ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२४८ [ चौथी पञ्चिका
जो पहल षडह का ठीक ठीक ज्ञान रखता है वह साल का
भली भांति पार पा लेता है । इसी तरह जो दूसरे षडह का,
तीसरे षडह का, चौथे षडह का और पांचवें षडह का ( षडह =
षट् + अह = छः दिन । महीने के तीस दिन पाँच षडह में बंटे
हुये हैं । ) ( १ )
१६—पहले षडह को करते हैं । छः दिन होते हैं और छः
ऋतुयें । इस प्रकार ऋतुओं वाले साल को प्राप्त करते हैं और
वर्ष की सभी ऋतुओं में प्रतिष्ठा लाभ करते हैं ।
दूसरे षडह को करते हैं । अब १२ दिन हुये । १२ मास
होते हैं । इस प्रकार महीनों वाले साल को प्राप्त करते हैं और
साल के सभी महीनों में प्रतिष्ठा लाभ करते हैं ।
तीसरे षडह को करते हैं । अब अठारह दिन हुये । यह
हुये नौ के दूने । ९ प्राण हैं और नौ स्वर्ग लोक । प्राणों और
स्वर्ग लोकों का लाभ करते हैं और प्राणों और स्वर्ग लोकों में
प्रतिष्ठा लाभ करते हैं ।
चौथे षडह को करते हैं । अब २४ दिन हुये । २४ पाख
हुये । पाख वाले वर्ष को प्राप्त करते हैं और वर्ष के सब पाखों
में प्रतिष्ठा लाभ करते हैं ।
पाँचवें षडह को करते हैं । तीस दिन हो गये । विराट् में
तीस अक्षर होते हैं । विराट् अन्न है । इस प्रकार यह हर मास
में विराट् (अन्न) का लाभ करते हैं ।
अन्न की कामना वालों ने सत्र किया । हर महीने विराट्
( तीस की संख्या ) को प्राप्त करके उन्होंने दोनों लोकों में
अन्न प्राप्त कर लिया ! इस लोक में भी और उस लोक में भी ।(२)
१७—"गवामयन" नामक ( गायों का भ्रमण ) कृत्य करते
हैं । गौ आदित्य हैं । 'गवामयन' करने से 'आदित्य-अयन'
हो जाता है ।