सब की रानी
है। यह पृथिवी पहले अलोमिका ( रोम रहित या वृक्ष आदि
रहित ) थी। उसने तब यह मंत्र देखा :--
अयं गौः पृश्निरक्रमीत् ( ऋ० १०।१८९६ )
२२

३३८ [ पाँचवीं पञ्चिका
तब उसमें पृश्निवर्णा ( चित्र विचित्र रंगों ) ने प्रवेश किया।
नाना रूपों में से जिस किसी की कामना की, ओषधि, वनस्पति
इत्यादि सभी रूप इसमें आ गये। जो इस रहस्य को समझता
है। वह नाना रूपों को अपनी कामना के अनुसार प्राप्त कर
सकता है।
प्रस्तोता मौन होकर ( मन से ) पढ़ता है। उद्गाता मौन
होकर पढ़ता है। प्रतिहर्ता मौन होकर पढ़ता है। होता वाणी
से ( जोर जोर से ) पढ़ता है। वाक् और मन देवों के मिथुन
हैं। देवों के इस मिथुन से मिथुन की उन्नति होती है। देवों
के मिथुन से मिथुन पैदा होता है। जो इस रहस्य को समझता
है वह सन्तान और पशुओं से युक्त होता है।
अब होता चतुर्होत्री मन्त्रों को पढ़ता है। उद्गाता के
स्तोत्र के साथ साथ पढ़ता है।
चतुर्होत्री में देवों का जो यज्ञ का नाम था वह छिपा हुआ
था। होता उसको प्रकट करता है। देवों का जो यज्ञ का नाम
है उसे प्रकाशित करता है। उस प्रकाशित को प्रकाशित करता
है। जो इस रहस्य को समझता है वह प्रकाशित हो जाता है।
जिस वेदपाठी ब्राह्मण को यश न प्राप्त हो, वह वन में जावे,
दर्भ घास के सिरों को बाँध ले और एक दूसरे ब्राह्मण के
दक्षिण की ओर बैठ कर चतुर्होत्री के मंत्रों को ज़ोर ज़ोर से
पढ़े। चतुर्होत्री में देवों का यज्ञ का नाम छिपा हुआ रहता है।
चतुर्होत्री पढ़ने से वह नाम प्रकाशित हो जाता है। जो इस
रहस्य को समझता है वह प्रकाशित हो जाता है। (३)
२४-अब उदम्बर वृक्ष की शाखा को ( जो यज्ञशाला में
उद्गाता के आसन के पीछे रक्खी रहती है ) छूते हैं। यह
सोचकर कि हम 'अन्न और रस' को छू रहे हैं। क्योंकि
उदुम्बर वृक्ष 'अन्न और रस' है। जब देवों ने 'अन्न और रस'

चौथा अध्याय ] ३३९
को पृथ्वी में बाँटा तो उदुम्बर वृक्ष उत्पन्न हुआ। इसलिये
उदुम्बर साल में तीन वार फल लाता है। उदुम्बर की शाखा
लेते हैं तो मानो अन्न और रस लेते हैं।
वाणी को रोकते हैं। वाणी ही यज्ञ है। यज्ञ को रोकने
से मानों दिन को रोकते हैं। दिन स्वर्गलोक है इसलिये मानो
स्वर्गलोक को लेते हैं।
दिन में वाणी न बोलें। अगर वह दिन में वाणी बोलेंगे
तो दिन को शत्रुओं के हवाले कर देंगे। रात में वाणी न बोलें।
यदि रात में वाणी बोलेंगे तो रात को शत्रुओं के हवाले कर
देंगे। केवल जब सूर्य्य अध-छिपा हो वाणी बोलें। तब वे शत्रु
के लिये केवल इतना समय छोड़ते हैं (जितना रात और दिन
के बीच का है)। या उस समय बोलें जब सूर्य्य बिल्कुल डूब
जाय। इससे वे शत्रु को अँधेरे का हिस्सेदार कर लेते हैं।
आहवनीय अग्नि के चारों ओर घूम कर बोलते हैं। आहवनीय
यज्ञ है। आहवनीय स्वर्गलोक है। यज्ञ रूपी स्वर्गलोक से
स्वर्गलोक को जाते हैं।
वे यह कह कर बोलते हैं:—“यदि होनमकर्मयदत्यरीरिचाम,
प्रजापतिं तत् पितरमप्येतु”। (जो कुछ हमसे छूट गया हो
या अधिक हो गया हो वह हमारे पिता प्रजापति को पहुँच
जावे)।
सब प्रजा प्रजापति के पीछे उत्पन्न होती है। इसलिये
प्रजापति कम बढ़ के दोष का रक्षक है। और कमी या बढ़ती
यजमान को हानि नहीं पहुँचाने पाती। जो इस रहस्य को
समझ कर वाणी बोलता है उसकी कमी या बढ़ती प्रजापति
को पहुँचती है। इसलिये इस मंत्र को पढ़कर ही वाणी बोलनी
चाहिये। (४)

