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सर्वकोश
ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

पृष्ठ 346, कुल 592 में से

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पृष्ठ 346

३३२ [ पाँचवीं पञ्चिका .
इस सूक्त में स्वाहाकार अन्त वाला है। 'अन्त' नवें दिन
का रूप है।
गायन्त्साम नभन्यं यथावेः ( ऋ० १।१७३ )
इस सूक्त में "अर्चाम तद्वावृधानं स्वर्वत्" इसमें "स्वः"
अन्त वाला है। अन्त नवें दिन का रूप है।
"तिष्ठा हरी रथ आ युज्यमाना" ( ऋ० ३।३५ )
इसमें 'स्था' अन्त वाला है। और 'अन्त' नवें दिन का
रूप है।
"इमा उ त्वा पुरुतमस्य कारोः" ( ऋ० ६।२१ )
इसमें "धियोरथेष्ठा" में 'स्था' अन्त वाला है। अन्त नवें
दिन का रूप है।
यह त्रिष्टुभ् छन्द में हैं। इस प्रतिष्ठित पद से सवन को
क़ायम रखता है और गिरने नहीं देता।
प्रमन्दिने पितुमदर्चंतावच......( ऋ० १।१०१ )
यह सूक्त समानोदर्कं है। यह नवें दिन का रूप है। यह
जगती छन्द में है। इस त्र्यह के मध्य सवन का वाहक छन्द
जगती है। जो छन्द वाहक होता है उसी में निविद् रक्खा
जाता है। इस लिये निविद् जगती छन्द में रक्खा गया है।
यह मिथुन सूक्त पढ़े गये, त्रिष्टुभ् भी और जगती भी।
पशु मिथुन हैं। पशु छन्दोम हैं। पशुओं की वृद्धि के लिये यह
पाँच सूक्त पढ़े जाते हैं। पंक्ति में पाँच पद होते हैं। यज्ञ पाँच
पद वाला होता है। पशु पाँच पद वाले होते हैं। पशु
छन्दोम हैं। पशुओं की वृद्धि के लिये ऐसा किया जाता है।
नवें दिन के बृहत् पृष्ठ यह हैं :—
त्वामिद्धि हवामहे...... ( ऋ० ६।४६।१ )
त्वं ह्यहि चेरवे...... ( ऋ० ८।६१।७ )