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ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

१० [ ऐतरेय-ब्राह्मण
'रोकना'। परन्तु इन सब में 'ग्रह' धातु का 'पकड़ना' अर्थ
ओत प्रोत है। जब तक एक मनुष्य दूसरे का संपर्क नहीं करता
उसके साथ न दया कर सकता है, न लड़ाई; न पालन, न रोकना।
इसी प्रकार पशु को मारने के लिये उसकी प्राप्ति पहले होगी
और वध पीछे। इस प्रकार 'आलभ्य हन्ति' के अर्थ में केवल
'आलभते' का प्रयोग किया गया। और जब यह प्रयोग दीर्घ-
काल के प्रयोग से परिचित सा हो गया तो 'आलभन' 'हनन'
के अर्थ में रूढ़ि हो गया। और जहाँ कहीं 'आलभन' प्राप्ति के
अर्थ में था वहाँ भी 'हनन' के अर्थ में ले लिया गया। जब यज्ञ
में पशु-वध सामान्य हो गया तो पशु-वध सम्बन्धी अन्य शब्दों
का ताना बाना भी 'आलभन' के चारों ओर इस प्रकार बुन दिया
गया कि उसके वास्तविक अर्थ का तिरोभाव हो गया।
ऐतरेय ब्राह्मण के बहुत से स्थलों के देखने से ज्ञात होता है
कि यज्ञों को हिंसा-शून्य बनाया जा सकता है। हिंसक-वृत्ति के
हस्तक्षेप से पहले यज्ञों का यही रूप था। कहीं-कहीं तो यज्ञ
की रूपकालंकार में पशु से उपमा देकर यज्ञ के सिर, यज्ञ के
पैर, यज्ञ के उदर, यज्ञ के हृदय आदि का उल्लेख किया गया
है। परन्तु पशु की उपमा इसलिये नहीं दी गई कि पशु को काटा
जाय या यज्ञ को काटा जाय। अपितु इस लिये कि जैसे पशु के
सब अङ्ग एक दूसरे से घनिष्ठतम सम्बन्ध रखते हैं उसी प्रकार
यज्ञ की भिन्न-भिन्न क्रियायें भी परस्पर सम्बन्धित हैं। यदि
किसी पशु का सिर काट लिया जाय तो न सिर सिर रहता है, न
पशु पशु। पशु तभी तक पशु है जब तक उसके अङ्ग बने हुये
हैं और अङ्ग तभी तक अंग हैं जब तक अङ्गों के साथ उनका
सम्बन्ध है। इसी प्रकार अङ्गभङ्ग होने से यज्ञ यज्ञ नहीं रहता।
'यज्' धातु का एक अर्थ संगतिकरण है। 'संगति' की सब से
अच्छी उपमा जीवित पशु का शरीर है। मृत का नहीं। अंगरेजी

प्राक्कथन ] ११
का शब्द 'Body Politic' जीवित शरीर की उपमा से समन्वित
है। इसी प्रकार Organisation जो सभा के अर्थों में आता है
शरीर के अवयवों या गोलकों ( Organs ) से सम्बन्ध रखता
है। Corporation, in corporate आदि अनेकों शब्द लैटिन
के Corpus ( शरीर ) से सम्बन्ध रखते हैं। परन्तु वहाँ काटने
का अर्थ न है, न उसकी ओर दूरस्थ संकेत ही है।
हमारा विचार था कि ऐतरेय ब्राह्मण और शतपथ ब्राह्मण
की गाथाओं की सुसङ्गत व्याख्या की जाय और इनको प्रक्षिप्त
स्थलों से मुक्त करके शुद्ध कर दिया जाय। परन्तु यह काम
बहुत छानबीन और बहुत समय चाहता है। जल बहुत गदला
हो तो उसको साधारण छन्ने से छान नहीं सकते। उसके लिये
बाष्पीकरण (Evaporation) चाहिये। विषाक्त अन्न का विष दूर
करना कठिन है। हमें खेद है कि हम इस कठिन कार्य का सम्पा-
दन नहीं कर सके। हममें योग्यता और समय दोनों की ही कमी
है। अतः हमने शाब्दिक अनुवाद पर ही सन्तोष किया है।
कुछ मित्रों का आग्रह था कि या तो हम ब्राह्मण ग्रन्थों को
मनुस्मृति के समान सर्वथा शोध कर और क्षेपकों को
निकाल कर छापें या हर कठिन स्थल की पूरी विवेचना और
व्याख्या करें या न छापें। पहली दो बातें इस समय असम्भव
सी प्रतीत हुईं। मनु में जो क्षेपक हैं वह समस्त शास्त्र में विषाक्त
अन्न के समान ओत प्रोत नहीं है अपितु दूध में मक्खी के
समान हैं जो जल्दी से निकाल कर फेंकी जा सकती है। ब्राह्मण
ग्रन्थों में क्षेपक भी हैं और रहस्यमय गाथायें भी हैं और कुछ
विशिष्ट परिभाषायें भी हैं। यह तीनों चीजें इस प्रकार मिली
जुली हैं कि इनको छान कर शुद्ध करना अत्यन्त कठिन है। एक
दो स्थलों को लेकर विभिन्न विद्वान विभिन्न पक्षों को सिद्ध कर के
अपने पाण्डित्य का परिचय दे सकते हैं और उलझनें ज्यों की

