ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
२३६ [ चौथी पञ्चिका
अग्निर्होता गृहपतिः स राजा विश्वा वेद जनिमा जातवेदाः, देवना-
मृत यो मर्त्यानां यजिष्ठः स प्र यजतामृतावा ॥ ( ऋ० ६।१५। १३ )
कुछ लोगों का कहना है कि इस मंत्र से अश्विन-शस्त्र का
आरंभ करना चाहिये :-
अग्निं मन्ये पितरमग्निमापिमग्निं भ्रातरं सदमित् सखायम् ।
अग्नेरनीकं बृहतः सपर्य दिवि शुक्रं यजतं सूर्यस्य । (ऋ० १०।७।३)
उनका कहना है कि "दिवि शुक्रं यजतं सूर्यस्य" (मंत्र
का चौथा पाद ) इन शब्दों से द्वारा वह यथेष्ट स्थान को पहुँच
जायगा ।
परन्तु यह बात माननीय नहीं है। उन लोगों से कहा कि
अगर मंत्र में 'अग्नि' शब्द बार बार आयेगा तो होता आग में
गिर पड़ेगा । ऐसा ही हुआ करता है । इसलिये "अग्नि होता
गृहपतिः" इससे आरंभ करना चाहिये । इसमें 'गृहपति' और
जनिमा ( सन्तान ) शब्द हैं । इससे उसको पूर्ण आयु प्राप्त हो
सकती है। जो इस रहस्य को समझता है उसकी आयु पूर्ण
होती है । (१)
८—यह जो देवते दौड़ रहे थे उनमें से चलने के बाद अग्नि
अपने मुख या लपटों द्वारा आगे था । अश्विन पीछे थे । और
वे उससे बोले "हम दोनों जीत जायं"। अग्नि मान गया कि
अश्विन शस्त्र में हम को भी भाग मिले । उन्होंने स्वीकार कर
लिया और अश्विन-शस्त्र में अग्नि को स्थान दे दिया । इसीलिये
अश्विन-शस्त्र में अग्नि के लिये कई मंत्र हैं ।
अश्विन उषा के पीछे थे । वे उससे बोले, "तू हट जा ।
हम जीत जायं" वह इस शर्त पर मान गई कि उसका भी
भाग लगे । उन्होंने स्वीकार कर लिया और उसके लिये अश्विन-
शस्त्र में जगह कर दी । इसीलिये अश्विन-शस्त्र में उषा के लिये
कई मंत्र हैं ।
दूसरा अध्याय ] २३७
अश्विन इन्द्र के पीछे चले और कहा, “मघवन् ! हम इस
दौड़ में जीतना चाहते हैं।” उनका यह साहस न हुआ कि इन्द्र
से कहते “हट जाओ”। इन्द्र ने इस शर्त पर मान लिया कि
मुझे भी भाग दो। उन्होंने स्वीकार कर लिया और अश्विन-
शस्त्र में इन्द्र को स्थान दिया। इसीलिये अश्विन-शस्त्र में कई
मंत्र इन्द्र के हैं।
इस प्रकार अश्विन जीत गये और उनको इनाम मिल गया।
चूँकि अश्विन जीत गये और उनको इनाम मिला इसलिये इस
शस्त्र को अश्विन-शस्त्र कहते हैं। जो इस रहस्य को समझता
है उसकी कामना पूरी हो जाती है।
कुछ लोग पूछते हैं कि जब इस शस्त्र में अग्नि, उषा और
इन्द्र के मंत्र हैं तो इसको अश्विन-शस्त्र क्यों कहते हैं। इसका
उत्तर यह है कि अश्विन जीत गये। उनको इनाम मिल
गया। जो इस रहस्य को समझता है उसकी कामना पूरी हो
जाती है। (२)
९—अग्नि ने दौड़ में अपने रथ में खच्चर (अश्वतरी)
जोड़े। दौड़ में अग्नि ने खच्चरियों की योनियाँ जला दीं। इस-
लिये उनके सन्तान नहीं होती।
उषा लाल गायों के रथ में दौड़ी। इसीलिये उषाकाल में
लाल रंग चमकता है। यह उषा का रूप है।
इन्द्र ने घोड़े के रथों में दौड़ की। इसलिये क्षत्रियों का
रूप यह है कि बहुत कोलाहल हो। यही इंद्र का रूप है।
अश्विनों ने गधों के रथ में दौड़ की और जीत गये। और
इनाम पा गये। (चूँकि बहुत दौड़ने से थक गये। इसलिये
गधों की तेजी जाती रही। और दूध मारा गया और रथ के
वाहनों में सबसे कम हो गये। लेकिन अश्विनों ने गधे के वीर्य
को शक्ति रहित नहीं किया। इसलिये वाजी अर्थात् गधे में दो
२३८ [ चौथी पञ्चिका,
प्रकार का वीर्य होता है (द्विरेता) (एक घोड़ी में खच्चर
उत्पन्न करने के लिए। दूसरा गधी में गधा उत्पन्न करने के
लिये)।
कुछ लोग कहते हैं कि "जैसे अग्नि, उषा और अश्विन के
लिये होता मंत्र पढ़ता है उसी प्रकार सूर्य्या के लिये भी सात
छंदों में मंत्र पढ़ने चाहिये। देवों के सात लोक हैं। वह सब
लोकों में फूले फलेगा।"
ऐसा माननीय नहीं है। तीन ही छंदों में पढ़ना चाहिये।
तीन ही लोक हैं जो त्रिवृत हैं। इन लोकों के जीतने के लिये।
कुछ लोग कहते हैं कि—
उदुत्यं जातवेदसं देवं वहन्ति केतवः। दृशे विश्वाय सूर्य्यम्॥"
(ऋ० १।५०।१)
से आरम्भ करे। यह भी माननीय नहीं है। मानो दौड़ने में
उद्दिष्ट सीमा को ही भूल जाय। उसको इस मंत्र से आरम्भ
करना चाहिये:—
सूर्य्यो न दिवस्पातु वातो अन्तरिक्षात्। अग्निनः पार्थिवेभ्यः॥
(ऋ १०।१५८।१)
मानो इससे वह उद्दिष्ट सीमा को पहुँच गया।
अब दूसरा मंत्र "उदुत्यं" (१।५०।१) बोले।
"चित्रंदेवानामुदगादनीकं" (१।११५) यह सूक्त त्रिष्टुभ् है।
यह सूर्य्य "देवों में चित्र" है। इस लिये यह बोला जाता है।
"नमो मित्रस्य वरुणस्य चक्षसेः" (ऋ० १०।३७।१)
यह जगती सूक्त है। इसमें एक आशीर्वाद का पद है।
इससे होता अपने लिये और यजमान के लिये आशीर्वाद
कहता है। (३)
१०—इस सम्बन्ध में कहते हैं कि सूर्य्य को न छोड़ जाय।
बृहती को न छोड़ जाय। सूर्य्य को छोड़ जायगा तो ब्रह्मवर्चस्
दूसरा अध्याय ] २३९.
