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ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

तीसरा अध्याय ] १२७
इन्द्र के विशेषण हैं )। जिस ( सोम ) को पीकर इन्द्र ने वृत्रों को
मारा और शत्रुओं को पराजित किया । ओ३म् ।” यह कह कर
होता अपनी जगह से उठता है । उठकर जलों का सम्मान
करता है जैसे जब कोई प्रतिष्ठित पुरुष निकट आता है तो उठ
कर सम्मान करते हैं । इसलिये उठ कर और सामने मुँह करके
जलों का सम्मान किया जाता है । इसी प्रकार प्रतिष्ठित पुरुष
का सम्मान करते हैं । इसलिये होता को सम्मानार्थ जलों के पीछे
जाना चाहिये । यदि दूसरा कोई भी यज्ञ करे तो भी होता यश
प्राप्ति के समर्थ है । इसलिये मंत्र पढ़ने वाले को जलों के पीछे
जाना चाहिये । उनके पीछे जाते हुये उसे यह मंत्र बोलना
चाहिये :-
अम्बयो यन्त्यध्वभिर्जामयो अध्वरीयताम् ।
पृञ्चतीर्मधुना पयः ॥ ( ऋ० १।२३।१६ )
जो यश की कामना करे वह यह मंत्र पढ़े ।
जो तेज या ब्रह्मवर्चस् की कामना करे वह यह मंत्र पढ़े :-
अमूर्या उपसूर्ये याभिर्वा सूर्यः सह । ता नो हिन्वन्त्वध्वरम् ॥
( ऋ० १।२३।१७ )
जो पशु की कामना हो तो यह मंत्र पढ़े :-
अपो देवीरुप ह्वये यत्र गावः पिबन्ति नः । सिन्धुभ्यः कर्त्वं हविः ॥
( ऋ० १।२३।१८ )
जो इनको पढ़ता हुआ जलों के पीछे जायगा वह अवश्य
ही इन कामनाओं की पूर्ति करेगा । जो इस रहस्य को समझता
है वह इसे इन कामनाओं को पा लेता है ।
जब वसतीवरी और एकधना जल वेदी पर रखे जा रहे
हैं तब वह यह मंत्र पढ़ता है :-

१२८ [ दूसरी पञ्चिका
एमा अग्मन् रेवतीर्जीवधन्या अध्वर्यवः सादयता सखायः ।
नि बर्हिषि धत्तन सोम्यासोऽपां नप्त्रा संविदानास एनाः ॥
( ऋ० १०।३०।१४ )
और जब जलों को वेदी में रख चुकता है तो नीचे के मंत्र
पढ़ता है :—
आगमन्नाप उशतीर्बर्हिरेदं न्यध्वरे असदन् देवयन्तीः । अध्वर्यवः
सुनुतेन्द्राय सोममभूदुवः सुशका देवयज्या ॥ ( २ ) (ऋ० १०।३०।१५)
२१—प्रातरनुवाक यज्ञ का शिर है। उपांशु और अंतर्याम
प्राण और अपान है। ( उपांशु और अंतर्याम दो घड़े होते हैं
जिनमें सोम रस रक्खा जाता है। घड़ों को उपांशु पात्र और
अंतर्याम पात्र कहते हैं। और घड़ों के ऊपर जो छोटे प्याले से
होते हैं उनको उपांशु ग्रह और अंतर्याम ग्रह कहते हैं )। वाणी
वज्र है। जब उपांशु और अंतर्याम से आहुतियां दी जाती हों
तो होता शब्द न बोले। यदि वह बोलेगा तो इस वाणी रूपी
वज्र के द्वारा यजमान के प्राण ले लेगा। यदि बोल पड़े तो किसी
अन्य को चाहिये कि होता से कहदे कि तुमने वाणी बोलकर
वाणी रूपी वज्र से होता के प्राण ले लिये अब तुम्हारे प्राण भी
चले जायँगे। सदा ऐसा ही होता है। इस लिये जब उपांशु और
अंतर्याम से आहुतियां दी जायं तो होता वाणी को न निकाले।
जब उपांशु से आहुति दी जा चुके तो वह यह बोले :—
“प्राणं यच्छ स्वाहा त्वा सुह्व सूर्याय ।”
अर्थात् “प्राण को ले । स्वाहा । हे अच्छी प्रकार बुलाने
वाली वाणी, तुझको सूर्य के लिये छोड़ता हूँ ।”
अब वह प्राण को खींचे और कहे, “हे प्राण, मुझ में प्राण
धारण करा ।”
जब अंतर्याम ग्रह से आहुति दी जा चुके तो वह बोले :—
“अपानं यच्छ स्वाहा त्वा सुह्व सूर्याय ।”