१२ [ ऐतरेय-ब्राह्मण .
त्यों बनी रहती हैं। हमें यह अभीष्ट नहीं है। अब अन्त की
बात रह जाती है अर्थात् फिर अनुवाद ही क्यों किया जाय।
इसका एक मात्र उत्तर यह है कि हिन्दी भाषा भाषियों के पास
कोई ऐसी चीज़ अवश्य होनी चाहिये जिससे वह संस्कृत
साहित्य की झलक देख सकें और पेचदार स्थलों पर अपनी
बुद्धि लगा सकें। ऐतरेय ब्राह्मण में ऐसी उलझनों का बाहुल्य
है। क्या गाथायें, क्या यज्ञ की क्रियाओं के पक्ष में युक्तियाँ,
शंकाओं का समाधान सभी विचित्र हैं और गुत्थियाँ सुलझाने
में चतुर लोगों के लिये पर्याप्त सामग्री उपस्थित करते हैं। कम
से कम लोगों को यह तो पता लग ही जायगा कि यज्ञ की
क्रियायें कितनी जटिल, कितनी महत्त्वपूर्ण और कितनी उपयोगी
हैं। हमने उन मन्त्रों को प्रायः पूरा-पूरा दिया है जिनकी मूल
ग्रन्थ या भाष्य में केवल प्रतीकें ही दी गई हैं। बहुत बड़े सूक्त
छोड़ दिये हैं अन्यथा पुस्तक का कलेवर बहुत बढ़ जाता। कहीं-
कहीं मन्त्रों के अर्थ भी दे दिये हैं। हमारे इस अनुवाद में
त्रुटियाँ बहुत मिलेंगी। हमको स्वयं अपनी कृति सन्तोषजनक
प्रतीत नहीं होती। परन्तु आशा है कि हमारे पश्चात् कार्य करने
वाले सज्जन उत्तरोत्तर विशदता का समावेश कर सकेंगे।
ऐतरेय ब्राह्मण, ऐतरेय ( महीदास ) ऋषि का बना हुआ
बताया जाता है। ग्रन्थ में कोई ऐसी साक्षी नहीं है जिससे
'ऐतरेय' मुनि के विषय में कुछ ज्ञात हो सके। कहते हैं कि
'इतरा' एक नीच कुल की स्त्री थी। उसी से उत्पन्न होने के कारण
माता के नाम पर इनका ऐतरेय नाम पड़ा। जैसे 'जाबाल' का।
हमारा इन गाथाओं पर विश्वास नहीं। यह ठीक है कि किसी
पुरुष का बड़ा होना उसके कुल के आश्रित नहीं है। अच्छे कुल में
बुरे और बुरे कुल में अच्छे उत्पन्न हुआ ही करते हैं। परन्तु एक
बात हमको बहुत खटकती है। वैदिक साहित्य में जिन-जिन बड़े

ब्राह्मण । इन ब्राह्मणों में ऋग्वेदीय, यजुर्वेदीय आदि की भेदक-

प्राक्कथन ] १३
और गौरवान्वित पुरुषों का उल्लेख आता है उनमें से प्रायः बहुतों
के जन्म के साथ ऐसी गाथायें क्यों जोड़ दी गईं ? क्या वैदिक
साहित्य में उच्चकुल के पुरुषों का कुछ भी भाग नहीं या अत्यन्त
न्यून भाग है ? सम्भव है कि बहुत सी गाथाओं का आधार वेद
विरोधी मत हुये हों । निश्चयात्मक होना कठिन है ।
ऐतरेय ऋग्वेदी ब्राह्मण है । 'ब्राह्मण' का क्या अर्थ है ? यह
शब्द 'ब्रह्म' में 'अण्' प्रत्यय करने से बनता है । ब्रह्म का अर्थ यहाँ
यज्ञ समझना चाहिये । यज्ञ के ऋत्विजों में ब्रह्मा का पद मुख्य है
क्योंकि वह यज्ञ के सब कृत्यों को जानता और होता, अध्वर्यु
तथा उद्गाता आदि का पथ प्रदर्शन करता है । इसलिये यज्ञ के
विशेषज्ञ यज्ञ के सम्बन्ध में जो विवेचना करते हैं उनका नाम है
ब्राह्मण । इन ब्राह्मणों में ऋग्वेदीय, यजुर्वेदीय आदि की भेदक-
भित्ति कैसे खड़ी हुई यह कहना कठिन है । ऐसा भेद उपनिषदों
के सम्बन्ध में भी पाया जाता है । आदि काल में ऐसा भेद न
था । लोगों को चारों वेद पढ़ने पढ़ाने की प्रथा थी । वेद यदि
जीवन से सम्बन्ध रखते हैं तो यह भेद क्यों हो ? यज्ञों में भी
यह भेद क्यों हो ? ऐसा प्रतीत होता है कि आगे चल कर किसी
कारण से वेदज्ञ ब्राह्मणों ने एक एक वेद अपने परिवार के लिये
चुन लिया । कोई ऋग्वेदी हो गये, कोई यजुर्वेदी और कोई
सामवेदी । पीछे से यह सामान्य भेद गहरा भेद हो गया ।
उनकी शाखायें अलग-अलग हो गईं । यज्ञ करने की प्रणाली भी
अलग अलग हो गई । आदि में सुसंगठित आर्यों की आगे
आने वाली भयानक विभिन्नता का यह एक सूत्रपात था । आज
कल भिन्न-भिन्न प्रकार के भेद मनुष्य जाति को विभक्त कर रहे
हैं । एक वेद मत के अनुयायी और वेद को ही अपना धर्म ग्रन्थ
मानने वाले लोगों में तो यह भेद होना दुर्भाग्य की ही बात है।
अस्तु । ऐतरेय ऋग्वेदीय ब्राह्मण है । इसमें होता द्वारा पढ़े जाने