को छोड़ जायगा और बृहती को छोड़ जायगा तो प्राणों को
छोड़ जायगा ।
इन्द्र के इन प्रगाथों को पढ़ता है :—
इन्द्र क्रतुं न आ भर पिता पुत्रेभ्यो यथा । शिक्षान्णो अस्मिन्
पुरुहूत यामनि जीवा ज्योतिरशीमहि ॥ ( ऋ० ७।३२।२६)
"हे इन्द्र, हमारे यज्ञ को पूरा कर जैसे पिता पुत्र की मदद
करता है। हे पुरुहूत ( सब इसी को बुलाते हैं इस लिये इसको
पुरुहूत कहा ) हमको इसमें शिक्षा दे, जिससे हम ज्योति को
प्राप्त होवें" ।
यह जो ज्योति है उससे सूर्य्य का तात्पर्य है । इस मंत्र को
पढ़कर वह सूर्य्य को भूलता नहीं ।
बार्हत प्रगाथ को पढ़कर वह बृहती को भूलने नहीं पाता ।
नीचे के मंत्र से राथंतरी योनि की स्तुति करता है :—
अभि त्वा शूर नोनुमोऽदुग्धा इव धेनवः । ईशानमस्य जगतः स्व-
दृ॑शमीशानमिन्द्र तस्थुषः ॥
(ऋ० ७।३२।२२ तथा सामवेद उत्त० १।१।११)
राथंतर स्वर से अश्विन शस्त्र का सन्धि स्तोत्र पढ़ा जाता
है । यह रथंतर योनि के लिये ।
ऊपर के मंत्र में "ईशानमस्यजगतः स्वदृ॑शम्" शब्द हैं ।
'स्वदृक्' से सूर्य्य का तात्पर्य् है ( स्वर्ग का देखने वाला ) ।
इसके पाठ से वह सूर्य को नहीं भूलता । यह जो बार्हत प्रगाथ
है उससे बृहती को नहीं भूलता ।
नीचे का मंत्र ओर वरुण का प्रगाथ पढ़ता है:—
बहवः सूरचक्षसोऽग्निजिह्वा ऋतावृधः । त्रीणि ये येमुर्विदथानि
धीतिभिर्विश्वानि परिभूतिभिः ॥ (ऋ०७।६६।१०)
दिन मित्र है और रात वरुण । जो अतिरात्र करता है वह
२४० [ चौथी पञ्चिका
दिन और रात से शुरू करता है। मैत्रावरुण प्रगाथ को पढ़कर
होता यजमान को दिन और रात में स्थापित कर देता है ।
"सूरचक्षसः" शब्द से सूर्य को नहीं भूलता। यह जो
बार्हत प्रगाथ है उससे बृहती को नहीं भूलने पाता ।
द्यौ और पृथिवी के यह दो मंत्र पढ़ता है :—
मही द्यौः पृथिवी च न इमं यज्ञं मिमिक्षताम् । पिपृतां नो
भरीमभिः ॥ (ऋ० १।२२।१३)
ते हि द्यावा पृथिवी विश्वशम्भुव ऋतावरी रजसो धारयत् कवी ।
सुजन्मनी धिषणे अन्तरीयते देवो देवी धर्मणा सूर्य्यः शुचिः ॥
(ऋ० १।१६०।१)
द्यौ और पृथिवी दो स्थान हैं । पृथिवी यहां और द्यौ वहाँ ।
द्यावापृथिवी के इन दो मंत्रों को बोलकर वह यजमान को द्यौ
और पृथिवी में स्थापित कर देता है ।
ऊपर जो "देवो देवी धर्मणा सूर्य्यः शुचिः" शब्द आये हैं
( अर्थात् देव और शुचि-सूर्य दो देवियों को पार करता है )
उन से वह सूर्य को नहीं भूलता । इनमें से एक गायत्री है और
दूसरा जगती । इन दोनों के मिलने से दो बृहती होते हैं। इस
प्रकार वह बृहती को नहीं भूलने पाता ।
द्विपदों की स्तुति करता है :—
विश्वस्य देवीमृचयस्य जन्मनो न यारोषति नग्नभत्
"यह जो उत्पन्न हुआ या चलता फिरता जगत है उस सब
की शासक देवी न हम पर क्रोध करे, न नाश करने के लिये
हमारे पास आवे" ( यह मंत्र संहिता में नहीं है ) ।
लोग इस अश्विन-शस्त्र को चितैध (चिता का ईंधन कहते
हैं। क्योंकि जब होता इस शस्त्र को समाप्त करने को होता है
तो निर्ऋति अपना पाश लिये छिपी रहती हैं कि होता की गर्दन
में डाल कर उसका नाश कर दे । बृहस्पति ने उसको बचाने के
दूसरा अध्याय ] २४१
लिये इस द्विपदा स्तुति का दर्शन किया । यह जो शब्द आये
हैं “न यारोषातिनग्मथत्” ( न क्रोध कर, न नाश के लिये देख )
इन शब्दों को कहकर निर्ऋति से पाश छीन लिये और नीचे
रख दिये । इसी प्रकार जब होता द्विपदों की स्तुति के मंत्र
पढ़ता है तो निर्ऋति के हाथों से पाश छुड़ा लेता है और उनको
नीचे रख देता है । और सुरक्षित निकल आता है । पूर्ण आयु
की प्राप्ति के लिये । जो इस रहस्य को समझता है वह पूर्ण
आयु प्राप्त कर लेता है ।