तीसरा अध्याय ] १२९
और अपान को बाहर निकाल कर कहे, "हे अपान, मुझ में
अपान धारण करा।"
फिर जिस पत्थर पर उपांशु का सोम पीसा गया उसको
यह कह कर छूता है "व्यानाय त्वा" और वाणी को छोड़ता है।
यह उपांश सवन आत्मा है। होता इस प्रकार आत्मा में प्राण
धारण करा के वाणी को छोड़ता है, और पूरी आयु को प्राप्त
होता है। इसी प्रकार वह भी जो इस रहस्य को समझता है। (३)
२२—यहाँ कुछ लोग प्रश्न करते हैं कि होता उन सब के
साथ चले या न चले। कुछ लोग कहते हैं कि चले, क्योंकि
बहिष्पवमान का स्तोत्र मनुष्यों और देवों दोनों के लिए है।
इस लिये यह भी उसमें शामिल हो सकता है। परन्तु यह
विचार ठीक नहीं। यदि वह चलेगा तो ऋक् को साम के पीछे
डाल देगा। यदि कोई उसे ऐसा करते भी देखे तो उससे कह
दे—"यह होता साम गाने वालों के पीछे हो लिया और हमने
अपना यश उद्गाता को दे दिया। अपने स्थान से गिर गया
और गिरता रहेगा"। ऐसा सदा होता है। इस लिये जहाँ बैठा
है वहीं बैठा रहे और यह अनुमंत्र पढ़ता रहे,
"यो देवानामिहसोम पीथोयज्ञे बर्हिषिवेद्यां । तस्यापि भक्षयामसि" ।
अर्थात्
"इस बर्हि यज्ञ में देवों के लिए सोम निकाला गया, उसे
हम खावें।"
इस प्रकार होता उस सोम से वंचित नहीं रहता। अब
उसको कहना चाहिये:—
"मुखमसि मुखं भूयासम्"
"तू मुख है, मैं भी मुख अर्थात् मुख्य हो जाऊँ।"
९

१३० [ दूसरी पञ्चिका
बहिष्पवमान यज्ञ का मुख (मुख्य भाग) है। जो इस रहस्य
को समझता है वह अपने लोगों में मुख्य होता है। श्रेष्ठ
होता है।
दीर्घजिह्वी (लम्बी ज़बान वाली) नाम की एक आसुरी
स्त्री थी। उसने देवताओं के प्रातःसवन को चाट लिया। उसमें
नशा नहीं रहा। देवों ने इसका उपचार करना चाहा। उन्होंने
मित्र और वरुण से कहा, "तुम दोनों इसका उपचार कर दो"।
उन्होंने कहा, "अच्छा, पहले हम तुमसे वर माँग लें।"
देवों ने कहा, "माँग लो"। उन्होंने प्रातःसवन में से पयस्या
(मट्ठे) को माँग लिया। यह उनका सदा का वर है। यह जो
पहले उस आसुरी ने बिना नशे के कर दिया था वह पयस्या
मट्ठे के द्वारा ठीक हो गया। क्योंकि (मित्र और वरुण) दोनों
ने पयस्या के द्वारा (सोम रस को) ठीक कर दिया। (४)
२३—देवों के सवन साथ जुड़े नहीं रहते थे (गिरे पड़ते थे)
उन्होंने पुरोडाशों को देखा। उन्होंने उनमें से हर एक सवन
का भाग अलग कर दिया। जिससे वह सब सवन जुड़े रहें।
इस लिये जब सवनों के लिये पुरोडाश के भाग किये जाते हैं
तो वे सवन जुड़े रहते हैं। इसी प्रकार उन्होंने उनको जोड़े
रक्खा। देवों ने इनको (सोमरस से) पहले काटा। इस लिये
इनका नाम पुरोडाश हुआ। यही पुरोडाशों का पुरोडाशत्व है।
इस पर कुछ लोग कहते हैं कि हर एक सवन के लिये इस
प्रकार पुरोडाश को विभाजित करे—प्रातः सवन के लिये आठ
कपालों का, दोपहर के सवन के लिए ११ कपालों का और १२
कपालों का तीसरे सवन के लिए। क्योंकि सवनों का रूप छन्दों
के रूपों के अनुसार है। लेकिन यह बात माननीय नहीं। जितने
पुरोडाश सवनों के लिए काटे जाते हैं वे सब इन्द्र के हैं। इस
लिये उनको ११ कपालों पर ही रखना चाहिये।

तीसरा अध्याय ] १३१
कुछ का कथन है कि पुरोडाश का जितना भाग बिना घी
लगा हुआ हो उतना ही खाले, सोम पान की रक्षा के लिए।
क्योंकि घृतरूपी वज्र से ही इन्द्र ने वृत्र को मारा। परन्तु यह
माननीय नहीं। क्योंकि जो हवि है वह भी अग्नि में डाली जाती
है और जो सोम-पान है वह भी अग्नि में छोड़ा जाता है। इस
लिये पुरोडाश का जो भाग चाहे खाले। ये जो हवियां, आज्य,
धान, करंभ, परिवाप, पुरोडाश, पयस्या आदि हैं वे यजमान के
पास चारों ओर से आ जाते हैं, इसी प्रकार जो इस रहस्य को
समझता है उसके पास यह चारों ओर से आ जाते हैं। (५)
२४—जो हवियों के पंचक को समझता है वह इन पंचकों
द्वारा समृद्धि को पाता है। यज्ञ की हवियों का पंचक यह है :—
धान, करंभ, परिवाप, पुरोडाश, पयस्या। जो इस रहस्य को
समझता है वह इन हवियों के पंचक द्वारा समृद्धि को पाता है।
जो यज्ञ के अक्षरों के पंचक को समझता है वह अक्षरों के पंचक
द्वारा यज्ञ से समृद्धि का लाभ करता है। यह अक्षर-पंचक यह
है :—सु, मत्, पद्, वग्, दे। जो इस रहस्य को समझता है
वह अक्षरों के पंचक द्वारा समृद्धि को लाभ करता है।
जो यज्ञ के नराशंसपंचक को समझता है वह इसके द्वारा
समृद्धि को पाता है। प्रातःसवन के दो नराशंस हैं। दोपहर के
सवन के दो और तीसरे सवन का एक। यह नराशंस पंचक है।
जो इस रहस्य को समझता है वह इसके द्वारा समृद्धि को लाभ
करता है।
जो यज्ञ के सवन पंचक को जानता है वह इसके द्वारा
समृद्धि को प्राप्त करता है। यह सवन पंचक यह है :—सोम के
पहले दिन का पशु-उपवसथ, तीन सवन, पशुरनुबंध्य। यह
यज्ञ का सवन-पंचक है। जो इस रहस्य को समझता है वह
सवन-पंचक द्वारा समृद्धि को लाभ करता है।