१४ [ ऐतरेय ब्राह्मण
वाले ऋग्वेदीय मंत्रों का ही वाहुल्य है । इसमें ४० अध्याय हैं ।
पाँच पाँच अध्यायों की एक पंचिका कहलाती है । इस प्रकार
ऐतरेय ब्राह्मण में आठ पंचिकायें ( ८ × ५ = ४० ) हैं ।

पहली पंचिका

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri
CC-0.Panini Kanya Maha Vidyalaya Collection.

पहला अध्याय
अग्निष्टोम का आरंभ
दीक्षणीय-इष्टि
१—देवों में अग्नि का सबसे आदि का और विष्णु का
सबसे अन्त का पद है । इनके बीच में और सब देव हैं । दीक्ष-
णीय इष्टि❀ में ग्यारह कपालों (प्यालों) वाला अग्नि-विष्णु का
पुरोडाश अर्पण करना चाहिये† । बिना किसी को छोड़े । इस
दृष्टि से सभी देवताओं के लिए अर्पण करते हैं । क्योंकि अग्नि ही
सब देवता है । विष्णु ही सब देवता है । यह दोनों शरीर धारी
(तन्वौ अर्थात् शरीर धारी या स्थूल रूप अर्थात् वास्तविक सत्ता
वाले) अग्नि और विष्णु यज्ञ के किनारे हैं । यह जो अग्नि और
❀सोमयाग में गोष्टोम, आयुष्टोम, आदि कई विभाग हैं । उनमें
सबसे पहला ज्योतिष्टोम है । इस ज्योतिष्टोम की चार संस्थायें हैं ।
( १ ) अग्निष्टोम ( २ ) उक्थ्य ( ३ ) षोडशी ( ४ ) अतिरात्र ।
ऐतरेय ब्राह्मण का आरंभ अग्निष्टोम से होता है ।
†यहाँ वर्तमान विधि-अर्थ में है, लिङर्थे लेट् (पाणिनि ३।४।७ )
( १७ )
२

१८ [ प्रथम पञ्चिका
विष्णु के पुरोडाश को अर्पण करते हैं, वह अन्त में उस यज्ञ के
देवों को समृद्ध करते हैं। (अर्थात् अग्नि और विष्णु का नाम
लेने से उनके मध्यवर्त्ती देवताओं का भी ग्रहण हो जाता है।
जैसे पाणिनि का सूत्र 'आदिरन्तेन सहेता'—ले०)
यहाँ प्रश्न उठता है कि जब पुरोडाश के ग्यारह कपाल हुये
और देवता दो ही हुये, एक अग्नि और दूसरा विष्णु, तो दोनों में
क्रम क्या होगा और बाँट कैसे होगा ?
इसका उत्तर यह है कि अग्नि के लिये आठ कपाल हैं।
गायत्री में आठ अक्षर होते हैं। गायत्री अग्नि का छन्द है। तीन
कपाल विष्णु के हैं क्योंकि विष्णु ने इस सृष्टि की तीन पदों
अर्थात् तीन क्रमों में रचना की☸। यही इन दोनों का क्रम है
यही बांट है।
जो अपने को अप्रतिष्ठित समझे वह भी घृत युक्त चरु को
अर्पण करे†। इस संसार में जिसका मान नहीं उसकी स्थिति
नहीं। यह जो घी है वह स्त्री का दूध है। तण्डुल पुरुष के हैं।
यह जोड़ा है। इस प्रकार जोड़ा होने के कारण ही (चरु) उस
को संवृद्धि के लिए प्रजा और पशुओं से युक्त करता है। जो
इस रहस्य को समझता है वह प्रजा और पशुओं वाला हो
जाता है।
जो अमावस्या और पूर्णिमा का यज्ञ करता है वह यज्ञ का
☸देखो ऋग्वेद १।२२।१७ इदं विष्णुर्विचक्रमे त्रेधा निदधे पदम् ।
१।२२।१८ त्रीणि पदा विचक्रमे विष्णुः।
†पका हुआ भात 'चरु' कहलाता है; उसमें दूध और घी भी
मिला सकते हैं।