मंत्र में जो यह शब्द हैं “मृचयस्य जन्मनः” इनके पाठ
से वह सूर्य को नहीं भूलता क्योंकि सूर्य्य चलता सा है
( मर्चयति ) ।
द्विपद मंत्र का छन्द मनुष्य का छन्द है ( क्योंकि इसके
भी दो पाद होते हैं और मनुष्य के भी दो पद ) । इसलिये
इसके अन्तर्गत सभी छन्द आ जाते हैं । इस प्रकार होता बृहती
को भूलने नहीं पाता । (४)
११—ब्रह्मणस्पति के मंत्र से समाप्त करता है । ब्रह्म
बृहस्पति है । वह ब्रह्म में उसको स्थापित करता है । जो पुत्र
और पशु की कामना करे वह इस मंत्र से समाप्त करे :—
“एवा पित्रे विश्वदेवाय वृष्णे यज्ञैर्विधेम नमसा हविर्भिः । बृहस्पते
सुप्रजा वीरवन्तो वय स्याम पतयो रयीणाम्” ॥ ( ऋ० ४।५०।६ )
क्योंकि इस मंत्र के “बृहस्पते सुप्रजा वीरवन्तो वयं स्याम
पतयो रयीणाम्” शब्दों के कहने से वह सन्तान, पशु, धन,
वीर, वाला हो जाता है । यह जान कर कि इस मंत्र से आरम्भ
करना चाहिये । तेज और ब्रह्मवर्चस् की कामना वाला नीचे के
मंत्र से आरम्भ करे :—
१६
२४२ [ चौथी पञ्चिका
बृहस्पते अति यदर्यो अर्हाद्द्युमद्विभाति क्रतुमज्जनेषु । यद्
दीदयच्छवस ऋत प्रजात तदस्मासु द्रविणं धेहि चित्रम् ।
( ऋ० २।२३।१५ )
'अति' का अर्थ यह है कि अन्यों की अपेक्षा अधिक ब्रह्म-
वर्चस् वाला होता है। "द्युमत्" का अर्थ है ब्रह्मवर्चस् ।
'विभाति' का अर्थ है कि ब्रह्मवर्चस् हर जगह चमकता सा है ।
"यद् दीदयच्छवस ऋत प्रजात" का अर्थ है कि ब्रह्मवर्चस्
चमकता है। 'चित्र' का अर्थ है कि ब्रह्मवर्चस् साक्षात् मालूम
होता है। जो जो इस रहस्य को समझ कर इस प्रकार समाप्त
करता है वह ब्रह्मवर्चसी और ब्रह्मयशसी होता है। इसलिये
इस रहस्य को समझने वाले होता को इसी ब्रह्मणस्पति के मंत्र
से समाप्त करना चाहिये। ऐसा करने से वह सूर्य्य को नहीं
भूलने पाता। तीन बार त्रिष्टुभ् में सभी छन्द आ जाते हैं।
इस प्रकार वह बृहती को नहीं भूलता। गायत्री और त्रिष्टुभ्
से वषट्कार करे। गायत्री ब्रह्म है और त्रिष्टुभ् वीर्य्य । इस
प्रकार ब्रह्म और वीर्य्य को जोड़ता है। जो इस रहस्य को समझ
कर गायत्री और त्रिष्टुभ् से वषट्कार करता है वह ब्रह्मवर्चसी
और ब्रह्मयशसी होता है। ( त्रिष्टुभ् यह है ):-
अश्विना वायुना युवं सुदक्षा नियुद्भिश्न सजोषा युवाना ।
नासत्या तिरो अह्नयं जुषाणा सोमं पिबतमस्रिधा सुदानू ।
( ऋ० ६।५८।७ )
गायत्री यह है :-
उभा पिब तमश्विनोभा नः शर्म यच्छतम् । अविद्रियाभिरूतिभिः ।
( ऋ० १।४६।१५ )
गायत्री और विराट् से भी वषट्कार हो सकता है :-
गायत्री ब्रह्म है और विराट् अन्न । इस प्रकार वह ब्रह्म को अन्न
से जोड़ता है। जो इस रहस्य को समझ कर गायत्री और
दूसरा अध्याय ] २४३
विराट् से वषट्कार करता है वह ब्रह्मवर्चसी और ब्रह्मयशसी
होता है और ब्रह्म-अन्न ( शुद्ध अन्न ) खाता है।
इसलिये जो इस रहस्य को समझे उसे गायत्री और विराट्
से वषट्कार करना चाहिये।
विराट् यह है :—
प्र वामन्धांसि मद्यान्यस्थुररं गन्तं हविषो वीतये मे। तिरो अ॒र्यो
हवनानि श्रुतं नः । (ऋ० ७।६८।२)
गायत्री वही है जो ऊपर दी गई। (५) (ऋ० १।४६।१५)
१२—इस दिन चतुर्विंश कृत्य करते हैं। यह आरंभ है।
इससे संवत्सर का आरंभ होता है और स्तोमों और छन्दों का
और देवतों का भी। यदि इस दिन आरंभ न हो तो न छन्द
का आरंभ समझा जायगा, न देवतों का। इसीलिये इसका नाम
आरंभणीय पड़ा। इसको चतुर्विंश इसलिये कहते हैं कि इसमें
चौबीस स्तोम पढ़े जाते हैं। या चौबीस पाख (आधे महीने)
होते हैं। इनसे पाखों वाला साल आरंभ होता है।
उक्थ्य भी उसी दिन होता है। उक्थ्य पशु हैं। पशुओं
