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सर्वकोश
ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

पृष्ठ 155, कुल 592 में से

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पृष्ठ 155

चौथा अध्याय ] १४१
इस प्रकार "चुपचाप प्रार्थना" से उन्होंने यज्ञ समाप्त किया ।
इस प्रकार "चुपचाप प्रार्थना" से यज्ञ को समाप्त करके यज्ञ की रक्षा
के लिये उनको अन्तिम ऋचा मिल गई। जब होता "चुपचाप
प्रार्थना" को कह लेता है तो यज्ञ समाप्त हो जाता है। "चुपचाप
प्रार्थना" करने पर होता के लिये यदि कोई बुरा कहे तो उससे
कहना चाहिये कि यह तेरे ही लिये हानि पहुँचावेगा। अब होता
पढ़ता है :—
“प्रातर्वाव वयमद्ये मं शस्ते तूष्णीं शंसे संस्थापयामः ।”
"आज प्रातःकाल हम इस चुपचाप प्रार्थना को कह कर
यज्ञ को समाप्त करते हैं।" जैसे घर में पाहुने का किसी कृत्य
के द्वारा स्वागत करते हैं उसी प्रकार यज्ञ का इस "चुपचाप
प्रार्थना' द्वारा स्वागत करते हैं। जो इस रहस्य को समझ कर
'चुपचाप प्रार्थना' के बाद होता को बुरा कहता है वह हानि
उठाता है। इसलिये जो इस रहस्य को समझता है उसको
"चुपचाप प्रार्थना" के बाद होता को बुरा नहीं कहना
चाहिये। (७)
३२—यह जो तूष्णी शंस या "चुपचाप प्रार्थना" है, वे सवनों
की आँखें हैं। "भूरग्निज्योतिः" “ज्योतिराग्निः" यह प्रातः सवन
की दो आँखें हैं। "इन्द्रोज्योतिः" “भुवो ज्योतिरिन्द्र" यह
दोपहर के सवन की दो आँखें हैं। "सूर्योंज्योतिर्ज्योतिः स्वः
सूर्यः" यह शाम के सवन की दो आँखें हैं। जो इस रहस्य को
समझता है वह आँखों वाले सवनों से समृद्धि को प्राप्त होता
है और आँखों वाले सवनों से स्वर्ग को जाता है।
यह जो "तूष्णी शंस" है वह यज्ञ की आँख है। हर प्रार्थना
में एक ही व्याहृति आती है पर वह दो बार बोली जाती है।
आँख है तो एक पर मालूम दो होती है।
यह जो "तूष्णी शंस" है, वह यज्ञ की जड़ है। जो कोई