पहला अध्याय ] १६
आरम्भ करने वाला और देवताओं का आरम्भ करने वाला हो
जाता है ।
अमावस्या में हवि देकर या पूर्णमासी में हवि देकर इस
हवि* और इस बर्हि में ( अर्थात् उनके द्वारा ) उसकी दीक्षा हो
जाय । यह एक दीक्षा हुई ।
होता को चाहिये कि सत्रह† सामिधेनियों का पाठ करे ।
*अमावस्या के यज्ञ को हवि और पूर्णिमा के यज्ञ को बर्हि
कहते हैं ।
†सामिधेनी १७ इस प्रकार हैं । १५ सामिधेनी और २ धाय्य ।
यह १५ वस्तुतः ११ ही हैं; पहला और पिछला मंत्र तीन तीन बार पढ़ा
जाने से १५ हो जाती हैं :—
(१) प्र वो वाजा अभिद्यवो हविष्मन्तो घृताच्या । देवाँञ् जिगाति
सुम्नयुः ( ऋ० ३।२७।१) ।
(२) तथा (३) इसी की पुनरावृत्ति ।
(४) अग्नआयाहि वीतये गृणानो हव्य दातये । निहोता सत्सि
बर्हिषि । ( साम० १।१ या ऋ० ६।१६।१० )
(५) तं त्वा समिद्भिर्अङ्गिरो घृतेन वर्धयामसि। बृहच्छोचा यविष्ठ्य ।
( ऋ० ६।१६।११ ) ।
(६) स नः पृथु श्रवाय्यमच्छा देव विवाससि । बृहदग्ने सुवीर्यम् ।
( ऋ० ६।१६।१२ ) ।
(७) ईडेन्यो नमस्यस्तिरस्तमांसि दर्शतः । समग्निरिध्यतेवृषा ।
( ऋ० ३।२७।१३ ) ।
(८) वृषो अग्निः समिध्यतेऽश्वो न देववाहनः । तं हविष्मन्त ईडते ।
( ऋ० ३ २७।१४ ) ।
(६) वृषणं त्वा वयं वृषन् वृषणः समिधीमहि । अग्ने दीद्यतं बृहत् ।
( ऋ० ३।२७।१५ ) ।

[ प्रथम पञ्चिका
२०
क्योंकि प्रजापति सत्रह हैं। बारह महीने और पांच ऋतुयें ।
(१०) अग्निं दूतं वृणीमहे होतारं विश्ववेदसम्। अस्य यज्ञस्य
सुक्रतुम्। ( ऋ० १।१२।१ ) ।
(११) समिध्यमानो अध्वरेऽग्निः पावक ईड्यः । शोचिष्केशस्तमीमहे ।
( ऋ० ३।२७।४ ) ।
(१२) समिद्धो अग्न आहुत देवान् यक्षि स्वध्वर । त्वं हि हव्यवाडसि ।
( ऋ० ५।२८।५ ) ।
(१३) आ जुहोता दुवस्यताऽग्निं प्रयत्यध्वरे । वृणीध्वं हव्यवाहनम् ।
( ऋ० ५।२८।६ ) ।
(१४) तथा (१५) इसी की पुनरावृत्ति ।
सामिधेनी ( सम् + इन्ध करणे ल्युट् ) । अग्नि प्रज्वलित करते
समय पढ़े जाने वाले मन्त्रों का नाम सामिधेनी है । ( शत० ब्रा०
१।३।५।१ ) ।
सामिधेनियों के बीच में जो मन्त्र पढ़े जाते हैं वे 'धाय्य' कहलाते
हैं। यह दो धाय्य ११वीं और १२ वीं सामिधेनियों के बीच में पढ़े
जायंगे । ११वीं ऋचा समिध्यमाना है ( ऋ० ३।२७।४ ) और १२वीं
ऋचा 'समिद्धवती' है ( ऋ० ५।२८।५ ) । इन दो के बीच में दो धाय्य
आने से संख्या १७ है ही। यह दो "धाय्य" मन्त्र यह हैं :—
"पृथुपाजा अमर्त्यो घृत निर्णिङ् स्वाहुतः । अग्निर्यज्ञस्य हव्यवाट् ।
( ऋ० ३।२७।५ ) ।
तं सबाधो यतस्रुच इत्था धिया यज्ञवन्तः । आचक्रुरग्निमूतये ।"
( ऋ० ३।२७।६ ) ।
अर्थात् मन्त्रों के उच्चारण के विचार से धाय्यों की संख्या बारहवीं
और तेरहवीं होगी । सायण ने इनको दसवां और ग्यारहवां बताया है
क्योंकि पहली सामिधेनी ही दूसरी और तीसरी बार दुहराई जाती है ।
पुनरावृत्ति को अलग न गिनें तो १० वीं ११ वीं हो जाती है ।

