ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंतीसरा अध्याय ] २६५
है कि हम आराम से यहाँ से जावें और आराम से लौट आवें ।
सद्यश्चिद्यः शवसा पंच कृष्टीः सूर्य इव ज्योतिषापस्ततान । सहस्रसाः
शतसा अस्य रंहिर्न स्मा वरन्ते युवतिं न शर्याम् ॥ (ऋ० १०।१७८।३)
जैसे सूर्य ज्योति से जलों को फैलाता है उसी प्रकार से
( तार्थ्य ) अपने बल से पांच लोकों को फौरन पार कर सकता
है । इस हज़ारों और सैकड़ों शक्ति वाले ( तार्थ्य ) की चाल
तेज बाण की चाल के समान है । (६)
'सूर्य इव' से प्रत्यक्ष रूप से सूर्य्य का अभिवादन करता हैं
और मन्त्र के पिछले भाग से वह यजमान के लिये और अपने
लिये कल्याण की प्रार्थना करता है ।
२१-आह्वाव के पश्चात् दूरोहण पढ़ता है । स्वर्गलोक दूरो-
हण है । वाणी आह्वाव है । ब्रह्म वाणी है । इस प्रकार ब्रह्मरूपी
आह्वाव के सहारे स्वर्गलोक का प्राप्त करता है। पहले पद पद
करके पढ़ता है । ( दूरोहण का पढ़ना चढ़ने का प्रतिनिधि रूप
है ) इस प्रकार इस लोक की प्राप्ति करता है। आधे-आधे मंत्र
से अन्तरिक्ष को प्राप्त करता है । फिर तीन-तीन पदों को मिला
कर पढ़ता है । इससे उस लोक को प्राप्त करता है, फिर कुल
मन्त्र बिना ठहरे पढ़ता है । इस से वह सूर्य्यलोक में जगह
पा लेता है ।
अब तीन-तीन पद मिला कर उतरता है जैसे वृक्षों की डाली
पकड़ कर उतरते हैं । इससे वह उस लोक में प्रतिष्ठा पा लेता
है । आधे-आधे मंत्र पर ठहर कर वह अन्तरिक्ष में स्थान पा
लेता है । और पद-पद पर ठहर कर इस लोक में । इस प्रकार
स्वर्गलोक में प्रतिष्ठा पाकर इस लोक में प्रतिष्ठा पाता हैं । जो
केवल एक यानी स्वर्ग की ही कामना चाहें उनके लिये दूरोहण
का पिछला भाग ( उतरने का भाग ) न पढ़ा जाय । इससे वे