अध्याय समाप्त

१३२ [ दूसरी पञ्चिका
हविष्पंचक का याज्य मंत्र यह है :—
हरि वाँ इन्द्रो धाना प्रत्तु पूषण्वान् करंभं सरस्वतीवान् भारतीवान्
परिवाप इन्द्रस्यापूप” ।
“घोड़ों वाला इन्द्र धान खावे, पूषावाला करंभ, सरस्वती-
वाला और भारतीवाला इन्द्र परिवाप खावे । इन्द्र का पुरोडाश
या अपूप है ।”
इन्द्र के दो घोड़े हैं ऋक् और साम । पशु पूषन हैं । करंभ
अन्न है । सरस्वतीवान् और भारतीवान् कहा, इसमें सरस्वती
का अर्थ है वाणी । प्राण भरत है । “परिवाप इन्द्रस्य अपूप” में
परिवाप अन्न है और अपूप इन्द्रिय है । इस प्रकार यज्ञ करके
होता यजमान को देवताओं का सायुज्य, सरूपता और सालो-
क्यता प्राप्त करा देता है और स्वयं भी श्रेय, सायुज्य और
श्रेष्ठता का लाभ करता है जो इस रहस्य को समझता है ।
पुरोडाश की हर सवन की स्विष्टकृत आहुति यह है
“हविरग्नेवीहि”—“अग्नि हवि खा !” इस प्रकार अवत्सार
ऋषि अग्नि के प्रिय धाम को पा गया और परम लोक को पहुँच
गया । जो इस रहस्य को समझता है और समझकर हवि-पंचक
की आहुति देता है और याज्य मंत्र बोलता है वह भी यही लाभ
प्राप्त करता है । (६)
ऐतरेय ब्राह्मण की दूसरी पञ्चिका का तीसरा
अध्याय समाप्त

चौथा अध्याय
२५-सोम राजा का पहले पान करने के लिये देव झगड़
पड़े। उन्होंने चाहा कि "मैं पहले पिऊँ", "मैं पहले पिऊँ।"
अब वे इस बात पर राजी हुये कि बाजी लगाकर दौड़ें। जो
जीत जाय वही पहले पीले। ऐसा कह कर वह दौड़े। जितने
दौड़े थे उनमें वायु पहले नियत स्थान पर पहुँचा, फिर इन्द्र,
फिर मित्र और वरुण, फिर दोनों अश्विन। इन्द्र यह सोच
कर कि मैं वायु से आगे पहुँचूँ, (ऐसा दौड़ा कि) वायु के
पास ही गिर पड़ा। तब उसने कहा, "हम दोनों साथ आये
हैं इसलिये दोनों जीते हैं"। उस (वायु) ने कहा, "नहीं मैं
ही जीता हूँ"। इन्द्र ने कहा, "तीसरा भाग मुझे मिले, हम
दोनों जीते हैं"। उस (वायु) ने कहा, "नहीं, मैं ही जीता
हूँ।" तब इन्द्र ने कहा, "चौथाई मुझे मिले, हम दोनों जीते हैं"।
वायु मान गया और चौथाई भाग इन्द्र को मिला। तभी से
इन्द्र को चौथाई भाग मिलता है और वायु को तीन भाग।
इस प्रकार इन्द्र और वायु दोनों जीते। फिर मित्र और वरुण।
फिर दोनों अश्विन। वह जिस जिस क्रम से जीते उसी क्रम से
( १३३ )