३४० [ पाँचवीं पञ्चिका
२५-चतुर्होत्री कहने वाला पुकारता है, "हे अध्वर्यु"।
यही उचित "आहाव" है। ( 'शौंसावोम्' इस अवसर के लिये
उचित आहाव नहीं है)।
अध्वर्यु कहता है, "ओ३म् होत:" या "तथा होत:"।
अब होता चतुर्होत्री को दुहराता है। दस पदों में से हर एक
पर ठहरता हुआ :-
( १ ) तेषां चित्तिः स्रुगासी३त् । (उनकी बुद्धि स्रुक् थी)
( २ ) चित्तमाज्यमासी३त् । (चित्त आज्य था)
( ३ ) वाग्वेदिरासी३त् । (वाणी वेदि थी)
( ४ ) आधीतं बर्हिरासी ३त् । (पढ़ा हुआ आसन था)
( ५ ) केतोऽअग्निरासी३त् । (समझ अग्नि थी)
( ६ ) विज्ञातमग्नीध्ररासी ३त् । (विज्ञान अग्नीध्र था)
( ७ ) प्राणो हविरासी ३त् । (प्राण हवि था)
( ८ ) सामाध्वर्यु रासी ३त् (साम अध्वर्यु था)
( ९ ) वाचस्पतिर्होतासी३त् । (वाचस्पति होता था)
(१०) मन उपवक्तासी ३त् । (मन उपवक्ता या मैत्रावरुण था)
(११) ते वा एतं ग्रहमगृह्णत । (उन्होंने ग्रह को लिया)
(१२) वाचस्पते विधे नामन् (हे वाचस्पति, हे विधि, हे नाम)
(१३) विधेम ते नाम । (हम तेरा नाम लें)
(१४) विधेस्त्वमस्माकं नाम्ना द्यां गच्छ । ( तू हमारे नाम
से द्यौ लोक को जा )
(१५) यां देवाः प्रजापतिगृहपतय ऋद्धिमराध्नुवंस्तामृद्धि
रात्स्यामः। (देव और प्रजापति गृहपतियों ने जो
ऋद्धि प्राप्त की उसी ऋद्धि को हम भी प्राप्त करें)
अब होता "प्रजापतेस्तनूः" और 'ब्रह्मोद्य" मन्त्रों को
पढ़ता है। (प्रजापतेस्तनू मन्त्र १२ हैं। यह दो दो कर के पढ़े
जाते हैं।)