की प्राप्ति के लिये यह किया जाता है। इस उक्थ्य में १५ स्तोत्र
होते हैं और १५ शस्त्र । ( मिल कर तीस हुये। तीस दिन का )
महीना होता है। इनसे महीनों वाला साल शुरू होता है। ( इस
उक्थ्य में ) तीन सौ साठ स्तोत्रिय मंत्र होते हैं। साल में इतने
ही दिन होते हैं। इस प्रकार वह दिनों वाले साल का आरंभ
करते हैं।
कहते हैं कि उस दिन अग्निष्टोम होना चाहिये। अग्निष्टोम
संवत्सर है। अग्निष्टोम के सिवाय और किसी ने इस दिन की
पवित्रता को या उसके भिन्न भिन्न कृत्यों की पवित्रता को क़ायम
नहीं रक्खा।
१४४ [ चौथी पञ्चिका
अगर इस दिन अग्निष्टोम करें तो तीनों पवमान (प्रातः
सवन, मध्य सवन और शाम के सवन के) अष्टाचत्वारिंश स्तोम
में होने चाहिये। (अर्थात् स्तोत्रिय तृच को बार बार पढ़ कर
४८ कर लेना चाहिये) और अन्य (नौ) स्तोत्र चतुर्विंश स्तोम
में। इस प्रकार ३६० स्तोत्रिय हो गये (३ × ४८ = १४४, ९ × २४
= २१६; १४४ + २१६ = ३६०) जितने कि वर्ष में दिन होते हैं।
इस प्रकार वह दिनों वाले साल को शुरू करते हैं।
परन्तु उक्थ्य को ही करना चाहिये (अग्निष्टोम को नहीं)।
यज्ञ पशु-समृद्ध होता है। अगर सभी स्तोत्र चतुर्विंश स्तोम में
होंगे तो प्रत्यक्ष ही यह दिन चौबीस गुना हो जायगा। इसलिये
उक्थ्य ही करना चाहिये। (६)
१३—(इस सत्र के) दो मुख्य साम होते हैं, बृहत् और
रथंतर। यह बृहत् और रथंतर यज्ञ की दो नावें हैं जो उसको
दूसरी ओर पार कर देती हैं। इन्हीं से यजमान साल को पार
कर लेता है। या बृहत् और रथंतर दो पैर हैं। दिन (का कृत्य)
सिर है। दो पैरों की कमाई सिर पर रक्खी जाती है।
बृहत् और रथंतर दो पक्ष हैं। दिन का कृत्य सिर है।
इन्हीं दो पक्षों से सिर को श्री तक ले जाते हैं।
इन दोनों सामों को एक साथ नहीं छोड़ देना चाहिये।
अगर सत्र करने वाले इन दोनों को साथ-साथ छोड़ देंगे तो जैसे
नावों की रस्सियाँ कट जाने से वे इस किनारे से उस किनारे
तक बहती फिरती हैं, इसी प्रकार यह भी बहते फिरेंगे।
अगर वह रथंतर को छोड़ दें तो बृहत् के द्वारा दोनों ठहरे
रहेंगे। और यदि बृहत् को छोड़ दें तो रथंतर के द्वारा दोनों
ठहरे रहेंगे। जो वैरूप है वह रथंतर है और जो बृहत् है वह
वैराज है। जो शाक्वर है वह रथंतर है, जो रैवत है वह
बृहत् है।
दूसरा अध्याय ] २४५
जो इस रहस्य को समझ कर सत्र का आरंभ करते हैं वे
पाखों, महीनों और दिनों वाले साल को प्राप्त करके स्तोमों
और छन्दों और देवों को प्राप्त करके तपों को तपते हुये और
सोम पान करते हुये साल को बिताते हैं ।
जो इस संवत्सर से ऊपर कोई कृत्य करते हैं वह भारी
बोझ को रख देते हैं । भारी बोझ पीठ को तोड़ देता है ।
वह जो पहले कर्मों को क्रमशः करता हुआ फिर उलटे क्रम
से कृत्य करता है वह साल के कल्याणप्रद अन्त को प्राप्त कर
लेता है । (७)
१४—यह जो चतुर्विंश है वह महाव्रत है । बृहद् दिव सूक्त
से होता वीर्य सींचता है ( ऋ० १०।१२०, तदिदास भुवनेषु-
इत्यादि ) और महाव्रत दिन के कृत्य से इस वीर्य से सन्तान
उत्पन्न कराता है । वीर्य सींचा जाय तो हर साल उपजता है ।
इसीलिये बृहद्दिव निष्केवल्य शस्त्र का भाग हो जाता है ।
जो इस रहस्य को समझ कर पहले क्रमशः कृत्य करता
है और फिर दूसरे भाग को उलटे क्रम से करता है, वह बृह-
द्विव सूक्त के द्वारा वर्ष के कल्याण-प्रद अन्त को पा लेता है ।
जो साल के इस पार और उस पार को जानता है वह
संवत्सर के उस पार को सुगमता से पार कर लेता है ।
सत्र के शुरू का अतिरात्र एक सिरा है और दूसरा अति-
रात्र दूसरा सिरा । जो इस रहस्य को समझता है वह साल के
अच्छे अन्त को पा लेता है ।
