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सर्वकोश
ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

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पृष्ठ 266

२५२ [ चौथी पञ्चिका
रस्सियां हैं। इन्हीं में महादिवाकीर्त्य पृष्ठ हैं। अन्य साम हैं
विकर्ण, ब्रह्म, भास और अग्निष्टोम । दोनों पवमान स्तोत्रों के
लिए बृहत् और रथंतर होते हैं ।
इस प्रकार उन्होंने सूर्य्य को पाँच रस्सियों से तान कर
ठहरा दिया और गिरने न दिया ।
सूर्य्य के उदय होने पर प्रातरनुवाक बोले । इस प्रकार यह
सब स्तुतियां दिवाकीर्त्य ( दिन की ) हो जाती हैं। जिस सौर्य्य-
पशु का सवन में आलभन किया जाय वह जहाँ तक मिले सफेद
होना चाहिये। क्योंकि यह दिन सूर्य्य देवता का है।
इक्कीस सामधेनियां बोले क्योंकि यह इक्कीसवीं है।
५१ वें या ५२ वें शस्त्र मंत्र को पढ़ने पर निविद रक्खे
(ऋ० १।३२ इन्द्रस्य नु वीर्याणि आदि—पूरा सूक्त), फिर इतने
ही मंत्र और पढ़े ( ५१ या ५२ ) इस प्रकार सौ से अधिक हो
गये । मनुष्य का पूरा जीवन सौ साल का है। वह शत-वीर्य्य
और शत-इन्द्रिय होता है। इस प्रकार होता यजमान को
आयुष्मान्, वीर्य्यवान और इन्द्रियवान बना देता है। (५)
२०—दूरॊहण का जाप करता है। मानो चढ़ता है। स्वर्ग
लोग दूरारोहण है (क्योंकि कठिनता से चढ़ा जाता है)। जो
इस रहस्य को समझता है वह स्वर्गलोक को चढ़ जाता है।
दूरोहण शब्द का यह अर्थ है कि यह जो तपता है अर्थात्
सूर्य्य यह कठिनता से चढ़ पाता है और जो कोई वहाँ जाना
चाहे वह भी ।
दूरोहण का जाप कर के मानो वह सूर्य्य तक चढ़ जाता है।
'हंस' वाले मंत्र को पढ़ कर चढ़ता है :—
हंसः शुचिषद वसुरंतरिक्षसद् होता वेदिषदतिथिर्दुरोण सत् ।
नृषद् वरसद्ऋतसद् व्योमसदब्जा गोजा ऋतजा अद्रिजा ऋतम् ॥
( ऋ० ४।४०।५ )