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सर्वकोश
ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

पृष्ठ 40, कुल 592 में से

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पृष्ठ 40

२६ [ प्रथम पञ्चिका
जो स्वर्ग की कामना वाला हो वह अनुष्टुभ् छन्द वाले दो
मंत्रों को पढ़े । दो अनुष्टुभों में ६४ अक्षर होते हैं । इन तीनों
लोकों में एक के ऊपर दूसरा इस प्रकार २१ स्थान होते हैं ।
इक्कीस-इक्कीस पगों में वह इन लोकों को तर लेता है और चौंसठवें
अक्षर से स्वर्ग में प्रतिष्ठित हो जाता है । जो इस रहस्य को
समझ कर दो अनुष्टुभों को पढ़ता है उसको स्वर्ग में प्रतिष्ठा
मिलती है ।
जिसको श्री और यश की कामना हो वह 'बृहती' छन्द वाले
दो मंत्रों को पढ़े । छन्दों में बृहती छन्द श्री और यश वाला है ।
जो इस रहस्य को समझ कर बृहती छन्द वाले दो मंत्रों को
पढ़ता है वह अपने में श्री और यश को धारण करता है ।
जिसको यज्ञ की कामना हो वह पंक्ति छन्द वाले दो मंत्र
पढ़े । यज्ञ पंक्ति वाला (या पाँच अंगों वाला) है । जो इस रहस्य
को समझ कर पंक्ति छन्द वाले मंत्र पढ़ता है उसको यज्ञ नमस्कार
करता है ।
जो पराक्रम की कामना करे वह त्रिष्टुभ् छन्द वाले दो मंत्रों
को पढ़े । त्रिष्टुभ् ओज या इन्द्रिय सम्बन्धी पराक्रम है । जो
इस रहस्य को समझ कर त्रिष्टुभ् छन्द के दो मंत्रों को पढ़ता
है वह ओजस्वी और इन्द्र सम्बन्धी पराक्रम वाला होता है ।
जिसको पशु की कामना हो वह 'जगती' छन्द वाले दो मंत्रों
को पढ़े । पशु जगती वाले हैं । जो इस रहस्य को समझ कर
जगती छन्द वाले दो मंत्रों को पढ़ता है, वह पशु वाला होता है ।
जो भोजन की कामना करे वह 'विराट्' छन्द वाले दो मंत्रों
को बोले । विराट् अन्न हैं । इसलिये जिसके पास अन्न बहुत होता
है वही संसार में अधिक विराजता है (प्रकाशित होता है) । यही