जो साल के अवरोधन और उद्रोधन को जानता है, वह
संवत्सर के कल्याण प्रद अन्त को पा लेता है। शुरू का अति-
रात्र अवरोधन है और अन्त का अतिरात्र उद्रोधन ।
जो इस रहस्य को समझता है वह वर्ष को अच्छी तरह पार
कर लेता है। जो संवत्सर के प्राण और उदान को समझता है
१४६ [ चौथी पञ्चिका
वह साल को अच्छी तरह पार कर लेता है। पहला अतिरात्र
प्राण है और दूसरा अतिरात्र उदान । जो इस रहस्य को सम-
झता है वह अच्छी तरह साल को समाप्त करता है। (८)
ऐतरेय ब्राह्मण की चौथी पंचिका का दूसरा अध्याय समाप्त हुआ !
तीसरा अध्याय
१५-वे ज्योतिर्गौ और आयु-स्तोम करते हैं। यह लोक
ज्योति है। अन्तरिक्ष गौ है। वह लोक आयु है। पिछले तीन
दिनों में वही स्तोम पढ़े जाते हैं (जो पहले तीन दिनों में)।
पहले तीन दिन का क्रम है ज्योतिः, गौ, आयुः। पिछले तीन
दिनों का है गौ, आयुः, ज्योतिः। (दोनों भागों के क्रम के
हिसाब से) ज्योति यह लोक भी है और वह लोक भी।
(अर्थात् पहले तीन दिनों में ज्योति पहला है और पिछले तीन
दिनों में आखिरी)। इस प्रकार दोनों ज्योतियाँ एक दूसरे के
के सामने हैं।
वे षडह (छः दिन के कृत्य) को दोनों ओर से ज्योति से
सम्पादन करते हैं। इस प्रकार दोनों लोकों में उनकी प्रतिष्ठा
होती है, इसमें भी और उसमें भी। और वे दोनों में विचरते हैं।
यह जो "अभिप्लव षडह" है यह देवों का चक्र है। दो
अग्निष्टोम इसकी परिधि हैं। चार बीच के उक्थ्य नाभि हैं।
इस चक्र के ज़ोर से जहाँ चाहे जा सकता है। जो इस रहस्य
को समझता है वह साल को अच्छी तरह पार कर लेता है।
( २४७ )
२४८ [ चौथी पञ्चिका
जो पहल षडह का ठीक ठीक ज्ञान रखता है वह साल का
भली भांति पार पा लेता है । इसी तरह जो दूसरे षडह का,
तीसरे षडह का, चौथे षडह का और पांचवें षडह का ( षडह =
षट् + अह = छः दिन । महीने के तीस दिन पाँच षडह में बंटे
हुये हैं । ) ( १ )
१६—पहले षडह को करते हैं । छः दिन होते हैं और छः
ऋतुयें । इस प्रकार ऋतुओं वाले साल को प्राप्त करते हैं और
वर्ष की सभी ऋतुओं में प्रतिष्ठा लाभ करते हैं ।
दूसरे षडह को करते हैं । अब १२ दिन हुये । १२ मास
होते हैं । इस प्रकार महीनों वाले साल को प्राप्त करते हैं और
साल के सभी महीनों में प्रतिष्ठा लाभ करते हैं ।
तीसरे षडह को करते हैं । अब अठारह दिन हुये । यह
हुये नौ के दूने । ९ प्राण हैं और नौ स्वर्ग लोक । प्राणों और
स्वर्ग लोकों का लाभ करते हैं और प्राणों और स्वर्ग लोकों में
प्रतिष्ठा लाभ करते हैं ।
चौथे षडह को करते हैं । अब २४ दिन हुये । २४ पाख
हुये । पाख वाले वर्ष को प्राप्त करते हैं और वर्ष के सब पाखों
में प्रतिष्ठा लाभ करते हैं ।
पाँचवें षडह को करते हैं । तीस दिन हो गये । विराट् में
तीस अक्षर होते हैं । विराट् अन्न है । इस प्रकार यह हर मास
में विराट् (अन्न) का लाभ करते हैं ।
अन्न की कामना वालों ने सत्र किया । हर महीने विराट्
( तीस की संख्या ) को प्राप्त करके उन्होंने दोनों लोकों में
अन्न प्राप्त कर लिया ! इस लोक में भी और उस लोक में भी ।(२)
१७—"गवामयन" नामक ( गायों का भ्रमण ) कृत्य करते
हैं । गौ आदित्य हैं । 'गवामयन' करने से 'आदित्य-अयन'
हो जाता है ।
तीसरा अध्याय ] २४६
गायों ने एक बार खुर और सींगों की अभिलाषा से सत्र
किया । दस महीनों में उनके खुर और सींग निकल आये ।
उन्होंने कहा "जिस अभिलाषा से हम दीक्षित हुये वह पूरी
होगी, अब उठें" । जब वे उठे, उस समय उनके सींग थे । लेकिन
उन्होंने सोचा कि "वर्ष को समाप्त कर दें"। इसलिये फिर सत्र
जारी रक्खा । उनकी अश्रद्धा के कारण उनके सींग जाते रहे
