ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३३६ [ पाँचवीं पञ्चिका
हमारे यज्ञ को अन्त तक पहुँचावे ) । इस पद का बार-बार
पाठ करता है, जिससे शान्ति हो जाय । ऐसा करने से वह
उन सब को पाप से छुड़ा देता है । यह गायत्री छन्द में हैं । इस
त्र्यह के तीसरे सवन का छन्द गायत्री है । (२)
२२—पृष्ठ्य षडह ( द्वादशाह के पहले छः दिन ) मुख्य
हैं । और ( सातवाँ, आठवाँ, नवाँ दिन ) अर्थात् छन्दोमा मुख
के भाग हैं । जैसे जिह्वा, तालु, दाँत । दशवाँ दिन ऐसा है
जिससे वाणी की विवेचना होती है या स्वादु और बेस्वादु
जाना जाता है । या पृष्ठ्य षडह नाक के नथुनों के समान हैं ।
और छन्दोमा उसके जो नथनों के बीच में हो । और दशवाँ
दिन ऐसा है जिसके द्वारा गंधों की पहचान की जाती है । या
पृष्ठ्य षडह आँखों के समान है । छन्दोमा आँख के काले
भाग के समान है और दसवाँ दिन पुतली के समान, जिससे
देखते हैं ।
या पृष्ठ्य षडह कान के समान है । छन्दोमा कान के
भीतर का आकाश है । और दसवाँ दिन वह है जिससे
सुनते हैं ।
दसवाँ दिन श्री है । जो दसवें दिन में प्रवेश करते हैं वे
श्रीमान् होते हैं । दसवें दिन मौन रहते हैं । श्री से कोई नहीं
बोलता । श्री बोलने की चीज नहीं है ।
अब ऋत्विज् लोग चलते हैं, स्नान करते है और पत्नीशाला
में जाते हैं । उनमें से जो इस आहुति को जाने वह कहे, “सम-
न्वारभध्वम् ।”
“इह रमेहरमध्वमिह धृतिरिहस्वधृतिरग्ने वाट् स्वाहा वाट्”
अब इस मन्त्र को पढ़ कर आहुति दे :—
“इत रम” ( यहां रमण कर ) से उन सब यजमानों को