पहला अध्याय ] २१
हेमन्त और शिशिर एक में सम्मिलित हैं। इतना संवत्सर हुआ।
वर्ष ही प्रजापति है। जो इस रहस्य को जानता है वह प्रजापति-
सम्बन्धी इन ऋचाओं द्वारा समृद्धि को प्राप्त होता है। (१)
२—यज्ञ देवों के पास से भाग गया। उसको इष्टियों द्वारा
उन्होंने तलाश करना चाहा। इष्टियों का इष्टित्व इस लिये है कि
उन्होंने इनके द्वारा (यज्ञ को) तलाश करने की इच्छा की। ('इष्टि'
'इष्' धातु से बना है, जिसका अर्थ है इच्छा करना—ले०)। उन्होंने
उस (यज्ञ) को पा लिया। जो इस रहस्य को समझता है वह
यज्ञ को पाकर समृद्धि को प्राप्त कर लेता है। वास्तव में 'आहूति'
(दीर्घ ऊ की मात्रा) को 'आहुति' (ह्रस्व उ की मात्रा) कहते हैं
क्योंकि इनके द्वारा यजमान देवतों को बुलाता है। यही 'आहु-
तियों' का 'आहुतित्व' है। यह ऊतियां हैं। क्योंकि इन्हीं के
द्वारा देवता यजमान के बुलाने पर आते हैं। ये जो 'ऊतियां' हैं
वे मार्ग या पथ हैं जो यजमान के स्वर्ग तक पहुँचने के लिये
होती हैं। ('आहुति' का अर्थ है, होम में अर्पण किया हुआ।
'आहूति' का अर्थ है बुलाया हुआ। इन दोनों शब्दों के अर्थों
की समानता दिखाई गई हैं अर्थात् हवन में आहुति देना मानों
देवों को बुलाना है—ले०)।
प्रश्न यह है कि जब आहुति देने वाला दूसरा (अध्वर्यु)
होता है तो अनुवाक्य और याज्य मंत्रों के पढ़ने वाले का नाम
'होता' क्यों है ?
(उत्तर) क्योंकि वह देवताओं को यथा स्थान यह कह कर
बुलाता है "अमुक को बुलाओ। अमुक को बुलाओ"। यही
'होता' का 'होतापन' है। जो इस रहस्य को समझता है उसे
'होता' कहते हैं। (२)
३—ऋत्विज लोग जिसको दीक्षा देते हैं उसको मानो फिर
गर्भ में बुलाते हैं (नया जन्म देने के लिये)। उस पर जल छिड़कते

२२ [ प्रथम पञ्चिका
हैं। जल वीर्य है। मानो वह उसको दीक्षा देकर वीर्यवान्
(सरेतस) बनाते हैं। नवनीत अर्थात् घी की नवनी को उस पर
मलते हैं। देवों के लिये जो घी होता है उसे "आज्य" कहते हैं। ॐ
जो मनुष्यों के लिये होता है उसे "घृत" । जो पितरों के लिये
होता है उसे "आयुत" और जो गर्भस्थ जीवों के लिये उसे
"नवनीत"। 'नवनी' मलने का तात्पर्य यह है कि इस प्रकार वह
उसी के भागधेय के द्वारा उसको समृद्ध बनाता है। अब आंखों
में अंजन दिलाते हैं। क्योंकि जो अंजन है उससे आँखों का
प्रकाश बढ़ता है। इस प्रकार उसको प्रकाश देकर दीक्षित करते
हैं। दूर्भो के इक्कीस मुट्ठों से उसे शोधते हैं। इस प्रकार उसको
शुद्ध और पवित्र करके दीक्षित करते हैं।
अब वह उसे उस स्थान पर ले जाते हैं जो दीक्षित-पुरुष के
लिये नियत होता है। यह दीक्षित पुरुष की योनि है। दीक्षा के
स्थान में ले जाकर मानो वह उसे उसकी ही योनि में ले जाते
हैं। इसलिये वह वहाँ योनि के सदृश सुरक्षित स्थान में ठहरता
है और फिर चलता है। इसीलिये गर्भ योनियों में सुरक्षित रक्खे
जाते हैं और वहाँ से उत्पन्न होते हैं। इसलिये दीक्षा-स्थान के
बाहर अन्य स्थान पर दीक्षित पुरुष के ऊपर सूर्य्य उदय और
अस्त न हो, और न वे लोग उससे वार्तालाप करें।
ॐ घी के चार प्रकार बताये :—आज्य, घृत, आयुत, नवनीत :—
सर्पिर्विलीनमाज्यं स्याद् घनीभूतं घृतं विदुः । ईषद्विलीनमायुतम् ।
पिघला घी 'आज्य' है। जमा हुआ 'घृत' है। आधा पिघला
आयुत् है। मक्खन 'नवनीत', नवनी या लौनी कहलाता है। इसी से
और तीन बनाये जाते हैं।
नवनीतस्यपाकजन्यास्तिस्रोऽवस्थाः-पक्वम्, ईषत्पक्वम्, निःशेषपक्वम्
च । द्रव्यान्तरप्रक्षेपेण सुरभिनिःशेष पक्वम् ॥