चौथा अध्याय ] ३४१
(१, २) अन्नादा चान्न पत्नी च । (अन्न खाने वाली और
अन्न की पत्नी) । अन्न खाने वाली अग्नि है और अन्न पत्नी
आदित्य ।
(३, ४) भद्रा च कल्याणी च । 'भद्र' सोम है और
'कल्याणी' पशु हैं ।
(५, ६) अनिलया चापभयाच । (घर रहित और भय
रहित) । घर रहित वायु है क्योंकि किसी एक जगह नहीं
ठहरती । और भय रहित मृत्यु है क्यों सब उससे डरते हैं ।
(७, ८) अनाप्ता चा अनाप्या च । (प्राप्त न की हुई और
प्राप्त न की जाने वाली) अनाप्ता पृथिवी है और अनाप्या द्यौ ।
(९, १०) अनाधुष्याचाप्रतिधुष्याच । (न जीते जाने
वाली और न रुकने वाली) । न जीते जाने वाली अग्नि है और
न रुकने वाला सूर्य ।
(११, १२) अपूर्वाचाभ्रातृव्या च (जिसका कोई कारण
नहीं और जो नाश नहीं हो सकता) । जिसका कोई कारण
नहीं वह मन है । और जो नष्ट न हो सके वह संवत्सर है ।
यह बारह प्रजापति के तनु या शरीर हैं । प्रजापति पूरा
है । दसवें दिन पूरे प्रजापति को प्राप्त होते हैं ।
अब 'ब्रह्मोद्यम्' को पढ़ते हैं :-
“अग्निर्गृहपतिरिति हैक आहुः सोस्य लोकस्य गृहपतिर्वायुर्गृहपति-
रिति हैक आहुः सोन्तरिक्षलोकस्य गृहपतिरसौ वै गृहपतिर्यो सौ तपत्येष
पतिऋतवोण्हाः । येषां वै गृहपतिं देवं विद्वान् गृहपतिर्भवति राध्नोति
स गृहपतीराध्नु वंति ते यजमानाः । येषां वा अपहतपाप्मानं देवं विद्वान्
गृहपतिर्भवत्यप स गृहपतिः पाप्मानं हते ऽ पतेयजमानाः पाप्मानं
घ्नतेऽध्वर्यो ऽरात्स्मारात्स्म” ।
“अग्नि गृहपति है, ऐसा कुछ लोग कहते हैं क्योंकि अग्नि
इस लोक का गृहपति है । कुछ लोग कहते हैं कि वायु गृहपति है'

३४२ [ पाँचवीं पञ्चिका
क्योंकि वह अंतरिक्ष का गृहपति है । यह जो सूर्य्य है वह
गृहपति है क्योंकि यह तपता है । ऋतु गृह हैं । जो जानता है
कि ऋतुओं का गृहपति कौन है वह सफल होता है । ऐसे यज-
मान सफल होते हैं । जो उस देव को जानता है जो पाप की
बुराइयों को दूर करता है (अर्थात् सूर्य्य) वह गृहपति होता
है । ये यजमान पाप की बुराई को दूर कर देते हैं । हे अध्वर्यु,
हम सफल हो गये, हम सफल हो गये ।” ( ४ )
ऐतरेय ब्राह्मण की पाँचवीं पंचिका का चौथा अध्याय
समाप्त हुआ ।

पांचवाँ अध्याय
२६—(अग्निहोत्री अध्वर्यु से) शाम को कहता है:—
“आहवनीय अग्नि में से ले।” जो कुछ दिन में अच्छा काम
किया उसको पूर्व की ओर ले जाकर भयरहित स्थान में रख
देता है। सबेरे कहता है, “आहवनीय अग्नि में से ले।” जो
कुछ रात में अच्छा काम करता है उसको पूर्व में ले जाकर निर्भय
स्थान में रख देता है। आहवनीय यज्ञ है। आहवनीय स्वर्ग
लोक है। जो इस रहस्य को समझता है वह यज्ञ रूपी स्वर्ग
लोक को स्वर्ग में स्थापित कर देता है।
जो सब देवों वाले, सोलह कला वाले, पशुओं में प्रतिष्ठित
यज्ञ को जानता है वह सब देवों वाले, सोलह कला वाले और
पशुओं में प्रतिष्ठित यज्ञ के द्वारा सफल होता है।
जो गाय में है वह रुद्र का है। जो बछड़े में है वह वायु
का है। जो दुहा जाने को है वह अश्विनों का, जो दुहा जा
चुका वह सोम का है। जो आग पर पकाने रक्खा वह वरुण
का है। जो उबलता है वह पूषा का है। जो टपक रहा है वह
( ३४३ )

