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सर्वकोश
ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

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१२८ [ दूसरी पञ्चिका
एमा अग्मन् रेवतीर्जीवधन्या अध्वर्यवः सादयता सखायः ।
नि बर्हिषि धत्तन सोम्यासोऽपां नप्त्रा संविदानास एनाः ॥
( ऋ० १०।३०।१४ )
और जब जलों को वेदी में रख चुकता है तो नीचे के मंत्र
पढ़ता है :—
आगमन्नाप उशतीर्बर्हिरेदं न्यध्वरे असदन् देवयन्तीः । अध्वर्यवः
सुनुतेन्द्राय सोममभूदुवः सुशका देवयज्या ॥ ( २ ) (ऋ० १०।३०।१५)
२१—प्रातरनुवाक यज्ञ का शिर है। उपांशु और अंतर्याम
प्राण और अपान है। ( उपांशु और अंतर्याम दो घड़े होते हैं
जिनमें सोम रस रक्खा जाता है। घड़ों को उपांशु पात्र और
अंतर्याम पात्र कहते हैं। और घड़ों के ऊपर जो छोटे प्याले से
होते हैं उनको उपांशु ग्रह और अंतर्याम ग्रह कहते हैं )। वाणी
वज्र है। जब उपांशु और अंतर्याम से आहुतियां दी जाती हों
तो होता शब्द न बोले। यदि वह बोलेगा तो इस वाणी रूपी
वज्र के द्वारा यजमान के प्राण ले लेगा। यदि बोल पड़े तो किसी
अन्य को चाहिये कि होता से कहदे कि तुमने वाणी बोलकर
वाणी रूपी वज्र से होता के प्राण ले लिये अब तुम्हारे प्राण भी
चले जायँगे। सदा ऐसा ही होता है। इस लिये जब उपांशु और
अंतर्याम से आहुतियां दी जायं तो होता वाणी को न निकाले।
जब उपांशु से आहुति दी जा चुके तो वह यह बोले :—
“प्राणं यच्छ स्वाहा त्वा सुह्व सूर्याय ।”
अर्थात् “प्राण को ले । स्वाहा । हे अच्छी प्रकार बुलाने
वाली वाणी, तुझको सूर्य के लिये छोड़ता हूँ ।”
अब वह प्राण को खींचे और कहे, “हे प्राण, मुझ में प्राण
धारण करा ।”
जब अंतर्याम ग्रह से आहुति दी जा चुके तो वह बोले :—
“अपानं यच्छ स्वाहा त्वा सुह्व सूर्याय ।”