पहला अध्याय ] २३
वे उसको वस्त्र से ढकते हैं। यह जो वस्त्र है वह दीक्षित
पुरुष का उल्ब है (उल्ब उस झिल्ली को कहते हैं जिसमें बच्चा
उत्पन्न होता है—ले०)। इस प्रकार वह उसे उल्ब से ढकते हैं।
उसके ऊपर से कृष्णाजिन या काले मृग का चर्म लपेटते हैं। उल्ब
के ऊपर जरायु होता है। इस प्रकार वह उसको जरायु से ढकते
हैं। वह मुट्ठी बांधे होता है। क्योंकि मुट्ठी बांधे ही बच्चा गर्भ
में होता है, मुट्ठी बांधे ही उत्पन्न होता है। यह जो वह मुट्ठी
बांधता है, मानो अपने दोनों हाथों में यज्ञ और देवतों को ले
लेता है। इसके लिये कहा जाता है कि जो पुरुष पहले दीक्षा ले
लेता है उसकी मुट्ठी में यज्ञ होता है और मुट्ठी में देवता होते हैं,
इसलिये उसको 'संसव'※ दोष नहीं लगता। और न उसको वह
हानि उठानी पड़ती है जो उस पुरुष को जो पीछे से दीक्षा लेता
है।
अब वह मृग-चर्म को उतार कर स्नान करता है। इस प्रकार
ही बच्चे जरायु के बाहर निकल कर उत्पन्न होते हैं। वह वस्त्र
को लपेटे-लपेटे ही नहाता है। क्योंकि बच्चा 'उल्ब' के साथ
ही तो उत्पन्न होता है। (३)
४—जो 'अनीजान' है अर्थात् जिसने अभी यज्ञ नहीं किया
उसके लिये होता दो अनुवाक्य बोलता है। आज्य भाग अर्थात्
घी के पहले भाग के लिये "त्वमग्ने सप्रथा असि"† (ऋ०
※ यदि दो या अधिक पुरुष एक ही समय में निकट स्थान में
सोम यज्ञ करते हों तो गड़बड़ हो जाती है; उसे 'संसव' दोष कहते हैं।
यदि कोई पुरुष दीक्षित हो जाय तो उसे 'संसव' दोष नहीं लगता। यह
सायण की राय है।
† त्वमग्ने सप्रथा असि जुष्टो होता वरेण्यः। त्वया यज्ञं वि तन्वते ॥
( ऋ० ५।१३।४ )

२४ [ प्रथमं पञ्चिका
५।१३।४) मंत्र और दूसरे भाग के लिये "सोम यास्तेमयो भुवः"
(ऋ० १।९१।९) मंत्र । मानों इस प्रकार "त्वया यज्ञं वितन्वते"
पढ़ कर वह उस (यज्ञ न किये हुये) को यज्ञ देता है ।
जो "ईजान" है अर्थात् जिसने पहले यज्ञ किया है उसके
लिये होता दूसरे दो मंत्र जपता है (१) "अग्निः प्रत्नेन मन्मना"
(ऋ० ८।४४।१२) और (२) "सोमगीर्भिर्ष्ट्वावयम्" (ऋ०
१।९१।११) । मंत्र में "प्रत्नम्" शब्द जो पड़ा है उससे पुरातन
कर्म की ओर संकेत है ।
परन्तु यह दोनों जप छोड़े भी जा सकते हैं । इनके स्थान
में वृत्र को मारने विषयक यह दो मंत्र बोलने चाहिये:—(१)
अग्निर्वृत्राणि जंघनत् (ऋ० ६।१६।३४); (२) त्वं सोमासि सत्पतिः
(ऋ० १।९१।५) । चूंकि जिसके पास यज्ञ आता है वह वृत्र को
मार देता है, इसलिये वृत्र के मारने सम्बन्धी दो ऋचाओं को
बोलना चाहिये ।
अग्नि और विष्णु के हविष् का याज्य है "अग्निर्मुखं प्रथमो
सोम यास्ते मयोभुव ऊतयः सन्ति दाशुषे । ताभिर्नोऽविताभव ॥
( ऋ० १।६१।६ )
अग्निः प्रत्नेन मन्मना शुम्भानस्तन्वं स्वाम् । कविर्विप्रेण वावृधे ॥
( ऋ० ८।४४।१२ )
सोम गीर्भिष्ट्वा वयं वर्धमानो वचोविदः । सुमृडीको न आ विश ॥
( ऋ० १।९१।११ )
अग्निर्वृत्राणि जङ्घनद् द्रविणस्युर्विपन्यया । समिद्धः शुक्र आहुतः ॥
( ऋ० ६।१६।३४ )
त्वं सोमासि सत्पतिस्त्वं राजोत वृत्रहा । त्वं भद्रो असि क्रतुः ॥
( ऋ १।६१।५ )