१३४ [ दूसरी पञ्चिका
उनको सोम पीने का अधिकार मिला, इन्द्र और वायु पहले,
फिर मित्र और वरुण, फिर अश्विन। ऐन्द्र-वायव ग्रह (वह
घड़ा जो इन्द्र-वायु का है) वह है जिसमें इन्द्र का चौथाई
भाग है। इस बात को एक ऋषि ने देखा था। उसने यह मन्त्र
पढ़ा:—
"नियुत्वाँ इन्द्रसारथिः" ❄ (ऋ० ४।४६।२)
"वायु और उसका सारथि इन्द्र।"
इस लिये आजकल जब भरत अर्थात् वीर पुरुष शत्रुओं
को जीत कर युद्ध में लूट का माल लेते हैं, तब सारथि लोग
कहते हैं, कि इसमें चौथाई भाग हमारा है क्योंकि इन्द्र ने वायु
का सारथि बनकर विजय पाई थी। (१)
२६—यह जो दो देवतों के सोमग्रह या घड़े हैं वे प्राण हैं।
इन्द्र और वायु के वाणी और प्राण। मित्र और वरुण के चक्षु
और मन। और अश्विन के श्रोत्र और आत्मा। कुछ लोग
ऐन्द्रवायु वाले घड़े में से आहुति देते समय दो अनुष्टुभ् छन्दों
में पुरोनुवाक्य और दो गायत्री छन्दों में याज्य पढ़ते हैं।
चूँकि ऐन्द्रवायव्य ग्रह वाणी और प्राण का है इस लिये ठीक-
ठीक छन्द हो गये (अर्थात् अनुष्टुभ् वाणी का और गायत्री
प्राण का)। परन्तु यह बात माननीय नहीं। क्योंकि जब
पुरोनुवाक्य मंत्र याज्य मंत्र से बढ़ गया तो यज्ञ सफल नहीं
होता। जब याज्य पुरोनुवाक्य से बढ़ जाता है तब सफलता
होती है। इसी प्रकार जब दोनों बराबर हों (तब भी सफलता
नहीं होती)। प्राण और वाणी की सफलता के लिये ऐसा
(कि दो अनुष्टुभ् छन्दों में अनुवाक्य पढ़े और दो गायत्री
❄ पूरामंत्र शेतना नो० (ऋ० ४।४६।२) २६ वें खंड में देखो।

चौथा अध्याय ] १३५
छन्दों में याज्य )। इससे कामना पूरी होगी। पहला पुरोनु-
वाक्य वायु का है :-
वायवा याहि दर्शतेमे सोमा अरंकृताः ।
तेषां पाहि श्रुधी हवम् ॥ ( ऋ० १।२।१ )
दूसरा इन्द्र और वायु का :-
इन्द्रवायू इमे सुता उप प्रयोभिरागतम् ।
इन्दवो वामुशन्ति हि ॥ ( ऋ० १।२।४ )
इसी प्रकार दो याज्यों में जो पहला याज्य मंत्र वायु का
है अर्थात् :-
अग्रं पिवा मधूनां सुतं वायो दिविष्टिषु ।
त्वं हि पूर्वपा असि ॥ ( ऋ० ४।४६।१ )
उससे यजमान में प्राण धारण कराता है। क्योंकि वायु
प्राण है।
और जो इन्द्र वायु का याज्य है अर्थात् :-
शतेना नो अभिष्टिभिर्नियुत्वाँ इन्द्र सारथिः ।
वायो सुतस्य तृम्पतम् ॥ ( ऋ० ४।४६।२ )
इसमें जो इन्द्र का पद है उससे वाणी को धारण कराता
है। क्योंकि वाणी इन्द्र की है। इस प्रकार प्राण और वाणी की
जो जो कामना है उसको बिना यज्ञ को विषम किये हुये पूरी
कर देता है। (२)
२७-दो देवतों का जो सोम है वह प्राण है। उसे एक ही
पात्र से ग्रहण करते हैं। क्योंकि सब प्राण एक ही हैं। दो पात्रों
से आहुति देते हैं क्योंकि प्राण दो हैं। इसके पश्चात् जिस यजु
मंत्र से अध्वर्यु सोम के प्याले को देता है, उसी मन्त्र से होता
ग्रहण करता है :-
“एष वसुः पुरूवसुरहिवसुः पुरूवसुर्मयि वसुः पुरूवसुर्वाक्पा वाचं
मे पाहि”

१३६ [ दूसरी पञ्चिका
"यह अच्छा है। यह बहुत अच्छा है। यहाँ अच्छा है,
बहुत अच्छा है। मुझमें अच्छा है, बहुत अच्छा है। हे वाणी
के रक्षक, मेरी वाणी की रक्षा कर।"
होता सोम को ऐन्द्रवायवी ग्रह से पीता है। अब पढ़ता
है :—
"उपहूता वाक् सह प्राणेनोरमां वाक सह प्राणेन ह्वयतामुपहूता
ऋषयो दैव्यास्तनू पावानेस्तन्वस्तपोजा उपमामृषयो दैव्यासो ह्वयं तां
तनूपावानस्तन्वस्तपोजा" ।
"वाणी प्राण के साथ बुलाई गई। वाणी प्राण के साथ
मुझे बुलावे, दिव्य ऋषि जो शरीरों की रक्षा करने वाले और
तप से उत्पन्न हुये हैं, बुलाये गये। दिव्य ऋषि जो शरीर के
रक्षक और तप से उत्पन्न हुये हैं मुझे बुलावें।"
दिव्य शरीरों के रक्षक और तप से उत्पन्न हुये ऋषियों का
अर्थ है प्राण। उन्हीं को वह बुलाता है।
मित्र और वरुण के ग्रह से इस मन्त्र को पढ़ कर पीता है—
"एष वसुविद्वद् वसुरिह वसुविद्वद् वसुर्मयि वसुविद्वद् वसुश्चक्षुष्पा-
श्चक्षुर्मे पाहि" ।
"यह वसु है, ज्ञान वाला वसु है। यहाँ वसु है, ज्ञान वाला
वसु है। मुझमें वसु है, ज्ञान वाला वसु है। हे आँख के रक्षक,
मेरी आँख की रक्षा कर।"
अब वह कहता है:—
"उपहूतं चक्षुः सहमनसोपमां चक्षुः सहमनसाह्वयतामुपहूता ऋषयो
दैव्यास्तनूपावानस्तन्वस्तपोजा उपमामृषयो दैव्यासो ह्वयतां तनूपावान-
स्तन्वस्तपोजा" ।
"मन के साथ आँख बुलाई गई। आँख मुझे मन के साथ
बुलावे। दिव्य तनूपा और तपोजा ऋषि बुलाये गये। दिव्य
तनूपा और तपोजा ऋषि मुझे बुलावें"।