३४४ [पाँचवीं पञ्चिका
मरुतों का। जिस पर फेन उठता है वह विश्वेदेवों का है।
मलाई मित्र की है। जो गिर पड़े वह द्यावापृथिवी का है। जो
उबल पड़े वह सविता का, जो ले लिया गया वह विष्णु का।
जो वेदी पर रक्खा जाता है वह बृहस्पति का है। पहली आहुति
अग्नि की। पिछली प्रजापति की। जो आहुति हो चुकी वह
इंद्र की। इस प्रकार यह सब देवों का, सोलह कला वाला और
पशुओं में प्रतिष्ठित अग्निहोत्र है। जो इस सब देवों
वाले, सोलह कला वाले, पशुओं में प्रतिष्ठित अग्निहोत्र को
जानता है वह सफल होता है। (१)
२७-अगर एक अग्निहोत्री की गाय जो बछड़ा के साथ है
दूध दुहने के समय बैठ जाय तो इसका क्या प्रायश्चित्त है ?
तब यह मंत्र पढ़े :-
"यस्माद्भीषा निषीदसि ततो नो अभयं कृधि।
पशून्नः सर्वान् गोपाय नमो रुद्राय मीढुषे ।"
"जिससे डर कर तू बैठती है उससे हम को अभय करो।
हमारे सब पशुओं की रक्षा कर। दानी रुद्र के लिये नमस्कार
हो।"
इस मंत्र को पढ़कर उठावे :-
'उदस्थाद् देव्यदितिरायुर्यज्ञपतावधात् । इंद्राय कृण्वती भागं
मित्राय वरुणाय च।"
"देवी अदिति उठी। और यजमान को दीर्घ जीवन दिया।
इन्द्र, मित्र और वरुण को भाग देती हुई।"
या उसके थन और मुख पर जलपात्र रखकर उसको ब्राह्मण
को दे देवे। यह दूसरा प्रायश्चित्त है।
अगर किसी अग्निहोत्री की गाय जो बछड़े से युक्त है दुहते
में चिल्ला पड़े तो क्या प्रायश्चित्त है ? यदि भूख से चिल्ला पड़े
और यजमान को प्रकट करे कि उसको क्या जरूरत है तो

पांचवाँ अध्याय ] ३४५
अधिक भोजन दे देवे । शान्ति के लिये । अन्न शान्ति है । और
यह मंत्र बोले :—
सूयवसाद् भगवती हि भूया अथो वयं भगवन्तः स्याम ।
अद्धि तृणमघ्न्ये विश्वदानीं पिब शुद्धमुदकमाचरन्ती ॥
( ऋ० १।१६४।४० )
“बैठ और भगवती हो जिससे हम भी भगवन्त होवें । हे
गौ, हर ऋतु में तृण खा । हमारे पास आती हुई शुद्ध जल पी ।”
यह प्रायश्चित्त है ।
जिस अग्निहोत्री की बछड़े से युक्त गाय हिल जाय उसका
क्या प्रायश्चित्त है ? यदि हिलकर दूध फैला दे तो उसे छूकर
यह मंत्र जपे :—
यद्य दुग्धं पृथिवीमसृपद्यदोषधीरत्यसृपद् यदापः । पयो गृहेषु पयो
अघ्न्यायां पयोवत्सेषु पयो अस्तु तन् मयि ॥
“जो दूध आज जमीन पर फैल गया या ओषधि में मिल
गया या जल में मिल गया वह दूध घरों में, वह गायों में, वह
बछड़ों में, वह मुझ में हो ।”
अब जो दूध बच रहे वह अगर काफ़ी हो तो उसकी
आहुति दे दे । और अगर सब फैल गया हो तो दूसरी गाय
मँगा कर दुहे और तब उसकी आहुति दें । श्रद्धा से हवन करना
चाहिये । यह प्रायश्चित्त है । जो इस रहस्य को समझकर अग्नि-
होत्र करता है उसको सब सामग्री मिल जाती है और उसे सभी
चीज़ों की प्राप्ति हो जाती है । (२)
२८—आदित्य इसका यूप है । पृथिवी वेदी है । ओषधि
बर्हि हैं । वनस्पति ईं धन हैं । जल प्रोक्षणी है । दिशायें परिधि
हैं, अगर अग्निहोत्री की कोई चीज़ खो जाय या वह मर जाय,
या उसका कुछ नष्ट हो जाय तो यह सब उसको परलोक में

