ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचौथा अध्याय ] ३३१
सरस्वति या सरथं ययाथ स्वधामिद्वि पितृभिर्मदन्ती । आसद्यास्मिन्
बर्हिषि मादयस्वऽनमीवा इष आ वेह्यस्मे ॥
सरस्वतीं यां पितरो हवन्ते दक्षिणा यज्ञमभिनक्षमाणाः । सहस्रा-
र्घमिडो अत्र भागं रायस्पोषं यजमानेषु धेहि ॥ ( ऋ० १०।१७।७ ६ )
आ नो दिवो बृहतः पर्वतादा सरस्वती यजता गन्तुयज्ञम् । हवं देवी
जुजुषाणा घृताची शग्मां नो वाचमुशती शृणोतु ॥
आ वेशसं नीलपृष्ठं बृहन्तं बृहस्पतिं सदनं सादयध्वम् । सादद्योनि
दम आ दीदिवांसं हिरण्यवर्णमरुषं सपेम ॥
आ धर्षत्सिन्वँ इन्दिनोराणो विश्वेभिर्गन्त्वोममिहुवानः । ग्ना वसान
ओषधीरमृतृन्त्रिधातुशृङ्गो वृषभो वयोधाः ॥ (ऋ० ५।४३।११-१३)
सरस्वत्यभि नो नेषि वस्यो माप स्फरीः पयसा मा न आ धक् ।
जुषस्व नः सख्या वेश्या च मा त्वत् क्षेत्राण्यरणानि गन्म ॥
( ऋ० ६।६१।१४ )
इन मंत्रों में शुचि, सत्य, चेति, गत, ओक आये हैं । यह
नवें दिन का रूप है । छन्द त्रिष्टुभ् है । इस त्र्यह के प्रातः
सवन का छन्द त्रिष्टुभ् ही है ।
जो तीसरे दिन के आतान हैं वही नवें के । वही नवें दिन
का रूप हैं :—
अर्थात्
तं तमिद्राधसे मह...... ( ऋ० ८.६८।७ )
इन्द्रस्य सोमा......
इन्द्र नेदीय एदहि...... ( ऋ० ८।५३।५ )
प्रनूनं ब्रह्मणस्पतिः...... ( ऋ० १।४०।५ )
अग्निर्नैतात्वं सोमक्रतुभिः......
पिन्वन्त्यपो...... ( ऋ० १।६४।६ )
न किः सुदासो रथम्...... ( ऋ० ७।३२।१० )
इन्द्रः स्वाहा पिबतु यस्य सोमः ( ऋ० ३।५० )