पहला अध्याय ] २५
देवतानाम्” और अनुवाक्य है “अग्निश्चविष्णो तप उत्तमं महः❀ ।”
यह अग्नि और विष्णु के मंत्र रूप-समृद्ध हैं अर्थात् जैसा कृत्य
हो उसी के अनुसार है। जो कृत्य के अनुसार होता है उससे
यज्ञ की सफलता होती है। अर्थात् ऐसे मंत्रों से जिनमें उस
क्रिया का विधान है जो होने वाली है।
देवतों में अग्नि और विष्णु दीक्षापाल अर्थात् दीक्षा की रक्षा
करने वाले हैं। वे दोनों दीक्षा पर स्वामित्व रखते हैं। जब अग्नि
और विष्णु के लिये हवि दी जाती है तो जो दोनों दीक्षा पर
शासन करते हैं वे प्रसन्न हो जाते हैं। और दीक्षा को प्रदान
कर देते हैं। अर्थात् जो दीक्षा देने वाले हैं वह दीक्षा देते हैं।
ये दोनों मंत्र त्रिष्टुभ् छन्द में हैं जिससे (यजमान को) इन्द्र का
पद प्राप्त हो जाय। (४)
५—जिसको तेज और ब्रह्मवर्चस् की कामना हो वह स्विष्ट-
कृत संयाज्य में गायत्री छन्द के दो मंत्र बोले। गायत्री तेज और
ब्रह्मवर्चस वाली है। जो इस रहस्य को समझ कर गायत्री छन्द
वाले दो मंत्रों को बोलता है वह तेजस्वी और ब्रह्मवर्चसी हो
जाता है। जो दीर्घायु चाहे वह “उष्णिक्” छन्द के दो मंत्र बोले।
क्योंकि उष्णिक् आयु वाला है। जो इस रहस्य को समझ कर
इन दो उष्णिक् छन्दों वाले मंत्रों को पढ़ता है वह पूर्ण आयु
वाला हो जाता है।
❀ यह दो मन्त्र, जो ऋग्वेद में नहीं पाये जाते श्रौत सूत्र ( आश्व-
लायन ) में इस प्रकार हैं :— ( पूर्व० ४.२ )
अग्निर्मुखं प्रथमो देवतानां संगतानामुत्तमो विष्णुरासीत् ।
यजमानाय परिगृह्य देवान् दीक्षयेदंहविरागच्छतं नः ॥१॥
अग्निश्च विष्णो तप उत्तमं महो दीक्षापालाय वन तंहि शक्रा ।
विश्वैर्देवैर्यज्ञियैः संविदानौ दीक्षामस्मै यजमानाय धत्तम् ॥२॥

२६ [ प्रथम पञ्चिका
जो स्वर्ग की कामना वाला हो वह अनुष्टुभ् छन्द वाले दो
मंत्रों को पढ़े । दो अनुष्टुभों में ६४ अक्षर होते हैं । इन तीनों
लोकों में एक के ऊपर दूसरा इस प्रकार २१ स्थान होते हैं ।
इक्कीस-इक्कीस पगों में वह इन लोकों को तर लेता है और चौंसठवें
अक्षर से स्वर्ग में प्रतिष्ठित हो जाता है । जो इस रहस्य को
समझ कर दो अनुष्टुभों को पढ़ता है उसको स्वर्ग में प्रतिष्ठा
मिलती है ।
जिसको श्री और यश की कामना हो वह 'बृहती' छन्द वाले
दो मंत्रों को पढ़े । छन्दों में बृहती छन्द श्री और यश वाला है ।
जो इस रहस्य को समझ कर बृहती छन्द वाले दो मंत्रों को
पढ़ता है वह अपने में श्री और यश को धारण करता है ।
जिसको यज्ञ की कामना हो वह पंक्ति छन्द वाले दो मंत्र
पढ़े । यज्ञ पंक्ति वाला (या पाँच अंगों वाला) है । जो इस रहस्य
को समझ कर पंक्ति छन्द वाले मंत्र पढ़ता है उसको यज्ञ नमस्कार
करता है ।
जो पराक्रम की कामना करे वह त्रिष्टुभ् छन्द वाले दो मंत्रों
को पढ़े । त्रिष्टुभ् ओज या इन्द्रिय सम्बन्धी पराक्रम है । जो
इस रहस्य को समझ कर त्रिष्टुभ् छन्द के दो मंत्रों को पढ़ता
है वह ओजस्वी और इन्द्र सम्बन्धी पराक्रम वाला होता है ।
जिसको पशु की कामना हो वह 'जगती' छन्द वाले दो मंत्रों
को पढ़े । पशु जगती वाले हैं । जो इस रहस्य को समझ कर
जगती छन्द वाले दो मंत्रों को पढ़ता है, वह पशु वाला होता है ।
जो भोजन की कामना करे वह 'विराट्' छन्द वाले दो मंत्रों
को बोले । विराट् अन्न हैं । इसलिये जिसके पास अन्न बहुत होता
है वही संसार में अधिक विराजता है (प्रकाशित होता है) । यही