२४६ [ पाँचवीं पञ्चिका
बर्हि पर रक्खा मिलेगा । जो इस रहस्य को समझकर अग्निहोत्र
करता है उसे यह सब कुछ मिल जाता है ।
देव और मनुष्य दोनों को और सब को ( एक के प्रति
दूसरे को ) दक्षिणा में देता है । जो कुछ शाम को आहुति दी
जाती है । उससे देवों के लिये मनुष्यों तथा और सब चीज़ की
दक्षिणा देता है । ये जो मनुष्य बिना रक्षा के सोते हैं वे मानों
देवताओं के लिये दक्षिणा हैं। जो कुछ प्रातःकाल हवन किया
जाता है वह मानों मनुष्यों के लिये देवताओं की तथा अन्य
चीज़ों की दक्षिणा देता है । देवता ( मन की बात ) जान जाते
हैं और कहते हैं कि “मैं करूँगा”, “मैं जाऊँगा ।”
जो लोक सब कुछ देवताओं को देकर प्राप्त होता है
वही लोक उसको मिलता है जो इस रहस्य को समझ कर
अग्निहोत्र करता है ।
शाम की आहुति देकर अश्विन-शस्त्र का आरम्भ करता है ।
‘वाक्’ ‘वाक्’ कह कर वाणी का प्रतिगार ( response ) करता
है । जो इस रहस्य को समझ कर अग्निहोत्र करता है उसके
अग्नि रात को अश्विन-शस्त्र का पाठ करता है ।
प्रातःकाल आदित्य के लिये आहुति देकर महाव्रत करता
है । ‘अन्न’ ‘अन्न’ कह कर वह ‘प्राण’ का प्रतिगार करता है ।
जो इस रहस्य को समझ कर अग्निहोत्र करता है, उसके लिये
आदित्य दिन में महाव्रत के शस्त्र का पाठ करता है । अग्निहोत्री
वर्ष में ७२० आहुतियाँ शाम को देता है और ७२० सबेरे ।
इतनी ही ‘गवां अयन’ में ईंटें होती हैं । जो इस रहस्य को
समझ कर अग्नि होत्र करता है वह अग्नि चिति द्वारा साल भर
तक यज्ञ करता है । (३)
२९—‘जातूकर्ण’ के पुत्र ‘वतवत’ के पुत्र ‘वृषशुष्म’ ने कहा,

पाँचवाँ अध्याय ] ३४७
“हम देवतों से कहेंगे कि जो अग्निहोत्र दोनों दिन ( उभयेद्यु )
किया जाता है वह तीसरे दिन ( अन्येद्यु ) किया जाय ।”
गन्धर्वगृहीता नामी कुमारी ने कहा, “हम पितरों से कहेंगे
कि जो अग्निहोत्र दोनों दिन किया जाता है वह तीसरे दिन
किया जाय ।”
जो अग्निहोत्र तीसरे दिन किया जाता है वह शाम को
सूर्यास्त के बाद और सबेरे को सूर्योदय स पहले किया
जाता है। और जो अग्निहोत्र दोनों दिन किया जाता है वह
सूर्यास्त से पहले और सूर्योदय के बाद । इसलिये अग्नि-होत्र
सूर्य-उदय के बाद करना चाहिये ।
जो सूर्य-उदय से पहले अग्निहोत्र करता है वह चौबीस
वर्ष में गायत्री लोक को प्राप्त हो जाता है। और सूर्योदय के
बाद करने वाला बारहवर्ष में। जो सूर्योदय से पहले दो साल
अग्निहोत्र करता है वह सूर्योदय के बाद एक साल अग्निहोत्र
करने के बराबर है। जो इस रहस्य को समझ कर सूर्योदय
पर अग्निहोत्र करता है वह एक साल में ही इतना समाप्त कर
लेता है। इसलिये सूर्योदय पर अग्नि-होत्र करना चाहिये ।
जो शाम को सूर्यास्त के बाद और प्रातःकाल सूर्योदय
के बाद अग्निहोत्र करता है वह अहोरात्र ( दिन रात ) के
तेज में हवन करता है। रात्रि अग्नि से तेज लेती है और दिन
सूर्य से । जो इस रहस्य को समझ कर सूर्योदय पर अग्नि-
होत्र करता है उसका हवन अहोरात्र ( रात दिन ) के तेज में
होता है। इसलिये सूर्योदय पर हवन करना चाहिये । (४)
५०—यह जो दिन रात हैं वे साल के दो चक्र हैं। उन्हीं
दोनों चक्रों (पहियों) के द्वारा संवत्सर चलता है। जो सूर्योदय
से पहले अग्निहोत्र करता है वह ऐसा है जैसे मानों एक चक्र
से चलता हो। परन्तु जो सूर्योदय के बाद हवन करता है