ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
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क्योंकि प्रजापति सत्रह हैं। बारह महीने और पांच ऋतुयें ।
(१०) अग्निं दूतं वृणीमहे होतारं विश्ववेदसम्। अस्य यज्ञस्य
सुक्रतुम्। ( ऋ० १।१२।१ ) ।
(११) समिध्यमानो अध्वरेऽग्निः पावक ईड्यः । शोचिष्केशस्तमीमहे ।
( ऋ० ३।२७।४ ) ।
(१२) समिद्धो अग्न आहुत देवान् यक्षि स्वध्वर । त्वं हि हव्यवाडसि ।
( ऋ० ५।२८।५ ) ।
(१३) आ जुहोता दुवस्यताऽग्निं प्रयत्यध्वरे । वृणीध्वं हव्यवाहनम् ।
( ऋ० ५।२८।६ ) ।
(१४) तथा (१५) इसी की पुनरावृत्ति ।
सामिधेनी ( सम् + इन्ध करणे ल्युट् ) । अग्नि प्रज्वलित करते
समय पढ़े जाने वाले मन्त्रों का नाम सामिधेनी है । ( शत० ब्रा०
१।३।५।१ ) ।
सामिधेनियों के बीच में जो मन्त्र पढ़े जाते हैं वे 'धाय्य' कहलाते
हैं। यह दो धाय्य ११वीं और १२ वीं सामिधेनियों के बीच में पढ़े
जायंगे । ११वीं ऋचा समिध्यमाना है ( ऋ० ३।२७।४ ) और १२वीं
ऋचा 'समिद्धवती' है ( ऋ० ५।२८।५ ) । इन दो के बीच में दो धाय्य
आने से संख्या १७ है ही। यह दो "धाय्य" मन्त्र यह हैं :—
"पृथुपाजा अमर्त्यो घृत निर्णिङ् स्वाहुतः । अग्निर्यज्ञस्य हव्यवाट् ।
( ऋ० ३।२७।५ ) ।
तं सबाधो यतस्रुच इत्था धिया यज्ञवन्तः । आचक्रुरग्निमूतये ।"
( ऋ० ३।२७।६ ) ।
अर्थात् मन्त्रों के उच्चारण के विचार से धाय्यों की संख्या बारहवीं
और तेरहवीं होगी । सायण ने इनको दसवां और ग्यारहवां बताया है
क्योंकि पहली सामिधेनी ही दूसरी और तीसरी बार दुहराई जाती है ।
पुनरावृत्ति को अलग न गिनें तो १० वीं ११ वीं हो जाती है ।