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सर्वकोश
ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

पृष्ठ 253, कुल 592 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 253

दूसरा अध्याय ] २३९.
को छोड़ जायगा और बृहती को छोड़ जायगा तो प्राणों को
छोड़ जायगा ।
इन्द्र के इन प्रगाथों को पढ़ता है :—
इन्द्र क्रतुं न आ भर पिता पुत्रेभ्यो यथा । शिक्षान्णो अस्मिन्
पुरुहूत यामनि जीवा ज्योतिरशीमहि ॥ ( ऋ० ७।३२।२६)
"हे इन्द्र, हमारे यज्ञ को पूरा कर जैसे पिता पुत्र की मदद
करता है। हे पुरुहूत ( सब इसी को बुलाते हैं इस लिये इसको
पुरुहूत कहा ) हमको इसमें शिक्षा दे, जिससे हम ज्योति को
प्राप्त होवें" ।
यह जो ज्योति है उससे सूर्य्य का तात्पर्य है । इस मंत्र को
पढ़कर वह सूर्य्य को भूलता नहीं ।
बार्हत प्रगाथ को पढ़कर वह बृहती को भूलने नहीं पाता ।
नीचे के मंत्र से राथंतरी योनि की स्तुति करता है :—
अभि त्वा शूर नोनुमोऽदुग्धा इव धेनवः । ईशानमस्य जगतः स्व-
दृ॑शमीशानमिन्द्र तस्थुषः ॥
(ऋ० ७।३२।२२ तथा सामवेद उत्त० १।१।११)
राथंतर स्वर से अश्विन शस्त्र का सन्धि स्तोत्र पढ़ा जाता
है । यह रथंतर योनि के लिये ।
ऊपर के मंत्र में "ईशानमस्यजगतः स्वदृ॑शम्" शब्द हैं ।
'स्वदृक्' से सूर्य्य का तात्पर्य् है ( स्वर्ग का देखने वाला ) ।
इसके पाठ से वह सूर्य को नहीं भूलता । यह जो बार्हत प्रगाथ
है उससे बृहती को नहीं भूलता ।
नीचे का मंत्र ओर वरुण का प्रगाथ पढ़ता है:—
बहवः सूरचक्षसोऽग्निजिह्वा ऋतावृधः । त्रीणि ये येमुर्विदथानि
धीतिभिर्विश्वानि परिभूतिभिः ॥ (ऋ०७।६६।१०)
दिन मित्र है और रात वरुण । जो अतिरात्र करता है वह