पहली अध्याय ] २७
विराट्त्व है। जो इस भेद को समझता है वह अपने लोगों में
चमकता है और श्रेष्ठ माना जाता है। (५)
६—विराट् छन्द में पाँच शक्तियाँ होती हैं। चूंकि इसमें
तीन पद होते हैं इस लिये यह उष्णिक् और गायत्री (के समान)
है। चूंकि इसके पदों में ग्यारह अक्षर होते हैं इस लिये त्रिष्टुभ्
के समान है। चूंकि इसमें तेतीस अक्षर होते हैं इसलिये अनुष्टुभ्
के समान है। एक या दो अक्षर की कमी से छन्द तब्दील नहीं
होता (यह इसलिये कहा, कि "प्रेद्धो अग्ने" और 'इमो अग्ने'
वाले दो विराट् छन्दों में से पहले में केवल २९ अक्षर हैं और
दूसरे में ३२)। पाँचवीं शक्ति विराट् है।
जो इस भेद को समझ कर (स्विष्टकृत में) दो विराट् छन्दों
वाले मंत्रों को पढ़ता है वह सब छन्दों की शक्ति को ले लेता है,
प्राप्त कर लेता है। सब छन्दों की सायुज्यता सरूपता और सलो-
कता को प्राप्त कर लेता है। अन्न का खाने वाला और अन्नपति
होता है, प्रजा और अन्न को पा लेता है। इसलिये विराट् छन्दों
वाले दो मंत्रों को अवश्य पढ़ना चाहिये—(१) प्रेद्धो अग्ने ꕤ
(ऋ० ७।१।३); (२) इमो अग्ने (७।१।१८)। दीक्षा ऋत है। दीक्षा
सत्य है। इसलिये दीक्षित को सत्य ही बोलना चाहिये।
इस पर प्रश्न होता है कि कौन मनुष्य निरन्तर सत्य बोल
सकता है। सत्य से युक्त देव है। झूठ से युक्त मनुष्य।
विचक्षणवती वाणी को बोले। चक्षु ही विचक्षण है क्योंकि
इसी से देखते हैं। मनुष्यों में जो आँख है, वह सत्य में निर्धारित
ꕤ प्रेद्धो अग्ने दीदिहि पुरोनोऽजस्रया सूर्म्या यविष्ठ।
त्वां शश्वन्त उपयन्ति वाजाः॥ (ऋ० ७।१।३)
इमो अग्ने वीततमानि हव्याऽजस्रो वक्षि देवतातिमच्छ।
प्रति न ईं सुरभीणि व्यन्तु॥ (ऋ० ७।१।१८)

२८ [ प्रथम पञ्चिका
है। इसीलिये जब कोई मनुष्य कुछ कहता है तो लोग कहते हैं
“क्या तूने देखा है ?” यदि वह कहता है “मैंने देखा है” तो वे
उस पर श्रद्धा करते हैं। यदि मनुष्य स्वयं किसी चीज को देख
सकता है तो दूसरों पर श्रद्धा नहीं करता, चाहे कई हों। इसलिये
विचक्षणवती वाणी को बोले। तब उसकी वाणी सचमुच ही
सत्य वाली हो जाती है। (६)
ऐतरेय ब्राह्मण की पहली पञ्चिका का पहला अध्याय समाप्त

अध्याय में किया गया। यह तो केवल तैय्यारी थी। जब यज्ञ आरंभ

दूसरा अध्याय

प्रायणीय-इष्टि

७—जो प्रायणीय इष्टि करते हैं वह इसके द्वारा स्वर्गलोक को
जाते हैं (प्रयंति) । इसीलिये इस इष्टि को प्रायणीय कहते हैं ।
प्रायणीय प्राण है और उदयनीय उदान है। होता समान होता
है। प्राण और उदान समान होते हैं। प्राणों के बनाने और
प्राणों के जानने के लिये ( प्रायणीय और उदयनीय दोनों इष्टियों
की आवश्यकता है।—ले०)†
यज्ञ देवों के पास से भाग गया। वे देव कुछ कृत्य न कर
सके। और न जान सके (कि वह यज्ञ कहाँ चला गया—ले०)।
उन्होंने अदिति से कहा, “तेरे द्वारा हम इस यज्ञ को जानें”। उसने
† 'प्रायणीय' का अर्थ है 'आरंभ की'। 'उदयनीय' का अर्थ है
'अन्त की'। यज्ञ में सब से पहले 'दीक्षणीय इष्टि' का उल्लेख पिछले
अध्याय में किया गया। यह तो केवल तैय्यारी थी। जब यज्ञ आरंभ
हुआ तो आरंभ की इष्टि हुई प्रायणीय और अन्त की उदयनीय। दोनों
मिलकर ही यज्ञ को पूरा करती हैं।
( २६ )