चौथा अध्याय ] १३७
दिव्य तनूपा और तपोजा ऋषि प्राण हैं। इससे उन्हीं
को बुलाता है।
नीचे के मंत्र से अश्वि के ग्रहों से पान करता है :—
“एष वसुः संयद् वसुरिहवसुः संयद् वसुर्मयि वसुः संयद् वसुः
श्रोत्रपाः श्रोत्रं मे पाहि”।
“यह वसु है, सदा रहने वाला वसु है। यहाँ वसु है, सदा
रहने वाला वसु है। हे कान के रक्षक, मेरे कान की रक्षा कर”।
अब वह कहता है:—
उपहूतं श्रोत्रं सहात्मनोपमां श्रोत्रं सहात्मनाह्वयतामुपहूता ऋषयो
दैव्यास्तनूपावानस्तन्वस्तपोजां उपमामृषयो दैव्यासोह्वयंतां तनूपावानस्तन्व-
स्तपोजा”।
“कान आत्मा के साथ बुलाया गया। कान आत्मा के साथ
मुझे बुलावे। दिव्य तनूपा और तपोजा ऋषि बुलाये गये।
दिव्यतनूपा और तपोजा ऋषि मुझे बुलायें”।
यह दिव्य तनूपा, तपोजा ऋषि प्राण हैं, इससे इन्हीं को
बुलाता है।
ऐन्द्रवायव्य ग्रह से पीते समय होता ग्रह (घड़े या प्याले) के
मुँह को अपनी ओर करके उसमें से पीता है। क्योंकि प्राण और
अपान उसके सामने है। इसी प्रकार मित्र-वरुण के ग्रह में से
पीता है क्योंकि दोनों आँखें उसके सामने हैं, अश्विनों के ग्रह
से पीते समय अपने मुख को पीछे फेर लेता है क्योंकि मनुष्य
और पशु चारों ओर से शब्द सुनते हैं। (३)
२८—दो देवताओं के सोम पात्र प्राण हैं। इसलिये प्राणों
को जारी रखने और उनको टूटने न देने के लिये याज्य मन्त्रों
को निरन्तर पढ़ना चाहिये। दो देवताओं के सोम पात्र प्राण हैं।
अतएव होता अनुवषट्कार न पढ़े। इससे प्राणों का क्रम टूट
जायगा। क्योंकि अनुवषट्कार क्रम के टूटने का द्योतक है। यदि

१३८ [ दूसरी पञ्चिका
कोई होता को अनुवषट्कार करते देखे तो कहे कि तुमने प्राणों
का क्रम बन्द कर दिया जो अन्यथा बन्द न होता और इसलिये
तुम्हारा जीवन समाप्त हो जायगा। ऐसा सदा होता है।
इसलिये दो देवताओं के सोमपात्रों पर अनुवषट्कार न पढ़े।
इस पर कुछ लोग प्रश्न करते हैं कि जब मित्र, वरुण
सम्बन्धी पुरोहित दो बार आगू कहता है और दो बार याज्य
मन्त्र पढ़ने की प्रेरणा करता है तो होता एक बार आगू कह
कर दो बार वषट्कार क्यों बोलता है (आगू का अर्थ यह है
कि पुरोहित कहता है "होता यक्षत" या "होतर्यज", यह वह
दो बार कहता है। होता एक बार उत्तर देता है "ये ३ यजा-
महे।" (प्रश्न यह है कि दो प्रश्नों का होता एक ही उत्तर क्यों
देता है?) इसका उत्तर यह है कि दो देवताओं के सोम पात्र
तो प्राण हैं और आगू वज्र है। इसलिये यदि होता दो याज्य
मन्त्रों के बीच में आगू बोल दे तो वह वज्र से यजमान का
जीवन काट दे। (यदि कोई होता को ऐसा करते देखे तो)
कहे कि तूने यजमान के जीवन को आगू वज्र से काट कर अपना
जीवन भी काट डाला। सदा ऐसा ही होता है। होता दो याज्य
मन्त्रों के बीच में आगू न बोले।
इसके अतिरिक्त मैत्रावरुण पुरोहित यज्ञ का मन है और
होता वाणी है। मन से प्रेरित होकर ही वाणी बोलती है। जो
मन से विरुद्ध वाणी बोलता है वह वाणी असुरों को प्यारी होती
है, देवों को नहीं। होता का आगू मैत्रावरुण के पुरोहित के दोनों
आगूओं के अन्तर्गत है। (४)
२९—ऋतु याज प्राण हैं। जो ऋतु याज करते हैं अर्थात्
जो ऋतुओं के लिये आहुतियाँ देते हैं वे यजमान को प्राण
धारण कराते हैं। 'ऋतुना' शब्द से आरम्भ होते हुये ऋतुओं
के छः मन्त्र बोल कर यजमान में प्राण धारण कराते हैं।

