ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२३६ [ चौथी पञ्चिका
अग्निर्होता गृहपतिः स राजा विश्वा वेद जनिमा जातवेदाः, देवना-
मृत यो मर्त्यानां यजिष्ठः स प्र यजतामृतावा ॥ ( ऋ० ६।१५। १३ )
कुछ लोगों का कहना है कि इस मंत्र से अश्विन-शस्त्र का
आरंभ करना चाहिये :-
अग्निं मन्ये पितरमग्निमापिमग्निं भ्रातरं सदमित् सखायम् ।
अग्नेरनीकं बृहतः सपर्य दिवि शुक्रं यजतं सूर्यस्य । (ऋ० १०।७।३)
उनका कहना है कि "दिवि शुक्रं यजतं सूर्यस्य" (मंत्र
का चौथा पाद ) इन शब्दों से द्वारा वह यथेष्ट स्थान को पहुँच
जायगा ।
परन्तु यह बात माननीय नहीं है। उन लोगों से कहा कि
अगर मंत्र में 'अग्नि' शब्द बार बार आयेगा तो होता आग में
गिर पड़ेगा । ऐसा ही हुआ करता है । इसलिये "अग्नि होता
गृहपतिः" इससे आरंभ करना चाहिये । इसमें 'गृहपति' और
जनिमा ( सन्तान ) शब्द हैं । इससे उसको पूर्ण आयु प्राप्त हो
सकती है। जो इस रहस्य को समझता है उसकी आयु पूर्ण
होती है । (१)
८—यह जो देवते दौड़ रहे थे उनमें से चलने के बाद अग्नि
अपने मुख या लपटों द्वारा आगे था । अश्विन पीछे थे । और
वे उससे बोले "हम दोनों जीत जायं"। अग्नि मान गया कि
अश्विन शस्त्र में हम को भी भाग मिले । उन्होंने स्वीकार कर
लिया और अश्विन-शस्त्र में अग्नि को स्थान दे दिया । इसीलिये
अश्विन-शस्त्र में अग्नि के लिये कई मंत्र हैं ।
अश्विन उषा के पीछे थे । वे उससे बोले, "तू हट जा ।
हम जीत जायं" वह इस शर्त पर मान गई कि उसका भी
भाग लगे । उन्होंने स्वीकार कर लिया और उसके लिये अश्विन-
शस्त्र में जगह कर दी । इसीलिये अश्विन-शस्त्र में उषा के लिये
कई मंत्र हैं ।