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सर्वकोश
ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

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पृष्ठ 32

१८ [ प्रथम पञ्चिका
विष्णु के पुरोडाश को अर्पण करते हैं, वह अन्त में उस यज्ञ के
देवों को समृद्ध करते हैं। (अर्थात् अग्नि और विष्णु का नाम
लेने से उनके मध्यवर्त्ती देवताओं का भी ग्रहण हो जाता है।
जैसे पाणिनि का सूत्र 'आदिरन्तेन सहेता'—ले०)
यहाँ प्रश्न उठता है कि जब पुरोडाश के ग्यारह कपाल हुये
और देवता दो ही हुये, एक अग्नि और दूसरा विष्णु, तो दोनों में
क्रम क्या होगा और बाँट कैसे होगा ?
इसका उत्तर यह है कि अग्नि के लिये आठ कपाल हैं।
गायत्री में आठ अक्षर होते हैं। गायत्री अग्नि का छन्द है। तीन
कपाल विष्णु के हैं क्योंकि विष्णु ने इस सृष्टि की तीन पदों
अर्थात् तीन क्रमों में रचना की☸। यही इन दोनों का क्रम है
यही बांट है।
जो अपने को अप्रतिष्ठित समझे वह भी घृत युक्त चरु को
अर्पण करे†। इस संसार में जिसका मान नहीं उसकी स्थिति
नहीं। यह जो घी है वह स्त्री का दूध है। तण्डुल पुरुष के हैं।
यह जोड़ा है। इस प्रकार जोड़ा होने के कारण ही (चरु) उस
को संवृद्धि के लिए प्रजा और पशुओं से युक्त करता है। जो
इस रहस्य को समझता है वह प्रजा और पशुओं वाला हो
जाता है।
जो अमावस्या और पूर्णिमा का यज्ञ करता है वह यज्ञ का
☸देखो ऋग्वेद १।२२।१७ इदं विष्णुर्विचक्रमे त्रेधा निदधे पदम् ।
१।२२।१८ त्रीणि पदा विचक्रमे विष्णुः।
†पका हुआ भात 'चरु' कहलाता है; उसमें दूध और घी भी
मिला सकते हैं।