चौथा अध्याय ] १३९
“ऋतुभिः” शब्द से आरम्भ होते हुये चार मन्त्रों से अपान को
यजमान में धारण कराते हैं। पीछे के दो मन्त्र जो 'ऋतुना' से
आरम्भ होते हैं उनसे यजमान में व्यान धारण कराते हैं। यह
प्राण तीन तरह का है—प्राण, अपान, व्यान। यह जो "ऋतुना",
"ऋतुभिः", "ऋतुना" आदि वाले मन्त्रों को निरन्तर पढ़ते हैं
वह प्राणों के सिलसिले को जारी रखने के लिये। उनका खंडन
न होने देने के लिये। ऋतुयाज प्राण हैं। उनके पीछे अनुवषट्-
कार न कहे। ऋतुओं का कोई अन्त नहीं। एक के बाद दूसरी
आती है। अगर वह ऋतुयाजों के पीछे अनुवषट्कार कहेगा तो
रोक देगा। क्योंकि अनुवषट्कार विराम का सूचक है। जो
इसको कहेगा वह ऋतुओं को रोक देगा और आपत्ति में
पड़ेगा। सदा ऐसा ही होता है। इसलिये ऋतुयाज के मन्त्र बोलने
के बाद अनुवषट्कार न कहे। (५)
३०—दो देवों वाले सोम पात्र प्राण हैं। और इला अर्थात्
पुरोडाश पशु हैं। सोम पात्रों में से पीकर इला को बुलाता है।
पशु ही भोजन है। इस प्रकार पशुओं को बुलाता है यजमान में
पशुओं को धारण कराता है।
यहाँ प्रश्न उठता है कि पहले इला ( पुरोडाश ) को खावे
या चमसे में से पान करे। इसका उत्तर यह है कि पहले भोजन
कर ले, फिर सोम पान करे। दो देवतों के सोम ग्रह से उसने
सोम पान पहले कर ही लिया। इसलिये अब पहले अपने हाथ
का पुरोडाश खाले, फिर चमसे में से सोम पान करे। इस तरह
से उसे दोनों तरह का अन्न अर्थात् खाना और पानी मिल
जाता है।
( ग्रह और चमसा ) दोनों में से सोम पान करने से सब
प्रकार का भोजन प्राप्त हो जाता है।
दो देवतों के ग्रह प्राण हैं और होता का चमसा आत्मा है।

१४० [ दूसरी पञ्चिका
ग्रहों में से चमसे में सोमरस उँडेलने का तात्पर्य यह है कि होता
अपने में प्राण धारण कर रहा है, और पूर्ण आयु को प्राप्त हो
रहा है। जो इस भेद को समझता है वह पूर्ण आयु को प्राप्त
होता है। (६)
३१—देवों ने जो यज्ञ किया वही असुरों ने किया। वे
बराबर शक्ति वाले हो गये, और देवों के अधीन न रहे। तब
देवों ने "तूष्णीं शंस" (चुपचाप प्रार्थना या जाप) को देखा।
असुरों ने इसको न किया। यह जो चुपचाप की प्रार्थना है वह
मन्त्रों का सार रूप है। देव जिस जिस वज्र को उठाते थे असुर
उसको जान जाते थे। देवों ने अब "चुपचाप की प्रार्थना" को
देखा और इसी वज्र को उठाया। असुर न जान सके। देवों ने
इस वज्र का असुरों पर प्रहार किया। असुर न जान सके। इस
प्रकार देव असुरों पर विजय पा गये। जो इस रहस्य को
समझता है वह अपने शत्रु, अहितकर और अत्याचारी पर
विजय पा लेता है।
देवों ने अपने आपको विजयी समझ कर यज्ञ रोप दिया।
असुर उसके निकट आये कि विघ्न डालें। उन्होंने बड़े असुरों
को चारों ओर से आते देखा। तब उन्होंने कहा "इसे समाप्त
कर दें जिससे असुर इसका विध्वंस न कर सकें।" उन्होंने ऐसा
ही किया, "तूष्णीं शंस" अर्थात् चुपचाप प्रार्थना द्वारा उसको
समाप्त किया। उन्होंने "भूरग्निज्योतिरग्निः" से आज्य
और प्रउग को समाप्त किया है। "इन्द्रो ज्योतिर्भुवो ज्योतिरिन्द्रः"
से उन्होंने निष्केवल्य और मरुत्वती को समाप्त किया। "सूर्यो-
ज्योतिर्ज्योतिः स्वःसूर्यः" से वैश्वदेव और अग्निमारुत को समाप्त
किया। (आज्य और प्रउग प्रातःकाल की प्रार्थनायें हैं।
निष्केवल्य और मरुत्वती दोपहर की। तथा वैश्वदेव और अग्नि-
मारुत शाम की)।

