ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 41, कुल 592 में से
संदर्भ में पढ़ेंपहली अध्याय ] २७
विराट्त्व है। जो इस भेद को समझता है वह अपने लोगों में
चमकता है और श्रेष्ठ माना जाता है। (५)
६—विराट् छन्द में पाँच शक्तियाँ होती हैं। चूंकि इसमें
तीन पद होते हैं इस लिये यह उष्णिक् और गायत्री (के समान)
है। चूंकि इसके पदों में ग्यारह अक्षर होते हैं इस लिये त्रिष्टुभ्
के समान है। चूंकि इसमें तेतीस अक्षर होते हैं इसलिये अनुष्टुभ्
के समान है। एक या दो अक्षर की कमी से छन्द तब्दील नहीं
होता (यह इसलिये कहा, कि "प्रेद्धो अग्ने" और 'इमो अग्ने'
वाले दो विराट् छन्दों में से पहले में केवल २९ अक्षर हैं और
दूसरे में ३२)। पाँचवीं शक्ति विराट् है।
जो इस भेद को समझ कर (स्विष्टकृत में) दो विराट् छन्दों
वाले मंत्रों को पढ़ता है वह सब छन्दों की शक्ति को ले लेता है,
प्राप्त कर लेता है। सब छन्दों की सायुज्यता सरूपता और सलो-
कता को प्राप्त कर लेता है। अन्न का खाने वाला और अन्नपति
होता है, प्रजा और अन्न को पा लेता है। इसलिये विराट् छन्दों
वाले दो मंत्रों को अवश्य पढ़ना चाहिये—(१) प्रेद्धो अग्ने ꕤ
(ऋ० ७।१।३); (२) इमो अग्ने (७।१।१८)। दीक्षा ऋत है। दीक्षा
सत्य है। इसलिये दीक्षित को सत्य ही बोलना चाहिये।
इस पर प्रश्न होता है कि कौन मनुष्य निरन्तर सत्य बोल
सकता है। सत्य से युक्त देव है। झूठ से युक्त मनुष्य।
विचक्षणवती वाणी को बोले। चक्षु ही विचक्षण है क्योंकि
इसी से देखते हैं। मनुष्यों में जो आँख है, वह सत्य में निर्धारित
ꕤ प्रेद्धो अग्ने दीदिहि पुरोनोऽजस्रया सूर्म्या यविष्ठ।
त्वां शश्वन्त उपयन्ति वाजाः॥ (ऋ० ७।१।३)
इमो अग्ने वीततमानि हव्याऽजस्रो वक्षि देवतातिमच्छ।
प्रति न ईं सुरभीणि व्यन्तु॥ (ऋ० ७।१।१८)