और वे तूपर (डुंडे) रह गये । उन्होंने ऊर्ज प्राप्त किया । इसके
बाद सब ऋतुओं को समाप्त करके वे उठे । चूँकि उन्होंने ऊर्ज
पैदा किया इसलिये गायों को सब प्यार करते हैं और उनको
सुन्दर (चारु) बनाते हैं । जो इस रहस्य को समझता है वह
सब का प्यारा होता है और सौंदर्य को प्राप्त करता है ।
आदित्य और अंगिरा लड़ पड़े कि कौन स्वर्ग लोक में
पहले पहुँचे । हर एक ने कहा, "हम पहले पहुँचेंगे । हम पहले
पहुँचेंगे" । आदित्य पहले स्वर्गलोक में पहुँच गये । फिर साठ
वर्ष पीछे अंगिरा । (गंवामयन और आदित्य-अयन में कई
बातों में समानता है ) । पहले अतिरात्र होता है । फिर चौबीसवें
दिन उक्थ्य । सब अभिप्लव षडह इसमें आ जाते हैं । दिनों
का क्रम बदल जाता है । यह आदित्यों का अयन है । अतिरात्र
पहले । चौबीसवें दिन उक्थ्य । पृष्ठियों के साथ अभिप्लव षडह ।
दिनों में कुछ अदल बदल । यह है अंगिरसों का अयन ।
यह जो अभिप्लव षडह है वह स्वर्ग लोक का सीधा मार्ग
है । पृष्ठियों का षडह स्वर्ग लोक का महापथ है । जो अभिप्लव
षडह और पृष्टि-षडह दोनों मार्गों का अवलम्बन करते हैं
उनकी सभी कामनायें पूरी हो जाती हैं । और इनको कोई हानि
नहीं पहुँचती । ( ३ )
१८—इक्कीसवीं करते हैं । इक्कीसवीं संवत्सर के बीच की
२५० [ चौथी पञ्चिका
विषुवत् रेखा है। इस इक्कीसवीं को करके देवों ने सूर्य्य को
स्वर्ग में पहुँचा दिया।
यह इक्कीसवीं जिस दिन दिवाकीर्त्य मंत्र (रचा गया)
इसके पहले दस दिन होते हैं और पीछे दस दिन। बीच में
यह होती है। इस प्रकार इसके दोनों ओर विराट् (दस संख्या
वाले) होते हैं। इस प्रकार दोनों ओर विराट् से युक्त होकर
यह (एकविंश अर्थात् सूर्य्य) इन लोकों के बीच में विघ्न को
प्राप्त नहीं होता।
देवों को डर लगा कि सूर्य कहीं स्वर्गलोक से गिर न
जाय। इस लिए उन्होंने तीन लोकों को नीचे (खंभे के रूप में)
लगा दिया।
तीन स्तोम ही तीन स्वर्ग लोक हैं।
उनको डर हुआ कि सूर्य्य ऊपर को न चला जाय। इस
लिये उन्होंने उसके ऊपर तीन लोक लगा दिये। तीन स्तोम ही
तीन स्वर्गलोक हैं।
इस प्रकार (विषुवान् दिन से) पूर्व तीन सत्रह भागों
वाले स्तोम होते हैं और पश्चात् तीन सत्रह भागों वाले स्तोम।
बीच में इक्कीसवीं होती हैं। इसके इधर उधर "स्वरसाम" होते
हैं। दोनों ओर से यह स्वरसामों से घिरा होता है इसलिये यह
(सूर्य्य) इन लोकों के भ्रमण में विघ्न नहीं पाता।
देव डर गये कि आदित्य स्वर्गलोक से गिर न पड़े। इस
लिये उन्होंने तीन "परम स्वर्गलोकों" की टेक लगा दी। स्तोम
परम स्वर्गलोक हैं।
देव डर गये कि आदित्य कहीं ऊपर से लौट न जावे। इस
लिये उन्होंने ऊपर से तीन "परम स्वर्गलोकों" की टेक लगा
दी। स्तोम परम स्वर्गलोक हैं।
·तीसरा अध्याय ] २५१
तीन सत्रह भागों वाले स्तोम पहले होते हैं और तीन सत्रह
भागों वाले पीछे। अगर दो दो करके लिये जायँ तो चौंतीस
हुये। स्तोमों में चौंतीसवां उत्तम या आखिरी है।
सूर्य्य इन लोकों के बीच में अधिष्ठाता होकर तपता है।
अपने इस पद के कारण वह भूत और भविष्यत् सभी चीजों
में अच्छा है और उन सबसे अधिक चमकीला है। इस प्रकार
विषुवान् अर्थात् इक्कीसवीं भी सब दिनों में श्रेष्ठ है। जो इस
रहस्य को समझता है वह विभूषित होता है और इस लिये
सबसे श्रेष्ठ होता है। (४)
१९—अब स्वरसामों का कृत्य किया जाता है। यह लोक
स्वरसाम हैं। इनको स्वरसाम इसलिए कहते हैं कि यजमानों ने
इनके द्वारा इन लोकों को प्रसन्न किया। (स्पृण्वन्) ऻ।
स्वरसाम करके वे (सूर्य्य को) इन लोकों में भाग दिलाते
हैं।
देवों को भय हुआ कि यह स्वरसामों के स्तोम सम होने के