चौथा अध्याय ] १४१
इस प्रकार "चुपचाप प्रार्थना" से उन्होंने यज्ञ समाप्त किया ।
इस प्रकार "चुपचाप प्रार्थना" से यज्ञ को समाप्त करके यज्ञ की रक्षा
के लिये उनको अन्तिम ऋचा मिल गई। जब होता "चुपचाप
प्रार्थना" को कह लेता है तो यज्ञ समाप्त हो जाता है। "चुपचाप
प्रार्थना" करने पर होता के लिये यदि कोई बुरा कहे तो उससे
कहना चाहिये कि यह तेरे ही लिये हानि पहुँचावेगा। अब होता
पढ़ता है :—
“प्रातर्वाव वयमद्ये मं शस्ते तूष्णीं शंसे संस्थापयामः ।”
"आज प्रातःकाल हम इस चुपचाप प्रार्थना को कह कर
यज्ञ को समाप्त करते हैं।" जैसे घर में पाहुने का किसी कृत्य
के द्वारा स्वागत करते हैं उसी प्रकार यज्ञ का इस "चुपचाप
प्रार्थना' द्वारा स्वागत करते हैं। जो इस रहस्य को समझ कर
'चुपचाप प्रार्थना' के बाद होता को बुरा कहता है वह हानि
उठाता है। इसलिये जो इस रहस्य को समझता है उसको
"चुपचाप प्रार्थना" के बाद होता को बुरा नहीं कहना
चाहिये। (७)
३२—यह जो तूष्णी शंस या "चुपचाप प्रार्थना" है, वे सवनों
की आँखें हैं। "भूरग्निज्योतिः" “ज्योतिराग्निः" यह प्रातः सवन
की दो आँखें हैं। "इन्द्रोज्योतिः" “भुवो ज्योतिरिन्द्र" यह
दोपहर के सवन की दो आँखें हैं। "सूर्योंज्योतिर्ज्योतिः स्वः
सूर्यः" यह शाम के सवन की दो आँखें हैं। जो इस रहस्य को
समझता है वह आँखों वाले सवनों से समृद्धि को प्राप्त होता
है और आँखों वाले सवनों से स्वर्ग को जाता है।
यह जो "तूष्णी शंस" है वह यज्ञ की आँख है। हर प्रार्थना
में एक ही व्याहृति आती है पर वह दो बार बोली जाती है।
आँख है तो एक पर मालूम दो होती है।
यह जो "तूष्णी शंस" है, वह यज्ञ की जड़ है। जो कोई

१४२ [ दूसरी पञ्चिका
यजमान की जड़ खोदना चाहे वह "चुपचाप की प्रार्थना" न पढ़े
क्योंकि इसके न पढ़ने से यज्ञ बिना जड़ के हो जाता है और
यजमान यज्ञ के साथ ही नष्ट हो जाता है।
इस पर कहते हैं कि होता को यह प्रार्थना पढ़नी ही
चाहिये। यह ऋत्विज् के लाभ के लिये है, जो "तूष्णीं शंस"
पढ़ी जाती है। ऋत्विज् में ही यज्ञ प्रतिष्ठित है। और यज-
मान यज्ञ में प्रतिष्ठित है। इसलिये "चुपचाप प्रार्थना" पढ़नी
चाहिये। (८)
ऐतरेय ब्राह्मण की दूसरी पञ्चिका का चौथा अध्याय समाप्त

पाँचवाँ अध्याय
३३—आज्य शस्त्र के तीन भागों में से "आहाव" नामी
पहला ब्राह्मण है। "निविद्" नामी दूसरा क्षत्रिय है। "सूक्त"
० नामी तीसरा वैश्य है। आहाव के बाद निविद् को कह कर
होता ब्राह्मण को क्षत्रिय से मिला देता है। 'सूक्त' से पहले
निविद् को कहकर क्षत्रिय से वैश्य को मिला देता है। यदि
होता यजमान को क्षत्ररहित करना चाहे तो निविद् के मध्य में
सूक्त कह दे। ऐसा करने से वह उसको क्षत्र-रहित कर देता है।
यदि होता चाहे कि यजमान को वैश्य-रहित कर दे तो
सूक्त के मध्य में निविद् कह दे। ऐसा करने से वह यजमान
को वैश्य-रहित कर देता है।
अगर चाहे कि यजमान को ठीक ठीक सब वर्णों से मुक्त
रक्खे तो पहले आहाव कहे, फिर निविद्, फिर सूक्त। यही
ठीक ठीक क्रम है।
पहले अकेला प्रजापति ही था। उसने चाहा कि बहुत हो
जाऊँ। उसने तप तपा। उसने मौन धारण कर लिया। एक
( १४३ )