कारण और (अन्य स्तोमों द्वारा) सुरक्षित न होने के कारण
गिर न पड़ें। उनको फिसलने से बचाने के लिए उन्होंने उनको
नीचे से स्तोमों से और ऊपर से पृष्ठों से घेर दिया। इसीलिये
(स्वर साम से पहले) "अभिजित्" दिन में सब स्तोम पढ़े
जाते हैं और (स्वरसाम से बाद के दिन) "विश्वजित्" दिन में
सब पृष्ठ पढ़े जाते हैं। सत्रह स्तोमों को स्तोमों और पृष्ठों से
इसलिये घेर देते हैं कि वे ठहरे रहें और गिरने न पावें।
देव डर गये कि सूर्य्य स्वर्गलोक से गिर न पड़े। इसलिए
उन्होंने उसको पाँच रस्सियों से कस दिया। दिवाकीर्त्य साम
ऻ'स्वरसाम' शब्द को "स्पृ" से कैसे बनाया और क्या अर्थ हुआ
यह जान नहीं पड़ता।
२५२ [ चौथी पञ्चिका
रस्सियां हैं। इन्हीं में महादिवाकीर्त्य पृष्ठ हैं। अन्य साम हैं
विकर्ण, ब्रह्म, भास और अग्निष्टोम । दोनों पवमान स्तोत्रों के
लिए बृहत् और रथंतर होते हैं ।
इस प्रकार उन्होंने सूर्य्य को पाँच रस्सियों से तान कर
ठहरा दिया और गिरने न दिया ।
सूर्य्य के उदय होने पर प्रातरनुवाक बोले । इस प्रकार यह
सब स्तुतियां दिवाकीर्त्य ( दिन की ) हो जाती हैं। जिस सौर्य्य-
पशु का सवन में आलभन किया जाय वह जहाँ तक मिले सफेद
होना चाहिये। क्योंकि यह दिन सूर्य्य देवता का है।
इक्कीस सामधेनियां बोले क्योंकि यह इक्कीसवीं है।
५१ वें या ५२ वें शस्त्र मंत्र को पढ़ने पर निविद रक्खे
(ऋ० १।३२ इन्द्रस्य नु वीर्याणि आदि—पूरा सूक्त), फिर इतने
ही मंत्र और पढ़े ( ५१ या ५२ ) इस प्रकार सौ से अधिक हो
गये । मनुष्य का पूरा जीवन सौ साल का है। वह शत-वीर्य्य
और शत-इन्द्रिय होता है। इस प्रकार होता यजमान को
आयुष्मान्, वीर्य्यवान और इन्द्रियवान बना देता है। (५)
२०—दूरॊहण का जाप करता है। मानो चढ़ता है। स्वर्ग
लोग दूरारोहण है (क्योंकि कठिनता से चढ़ा जाता है)। जो
इस रहस्य को समझता है वह स्वर्गलोक को चढ़ जाता है।
दूरोहण शब्द का यह अर्थ है कि यह जो तपता है अर्थात्
सूर्य्य यह कठिनता से चढ़ पाता है और जो कोई वहाँ जाना
चाहे वह भी ।
दूरोहण का जाप कर के मानो वह सूर्य्य तक चढ़ जाता है।
'हंस' वाले मंत्र को पढ़ कर चढ़ता है :—
हंसः शुचिषद वसुरंतरिक्षसद् होता वेदिषदतिथिर्दुरोण सत् ।
नृषद् वरसद्ऋतसद् व्योमसदब्जा गोजा ऋतजा अद्रिजा ऋतम् ॥
( ऋ० ४।४०।५ )
तीसरा अध्याय ] २५३
“हंसः शुचिषद्” ( प्रकाश में बैठने वाला हंस ) यह सूर्य्य
है जो प्रकाश में बैठा हुआ है। “बसुरन्तरिक्ष सद्” वही अन्त-
रिक्ष्न में बैठने वाला वसु है। वही “होता वेदिषद्” अर्थात् वेदी
में बैठने वाला होता है। वही “अतिथिर्दुरोणसत्” अर्थात् घर
में बैठने वाला अतिथि है। वही ‘नृषद्’ मनुष्यों में बैठने
वाला है। “वरसद्” अच्छे स्थान पर बैठने वाला है। अर्थात्
जिस स्थान् पर बैठ कर यह तपता है वह बहुत अच्छा स्थान
है। “ऋतसद्” वह सचाई में बैठा हुआ है। “व्योमसद्” वह
आकाश में बैठा हुआ तपता है। वह ‘अब्जा’ जल से उत्पन्न
हुआ है। वह प्रातःकाल जलों में से निकलता है, और शाम को
जलों में घुस जाता है। वह ‘गोजा’ गौओं से उत्पन्न हुआ।
और ‘ऋतजा’ सत्य से उत्पन्न हुआ। ‘अद्रिजा’ पहाड़ से उत्पन्न
हुआ है। ‘ऋत्’ अर्थात् सत्य है।
सूर्य्य यह सब कुछ है। और यह मंत्र सूर्य्य का प्रत्यक्षतम
रूप बतलाने वाला है। इसलिये जहाँ कहीं दूरोहण पढ़ा जाय
‘हंस’ वाले मंत्र के साथ पढ़ा जाय । ॐ
ॐ दूरोहण का यह हंस वाला मंत्र सात बार पढ़ना चाहिये। इस
प्रकार :-
( १ ) ‘शोंसावोम्’ कहने के पश्चात् पहले पद पद कर के।
( २ ) फिर आधा आधा मंत्र।
( ३ ) फिर तीन तीन पद मिला कर।
( ४ ) फिर पूरा मंत्र लगातार बिना ठहरे हुये।
( ५ ) फिर तीन तीन पद मिला कर।
( ७ ) फिर आधा आधा मंत्र।
( ७ ) फिर पद पद अलग करके। अन्त में ओम् कह कर समाप्त
करे।
१५४ [चौथी पञ्चिका
स्वर्ग की इच्छा वाला तार्क्ष्य मंत्र से आरंभ करे :—
त्यमूषु वाजिनं देवजूतं सहावानं तरुतारं रथानां । अरिष्टनेमि पृत-
नाजमाशुं स्वस्तये तार्क्ष्यमिहा हुवेम ॥ (ऋ० १०।१७८।१)
क्योंकि तार्क्ष्य ने मार्ग दिखाया था जब गायत्री सुपर्ण
होकर सोम को लाई थी। जैसे कोई खेत जानने वाले को अपना
अगुवा बनाले इसी प्रकार तार्क्ष्य मंत्र से ('दूरोहण' को) आरंभ
करना है। तार्क्ष्य वह है जो बहता है ( पवन ) और स्वर्ग लोक
को ले जाता है।
ऊपर के मंत्र का अर्थ :—
हम यहां स्वस्ति के लिये बुलावें ("देवजूतं वाजिनं") देव-
ताओं से प्रेरित हुये घोड़े को जो ( सहावान ) मजबूत है।
( रथानां तरुतारं ) रथों में शीघ्र चलने वाला । ( अरिष्ट नेमि )
जिसकी नेमि अच्छी है, ( पृतनाजं ) जो लड़ाई में तीव्र है,
( तार्क्ष्य ) जो तेज है।"
यह ( पवन ) देवजूत वाजी है। यह सहावान है। वह
'रथानां तरुतारं' है क्योंकि इन लोकों को शीघ्र ही पार कर
जाता है, 'स्वस्तये' से होता अपना कल्याण चाहता है, 'इहा
हुवेम' से होता उसका आह्वान करता है।
इन्द्रस्येव रतिमाजोहुवानाः स्वस्तये नावमिवा रुहेम । उर्वी न पृथ्वी
बहुले गभीरे मा वामेतौ मा परेतौ रिषाम ॥ (ऋ० १०।१७८।२)
“इन्द्र के लिये जैसे उसी प्रकार 'तार्क्ष्य' के लिये बार-बार
आहुति देते हुये हम नाव के समान चीजों में चढ़ें। पृथ्वी हमारे
लिये विस्तृत हो, बहुत बड़े और गहरे तुम दोनों ( आकाश और
पृथिवी ) में चलते हुये हम दुःख न उठावें।”
'स्वस्तये' शब्द से कल्याण चाहता है। 'नावमिवारुहेम'
से वह तार्क्ष्य में चढ़ता है, स्वर्गलोक को प्राप्ति उसके भोग और
वहां की संपत्ति के लिये। मंत्र के अन्तिम पद से तात्पर्य यह
तीसरा अध्याय ] २६५
है कि हम आराम से यहाँ से जावें और आराम से लौट आवें ।
सद्यश्चिद्यः शवसा पंच कृष्टीः सूर्य इव ज्योतिषापस्ततान । सहस्रसाः
शतसा अस्य रंहिर्न स्मा वरन्ते युवतिं न शर्याम् ॥ (ऋ० १०।१७८।३)
जैसे सूर्य ज्योति से जलों को फैलाता है उसी प्रकार से
( तार्थ्य ) अपने बल से पांच लोकों को फौरन पार कर सकता
है । इस हज़ारों और सैकड़ों शक्ति वाले ( तार्थ्य ) की चाल
तेज बाण की चाल के समान है । (६)
'सूर्य इव' से प्रत्यक्ष रूप से सूर्य्य का अभिवादन करता हैं
और मन्त्र के पिछले भाग से वह यजमान के लिये और अपने
लिये कल्याण की प्रार्थना करता है ।
२१-आह्वाव के पश्चात् दूरोहण पढ़ता है । स्वर्गलोक दूरो-
हण है । वाणी आह्वाव है । ब्रह्म वाणी है । इस प्रकार ब्रह्मरूपी
आह्वाव के सहारे स्वर्गलोक का प्राप्त करता है। पहले पद पद
करके पढ़ता है । ( दूरोहण का पढ़ना चढ़ने का प्रतिनिधि रूप
है ) इस प्रकार इस लोक की प्राप्ति करता है। आधे-आधे मंत्र
से अन्तरिक्ष को प्राप्त करता है । फिर तीन-तीन पदों को मिला
कर पढ़ता है । इससे उस लोक को प्राप्त करता है, फिर कुल
मन्त्र बिना ठहरे पढ़ता है । इस से वह सूर्य्यलोक में जगह
पा लेता है ।
अब तीन-तीन पद मिला कर उतरता है जैसे वृक्षों की डाली
पकड़ कर उतरते हैं । इससे वह उस लोक में प्रतिष्ठा पा लेता
है । आधे-आधे मंत्र पर ठहर कर वह अन्तरिक्ष में स्थान पा
लेता है । और पद-पद पर ठहर कर इस लोक में । इस प्रकार
स्वर्गलोक में प्रतिष्ठा पाकर इस लोक में प्रतिष्ठा पाता हैं । जो
केवल एक यानी स्वर्ग की ही कामना चाहें उनके लिये दूरोहण
का पिछला भाग ( उतरने का भाग ) न पढ़ा जाय । इससे वे