१४४ [ दूसरी पञ्चिका
वर्ष के पश्चात् उसने बारह पद कहे, यही बारह निविद् के पद
हैं। निविद् कहने के पश्चात् सब प्राणी उत्पन्न हुये।
इसको (कुत्स) ऋषि ने नीचे का मन्त्र पढ़ते हुये देखा—
स पूर्वया निविदा कव्यतायोरिमाः प्रजा अजनयन्मनूनाम्। विव-
स्वता चक्षसा द्यामपश्च देवा अग्निं धारयन् द्रविणोदाम्॥
(ऋ० १।९६।२)
"उस अग्नि ने पहले निविद् से और काव्य से मनुष्यों की
प्रजा को उत्पन्न किया। हर जगह चमकते हुये प्रकाश से द्यौ
और जलों को उत्पन्न किया। देवों ने धन देने वाले अग्नि को
धारण किया।" इसीलिये जब होता सूक्त से पहले निविद् को
कहता है तो उसे सन्तान का लाभ होता है। जो इस रहस्य को
समझता है उसको सन्तान और पशु की प्राप्ति होती है। (१)
३४—होता कहता है :
“अग्निर्देवेद्धः”
"अग्नि देवों से प्रज्वलित की गई"।
देवों की प्रज्वलित की हुई वह (स्वर्गीय) अग्नि है क्योंकि
उसको देवों ने प्रज्वलित किया है। इसी के द्वारा वह उस लोक
में इस अग्नि पर आधिपत्य प्राप्त करता है।
अब कहता है :
“अग्निर्मन्विद्धः”
"अग्नि मनुष्यों द्वारा प्रज्वलित की गई।"
मनुष्यों से प्रज्वलित की गई अग्नि यह (पृथ्वी) की अग्नि
है। क्योंकि मनुष्यों ने इसे जलाया है। इसके द्वारा वह इस
लोक की अग्नि पर आधिपत्य प्राप्त करता है।
अब वह कहता है :—
“अग्निः सुसमिद्”
"अग्नि जो अच्छी तरह प्रज्वलित करता है"। यह "अग्निः

पांचवाँ अध्याय ] १४५
सुशमित्" वायु है । वायु अपने द्वारा अपने को और जो कुछ
संसार में है उसको प्रज्वलित करता है । इसके द्वारा वह अन्त-
रिक्ष में वायु पर आधिपत्य प्राप्त करता है ।
अब कहता है :-
"होता देववृतः"
"देवों से वरण किया हुआ होता" ।
देवों से वरण किया हुआ होता वह ( स्वर्गीय ) अग्नि है ।
क्योंकि वह हर जगह देवों से वरण किया हुआ है । इस प्रकार
वह उस लोक में उस पर आधिपत्य प्राप्त करता है ।
अब वह कहता है :-
"होता मनुवृतः"
"मनुष्यों से वरण किया गया होता ।"
मनुष्यों से वरण किया हुआ होता यह (इस लोक की) अग्नि है ।
क्योंकि यह अग्नि हर जगह मनुष्यों द्वारा वरण की जाती है । इस
प्रकार होता इस लोक में इस अग्नि पर आधिपत्य प्राप्त करता है ।
अब वह कहता है :-
"प्रणीर्यज्ञानाम्"
"यज्ञों को ले जाने वाला" ।
वायु यज्ञों का ले जाने वाला है । जब वह चलता है तब
यज्ञ होता है तभी अग्निहोत्र होता है । इस प्रकार अन्तरिक्ष में
वायु पर आधिपत्य प्राप्त करता है ।
अब कहता है :-
"रथीरध्वराणाम्"
"अध्वरों का रथी ।"
अध्वरों का रथी वह (सूर्य्य) है । क्योंकि वह रथी के समान
चलता है । इस प्रकार होता इस अग्नि पर इस लोक में आधिपत्य
प्राप्त करता है ।
१०

१४६ [ दूसरी पञ्चिका
अब वह कहता है :-
"ऋतूर्तों होता"
"अपराजित होता" ।
यह अग्नि अपराजित होता है। क्योंकि कोई इसका
मुकाविला नहीं कर सकता। इस प्रकार होता इस लोक में इस
अग्नि पर आधिपत्य प्राप्त करता है।
अब वह कहता है :-
"तूर्णिर्हव्यवाट्"
"हव्य को ले जाने वाले वाहक" ।
हव्यों को ले जाने वाला वाहक वायु है। क्योंकि वायु सारे
संसार में शीघ्रता से बहता है। वह हवियों को देवों तक ले
जाता है। इस प्रकार वह अन्तरिक्ष में वायु पर आधिपत्य
पाता है।
अब वह कहता है :-
"आ देवो देवान् वक्षत् ।"
"देव देवों को लावें।"
वह देव ( स्वर्गीय अग्नि ) है जो देवों को यहां लाता है।
इस प्रकार वह उस लोक में उस अग्नि पर आधिपत्य प्राप्त
करता है।
अब वह कहता है :-
"यक्षादग्निर्देवो देवान् ।"
"अग्नि देव देवों के प्रति मन्त्र बोले।"
देवों के प्रति मन्त्र बोलने वाला यह अग्नि है। इस प्रकार
वह इस लोक में अग्नि पर आधिपत्य प्राप्त करता है।
अब वह कहता है :-
"सो अध्वराकरति जातवेदाः ।"
"वह जातवेद पवित्र आहुति को बनावे।"